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कहानी- बी माय वैलेंटाइन (Short Story- Be My Valentine)

कविता राय

जब चुप्पी भारी लगने लगी तब राम ने धीरे से पूछा, “आपको कुछ कहना था.” “जी, जी नहीं... जी हां...” राशि ने अटकते हुए कहा, क्योंकि वो नहीं जानती थी कि वो जो करने जा रही है वो ठीक है या नहीं. राम ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ़ देखा. राशि का चेहरा अब तक सुर्ख़ हो चुका था. उसके होंठ और हाथ कांप रहे थे.

राशि के दिल की धड़कन आज सुबह से ही बहुत तेज़ थी. कभी मीठी गुदगुदी होती, तो कभी पेट में बटरफ्लाइज़ महसूस हो रही थी. वो आज के दिन के लिए पिछले कुछ दिनों से तैयारी कर रही थी. वैसे उसे तैयारी की कोई ज़रूरत नहीं थी. ऊपर वाले ने उसे तराशकर बनाया था- दूध में पड़े केसर सी रंगत, बड़ी-बड़ी पानीदार आंखें, स्याह चमकीली और घुटनों तक झूलती घनी केश राशि. जो भी देखता कुछ पल के लिए थम सा जाता था. राशि स्वयं भी अपने रूप से अनभिज्ञ नहीं थी. उसे इसका पूरा आभास था और इसने उसे रूपगर्विता बना दिया था.

इसके अतिरिक्त वो अपने उच्च मध्यमवर्गीय माता-पिता की एकमात्र संतान भी थी. इसका एक साधारण अर्थ ये था कि वो न केवल ऊंचे स्वप्न देख सकती थी, वरन उन सपनों के यथार्थ में परिवर्तित होने की भी पूरी संभावना थी. उसकी सोच की इन्हीं उड़ानों में था उसका सपनों का राजकुमार. उसका राजकुमार सुंदर, सजीला और बांका जवान था जिसकी धूमिल सी छवि सदैव उसके मन पर छायी रहती थी. और आज वो सपनों का राजकुमार सचमुच में आनेवाला था.

लड़का अच्छी नौकरी में उच्च पदासीन है, बड़े परिवार से है और सबसे बड़ी बात राशि के पापा लड़के के परिवार को अच्छे से जानते हैं. यही सब बार-बार ख़ुद से कहकर वो पिछले कई दिनों से लगातार लड़के और उसके परिवार की तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे.

“जानती हो, आज के ज़माने में राम जैसा लड़का मिलना मुश्किल है. इतनी ऊंची पोस्ट पर होने के बाद भी वो बहुत सीधा-सादा है. उनका परिवार पैसेवाला और संस्कारी है और राम भी हमारी राशि की तरह इकलौता है. उन्हें बेटी मिल जाएगी और हमें बेटा.” इतना कहते हुए पापा निहाल हो जाते और हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाते हुए ऊपर आसमान की तरफ़ देखने लगते. पापा की इन निरंतर की जानेवाली तारीफ़ों और लड़के के नाम राम ने राशि के दिल की धड़कन बढ़ा दी थी. कितना प्यारा नाम था राम- हॉट एंड हैपेनिंग. इसके अलावा टीवी सीरियल्स ने भी इस नाम को काफ़ी हॉट बना दिया था.

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इस तरह राशि के सपनों के राजकुमार ने छवि के साथ नाम भी नायक वाला अपना लिया था. और आज वही दिन था जिसका राशि को न जाने कब से इंतज़ार था. धीरे-धीरे दिन खिसकने लगा और तभी बाहर गेट पर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई. घंटी बजी और फिर मेहमानों के क़दमों की आहट कॉरिडोर से होकर अंदर ड्रॉइंगरूम में जाकर थम गई. ड्रॉइंगरूम सेे उठती हंसी की आवाज़ों के बीच राम की आवाज़ को अनजानी होने पर भी राशि पहचान पा रही थी. आज उसकी चेतना जैसे उसके कानों में स्थिर हो गई थी. राम की आवाज़ शांत, गहरी और पौरुषपूर्ण थी. इस आवाज़ से राम की कल्पना छवि राशि के मन में साकार रूप लेने लगी. तभी मम्मी की आवाज़ कानों से टकराई. उसके लिए बुलावा आ गया था.

