
सुषमा मुनीन्द्र
यह कैसी दुनिया है, कैसा चलन जहां तुतलाना नए-नए रोमांच तलाश रहे नर पशुओं को रोमांच देने जैसी विशेषता बन जाता है? निरंजना जानती है स्किन बिज़नेस में स्पष्ट बोली, भाषा नहीं दैहिक आकर्षण प्रमुख होता है, जो भागी हुई मां और गांजे में धुत्त, अधपगले बाप की बेटी में गज़ब का था.
गुम्मन जब गल्ला बाई के साथ पहली बार आई, उसकी उम्र जो भी रही हो, पर उसके आगे वाले दूध के दो दांत टूटे हुए थे. निरंजना ने पूछा, “यह कौन है गल्ला बाई?”
“हमार नातिन गुम्मन. हमरे साथ काम सीखी.”
“बहुत छोटी है.”
“बड़ी होई जई. काम त सीखे.”
“स्कूल नहीं जाती?”
“जात ही. दुसरा दर्जा (दूसरी) पढ़त ही, पै तोतलात (तोतली है) ही.”
“छोटी है न!”
“एकर महतारी तोतल रही. एकर मामा तोतल हय. यहौ तोतल ही.”
“तोतली है पर सुंदर है.” गल्ला बाई ने गुम्मन को एक सप्ताह तक बर्तन धोने, झाडू-पोंछा करने का कायदा समझाया.
“गुम्मन झाडू अइसन पकड़... पलंग के नीचे से कचड़ा निकाल... वा कोना मा पोंछा ठीक से नहीं लगा... देख बर्तन मा जूठ लगा हय... गुम्मन कामचोरी न कर... मलकिन (निरंजना) नाराज़ हो जाती हैं...” आगे के दो दांत आने तक गुम्मन को सम्पूर्ण रूप से काम सौंप कर गल्ला बाई ने अवकाश ले लिया.
गुम्मन, निरंजना का काम करती. इस बीच गल्ला बाई मोहल्ले से गोबर बीन-बटोर कर निरंजना के परिसर के दूर वाले कोने में कंडे पाथ लेती. निरंजना चाहती गुम्मन, गल्ला बाई की तरह मुस्तैदी से काम करे, लेकिन नन्हें हाथों में न बल, न अभ्यास. वस्तुतः निरंजना का समृद्ध घर गुम्मन के लिए चमत्कार की तरह था. जिधर देखती, देखती रह जाती. खाना बनाने के लिए निरंजना को बर्तन चाहिए. गुम्मन, निरंजना के बेटे विज्ञान और विमान के कमरे में झांक कर संगीत सुन रही है.
निरंजना बेचैन, “गुम्मन...”
विज्ञान बचाव में, “बच्ची है मम्मा.”
आंगन धोना है, गुम्मन रस्सी कूद रही है. “गुम्मन...”
विमान बचाव में, “बच्ची है मम्मा.”
निरंजना व्यंजन बना रही है. गुम्मन ललक कर देख रही है.
“गुम्मन...” निरंजना के पति एकनाथ बचाव में, “बच्ची है निरंजना.”
गुम्मन, निरंजना को संत्रस्त करने के लिए हरकत नहीं करती थी. नहीं जानती थी दरअसल निरंजना को नाराज़ कर रही है.

“गुम्मन तरी़के से काम कर. तू जल्दी काम नहीं करती है. गल्ला बाई कहती है मैं तुझसे देर तक काम कराती हूं. गल्ला बाई से तेरी शिकायत करूंगी.”
“आदी (आजी) माल-माल के तमली (चमड़ी) उकेल लेगी. कान पकलती हूं मम्मा दी (जी).” एकनाथ ने अभयदान दिया, “निरंजना, गुम्मन काम सीख रही है. विज्ञान और विमान से छोटी, एकदम बच्ची है.”
