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कहानी- इतनी सी बात (Short Story- Itani Si Baat)

"अरी पगली, आज के इस आपाधापी के युग में प्यार दुर्लभ हो गया है. किसी के भी पास किसी को प्यार देने का समय नहीं है. भावनाएं मर रही हैं. हम सब भौतिकता के अंधे कुएं में डूब रहे हैं. ऐसे में निःस्वार्थ प्रेम की वर्षा से नहलाने वाला एक भी प्राणी मिल जाए तो सबको अच्छा लगता है."

सरला सोच में डूबी थी. मृदुला भाभी का कहा गया वाक्य, " हैं न तुम्हारी बुआ बुद्धू..." उसके मन पर हथौडे सा बजने लगा, घबराकर उसने अपने कान बंद कर लिए. सोचने लगी कि ग़लती कहां हुई? क्यों वह बुद्धू बुआ कहलाई? क्या प्यार करना गुनाह है? क्या रिश्तेदारों का सुख-दुख बांटना बुद्धूपना है? इस वाक्य ने उसे झकझोर कर रख दिया. सरला रुआंसी हो गई. चुपचाप लेट गई, तब भी उसे चैन नहीं मिला, घबराकर उठ बैठी और तुरंत निर्णय लिया कि अब यहां एक पल भी नहीं रहना है, अपने घर जाना है. बस उसने फटाफट अपने कपड़े अटैची में ठूसने शुरू कर दिए. बच्चों ने देखा तो दौडकर आए और सरला से लिपट गए, बोले, "बुआ हम आपको नहीं जाने देंगे, आप जाने की तैयारी क्यों कर रही हैं?" बच्चे मचल रहे थे, बुआ उन्हें प्यार से समझा रही थी. बच्चों की जान बुआ में बसती है, उनका शोर सुनकर मृदुला दौड़ी आई. पीछे-पीछे सरला का भाई श्रीकांत भी आ गया.

अपनी बहन का उतरा चेहरा देखकर श्रीकांत घबरा गया. वह बहन के स्वभाव से वाक़िफ था कि ज़रा सी बात पर सरला उदास नहीं होने वाली. मृदुला चिंतित होकर पूछने लगी, "जीजी, क्या हुआ? आप जाने की तैयारी क्यों कर रही हैं? आप तो आठ-दस दिन के लिए आई हैं न. आप संगीत संध्या के कार्यक्रम सुनना चाह रही थीं ना हमने उसके टिकट भी मंगवा लिए हैं. आपके पसंदीदा सरोद वादक यहां पधार रहे हैं. क़िस्मत वालों को ही उनका संगीत वादन सुनना नसीब होता है."

सरला ने रुखाई से कहा, "अब मैं अपने घर जा रही हूं. तुम्हारे जीजाजी परेशान हो रहे होंगे."

उसकी बात सुनकर बच्चे सरला की टांगों से लिपट गए, बोले, "हम आपको इतनी जल्दी नहीं जाने देंगे."

सरला ने दोनों बच्चों को बांहों में समेट लिया और बोली, "तुम्हारे फूफाजी को खाना कौन बनाकर खिलाएगा? उनके कपड़े कौन धोएगा?"

इस पर बच्चों ने भोलेपन से कहा कि तो फिर उन्हें भी यहीं बुला लीजिए. सरला ने प्यार से उनके गाल थपथपाते हुए कहा कि फिर वह दफ़्तर कैसे जाएंगे?

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बच्चे नहीं माने फिर मचलने लगे, "हमें नहीं पता, बस हम आपको जाने नहीं देंगे. हमें कहानी कौन सुनाएगा? हमें अच्छी अच्छी चीज़ें बनाकर कौन खिलाएगा? मम्मी को तो अपने दफ़्तर से ही छु‌ट्टी नहीं मिलती. इतना थककर आती हैं कि कुछ भी बनाने को कहो तो डांट देती हैं."

सरला ने उन्हें प्यार से समझाया, "देखो न, मैं यहां बढ़िया-बढिया पकवान बना रही हूं, खा रही हूं, खिला रही हूं और वहां तुम्हारे फूफाजी बेचारे ब्रेड और दलिया तो कभी खिचड़ी पर ही गुज़ारा कर रहे होंगे." इस बात पर बच्बों ने मुंह फुला लिया.

मृदुला बोली, "जीजी, हमारे ननदोई जी को तो आदत है. वह अक्सर अकेले ही रहते हैं. आप उन्हें अकेले छोड़कर सब रिश्तेदारों के सुख-दुख में मदद करने पहुंच जाती है. आप कितनी अच्छी हैं जीजी और जीजा जी भी कितने ग्रेट हैं कि आपको कहीं भी आने-जाने से रोकते नहीं हैं."