उसकी पूरी देह थरथरा उठी. वो मुख पर स्मित मुस्कान लिए धीरे-धीरे कमरे में पहुंची. उसके पहुंचते ही सभी की आंखें उसकी तरफ़ उठ गईं और वो आंखें भी जिनके लिए उसके मन में अनेक सपने थे. उसके रूप का प्रभाव ऐसा था कि सभी कुछ पल के लिए ठिठक गए. सबसे पहले राम की मम्मी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “विनायक जी, आपकी बेटी को देखकर लगता है कि आज चांद इस कमरे में उतर आया है. अगर आपको मंज़ूर हो, तो इस चांद को मेरे घर की शोभा बना दीजिए.” ये सुनकर राशि की गुलाबी रंगत सुर्ख़ हो गई. वो राम की आंखों को अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी, पर वो स्वयं उसे देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

विनायक जी ने शायद उसकी इस दुविधा को समझ लिया था, “हम लोगों ने तो समझ लिया है. अब तुम दोनों भी एक-दूसरे से बातचीत करो और देख-समझ लो.” इतना कहकर उन्होंने हंसते हुए राशि की मां से चाय की व्यवस्था गार्डन में करवाने के लिए कहकर राम के मम्मी-पापा को लेकर गार्डन में चले गए.

अब ड्रॉइंगरूम में राशि और राम अकेले बैठे थे और दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि बात कहां से शुरू करें. राशि की स्थिति तो और ज़्यादा ख़राब थी. वो जिस पल का इंतज़ार हमेशा से कर रही थी, उसके आते ही उसकी गर्दन शर्म-संकोच से ऐसी झुक गई थी कि वो उसे उठा ही नहीं पा रही थी. खैर जैसे-तैसे बातचीत का सिलसिला राम ने ही शुरू किया और पूछा, “आपका नाम क्या है?” अपने इस मूर्खतापूर्ण प्रश्न को जब तक सुधारता, राशि ने बिना सिर उठाए खिलखिलाते हुए जवाब दिया, “राशि.” उस हीरक दंत पंक्ति युक्त हास्य ने राशि के सौंदर्य को द्विगुणा कर दिया था. राम ठगा सा रह गया और उसने उसी मनःस्थिति में कहा, “वैसे आपको पता ही होगा, पर मेरा नाम रामदास है.”

“रामदास पर आपका नाम तो रा... है.” उसने तुरंत अपनी भूल सुधारते हुए ख़ुद को रोका और झटके से सिर उठाकर देखा तो उसका दिल धक् से रह गया. उसके सामने एक साधारण किन्तु सौम्य व्यक्तित्व था. मध्यम या कहें दुबली काठी, दरमियाना कद और सांवली रंगत लिए बैठा था उसका राजकुमार. ऐसा... ऐसा तो कभी उसने अनजाने में भी नहीं सोचा था. ये उसकी सोची हुई छवि के बिल्कुल विपरीत था. राम के पूरे व्यक्तित्व में सबसे आकर्षक थीं उसकी आंखें, बिल्कुल साफ़ और पारदर्शी जिनमें राशि के लिए अपार स्नेह छलक रहा था. पर उस छलकते नेह सागर के कुछ छींटें भी राशि तक नहीं पहुंच पाए. उसकी वो सलज्ज हंसी एकदम सूख गई और चेहरे पर घृणा के भाव उभर आए. उसने तुरंत अपना चेहरा झुका लिया. तब तक बाहर से भी सभी अंदर आ गए. राम के चेहरे के उल्लास के बीच राशि की तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं गया.

राम की मम्मी ने झट से अपना पर्स खोला और एक क़ीमती सेट और शगुन का नेग राशि के आंचल में डालते हुए कहा, “आज से आपकी बेटी हमारी भी हुई.”

राशि मन ही मन उबल रही थी, पर सबकी ख़ुशी पर आघात करने की हिम्मत नहीं हुई. वो चुपचाप सारी औपचारिकताओं को झेलती रही और उसका ये आक्रोश लड़के वालों के जाते ही मम्मी पर निकलने लगा.

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“क्या ज़रूरत थी इतनी जल्दी सब करने की. क्या मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं था?”

“क्यों राशि, क्या तुझे राम पसंद नहीं है?” मम्मी ने आवाज़ दबाते हुए पूछा.

“नहीं, नहीं है और हां राम नहीं आपका रामदास मुझे पसंद नहीं है.” राशि चिल्लाई. “प्लीज़, मम्मी प्लीज़, उसकी शक्ल भी उसके नाम की तरह आउटडेटेड है. क्या कहेंगी मेरी सहेलियां! हंसेगे सब मुझ पर. मेरा और उसका कोई मेल नहीं है.” राशि के मुंह पर कभी घृणा और कभी दया के भाव आ-जा रहे थे.

“ऐसा नहीं कहते बेटा, राम एक अच्छा लड़का है.” मम्मी ने समझाते हुए कहा. पर मम्मी की कोई भी बात राशि के पल्ले नहीं पड़ रही थी.

