
विनीता राहुरीकर
पता नहीं अब इस जीवन में इस घर में अपने हाथ से कुछ पका कर उन्हें खिला भी पाएंगी कि नहीं. अगली बार इस घर में ये सब उनके जीते जी आएंगे या जाने के बाद क्रिया कर्म करने. आंखें भी भर आ रही थीं और एक राहत भी मन में तैरती चल रही थी. समय को रोकने का भी मन कर रहा था और सबको भेज कर निढाल तन और मन को एकांत में विश्रांति देने का भी. दोनों भाव समान वेग से उन पर हावी हो रहे थे.
जब से विदेश में बसे तीनों बच्चों के अचानक भारत में छुट्टियां मनाने की बात सुनी, वह भी एक साथ, तभी से उर्मिला के हाथ-पैर फूल रहे हैं. अभी-अभी बड़े बेटे उपमन्यु का फोन आया था, “मम्मा, आपके लिए एक सरप्राइज़ है. परसों हम सब भारत आ रहे हैं. एक महीना वही रहेंगे आपके पास. अभिमन्यु तो निकल भी चुका है ऑस्ट्रेलिया से. मैं कल सुबह निकल रहा हूं और उन्नति भी हमारे साथ आ रही है, तो मिलते हैं मां परसों.” और तब से मोबाइल को घूरती उर्मिला सोच रही थी कि अभी-अभी जो सुना, वह सच था या उनके कानों का भ्रम था. विदेश में बसे बच्चों को अचानक मां पर इतना प्रेम उमड़ आया कि तीनों एक साथ मां के चरण कमलों के दर्शनों के लिए उतावले हो गए.
मन में कई शंकाएं सिर उठाने लगीं और उन्होंने अपने आलीशान घर को नज़र भर कर देखा. उनके शौकीन पति ने बहुत उत्साह से यह घर बनवाया था. एक-एक कमरे की टाइल्स, बाथरूम की फिटिंग, दीवारों का रंग, सब कितने चाव से चुन-चुन कर अपने सामने सब काम करवाया था. इस घर को बनाने में न केवल गाढ़ी मेहनत से कमाया गया रुपया लगा है, बल्कि उनके पति शिशिर की रात-दिन की शारीरिक मेहनत भी लगी है. तभी उनके सुरुचिपूर्ण कलाप्रियता की छाप एक-एक कोने में स्पष्ट परिलक्षित होती है.
हमेशा कहा करते, “उर्मिला, आयु का अधिकांश भाग तो माता-पिता, फिर बच्चों के भविष्य की ख़ातिर समझौता करते ही बीत गया. अभी वो समय आया है कि हम अपनी पसंद अनुसार अपना घर बनवा कर अपनी मर्ज़ी से रह सकें.”
सही था जब ब्याह कर आई थी उर्मिला, तब सास-ससुर के साथ ही घर में ददिया सास-ससुर भी थे, ननद-देवर भी ईश्वर कृपा से कम नहीं थे. पुश्तैनी मकान में इतनी भीड़ के बीच एक छोटा सा कमरा मिल पाया वही गनीमत समझी. इतने बड़े परिवार को आगे बढ़ाते, जन्म-मरण, शादी-ब्याह, बच्चों का जन्म, उनकी पढ़ाई में जीवन के 30-32 साल कहां निकल गए, पता ही नहीं चला.
शिशिर सरकारी विभाग में उच्च पद पर पदस्थ थे. अत: जीवन की गाड़ी पैसों की तंगी की वजह से एकाध बार हिचकोला भले खा गई होगी, लेकिन रुकी कभी नहीं. शिशिर को सिर्फ़ एक ही शौक था, सजे-संवरे सुंदर आधुनिक घर का. तभी अपनी ज़िम्मेदारियों से निवृत्त होकर माता-पिता के देवलोक गमन के तुरंत बाद ही शिशिर ने बैंक से लोन लेकर और कुछ बचत का पैसा लगाकर यह बंगला बनवाना शुरू कर दिया.
