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कहानी- नीम का पेड़ (Short Story- Neem Ka Ped)

"देखा बेटा, यह पेड़ सबकी सुनता है. न कुछ कहता है, न कुछ मांगता है, बिल्कुल तेरी दादी की तरह. उसने भी ज़िंदगी के हर सुख-दुख में मेरा साथ दिया, कभी कोई गिला शिकवा नहीं किया."

अश्रुधारा रोके न रुक रही थी. मन की मलिनता व अपनों को खो देने का एहसास अपनी बीस वर्ष की उम्र में आज पहली बार हो रहा था. पोता होने के नाते दादाजी की चिता को अग्नि देने के साथ ही सही मायनों में मैं यह एहसास कर पाया था कि उनको मुझसे व मुझे उनसे कितना प्यार था.

दादी के पैरों में दर्द रहता था, पर दादी के रहते खाना, नाश्ता, चाय आदि सब कुछ नीम के पेड़ के नीचे होता था. यहां तक कि फ़ुर्सत के क्षणों में मैंने दादी व दादा को बातें करते भी उसी नीम के पेड़ तले देखा था.

मुझे याद है, दादी कभी-कभी झुंझलाहट में कह देती थीं, "मरा ये नीम का पेड़ न हुआ, मेरी सौत हो गई." यहां तक कि उस रात, जब दादी को दिल का दौरा पड़ा था और डॉक्टर ने जवाब दे दिया था, ददू कह रहे थे, "देखो, तुम मुझे यूं अकेला छोड़कर नहीं जा सकतीं." इस पर दादी बोलीं, "तुम अकेले कहां हो. बेटा, पोता, बहू सब तो हैं." और मुस्कुराकर बोलीं, "और वो मेरी सौत नीम का पेड़ भी तो है."

मैं दादी की वो तसल्ली भरी मुस्कान आज तक नहीं भूल पाया. उस दिन मैंने दादी की चिता के भी चक्कर लगाए थे, पर आज वाला एहसास न था.

"अरे... अरे क्या चक्कर लगाए ही चले जाएगा." रवि ने मेरा हाथ पकड़ा और हम दोनों तेज कदमों से सबके पीछे एक पेड़ की छांव में बैठ गए.

मैंने कहा, "चलो ददू खाना खा लो वरना मां फिर चिल्लाएगी."

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"चलो बेटा." मैंने देखा था, ददू खाना खाकर अक्सर दादी के पल्लू से ही हाथ पोंछते थे, आज मैंने भी खाने के बाद हाथ धुलाकर अपना कुर्ता आगे कर दिया. ददू मुस्कुराते हुए बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखकर बाहर खाट पर आकर लेट गए.

सच, दादी के बाद ददू के सुख-दुख का साथी वो पेड़ ही तो था. जब कभी ददू बहुत अकेला या उदास महसूस करते, तब उसी पेड़ के सामने बड़बड़ा कर सुकून महसूस करते थे, वहीं बैठे-बैठे आने-जाने वालों से बतियाते रहते थे. बच्चों को उस पेड़ की छांव में खेलते देख बड़े ख़ुश होते थे ददू.

एक दिन बता रहे थे कि वो नीम का पेड़ उनके दादा ने उनके जन्म के समय लगाया था और उनके दादा को भी उस नीम के पेड़ से उतना ही प्यार या जितना ददू से. ददू को भी तो उस नीम के पेड़ से कितना लगाव था. हर समय मुझे कहते रहते थे, "देखो बेटा, नीम की हवा स्वास्थ्य के लिए बड़ी लाभकारी होती है. इसका मंजन दांतों को मज़बूत व नीरोगी रखता है. इसके पत्तों को पानी में उबालकर उस पानी से नहाने से त्वचा स्वस्थ रहती है."

दोपहर की चाय मैं हमेशा ददू को उस पेड़ तले ही दिया करता था, उसके बाद उनके साथी-संगियों की दो-तीन घंटे की चौपाल जमा रहती थी. एक दिन सबके जाने के बाद  मुझसे बोले,

"देखा बेटा, यह पेड़ सबकी सुनता है. न कुछ कहता है, न कुछ मांगता है, बिल्कुल तेरी दादी की तरह, उसने भी ज़िंदगी के हर सुख-दुख में मेरा साथ दिया, कभी कोई गिला-शिकवा नहीं किया."