“मुझे आपके इस रामदास से शादी नहीं करनी है.” उसका आक्रोश आंसुओं के रास्ते बह रहा था.

“क्यों, क्यों नहीं करनी है! क्या कमी है लड़के में?” विनायक जी जो अब तक बाहर खड़े सुन रहे थे तूफ़ान की तरह कमरे में दाख़िल हुए.

“पापा, वो... वो आपका रामदास किसी काम का नहीं है. उसकी शक्ल तो देखिए!” राशि ने सिसकते हुए कहा.

“बस राशि... बहुत हो गया...” पापा फिर गुर्राए, “हर चीज़ स़िर्फ शक्ल से तय नहीं होती.”

“मेरे लिए होती है पापा और मैं ये शादी नहीं करूंगी.” राशि ने दृढ़ स्वर में कहा.

“मैंने जो किया, तुम्हारा अच्छा सोचकर किया. अगर तुम ये शादी नहीं करोगी, तो मैं आज के बाद तुम्हारे जीवन के किसी निर्णय में शामिल नहीं हूं, क्योंकि ये तुम्हारे लिए किए गए मेरे फ़ैसलों पर एक बड़ा प्रश्‍नचिह्न होगा. इतना कहकर विनायक जी झटके से कमरे से बाहर निकल गए.

अब क्या! राशि के लिए हां या ना को कोई प्रश्‍न ही शेष नहीं था. वो नियति और अपने माता-पिता के फ़ैसले के समक्ष बेबस महसूस कर रही थी. उसकी आंखें बहने लगीं. मम्मी ने कई बार राशि को समझाने का प्रयास किया, पर उसके कड़वे उत्तर सुनकर चुप हो जाती और पापा उन्होंने तो बोलना और बातचीत करना ही छोड़ दिया था.

कई दिन रोने और अफ़सोस करने के बाद राशि का मन विद्रोह पर उतर आया और उसने शादी से पहले अपनी ज़िंदगी अपनी तरह से जीने का निश्‍चय कर लिया. उसने पास के एक कोचिंग सेंटर में अप्लाई किया और उसे तुरंत वहां नौकरी भी मिल गई. शुरू के दिन बोरिंग थे, पर जब एक बार वहां बाकी लोगों से उसका परिचय हो गया, तो उसे वहां जाना अच्छा लगने लगा. वहां उसे सबसे अच्छा तब लगता था जब अजीत उसके आसपास होता था. लगभग छह फुट की लंब-तगड़ी देह यष्टि चौड़े स्कंध और विस्तृत वक्ष स्थल के साथ हल्की सांवली रंगत, छोटे मिल्ट्री कट बाल और मुख पर हल्की ट्रिम की हुई दाढ़ी-मूंछ... कुल मिलाकर वो राशि के सपनों के राजकुमार की प्रतिकृति था.

उसे पहली बार देखकर राशि ठगी सी रह गई थी और उसके बाद वो हर समय किसी ना किसी बहाने उसके आसपास रहने की कोशिश करती थी. अजीत बातचीत में बहुत अच्छा था. उसकी बातें इतनी मीठी और अपनापन लिए हुए होती थीं कि सबको लगता था जैसे वो उसे बहुत पहले से जानते हैं. धीरे-धीरे वो राशि के मन में एक गहरी जगह बनाने लगा था. वो जब भी उसकी तरफ़ देखता, तो राशि को लगता कि उसकी आंखों में उसके लिए कुछ अनकहा सा है. उसे लगने लगा था कि अजीत जो कुछ भी कहता है, वो सब उसी के लिए होता है, पर शायद वो सबके बीच होने के कारण इस तरह बातें घुमा-फिरा कर कहता है. अजीत कभी फ़िल्मी डायलॉग बोलता, कभी गाने गाता, कभी धीरे से मुस्कुराता और कभी ठहाका लगाकर राशि के दिल की धड़कन बढ़ा देता. अब वो हर पल इंतज़ार करने लगी कि कब अजीत उससे इज़हार करेगा. वो उसके दिलोदिमाग़ पर इस तरह छाने लगा कि वो सोचने लगी कि अजीत के एक बार प्रपोज़ करते ही वो भी उससे तुरंत अपने दिल की बात कह देगी और फिर बिना देरी के मम्मी-पापा से मिलवा देगी. वो अगर मान गए तो ठीक, वरना वो अब किसी की परवाह नहीं करेगी.