सरला अंदर से भरी बैठी थी, बोली, "ग्रेट-वेट नहीं हैं तुम्हारे जीजाजी, बुद्धू हैं. क्यों नहीं रोकते मुझे बार-बार बाहर आने-जाने से. मुझे भी इस तरह से बार-बार घर छोड़कर नहीं जाना चाहिए. मैं भी तुम सब के अंधे मोह में डूबी रहती हूं. बस किसी का भी फोन या पत्र आए मैं चल पड़ती हूं."

मृदुला ने कहा, "जीजी यह तो हम सबका सौभाग्य है कि आप जैसी स्नेही बहन हमें मिली. मैं कैसे भूल सकती हूं जीजी, जब मेरे यह जुड़वां रिक्की-निक्कू हुए आप कैसे घबराकर दौड़ी आई थीं. उस समय हमें ऐसा लगा कि मानो हमें मसीहा मिल गया हो. हम सबने बहुत तंग किया है आपको हमेशा."

"नहीं मृदुला, ऐसा नहीं है..." सरला भावुक हो गई, "उस समय मेरा आना ज़रूरी था. मेरा कर्तव्य भी था. मैने सोचा था कि मेरी मां अकेले सब कैसे संभालेगी? भैया तो कुछ जानता ही नहीं, ऐसे में तो उसके हाथ-पांव ठंडे हो जाते हैं."

"हां जीजी", श्रीकांत ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला ही था कि सरला बोली, "नहीं भैया, आज पहले मुझे ही कह लेने दो. हां, तो मृदुला तुम्हारे बच्चों से निपटी तो छुटकी की चि‌ट्ठी आ गई. उसने लिखा था, "दीदी, न तो मेरी सास है, न ननद, बस आपका ही सहारा है. उसके घर जाना पड़ा. उसकी बिटिया बीस दिन की हो गई, तब मैं वहां से वापस लौट सकी. इसके बाद बड़ी दीदी का ऑपरेशन होना था, वहां मैं अपना फ़र्ज़ समझकर गई.

कहानी- इतनी सी बात

इस तरह मैं बार-बार कभी जेठानी के लिए तो कभी देवरानी के लिए, कभी बहन के लिए तो कभी मां और भाई के लिए दौड़ती ही रही. बहन-भाइयों से फ़ुर्सत पाई तो अब अपने बच्चे दौड़ाते रहते हैं. सब मुझे सुलभ मानकर बुलाते रहे, मैं जाती रही. तुम्हारे जीजाजी भी मेरी हर ज़िद के आगे झुकते रहे." सरला ने लंबी सांस ली.

"मृदुला, सार यह है कि दूसरों की नज़र में अच्छी बुआ, अच्छी मौसी, अच्छी चाची, अच्छी बहन, अच्छी ननद बनने के चक्कर में शायद मैं अपने बच्चों और पति के प्रति अन्याय करती रही और न अच्छी मां बन सकी, न अच्छी पत्नी. सबकी सेवा मैंने अपना धर्म माना, सबके काम आना पूजा समझा, सबका हित करती मैं अपना स्वास्थ्य भी गंवा रही हूं. पति व बच्चों को दूसरों के सहारे छोड़कर मैं यहां-वहां भागती रही. पुण्य कमाती रही. यह तो कहो कि मेरी पड़ोसने सदा ही मुझे बहनों जैसी मिलीं. उन्होंने हमेशा मेरे बच्चों व पति का ध्यान रखा."

मृदुला व श्रीकांत स्तब्ध से सब सुन रहे थे. उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि जीजी कितना कुछ अपने भीतर छुपाए रहीं. श्रीकांत की आंखें भर आईं. बहन के प्रति उसकी श्रद्धा पहले भी थी, अब और बढ़ गई. भावावेग से उसका गला रुंध सा गया. बोला, "जीजी, यह भी तो सोचिए कि आप हमारे व बच्चों के दिलों पर राज करती हैं. जहां भी आप जाती हैं लोग राहत की सांस लेते हैं, कहते हैं, लो अब सरला आ गई, चिंता की कोई बात नहीं."

मृदुला बोली, "जीजी जिस प्यार व अपनेपन से आप सबके साथ व्यवहार करती हैं वह हर किसी के बस का नहीं, आपके आने से सब प्रसन्न हो उठते हैं. यह क्या बड़ी उपलब्धि नहीं है जीजी. शादी-ब्याह हो या मरना-जीना आपके बिना सब अधूरा है."

सरला ने कहा, "यह तो ठीक है पर सोचो तो मृदुला इन सबकी मैंने कितनी बड़ी क़ीमत चुकाई है. कभी किसी को पराया नहीं समझा, पर आज तुम्हारे कहे गए एक वाक्य ने मेरा स्वाभिमान जगा दिया है, मुझे बड़ी ठेस लगी है."