पुश्तैनी घर अपने दोनों भाइयों के नाम कर दिया. नौकरी के अभी दो-तीन साल बचे थे तो चिंता नहीं थी कि लोन चुकता कैसे होगा. बच्चे सब नौकरी और परिवार सहित अपनी-अपनी जगह स्थापित हो ही गए थे. यह घर एक तरह से उर्मिला और शिशिर की नई गृहस्थी, नए जीवन का प्रारंभ ही था. सब ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर एक-दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम व्यतीत करने का. और दोनों ने उस परिपक्व उम्र में उस समय को, उस अवसर को भरपूर जिया.
तीन साल बाद जब शिशिर रिटायर हुए तब बजाय अवसाद से घिरने के उन्होंने उस खाली समय का उपयोग घर को व्यवस्थित और हरा-भरा रखने में किया. घर के आंगन में ही नहीं, आसपास की खाली पड़ी ज़मीन पर भी उनके लगाए कितने ही पेड़-पौधे फल-फूल रहे हैं.
इस तरह सुखद वर्ष इस घर में जीने के बाद एक दिन सुबह-सुबह चाय पीकर अख़बार पढ़ते हुए आराम कुर्सी पर बैठे थे कि हृदयघात से वहीं चिरनिद्रा में सो गए. तब भी उनके मुख पर एक अपार संतोष और सुख की छाया तैर रही थी. तब से, पिछले तीन साल से उर्मिला को इस घर से और अधिक मोह हो गया है. उसके एकाकी जीवन में अब यहां रची बसी शिशिर की यादें ही सहारा हैं. सुबह की चाय से लेकर रात में शिशिर के तकिए तक, उनकी आत्मा जैसे सदा आसपास रहती है.
यह भी पढ़ें: ख़ुद अपना ही सम्मान क्यों नहीं करतीं महिलाएं (Women Should Respect Herself)
बीच में बहुत बुलाने पर बच्चों के पास अमेरिका गई थीं, लेकिन दो महीनों में ही इस घर में बसी शिशिर के सानिध्य में बीते आत्मीय पलों की यादों ने वापस बुला लिया और वे व्याकुल होकर दौड़ी आईं. मन में कहीं यह आभास लगातार कचोट रहा था कि शिशिर को जैसे वह इस घर में अकेला छोड़ आई हैं. बस तब से वह कहीं नहीं गईं.
उनकी कामवाली ने अपनी बड़ी लड़की माधुरी को उनके पास रख दिया है. वह सारा दिन साथ रहती है और घर के काम करती रहती है. इस एकांत में बस माधुरी के पायलों की रुनझुन घर में मध्यम संगीत सी तैरती रहती है. उसकी पायल के घुंघरू जैसे धड़कनों की तरह उन्हें आश्वस्त करते रहते हैं कि शिशिर की यादों के अतिरिक्त भी कुछ है, जो इस घर को जीवंत रखे हुए है. उन्हें ढांढ़स देते रहते हैं कि कोई है, जो हर पल उनके इर्दगिर्द है, उनके क़रीब है.
“मां आपकी चाय.” माधुरी ने चाय का कप उनके हाथ में थमाया तब वे अपने विचारों की उलझन से बाहर निकलीं. घड़ी एकबारगी रुक सकती है या ग़लत समय दिखा सकती है, लेकिन माधुरी ठीक समय पर उन्हें चाय देना नहीं भूलती. तीन सालों के स्नेह ने उसे उन्हें मां कहने का अधिकार भी दे दिया था. वह भी तो मन की अधिकांश बातें, बीती यादें उसी के साथ बांटती थी. कभी-कभी तो वे भूल ही जातीं कि माधुरी उनकी उन्नति नहीं है. और सच पूछो तो उन्नति को उनके मन के क़रीब आने का समय कभी मिला ही नहीं. पहले पढ़ाई में व्यस्त रही, फिर शादी करके अमेरिका ही चली गई. उसके विवाह के बाद के पहले बरस के सारे तीज-त्योहार धूमधाम से मनाने का चाव धरा का धरा रह गया. वह तो बच्चे के जन्म पर भी उनके पास नहीं आ पाई थी. वे और शिशिर ही गए थे छह माह के लिए अमेरिका उसके पास. नाती को गोद खिलाने का उम्र भर का चाव छह माह में ही पूरा करके छाती ठंडी कर आए.