दिन बीत रहे थे और राशि का हर पल अजीत में डूब रहा था. वो उसके प्रपोज़ करने का इंतज़ार कर रही थी, पर वो था कि कुछ कहता ही नहीं था. इस अंतहीन इंतज़ार से जब उसके सब्र का बांध टूटने लगा, तो उसने ख़ुद से पहल करने का निर्णय लिया. वो मन ही मन सोचने लगी कि अजीत से अपने मन की बात कैसे कहे? वैलेंटाइन डे क़रीब ही था और इससे अच्छा दिन किसी प्यार करनेवाले के जीवन में हो नहीं सकता. उसने इसी दिन अजीत से सब कुछ कहने का निश्‍चय किया. वो इस वी-डे प्रपोजल की तैयारी करने लगी- कपड़े, मेकअप सब कई बार चेक किए और आईने के सामने खड़े होकर डायलॉग कई बार दोहराए.

आख़िरकार वैलेंटाइन डे भी आ गया. उस दिन वो सुबह जल्दी उठकर तैयार होने लगी. पहले चेहरे पर हल्का मेकअप किया और फिर आंखों में काजल की हल्की सी रेखा खींचकर पलकों को झपकाया, “वाओ! अमेज़िंग राशि...” अपनी ख़ूबसूरती पर मुग्ध होती हुई वो ख़ुद से ही कहने लगी.

फिर आया कपड़ों का नंबर- और फिर पलंग पर कपड़ों के ढेर लगने लगे. वो एक जोड़ा पहनती और फिर स्वयं को आईने में हर कोने से निहारते हुए कहती, “ऊं हूं, ये नहीं, और ये तो बिल्कुल भी नहीं...” कहते हुए जोड़ा उतारकर पलंग पर फेंक देती. आख़िरकार उसे एक गुलाबी सलवार कमीज़ पर तस्सली हुई. उस सूट का रंग उसके गोरे चेहरे को एक ख़ूबसूरत सी गुलाबी आभा दे रहा था.

“ये ठीक है.” कहते हुए उसने अपनी साज-सज्जा को एक फाइनल टच दिया.

तभी उसकी दृष्टि घड़ी पर पड़ी, तो वो बुरी तरह चौंक गई, क्योंकि घड़ी तो दोपहर के बारह बजा रही थी और ये समय अजीत की शिफ्ट ख़त्म होने का था. वो मन ही मन घबराने लगी कि कहीं ऐसा ना हो कि उसके पहुंचने से पहले अजीत वहां से निकल जाए. वो आज का दिन खोना नहीं चाहती थी, तो उसने अजीत का अता-पता लेने के लिए कोचिंग सेंटर फ़ोन किया.

कुछ देर घंटी बजने के बाद फोन उठा, तो उधर से प्रवेश की आवाज़ थी, “हेलो! जी कहिए राशि मैडम.”

“हेलो, हां प्रवेश, क्या फर्स्ट शिफ्ट के सभी लोग निकल गए हैं?” राशि ने हड़बड़ाते हुए पूछा.

“हां, मैडम सभी निकल गए हैं. बस मैं और अजीत सर अभी यही हैं.” प्रवेश ने जवाब दिया.

“ओके, ठीक है तो उसे रोकना.” राशि ने अपनी ख़ुशी दबाते हुए कहा.

“आ...” इससे पहले कि प्रवेश कुछ जवाब देता, पीछे से अजीत की आवाज़ सुनाई दी, “कौन है! जो हमें पूछ रहा है?”

“राशि मैडम हैं.” प्रवेश ने उसे बताया.

“कौन राशि मैडम?” अजीत की आवाज़ बड़ी बेपरवाह सी लगी.

“अरे! वही जो...” प्रवेश अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि अजीत ने उसे टोकते हुए कहा, “अरे यार प्लीज़ जल्दी निपटा... कौन है ये तेरी राशि वाशी मैडम! मेरे पास टाइम नहीं है. मुझे अभी अपनी वाइफ को लाने के लिए निकलना है.”

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ये सुनते ही राशि जैसे सुन्न हो गई. फोन उसके हाथ से छूट गया. उसे लगा जैसे उसके पैरों तले की ज़मीन हिल रही है. उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं और वो वहीं धम्म से ज़मीन पर बैठ गई. वो अजीत जिसे वो अपना सब कुछ मान चुकी थी और जो सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका था, उसकी शादी हो चुकी थी. वो अजीत जिसके सिवा उसे कुछ दिखाई नहीं देता था... वो अजीत... उसे पहचानता तक नहीं है... फ्लर्ट, धोखेबाज़, चालू...