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एक दिन तो दादी मेरे सामने ही ददू से बोलीं, "जब मैं न रहूंगी तब इस पेड़ तले बैठकर अपनी बीती बातें याद करते रहना, दिन कट जाएंगे." शायद दादी के मुंह से अनायास ही कोई सच निकल गया. मेरी मां ने मेरे ददू व बापू को कभी दो घड़ी भी साथ बैठकर सुख-दुख बांटने नहीं दिया.

ददू पौ फटते ही उठकर नीम की टहनी दांतों में दबाकर सैर को निकल जाया करते थे, लौटकर बाहर ही बैठे चाय का इंतज़ार करते थे, क्योंकि जब मां उठती तभी चाय बनती थी, जबकि मैंने देखा था, दादी जल्दी उठकर सुबह का काम निपटाकर चाय बना, पेड़ के नीचे बैठी ददू का रास्ता देखती थीं.

अभी कुछ दिन पहले ही मैंने ही ददू को ख़बर दी थी कि सरपंच जी के साथ कुछ शहरी बाबू लोग आए हैं. वे लोग कुछ नाप-जोख करते हुए घर के बाहर तक आ पहुंचे थे, उनमें से एक बोला, "ये पेड़ हटवाना पड़ेगा. दो-चार दिन में इसे कटवा दीजिए."

शाम को जब सरपंच जी उधर से गुज़रे तो ददू बड़े अनुनय विनय से बोले, "क्या इस पेड़ को काटे बिना काम नहीं चल सकता?"

इतने में मेरे बापू बाहर आते हुए बोले, "आप भी क्या बात करते हैं, इतने वर्षों बाद तो सरकार इस गांव में सड़क बनवा रही है और आप इस पेड़ का रोना लेकर बैठ गए. पता है इस पेड़ के कटने से अपने मकान की क़ीमत कितनी बढ़ जाएगी." दद्दू चुप हो गए.

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गर्मियों में अक्सर ददू उसी पेड़ के नीचे सोया करते थे. उस रात भी मैं और वे, वहीं सोएं, पर दोनों की आंखों में नींद नहीं थी. तभी किसी के बोलने की आवाज़ आई, ध्यान से सुनना चाहा तो पता लगा, बापू मां से कह रहे थे, "पेड़ के काटे जाने की बात से पिताजी बड़े दुखी हैं." इस पर मां बोली, "क्या तुम्हारे पिता के प्राण इसी पेड़ में बसे हैं कि पेड़ कट जाने से प्राण ही छूट जाएंगे." और एक व्यंग्यपूर्ण हंसी.

ददू अपने आपसे बोले, "पेड़ के कट जाने पर मेरा समय कैसे कटेगा." एक ठंडी आह...

पर पेड़ की व्यथा देखो, इन्सानों के हाथों मजबूर होने पर अपने प्राण त्याग तो देता है, पर अपनी जन्मभूमि में अपनी जड़ें दफ़न कर देता है. चिड़ियों की चहचहाहट से जब मेरी नींद खुली तो देखा, आज ददू सैर पर नहीं गए. मैंने उन्हें हिलाकर उठाना चाहा तो देखा ददू का शरीर एकदम ढीला व ठंडा पड़ चुका है. मैं फटे नेत्रों से उन्हें देखता रहा. पता नहीं ददू के प्राण इस पेड़ में बसे थे या पेड़ के प्राण ददू में, वैसे भी ददू इस पेड़ को कटता नहीं देख सकते थे.

मैं सोच ही रहा था कि रवि ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला, "अब बस भी कर, अब तो ददू की चिता की अग्नि भी शांत हो गई है."

मैं सबके साथ इस निश्चय से घर लौटा कि ददू को सही अर्थों में श्रद्धांजलि तभी दे पाऊंगा जब घर के आंगन में एक नीम का पेड़ लगाऊंगा. यह एक संयोग ही होगा कि एक नीम का पेड़ ददू के जन्म की ख़ुशी में था, तो दूसरा उनके प्रति श्रद्धांजलि का प्रतीक होगा.

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