“चाय पियो ना. आज क्या हो गया आपको? मन कहां है आपका?”
माधुरी ने टोका तो एक गहरी सांस भरकर वे वर्तमान में लौट आईं और चाय पीने लगीं. क्या बतातीं माधुरी को कि बच्चों के आने की ख़बर सुनकर प्रसन्नता और आशंका के मिले-जुले उद्वेग से जूझ रही हैं. लेकिन प्रकट में बस इतना ही बोलीं, “उपमन्यु भैया का फोन आया था. वे सब यहां आ रहे हैं महीने भर के लिए छुट्टियां मनाने.”
“अरे वाह दीदी-भैया सब आ रहे हैं. फिर तो ख़ूब रौनक़ रहेगी घर में, बिल्कुल दीपावली जैसी.” माधुरी के अल्हड़ मुख पर अभी से ही दीप जगमगा गए. उसका उल्लास देखकर क्षण भर को वह भी अपनी आशंका का तनाव भूल गई.
“मैं जल्दी-जल्दी घर ठीक-ठाक कर देती हूं. पलंगों पर नई चादर बिछाकर तकिए के कवर बदल दूंगी. विनोद को बुलवाकर चारों बाथरूम धुलवा लेती हूं. इतने सारे लोग आ रहे हैं. साबुन, शैंपू, कपड़ों का साबुन, राशन, फल-सब्ज़ी सभी कुछ तो लाना होगा और खाना, खाना क्या बनेगा?”
माधुरी अचानक ही जैसे बहुत व्यस्त हो गई. जो बातें उर्मिला को सोचनी चाहिए थी, वो माधुरी सोच रही थी. वैसे भी पिछले तीन साल से गृहस्थी की प्रमुख कर्ताधर्ता तो वही थी. उर्मिला तो उस पर सब सौंप कर एक तरह से निश्चिंत ही हो गई थीं और थोड़ी आराम तलब भी. पूरी उम्र तो यूं भी गृहस्थी की चक्की में पिसती ही रही थी वह. अब तो गृहस्थी जैसे माधुरी की हो गई है और वे बस मार्गदर्शन देती हैं और थोड़ी बहुत मदद कर देती हैं. लेकिन उसके गिनाए कामों ने उर्मिला के भी हाथ-पैर फुला दिए. हां तैयारियां तो बहुत सी करनी ही होंगी. अब तक उन्होंने तो कुछ सोचा ही नहीं इस बारे में.
यह भी पढ़ें: महिलाओं के हक़ में हुए फैसले और योजनाएं (Government decisions and policies in favor of women)
“तू हम दोनों का खाना बना ले. दोपहर में कमरे ठीक कर देंगे और शाम को बाज़ार चले जाएंगे.” उर्मिला भी उठ खड़ी हुईं. माधुरी दोनों का कप उठाकर रसोई में चली गई. उर्मिला अपने कमरे से लगे एक छोटे से कमरे में रखी आलमारी में से चादरें निकालने लगी. यूं तो नियम से वह घर की साफ़-सफ़ाई, चादरें बदलना, धोना करती रहती हैं, फिर भी बच्चों के आने के पहले एक बार सब कुछ व्यवस्थित कर देना ही ठीक रहेगा.