और भी ना जाने क्या-क्या कह गई. अपमान और तिरस्कार से उसका मन भारी हो गया था और फिर जब ये भार वहन नहीं हुआ, तो आंखों के रास्ते बहने लगा. उसने अपना सैंडल, ज्वेलरी सब निकालकर फेंक दिया और पलंग पर रखे कपड़ों के ढेर में मुंह छिपाकर सिसकने लगी.

जब रोकर मन का भार हल्का हुआ, तो उसके मन में फिर से अजीत की छवि उभरने लगी, पर इस बार दिल और दिमाग़ दोनों निष्पक्ष थे. उसके मन में सारी घटनाएं घूमने लगीं. उसे ध्यान आया कि अजीत ने कभी अकेले में उससे कुछ नहीं कहा. वो जो भी कहता था, पूरे ग्रुप के बीच और पूरी मस्ती में कहता था, शायद ये उसका अंदाज़ था. ये तो उसकी एकतरफ़ा सोच या ग़लतफ़हमी थी, जो वो इतना आगे तक सोचने लगी थी.

“क्या होता अगर मैं उसे प्रपोज़ कर देती! मेरी क्या इज़्ज़त रह जाती! हे भगवान, आज तुमने मेरी इज़्ज़त रख ली...” ये सब कहते हुए आज पहली बार उसने भी पापा की ही तरह हाथ जोड़कर ऊपर देखते हुए परमात्मा को धन्यवाद दिया. अब उसकी आंखों के सामने मम्मी-पापा के हताशा भरे चेहरे उभरने लगे. उसका मन ग्लानि से भर गया. इसके बाद राम की सरल छवि उभरी- उसकी वे आंखें, जिनमें उसके लिए अथाह प्रेम छलकता था और जो बिना कहे भी सब कुछ कहते थे... अब उसे याद आया कि उसने पिछले दिनों कई बार ऐसा बहुत कुछ किया था, जिससे राम का मन दुखा होगा और उसकी कुछ हरकतें तो ऐसी थीं कि शायद उसके कारण वो उससे अपनी शादी के ़फैसले पर भी दोबारा सोच रहा हो. ये ध्यान में आते ही वो कांप उठी और उसने तुरंत अपनी ग़लती सुधारने का निर्णय लिया.

उसने मुंह धोया, बाल और कपड़ेे ठीक करके पापा के कमरे में पहुंच गई. वहां पापा चुपचाप कुर्सी पर बैठे रिमोट से टीवी चैनल बदल रहे थे. स्पष्ट था कि उनका ध्यान टीवी में नहीं, कहीं ओर ही लगा हुआ था.

“पापा...” उसने विनायक जी के कंधे पर स्नेह से हाथ रखते हुए कहा.

“ऐ... कौन?” पापा ने चौंकते हुए कहा.

“पापा, आई एम सॉरी, मुझे माफ़ कर दीजिए. आप ठीक थे. मुझे राम पसंद है, पर मैं शादी से पहले एक बार उससे मिलना चाहती हूं.” राशि ने झिझकते हुए कहा.

“हां, हां, क्यों नहीं.” पापा को चुप देखकर मम्मी ने उत्साह से उत्तर दिया.

“मैं आपसे मिलना चाहती हूं.” उसने राम को फोन किया.

“क... कहां और कब. क्या कुछ ज़रूरी था?” दूसरी तरफ़ राम का असमंजस भरा स्वर उभरा.

“जी, क्या हम लंच के लिए मिल सकते हैं?”

“जी, मैं आपका इंतज़ार करूंगा.” राम ने संक्षिप्त उत्तर दिया.

राशि ने जल्दी से मेकअप ठीक किया और लंच तक राम के पास पहुंच गई. एक औपचारिक मुस्कान के बाद दोनों चुपचाप बैठ गए. जब चुप्पी भारी लगने लगी तब राम ने धीरे से पूछा, “आपको कुछ कहना था.”

“जी, जी नहीं... जी हां...” राशि ने अटकते हुए कहा, क्योंकि वो नहीं जानती थी कि वो जो करने जा रही है, वो ठीक है या नहीं.

राम ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ़ देखा. राशि का चेहरा अब तक सुर्ख़ हो चुका था. उसके होंठ और हाथ कांप रहे थे.

राम समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर वो क्या कहना चाहती है.

“बी... बी माय वैलेंटाइन राम...” उसने पर्स से गुलाब निकालकर राम की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा. राम ने एक सुखद आश्‍चर्य के साथ गुलाब लेते हुए एक मीठी सी स्मृति उसके माथे पर अंकित कर दी. राशि की आंखें झुक गईं और चेहरे पर एक सलज्ज मुस्कान फैल गई. आज उसके सपनों के राजकुमार की कल्पना छवि ने साकार रूप ले लिया था.

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