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उनके दर्द को शायद उनसे बेहतर कोई नहीं समझ पाए.. आख़िर ट्रांसजेंडर की ये कैसी त्रासदी, उन पर आधारित फिल्मों पर एक नज़र… (Perhaps no one can understand their pain better than them.. What kind of tragedy is this of transgender people, a look at the films based on them)

उनकी अपनी एक अलग ही दुनिया होती है, जहां उनका दर्द और ख़ुशी दोनों ही कभी अकेले तो कभी महफ़िल में वे साझा करते रहे हैं. जी हां, किन्नरों की यही तो आपबीती रही है.

transgender people in films

मेरी सहेली के इस पॉडकास्ट में जानेंगे एक ऐसी दर्दभरी दास्तान जो सोचने के साथ-साथ आंखें भी नम कर देंगी. पूरा पॉडकास्ट देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें-

जब भी ट्रांसजेंडर पर कोई भी फिल्म, सीन या फिर गाना ही क्यों न हो तो उसने काफ़ी सुर्ख़ियां बटोरी है. महमूद की फिल्म ‘कुंआरा बाप’ का गाना सज रही गली मेरी मां सुनहरी गोटे में... इस कदर मशहूर हुआ था कि आज भी लोगों की ज़ुबां पर है. समय-समय पर कई फिल्मों में इनके क़िरदार काफ़ी मशहूर हुए.

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'सड़क' फिल्म में सदाशिव अमरापुरकर का क़िरदार हो या फिर लक्ष्मी में अक्षय कुमार का. हर किसी ने किन्नर की भूमिका को अपने लाजवाब अभिनय से जानदार-शानदार बनाया. परेश रावल की 'तमन्ना' ने इनके जीवन के एक अलग ही पहलू को उजागर किया.

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इनके अलावा 'दरमियान' में आरिफ जकारिया और किरण खेर द्वारा मां-बेटे के रिश्ते की एक अलग ही परिभाषा देखने को मिलती है. इस फिल्म में आरिफ ने ट्रांसजेंडर के दर्द को कुछ इस तरह बयां किया कि जाने कितनों की आंखें नम हो गईं.

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आशुतोष राणा मंजे हुए कलाकार हैं. वे अपने हर क़िरदार में अपनी बेमिसाल अदाकारी से जान फूंक देते हैं. कुछ ऐसा ही कमाल उन्होंने 'शबनम मौसी' में दिखाया था. सच्ची घटना पर आधारित थी यह फिल्म. दरअसल, शबनम मौसी उन किन्नरों में से एक रही हैं, जिन्होंने अपने नाम और काम से इनकी जमात में एक अलग ही पहचान बनाई.

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'रज्जो' फिल्म में तो रवि किशन और महेश मांजरेकर दोनों ही इस भूमिका में दिखे. इसके लिए उन्हें काफ़ी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा था. 'गंगूबाई काठियावाड़ी' में विजय राज ने तो किन्नर बनकर कमाल ही कर दिया था. उनकी चाल-ढाल और संवाद अदायगी ने ख़ूब वाहवाही लूटी थी. कई जगहों पर वे आलिया भट्ट पर भी भारी पड़ गए थे. 

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Photo Courtesy: Social Media

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