"सर मुझे एक लड़की से 'आई लव यू' कहना है. आप इस विषय में यदि मुझे गाइड कर सकें, तो आपकी मुझ पर बड़ी मेहरबानी होगी."
बात उन दिनों की है, जब मैं बंबई में रहा करता था. एक दिन प्रातःकाल जब मैं चाय की चुस्कियां लेता हुआ अख़बार पढ़ रहा था, तभी अचानक कॉलबेल बजी. मैंने तुरंत उठकर दरवाज़ा खोला तो सामने लगभग बाईस तेईस वर्ष की उम्र के एक नवयुवक को खड़ा पाया. उसने स्वयं अपना परिचय देते हुए मुझे बताया कि वह पास ही में स्थित एक छोटी सी कॉलोनी में रहता है. उसका नाम कमलेश है एवं वह मुझसे एक महत्वपूर्ण मसले पर मार्गदर्शन लेने आया है.
मैंने उसे अन्दर बुलाकर बरामदे में पड़ी कुर्सी पर बैठने को कहा. तदुपरांत मैंने उससे पूछा कि वह किस विषय में मुझसे सलाह लेना चाहता है? वह बोला, "सर मुझे एक लड़की से 'आई लव यू' कहना है. आप इस विषय में यदि मुझे गाइड कर सकें, तो आपकी मुझ पर बड़ी मेहरबानी होगी."
उसके इस अनुरोध को सुनकर मुझे बहुत क्रोध आया. मैंने उसकी वेशभूषा पर ध्यान दिया, वह मैली पैंट एवं शर्ट पहने हुए था, जो दी-तीन जगहों पर फटी हुई भी थी. मैंने उसे जाने का इशारा करते हुए कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे इस तरह की बेहूदा बात कहने की? तुम तुरंत यहां से दफ़ा हो जाओ और आइन्दा इस घर में कभी कदम मत रखना."
मेरे इतना कहते ही वह युवक फूट-फूटकर रोने लगा एवं रोते-रोते मेरे पैरों पर गिर पड़ा और बोला, "सर, घर में बहुत गरीबी है, पिताजी लकवे के मरीज़ हैं. मां थोड़ा बहुत सिलाई-बुनाई कर कुछ कमाती है एवं मैं बी.ए. पास बेरोज़गार हूं. मुझ पर दया कीजिए. सर, उस लड़की को 'आई लव यू' कहना मेरे लिए जीवन-मरण का प्रश्न है."
"घर में जब ऐसे हालात हैं, तो तुम्हें यह इश्क़ फ़रमाने की कैसे सूझी?" मैने उससे पूछा.
"मैं इश्क़ नहीं फ़रमा रहा हूं सर. मैंने तो उस लड़की को देखा तक नहीं है. उसे 'आई लव यू' कहने से मुझे नौकरी मिल जाएगी सर." उसने दीनता से कहा,
मुझे वह युवक कुछ पागल जैसा प्रतीत हुआ, क्योंकि उसकी बातें ही विचित्र प्रकार की थीं. अतः मैंने उसे टालने के मूड में कहा, "देखो भाई, मुझे तो तुम्हारी बातें ज़रा भी समझ में नहीं आ रही है. अतः या तो तुम पूरी बात मुझे समझाओ या फिर चलते बनो,"
इसी बीच मेरी पत्नी चाय लेकर आ गई. चाय पीते समय उस युवक ने जेब से अख़बार की एक कटिंग निकालकर मुझे देते हुए कहा, "इसे पढ़ लीजिए सर, इससे आपको पूरी जानकारी मिल जाएगी. मैंने देखा कि वह एक स्थानीय अख़बार में छपे वैवाहिक विज्ञापन की कटिंग थी, जिसे शहर के जाने-माने रईस सेठ धनपतलाल जी ने अपनी पुत्री सुलक्षणा के विवाह के लिए छपवाया था.