अब बदलने का काम दोपहर में माधुरी करती रहेगी. ऊपर चार बेडरूम थे, नीचे दो बेडरूम और एक छोटा सा कमरा कुछ अतिरिक्त सामान रखने के लिए. शिशिर ने कितना सोच समझकर बड़ा घर बनवाया था. तीनों बच्चों के लिए तीन कमरे, दो कमरे नाती-पोतों के लिए. नीचे वाले गेस्ट रूम में पिछले तीन साल से माधुरी सो रही है.
अब... क्या शिशिर के बाद इस घर में बसी उनकी यादों से भी बिछड़ने का समय आ गया है. उनके दिल में मरोड़ उठी. आंखें भर आईं. एक खीज उठी मन में. उनके शांत, सुकून भरे जीवन में हलचल मचाने क्यों आ रहे हैं ये सब. जैसे अपनी गति से बहती शांत नदी में किसी ने बड़ा सा पत्थर फेंक दिया हो. जीवन में ऐसा भी समय आ सकता है कभी कि मां को अपनी ही संतान का आना खल जाए, आशंका से भर दे. ये उर्मिला को आज पता चल रहा था.
“मां खाना तो बन गया. लाइए अब चादर वगैरह बदल दें, फिर खाना खाएंगे.” माधुरी झनक कर पास आ खड़ी हुई. हाथ से चादर ली और ऊपर चली गई. अचानक वह व्यस्त हो गई और उसकी पायल उससे भी अधिक. उर्मिला भी ऊपर आ गई. जब तक माधुरी चादर बदलती, उन्होंने तकियों को कवर चढ़ा दिया. आज मन ना जाने क्यों बड़ा कच्चा सा हो रहा था घर को लेकर. एक हौल सा उठ रहा था छाती में, गले में कुछ अटक रहा था. वह तकिए पर लिहाफ चढ़ाती एक-एक दीवार को नम आंखों से देख रही थीं. शिशिर की यह धरोहर, यह अंतिम याद, निशानी कहीं...
खाना खाने के बाद वे थोड़ा आराम करने के लिए कमरे में लेट गईं. लेकिन आंखों में आज नींद कहां थी... इतने सालों बाद बच्चे घर आ रहे थे. उन्हें तो ख़ुश होना चाहिए, लेकिन उलट उनके मन में उथल-पुथल मची थी.
अभी कमर थोड़ी सीधी हुई ही थी कि माधुरी चाय लेकर आ खड़ी हुई, “जल्दी चाय पीकर तैयार हो जाइए. ख़ूब काम पड़ा है. विनोद से बाथरूम तो साफ़ करवा ही लिया है अब बाज़ार से सामान ले आते हैं.” माधुरी पलंग के पास रखे स्टूल पर बैठ गई. एक यह है जिसे सब बातों का अति उत्साह चढ़ा हुआ है और इधर उर्मिला के हाथ-पैर ठंडे होते जा रहे हैं. फिर भी सामान तो लाना ही होगा. दो लोगों की छोटी सी गृहस्थी में नौ अतिरिक्त लोगों की व्यवस्था तो हो नहीं पाएगी.
उन्होंने ड्राइवर को बुलवाया और माधुरी के साथ बाजार चल दीं. शिशिर के ऑफिस के चपरासी का बेटा है. काम पड़ने पर वे उसे ही बुलवा लेती हैं. वर्षों तक संयुक्त परिवार की ज़िम्मेदारी सहज रूप से निभाने वाली उर्मिला आज अपने ही बच्चों के अचानक आने की ख़बर सुनकर हड़बड़ा गईं. बहुत साल हो गए अब गृहस्थी मात्र दो लोगों तक सीमित होकर रह गई है. उनका शरीर भी उतना ही साथ देता है और राशन का अंदाज़ा भी भूल गई हैं. माधुरी ही सारा सामान सोच-विचार कर लेती जा रही थी. हर पल उन्हें लग रहा था कहीं ख़र्च उनकी सीमा से बाहर न हो जाए. आगे महीने भर तक भी तो घर चलाना है इतने लोगों को लेकर.