मृदुला व श्रीकांत पूछ-पूछकर थक गए कि सरला को मृदुला के कौन से वाक्य ने इतना आहत कर दिया कि वे इतनी दुखी हो गई हैं कि तुरंत घर जाना चाहती है. सरला ने चुप्पी साध रखी थी. सरला के जाते वक़्त श्रीकांत व मृदुला ठगे से खड़े थे. उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था.

सरला को अप्रत्याशित रूप से घर में आया देखकर उसके पति सुमंत हैरान रह गए, "यह क्या सरला, न फोन न चिट्ठी, अचानक कैसे चली आई?" उन्होंने पूछा.

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सरला पति की बांहों में बिलख-बिलख कर रोने लगी. सुमंत समझ नहीं पाए कि यह बिन बादल बरसात कैसे हो रही है. वे समझ गए, अवश्य कहीं कुछ गड़बड़ है.

उन्होंने प्यार से सरला का सिर सहलाया, आंसू पोंछे, पानी पिलाया फिर पूछा, "क्यों देवीजी, क्या भैया-भाभी से लड़कर आई हो?"

सरला तनिक आवेश में बोली, "क्या आप समझते हैं कि में कभी किसी से लड़ सकती हूं?"

सुमंत हंसकर बोले, "हां भई, हम यह तो भूल गए कि हमारी सरला यथा नाम तथा गुणों वाली सरल व भोली-भाली है, किसी की बात बुरी लगेगी भी, तो हमारे ही पहलू में छुपकर रो लेगी, पर लड़ेगी नहीं, हम जानते हैं, हमारी प्यारी सरला लाखों में एक है. सुंदर, सुशील, दयावान, तन, मन, धन से सबके काम आने वाली, पर यह तो बताओ कि आख़िर वहां हुआ क्या, जो तुम यूं अचानक चली आई?"

सरला, जो पति का स्नेहभरा स्पर्श पाकर संभली थी, फिर द्रवित हो उठी. उसे फिर रुलाई आ गई. किसी का कहा गया एक छोटा सा वाक्य भी कितनी बड़ी चोट दे जाता है, यह सरला ने आज ही जाना. उस एक वाक्य की चोट से वह भीतर तक आहत थी.

सुमंत की समझ में नहीं आ रहा था कि हर समस्या का समाधान चुटकियों में करने वाली उनकी सरला किस भंवरजाल में फंस गई. सुमंत ने उसे जी भरकर रो लेने दिया. जब वह कुछ संभली तो सुमंत ने फिर अपना सवाल दोहराया.

सरला ने बताया कि आज सुबह जब में नहाकर निकली तो मृदुला भैया व बच्चों से मेरे ही विषय में कुछ कह रही थी. मैं जानती हूं सुमंत कि चोरी-छिपे किसी की बात सुनना अशिष्टता है, पर मेरा नाम लिया जा रहा था, इस कारण मैं सुनने का लोभसंवरण न कर सकी. श्रीकांत कह रहा था, "जीजी कितनी अच्छी हैं. कितनी मेहनती हैं. कितना काम करती हैं." रिक्की-निक्कू बोले, "हां बुआ जब भी आती हैं, मम्मी के तो मज़े हो जाते हैं. सबको गरमागरम खाना खिलाती हैं. सारा घर संभालती हैं. कितना प्यार करती हैं बुआ सबको." मृदुला बोली, "हां भई यह तो सच बात है. जीजी तो बस जीजी ही हैं. दिन-रात काम करते थकती नहीं, बस एक साड़ी और ढेर सारा प्यार दे दो तो तुम्हारी बुआ जान भी क़ुर्बान कर दें, हैं न बुद्धू तुम्हारी बुआ."

कहानी- इतनी सी बात

"बस, सुमंत इसके आगे मैं सुन न सकी, यह बात तीर की भांति मेरे हृदय को घायल कर गई. मुझे क्या साड़ियों की कमी है? अपने घर में मुझे कौन सा सुख नहीं है? क्या मैं वहां दिन-रात बस एक साड़ी के लिए ही खटती रहती हूं? तुम्हीं बताओ सुमंत, क्या मैं उनकी नौकरानी हूं? क्या समझते हैं सब ख़ुद को?"