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विज्ञापन में लिखी बातें कुछ इस प्रकार- सेठ धनपतलाल की इकलौती बेटी- २१ वर्षीया, बी.ए. पास, सुंदर, सुशील एवं गृह कार्यों में दक्ष कन्या सुलक्षणा के विवाह हेतु विवाह प्रस्ताव आमंत्रित है. सुलक्षणा विकलांग है, क्योंकि एक सड़क दुर्घटना में वह अपना एक पैर खो चुकी है. इच्छुक प्रत्याशी यदि निर्धन होगा तो भी कोई बात नहीं. शर्त केवल इतनी है कि उस प्रत्याशी युवक को सुलक्षणा से केवल एक मुलाक़ात में ही उसे विश्वास दिलाना होगा कि वह न तो उसकी दौलत की ख़ातिर उससे शादी कर रहा है और न ही उसकी विकलांगता पर तरस खाकर उससे शादी के लिए तैयार हुआ है. उसे यह भी विश्वास दिलाना होगा कि वह सुलक्षणा को सच्चे दिल से प्यार करता है. विवाह के पश्चात् युवक के लिए उसकी इच्छा के अनुसार नौकरी या व्यापार की व्यवस्था की गारंटी. जाति, धर्म, भाषा एवं उम्र का कोई बंधन नहीं. कृपया शीघ्र संपर्क करें.
पता- सेठ धनपतलाल, पोस्ट बॉक्स नं. २०५, बंबई-३२
इस विज्ञापन को पढ़ने के बाद मैंने कमलेश से पूछा कि वह मुझसे क्या सहायता चाहता है? उसने कहा, "सर, मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा है कि मैं उससे कैसे बात करूंगा एवं किन शब्दों में उसे विश्वास दिला पाऊंगा कि मैं न तो धन के लालच में एवं न ही उसकी विकलांगता पर तरस खाकर उससे शादी करने की सोच रहा हूं. इसके अलावा मैं कैसे उससे कह सकूंगा कि में उससे सच्चे दिल से प्यार करता हूं, क्योंकि ऐसा कहना ग़लत होगा. मैं तो केवल नौकरी की ख़ातिर ही उससे शादी कर रहा हूं."
परिस्थिति वाक़ई काफ़ी गंभीर थी. मैंने कमलेश से कहा, "मुझे भी यही लगता है कि तुम शायद ही उससे कुछ कह पाओगे. बेहतर यही होगा कि तुम अपनी भावनाएं एक पत्र में व्यक्त कर दो एवं वह पत्र उसे स्वयं देकर घर आ जाओ."
मैंने उससे यह भी कहा कि पत्र लिखने में यदि भाषा या व्याकरण संबंधी कोई कठिनाई हो तो वह यदि उचित समझे तो पत्र मुझे दिखा सकता है, मैं उसकी भाषा संबंधी ग़लतियां ठीक कर दूंगा. किन्तु कमलेश ने मुझसे कहा, "सर, मेरी हिन्दी अच्छी है. बी.ए. की परीक्षा में मुझे हिन्दी विषय में पैंसठ प्रतिशत अंक मिले थे. अतः पत्र लिखने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होगी. हां, आपके सुझाव के अनुसार मैं उसकी भाषा सही हो, इसका पूरा ध्यान रखूंगा."
इस घटना के तीन दिन बाद की बात है. मेरे घर के सामने एक कार आकर रुकी एवं उसमें से सेठ धनपतलाल जी उतरे. उन्होंने मुझसे कुछ बात करने की इच्छा प्रकट की. उन्होंने मुझसे पूछा, "क्या आप कमलेश नामक लड़के को जानते हैं?"
मैंने उन्हें बताया कि मैं उसे जानता तो हूं, किंतु उसके बारे में ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं है. इस पर उन्होंने कहा, "उस लड़के ने तीन दिन पहले सुलक्षणा से मिलकर उसे एक पत्र दिया था तथा परिचितों में उसने केवल आपका ही नाम एवं पता दिया था. यही कारण है कि हम आपसे चर्चा करने आए हैं. असल बात यह है कि सुलक्षणा कमलेश के पत्र को पढ़कर उससे बहुत प्रभावित हो गई है एवं उससे ही विवाह करने का फ़ैसला कर लिया है. अब हमें उसके घर जाकर उसके माता-पिता से बात करनी है."