यह भी पढ़ें: 30 बातें जहां महिलाएं पुरुषों से बेहतर हैं (30 things women do better than men)
दूसरे दिन माधुरी दिनभर व्यस्त रही. एक लय में धीमे-धीमे बजने वाली उसकी पायल उस दिन क्षण-क्षण में सुर बदल रही थी. उपमन्यु की फ्लाइट समय पर आ गई थी. उन्नति भी पति-बच्चे के साथ उसी के साथ आई. अचानक ही सात लोगों के कोलाहल से घर गूंज उठा. पेट जायों को देखकर उर्मिला का मातृ हृदय पिघल गया. अतीत की वात्सल्य पूर्ण स्मृतियां जीवंत हो गईं. नाती-पोतों ने जब उनके पैर छूए, तो मन को एक छांह सी मिली, ‘चलो बच्चों ने विदेश जाकर भी अपने संस्कारों का अब तक त्याग नहीं किया है, उसे अगली पीढ़ी को भी दिया है...’
माधुरी बड़ी तत्परता से कभी पानी, कभी चाय, कभी बच्चों की फ़रमाइश पूरी कर रही थी. उपमन्यु के चीनी और शानू तो बड़े और समझदार हो गए थे, लेकिन उन्नति का चीनू बड़ा ही शैतान था. आते ही उसने पूरे घर का निरीक्षण-परीक्षण कर डाला और चीज़ें उलट-पुलट कर डालीं. कुछ चीज़ें टूटते-टूटते बचीं. सबसे बुरा इस बात का लगा उन्हें कि चीनू पूरा अमेरिकन हो गया था. एक शब्द उसे अपनी भाषा की नहीं आती थी. भाषा मन जोड़ने की बहुत मज़बूत कड़ी होती है. यहां वही कड़ी टूटी हुई थी. उन्नति और शेखर उससे पूरे समय अंग्रेज़ी में ही बात करते.
दूसरे दिन ऑस्ट्रेलिया से अभिमन्यु भी अपनी अमेरिकन पत्नी को साथ लेकर आ गया. कई साल ‘लिव इन’ में साथ रहने के बाद सुना है पिछले साल दोनों ने चर्च में आख़िर शादी कर ही ली, अतः अब कैथी को उसकी पत्नी तो कहा ही जा सकता है. कम से कम वर्तमान में तो, भविष्य की तो आनेवाला समय ही जाने. जींस टी-शर्ट पहने उन्नति और बड़ी बहू के विपरीत कैथी साड़ी पहनकर माथे पर बिंदी, हाथों में चूड़ियां डाल कर आई थी और आते ही उनके पैर छूए. अभिमन्यु ने बड़ी मेहनत से उसे होमवर्क करवाया था, यह उर्मिला जी ने समझ लिया.
दूसरे दिन कैथी सूट में और तीसरे दिन जींस-टॉप में आ गई. उर्मिला जी मन ही मन मनाती रही थीं कि अब बात इससे आगे ना बढ़े. सबके लाए हुए उपहारों से माधुरी तो ख़ुशी से पुलक उठी. लिपस्टिक, नेलपॉलिश, स्वेटर, सेंट कितना कुछ तो ले आए थे तीनों उसके लिए. लेकिन उर्मिला को न जाने क्यों अपने लिए लाए गए उपहार किसी अवांछित बात को मनवाने के लिए दी जाने वाली रिश्वत से लगे. उसने उन्हें आलमारी में रख दिया. नाती-पोतों में तो मन रम गया, लेकिन बेटों के पास बैठते समय मन को हर पल धड़का लगा रहता कि कहीं बेटे घर बेचने की बात न करने लगें और उनकी सांस घुटने लगती.