सरला के आवेश पर ठंडे पानी सा छींटा मारते सुमंत ठठाकर हंस पड़े. बोले, "ओहो, हमारी सरला तो सचमुच बुद्धू है." सुमंत ने बांहों का घेरा कसते हुए सरला से कहा,

"यह तो बताओ सरला कि मृदुला ने एक साड़ी और ढेर सारा प्यार भी मिले कहा ना... तुम ढेर सारे प्यार को क्यों भूल बैठी? तुम श्रीकांत व बच्चों की बातों पर भी तो ध्यान दो. तुम जहां भी जाती हो लोगों की बांछें खिल जाती हैं." सुमंत भावुक हो उठे, बोले, "अरी पगली, आज के इस आपाधापी के युग में प्यार दुर्लभ हो गया है. किसी के भी पास किसी को प्यार देने का समय नहीं है. भावनाएं मर रही हैं. हम सब भौतिकता के अंधे कुएं में डूब रहे हैं. ऐसे में निःस्वार्थ प्रेम की वर्षा से नहलाने वाला एक भी प्राणी मिल जाए तो सबको अच्छा लगता है."

सरला बोली, "यह मैं नहीं जानती, मैं तुम्हारी तरह विद्वान नहीं हूं. इन चक्करों में तुम्हारी व बच्चों की कितनी अवहेलना हुई है. मैं आज समझ सकी हूं."

सुमंत ने उसके गालों पर चपत लगाते हुए कहा, "तुम्हारे बच्चे भी तुम्हारे पद‌चिह्नों पर चल रहे हैं. तुम्हारे बच्चों ने मृत्यु पर पड़े लोगों को दो बार रक्त तक दिया है. रक्त दिया है, कहना आसान है, पर देना बहुत कठिन, अक्सर अपने घर के सदस्य ही रक्त देने के नाम पर आंखें चुराने लगते हैं, पर हमारे बच्चे हंसते-हंसते हर किसी के लिए आगे आते हैं. यह सब तुम्हारे दिए संस्कारों का ही फल है. रही मेरी परेशानी की बात, तो यदि छोटी-मोटी परेशानियों को झेलकर मैं तुम्हें दूसरों के सुख-दुख में शामिल होने के लिए स्वतंत्र कर देता हूं, तो यह कोई महंगा सौदा नहीं है. तुम्हारी तारीफ करने के साथ ही सब यह कहना नहीं भूलते कि असली त्याग तो सुमंत करता है. बेचारा रूखी सूखी खाकर पत्नी को हर जगह भेज देता है. सरला रानी, यदि मनुष्य का जीवन पाया है तो सबके काम आना ही चाहिए, चाहे किसी भी तरह."

सरला को पति की बातें अच्छी लगी, उसके मन का बोझ कुछ हल्का हुआ. सुमंत ने उससे कहा कि अब प्रण करो कि हम सब इसी तरह सबके काम आते रहेंगे. सरला फूल सी हल्की हो गई थी, बोली, "हां, मैं भी संकल्प लेती हूं." सुमंत बोले, "चलो इसी बात पर चाय हो जाए, चाय पीकर मैं तुम्हारे भैया को फोन करता हूं."

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सरला हाथ-मुंह धोकर रसोई की ओर जा ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी बजी. सुमंत ने दरवाज़ा खोला तो मृदुला व श्रीकांत घबराए से खड़े थे. सुमंत ने श्रीकांत को बांहों में भर लिया, श्रीकांत बोला, "जीजाजी, जीजी को न जाने क्या हुआ कि अचानक वहां से चल पड़ीं, हमारी एक नहीं सुनी. यहां तक कि हमें तैयार होने की भी मोहलत नहीं दी कि हम स्वयं उन्हें बस पर ही चढ़ा आते. हमसे रहा नहीं गया, हम बच्चों को पड़ोसियों के पास छोड़कर पीछे-पीछे चले आए. कुछ बता ही नहीं रही थीं. आप ही पूछिए जीजाजी इनसे कि ये हमसे क्यों रूठ कर आ गईं."

मृदुला हाथ जोड़कर बोली, "जीजी, आपके पांव पड़ते हैं, हमारी भूल तो बता दीजिए. चाहे जो भी दंड हमें दीजिए, पर हमसे रूठीए नहीं. हम आपका रूठना सहन न कर सकेंगे. बच्चों का भी रो-रोकर बुरा हाल हो रहा है."

सुमंत ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया और बोला,

"अरे कुछ नहीं हुआ. तुम्हारी जीजी ने एक बुरा सपना देखा था, तभी भागी चली आई. मुझे ठीक-ठाक देखा तो ख़ुश हो गई. हमारी सरला तो पगली है. कुछ भी कर बैठती हैं."

मृदुला ने राहत की सांस ली और धम्म से सोफे पर बैठ गई, बोली, "हे भगवाना जीजी, आपने तो हद कर दी. मैं आज सुबह ही बच्चों से कह रही थी कि तुम्हारी बुआ बुद्धू हैं." सरला और सुमंत ने एक-दूसरे को अर्थपूर्ण दृष्टि से देखा और दोनों ठठाकर हंस पड़े.

- सरबजीत

कहानी- इतनी सी बात

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