"तो इसमें कठिनाई क्या है? फ़ौरन जाकर बात पक्की कर दीजिए." मैंने कहा.
"मार्ग में एक बहुत बड़ी कठिनाई है साहब, यह देखिए उसका पत्र और पढ़िए कि पत्र के अंत में उसने क्या शर्त रख दी है." धनपतलाल जी ने कहा.
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पत्र पढ़कर मैं कमलेश की बुद्धिमत्ता का प्रशंसक हो गया. उसका पत्र की इस प्रकार था-
आदरणीय सुलक्षणाजी,
आपके पिताजी के द्वारा आपके विवाह हेतु समाचार पत्र में दिए गए विज्ञापन में निहित शर्त के अंतर्गत में यह पत्र लिख रहा हूं. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरे पत्र में लिखी बातों पर शांत चित्त से, बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करें एवं तदुपरांत अपने माता-पिता से परामर्श करने के पश्चात् ही अंतिम निर्णय पर पहुंचे,
सर्वप्रथम तो मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि मैं आपकी विकलांगता पर तरस खाकर कतई आपसे शादी नहीं करना चाहता हूं. सच पूछिए तो आपसे अधिक विकलांग तो मैं हूं. आप तो केवल शारीरिक रूप से ही विकलांग हैं, किंतु मैं तो आर्थिक रूप से विकलांग हूं. यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन भी दूर नहीं, जब मैं मानसिक रूप से भी विकलांग हो जाऊंगा. मैं आपको स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूं कि मुझे आपके पिताजी की संपत्ति का कोई लालच नहीं है. मैं अपनी मेहनत की कमाई में ही गुज़ारा करना पसंद करता हूं, भले ही उसमें केवल एक वक़्त की रोटी का जुगाड़ ही क्यों न संभव हो. भूखे पेट सोना तो मुझ जैसे गरीबों की आदत में शुमार हो गया है.
जहां तक आपसे प्यार की बात है तो यदि मैं आपसे कहूं कि 'आई लव यू' तो इससे बड़ा झूठ एवं पाखंड दूसरा नहीं होगा, क्योंकि मैं जब आपसे कभी मिला ही नहीं तो प्यार करने का प्रश्न ही नहीं उठता. मैं आपको स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूं कि मैं आपसे विवाह हेतु केवल इसलिए सहमत हूं, क्योंकि ऐसा करने से मुझे आपके पिताजी नौकरी दिलवा देंगे. हां, मैं इतना वादा अवश्य करता हूं कि मेरी जो भी कमाई होगी, उसमें अपनी हैसियत के अनुसार आपको सुखी रखने का मैं भरसक प्रयास करूंगा.
अंत में मेरी भी एक छोटी सी शर्त है, वह यह कि यदि आप मुझसे विवाह हेतु अपनी सहमति देती हैं, तो आपको भी मुझे विश्वास दिलाना होगा कि आप मेरी गरीबी पर तरस खाकर मुझसे शादी नहीं कर रही हैं एवं आप मुझसे कभी भी घर जवाई बनने का आग्रह नहीं करेंगी. अगर मेरी यह शर्त आपको स्वीकार नहीं है तो इस प्रकरण को यहीं समाप्त समझने की कृपा करें.
पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में...
कमलेश
पत्र पढ़ने के उपरान्त मैने धनपतलालजी से पूछा कि अब इस मामले में भला मैं क्या कर सकता हूं? इस पर उन्होंने कहा, "मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि सुलक्षणा उसे कैसे विश्वास दिला सकती है कि वह उसकी गरीबी पर तरस खाकर उससे विवाह नहीं कर रही है. बल्कि सच्चे दिल से उसकी स्पष्टत्वादिता एवं बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर ही उससे विवाह हेतु सहमत है. मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप कृपया उसका इस विषय में मार्गदर्शन कीजिए."