तीसरे दिन दोपहर में खाना-पीना होने के बाद उर्मिला सोफे पर कमर सीधी करने बैठी ही थीं कि कैथी पास आ बैठी. कुछ देर औपचारिक बातचीत के बाद अचानक ही बोली, “यूअर हाउस इज वेरी ब्यूटीफुल. रियली इट्स अ प्लेजर लिविंग हियर (आपका घर बहुत ख़ूबसूरत है. मुझे रहां रहते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है.)
“अभिमन्यु के पिता ने बड़ी लगन और शौक से इसे बनवाया था...” कहते-कहते उर्मिला को अपनी ग़लती का भान हो आया, “मेरा मतलब मेरे पति ने. उन्हें बड़े, सुंदर घर में रहने का बड़ा शौक था.” किसी भी तौर पर जैसे वह घर का कोई रिश्ता अपने बच्चों के साथ जोड़ने को तैयार नहीं थीं.
दूसरे दिन यही बात दूसरी तरह से बड़ी बहू ने कही. रसोई में उनके साथ हाथ बंटाते हुए बोली, “अकेले इतने बड़े घर में आपका जी नहीं घबराता मां. बाप रे मैं तो रह ही नहीं सकती. सारा दिन अकेले घर तो काट खाने को दौड़ेगा. फ्लैट में तो कम से कम दरवाज़ा खुलते ही सामने कोई दिखता है. ग्राउंड में लोग दिनभर आते-जाते हैं, बच्चे खेलते हैं. यहां तो कितना सन्नाटा लगता होगा.”
और तीसरे दिन ही शाम को चाय की गर्म भाप के साथ यही जलती हुई बात बड़े बेटे ने कही. उर्मिला का माथा ठनका. ये अचानक सबको घर बड़ा क्यों लगने लगा और उनके अकेले होने का दर्द क्यों सालने लगा. “सच मां अब अकेले कैसे मैनेज करती होंगी तुम इतने बड़े घर और गार्डन को, बड़ी मेहनत का काम है.” चाय अचानक कड़वी लगने लगी उर्मिला को. कहीं किसी फ्लैट में शिफ्ट करवाने का इरादा तो नहीं है इन लोगों का. पता चला महीने भर में ही कहीं कोई छोटा सा फ्लैट ढूंढ़ कर...
“सब हो जाता है, बरसों की आदत है. फिर अकेलापन कैसा. तुम्हारे पिताजी की यादें हैं ना साथ में, उनके लगाए पेड़-पौधों की देखभाल करते दिन कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता. माधुरी भी सारा दिन साथ रहती है. बोलती बतियाती रहती है.” उर्मिला को स्वयं ही लगा, स्वर थोड़ा कठोर हो गया था. और ये लोग अकेलेपन की बात क्यों कर रहे हैं.
जब शिशिर के जाने के बाद वह उपमन्यु के पास गई थी, तो उस अजनबी देश में बंद घर में कितना दिल घबरा गया था उनका. उपमन्यु और बहू दोनों नौकरी पर चले जाते थे और बच्चे स्कूल से आकर अपना फोन लेकर अपने कमरे में बंद हो जाते. वहां तो काम वाली भी नहीं होती कि उसी से बात करके मन बहला ले. पांच दिनों में पचास बार उनके दिल को धड़का लगा होगा. रात भी कहां चैन से गुज़रती.
सुबह-शाम की चाय हो या खाना, फ़ुर्सत के इन पलों में वे एक अव्यक्त तनाव से घिरी रहतीं. आसपास देखी-सुनी, पढ़ीं अनगिनत कहानियां मन में नागफनी के कांटों सी चुभती रहतीं. ऊपर से शांत, संयत रहकर वे ध्यान से रुचिपूर्वक बच्चों की बातों में शामिल होतीं, लेकिन अंदर मन जल्दी में रहता कि ये लोग अब उठ जाएं, तो अच्छा हो. पता नहीं बातें अचानक कब कोई अवांछित मोड़ ले लें.
हफ़्ते भर बाद अभिमन्यु कैथी को लेकर भारत के दर्शनीय स्थल देखने चला गया. थोड़ा कैथी को भारतीय संस्कृति और सुंदरता से परिचित करवाने और थोड़ा उसके साथ एकांत समय बिताने के उद्देश्य से, क्योंकि घर में कैथी अब उबने भी लगी थी. उर्मिला ने थोड़ा राहत की सांस ली. एक तरफ़ से तो कम से कम दस-बारह दिनों के लिए निश्चिंत हुईं, लेकिन दो तलवारें तो अब भी सिर पर ही थीं. उस पर चीनू की उद्दंडता. चीनी-शानू तब भी ठीक है, अनुशासित है, लेकिन चीनू बहुत ही बिगड़ा बैल था. अधिक बोलकर वे उन्नति का मन नहीं दुखाना चाहती थीं, लेकिन सारा दिन उस पर नज़र रखनी पड़ती. बगीचे के कई पेड़ों को वह खींचतान चुका था. कलियां-फूल मसल कर फेंक देता. उर्मिला को ऐसी उद्दंडता की आदत नहीं थी. उनके अपने बच्चे कभी ऐसे शैतान और असभ्य नहीं रहे, उस पर अब घर में बरसों से उन्हें छोटे बच्चों की आदत ही नहीं रही. इसलिए कभी-कभी वे बुरी तरह खीज जातीं कि कब इनकी छुट्टी ख़त्म हो और कब ये वापस जाएं.
शांत एकाकी जीवन का आदी हो चुका उनका तन और मन दोनों ही थकान अनुभव करने लगे थे. शाम को रोज़ कहीं ना कहीं घूमने जाने का प्रोग्राम बनता. कभी तालाब किनारे बोटिंग का, कभी वनविहार, कभी मानव संग्रहालय, कभी बिरला मंदिर. बरसों बाद घर से बाहर निकल कर उर्मिला भी पूरी तरह तनावमुक्त, सारी आशंकाओं से मुक्त रहतीं. माधुरी तो बाहर निकल कर चिड़िया जैसी चहकने लगती. एक-एक करके दिन और आगे सरकते जा रहे थे. बच्चे अचानक ही गंभीर होकर मां कहते या उन्हें अपने साथ अमेरिका में ही सेटल हो जाने को कहते, तो वे अतिरिक्त रूप से सतर्क हो जातीं. आख़िर उन्होंने साफ़ कह दिया, “अभी जब तक मेरे हाथ-पैर काम कर रहे हैं तब तक तो मुझे यहीं रहने दो. अब उम्र के कितने साल बचे हैं. ये अंतिम दिन जीवन के तुम्हारे पिताजी की इस आख़िरी निशानी के साथ, उनकी स्मृतियों के साथ यहीं बताने दो.”

चौदह दिन बाद कैथी को लेकर अभिमन्यु भी वापस आ गया. जाने के दिन क़रीब आते जा रहे थे और व्यस्तता बढ़ती जा रही थी. तीनों की ही मनपसंद खाने की फ़रमाइश, कभी बाज़ार की कुछ ख़ास पसंदीदा मिठाई, कभी चाट, कभी पानी पूरी, दही वड़े, कभी और कुछ. जो चीज़ें अमेरिका में नहीं मिलतीं या बन नहीं पातीं व्यस्तता के कारण वो सब या तो बाज़ार से आतीं या उर्मिला और माधुरी बनाती रहतीं. पानीपुरी तो आठ दिन से रोज़ ही बन रही थी मिनरल वाटर में. अंतिम तीन दिन तो उर्मिला को दम मारने की भी फ़ुर्सत नहीं थी. बच्चों को अपने हाथ से बना कर पेट भर खिलाने का चाव और कुछ साथ देने को भी. एक तरफ़ मन में बच्चों के लिए ममता भी उमड़ रही थी. पता नहीं अब इस जीवन में इस घर में अपने हाथ से कुछ पका कर उन्हें खिला भी पाएंगी कि नहीं. अगली बार इस घर में ये सब उसके जीते जी आएंगे या जाने के बाद क्रिया कर्म करने. आंखें भी भर आ रही थीं और एक राहत भी मन में तैरती चल रही थी.