"ठीक है, आप जाकर सुलक्षणा को मेरे पास ले आइए, मैं उससे इस विषय में बात करना चाहता हूं." मैंने धनपतलाल जी से कहा.
"सुलक्षणा तो अपनी मां के साथ बाहर कार में ही बैठी हुई है." धनपतलाल जी ने कहा.
यह सुनकर मैंने आश्चर्य से उनसे कहा, "आप भी कमाल करते हैं, भाभीजी और सुलक्षणा को बाहर कार में क्यों छोड़ दिया आपने? उन्हें भी अपने साथ अन्दर ले आते."
"साहब, बात यह है कि वे दोनों बेहद संकोची स्वभाव की हैं, इसीलिए मैने सोचा कि पहले मैं ही आपसे चर्चा कर लूं तो अधिक अच्छा होगा." धनपतलालजी ने कहा.
फिर मेरे अनुरोध पर धनपतलाल सुलक्षणा एवं उसकी मां को मेरे ड्राइंगरूम में ले आए, तत्पश्चात् हम सब चाय पीने लगे.
अब मैंने सुलक्षणा से कहा, "बेटी, अब तुम भी कमलेश को एक पत्र लिख दो, जिसे पढ़कर उसे लगे कि उसकी शर्त पूरी हो चुकी है."
"अंकल, मैं एक पत्र लिखकर लाई हूं, आप कृपया उसे देखकर बताइए कि यह पर्याप्त है या इसमें कुछ संशोधन की आवश्यकता है." सुलक्षणा ने कहा. मैंने जब सुलक्षणा के हाथ से पत्र लेकर पढ़ना आरंभ किया, तो मैं आश्चर्यचकित हो गया.
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उस लड़की ने पत्र में जो कुछ लिखा था, उससे बेहतर तो मैं भी नहीं लिख सकता था. उसके ख़त का अक्षरशः विवरण निम्नानुसार है-
आदरणीय कमलेश जी,
मैं आपके पत्र में लिखी गई बातों, आपके विचारों एवं सबसे अधिक आपकी स्पष्टवादिता से अत्याधिक प्रभावित हूं. रही बात आपकी शर्त को पूरा करने की, तो मैं केवल आपसे यही कह सकती हूं कि आपकी ग़रीबी पर तरस खाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है. जब आपने अपने पत्र में अपनी गरीबी का स्पष्ट उल्लेख कर ही दिया है, तो मैं सब कुछ जान-समझकर ही आपके साथ विवाह करने को तैयार हूं. मेरे पास ऐसा कोई भी साधन नहीं है, जिससे मैं अपनी बात की सत्यता प्रमाणित कर सके. यदि आप इस बारे में मेरी किसी तरह की परीक्षा लेना चाहें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी. जहां तक घरजवाई होने की बात है, यह बात न तो कभी मेरे दिमाग़ में आई है और न ही कभी आएगी. उपरोक्त दोनों बातों पर आपको मुझ पर भरोसा करना ही होगा, वरना अविश्वास के साये में विवाह करने से तो आजीवन कुंवारी रहना ही मैं बेहतर समझती हूं, आगे जैसी आपकी इच्छा.
सुलक्षणा
यह पत्र उसी समय सुलक्षणा अपने माता-पिता के साथ जाकर कमलेश को दे आई, वे लोग कमलेश के माता-पिता से भी मिले. शादी की तिथि भी निश्चित हो गई. किंतु विधि का विधान देखिए, मेरा तबादला दिल्ली हो गया एवं वहां अपनी व्यस्तता की वजह से मैं इस विवाह में सम्मिलित नहीं हो पाया.
लगभग एक वर्ष बाद कमलेश एवं सुलक्षणा दिल्ली स्थित मेरे निवास पर आए. दोनों काफ़ी प्रसन्न थे एवं उनकी गोद में एक नन्ही सी गुड़िया भी थी. मुझे यह जानकर बड़ी तसल्ली हुई कि मेरे द्वारा उन्हें दिया गया अनोखा मार्गदर्शन व्यर्थ सिद्ध नहीं हुआ.
- डॉ. पी. के. श्रीवास्तव

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