समय को रोकने का भी मन कर रहा था और सब को भेज कर निढाल तन और मन को एकांत में विश्रांति देने का भी. दोनों भाव समान वेग से उन पर हावी हो रहे थे. अब चीनू की शरारत पर भी कोफ्त नहीं हो रही थी उन्हें. अब कब यह बच्चा यहां उथल-पुथल मचाने कभी आ पाएगा, कर ले जितना उधम करना है. विदेश जाकर तो वापस उसी बनावटी शिष्टाचार में बंधकर ही रहना होगा.
तीसरे दिन सुबह अभिमन्यु निकल गया और शाम को उन्नति और उपमन्यु. सभी के लिए उन्होंने अपने दम भर यथा योग्य उपहार ख़रीदे थे. पता नहीं अब आगे बच्चों को कुछ देने का अवसर मिले ना मिले. पांच बजे जब टैक्सी आंखों से ओझल हो गई तब भरी आंखों और भारी मन से वे अंदर आईं. महीने भर की हलचल, रौनक़, भरापन, शोर-शराबा अचानक ही क्षण भर में सपने जैसा प्रतीत होने लगा. बस घर का बिखराव ही कुछ देर पहले तक घर में कई लोगों के होने की गवाही दे रहा था. अब यह सब कल ठीक-ठाक करेंगे.
वे ड्रॉॅइंगरूम में सोफे पर ही लेट गईं. महीने भर की थकान अचानक ही तन पर हावी हो गई, लेकिन मन अंदर से पुलकित हो रहा था. जिस आशंका से महीना भर ग्रस्त रहीं वह निर्मूल साबित हुई. बच्चों ने घर बेचने की बात नहीं की. वह शायद यहां सचमुच ही स़ि़र्फ उन्हें मिलने और साथ रहने ही आए थे, अपनी पुरानी यादें, पुराना जीवन दोहराने. मन पर से जैसे एक भारी बोझ हटते ही वह पंख सा हल्का हो गया, बस आशंका की जगह अपने पेटजायों पर शंका करने का एक अपराधबोध सा मन पर छा रहा था. शंका नहीं करतीं, तो बच्चों के साथ और ख़ुशियां जी सकती थीं. लेकिन उनकी भी तो कोई ग़लती नहीं. जो हुआ सो हुआ. इस ठंड में बच्चों के लाए स्वेटर, कार्डिगन पहनकर उनके स्नेह की ऊष्मा ओढ़ लेंगी वे. और उन्हें लगा उन्हें बहुत नींद आ रही है. वे वहीं सोफे पर लेट गईं.
नींद में उन्हें सुनाई दे रहा था चाय के कप-प्लेट समेटती, काम में व्यस्त माधुरी के पायलों की रुनझुन. उन्होंने उनींदी आंखों से देखा सामने वाली दीवार पर लगी तस्वीर में शिशिर मुस्कुरा रहे थे और घर में एक बार फिर से जीवन की लय सी माधुरी के पायलों की झंकार धीमी-धीमी सी बज रही थी और आश्वस्त कर रही थी. अब यह मधुर संगीत उनके रहते ऐसे ही हमेशा बजता रहे. जीवन के पूर्वार्ध में भले ही कितना भी बड़ा परिवार रहा हो, लेकिन अब उत्तरार्ध में माधुरी ही वास्तव में उनका परिवार है. मुस्कुराकर उन्होंने माधुरी को चाय बनाने को कहा. “अभी लाई मां.” और झनक सी वह दो कप हाथ में लिए सामने आ खड़ी हुई.
अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