निरंजना उसे बच्ची नहीं गल्ला बाई का स्थानापन्न मानती थी. लेकिन एक दिन देखा सबकी नज़रों से बचकर गुम्मन दीवान के नीचे गहरी नींद सो रही है. निरंजना को उस क्षण अप्रतिम ज्ञान मिला. उसने निद्रालीन गुम्मन में छोटी बच्ची देखी. छोटी बच्ची की मजबूरी और मासूमियत देखी. बचपन की मोहलत पाना चाहती है. छोटी-छोटी लापरवाहियां करना चाहती है. हो जाती है ग़लती. इसे थोड़ा सुकून, सुरक्षा, स्नेह व सहयोग मिले, तो बेहतर तरी़के से काम कर सकती है.
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निरंजना ने नरमाई से पुकारा, “गुम्मन...”
गुम्मन भयभीत मुद्रा में उठी, “मम्मा दी, मैं थक दाती हूं.”
“आज स्कूल नहीं जाएगी?”
“दाऊंगी. काम कल लूं.”
“स्कूल जा. बचा हुआ काम लौट कर करना.” इसी तरह होती हैं संधियां. विकसित होता है लगाव. बन जाता है भरोसा. गुम्मन दक्ष हो गई. गल्ला बाई अब कंडा पाथने और वेतन लेने ही आती.
“मालकिन, पइसा देई. रासन ख़रीदना हय.” निरंजना ने पैसे गल्ला बाई को दे दिए. गुम्मन एकाएक बोली, “पताथ (पचास) लुपिया मुझे दे. हम तोले बद (तुम्हारे बदले) काम कलते हैं.” गल्ला बाई को गुम्मन घुटी हुई दुनियादार लगी. “काम करते हय त हम तोही खाना देईत हयन. मलकिन अमदरा वाली (गुम्मन की मां) से जवानी नहीं सम्भारी जात रही. कहय दसईंया (गुम्मन का पिता) नामरद हय. हमरे पहुना (गल्ला बाई की पुत्री सिमरा का पति) से मोहब्बत कई लिहिन. पहुना के साथ भाग गय त आज तक नहीं लउटी. दसईंया पागल होइ गा. सिमरा मनी अउर मझली (सिमरा की पुत्रियां) का लइके हमरे पास आ गय के मजूरी कइ के पेट चलाइ. अमदरा वाली के मइके मा तंत्र-मंत्र होत हय. मूठ चलवाय के सिमरा का मरवाय दिहिस. सिमरा के पेट मा अइसन पीड़ा भय के तड़प-तड़प के मरी. मनी अउर मझली हमरे साथ रहती हैं. उनहीं खाना-कपड़ा चाही. दसईंया का गांजा अउर परात भर भात चाही. हमार आदमी मर गा. पहिले हम मजूरी करत रहेन. अब जांगर नहीं चलय. अमदरा वाली कहत रही दसईंया नामरद हय. नामरद हय त गुम्मन, दसईंया के अउलाद न होय. तबहूं हम ऐही पाल-पोस रहे हयन. या बेसरम पचास रुपिया मांगत ही.”
“बच्ची है. इतना काम करती है.”
“एहसान नहीं करय. मेवा-पकवान खाय के खासा लंबी होय रही हय. आप मिठाई, नमकीन, हेलुवा, पकौड़ी दइ के एही चटोर बना दिहेन. घर लइ जात ही अउर मनी-मझली का देखा के खात ही. कोहू को नहीं दे.”
दूसरों को ललचाते हुए अकेले खाना गुम्मन का आनंद, परिश्रम से किया गया उपार्जन और ख़ुद को ख़ास साबित करने का आयोजन है.
“मम्मा दी, मैं मनी औल मधली को मिथाई नहीं देती, इथलिये आदी मुझे मालती है.” गल्ला बाई दंग. मालकिन के प्रश्रय में प्रतिद्वन्दी तैयार हो रही है.
“हमार इज़्ज़त न उतार. ले पचास रुपिया.” पचास रुपए का नोट गुम्मन के सम्मुख फेंक कर गल्ला बाई चली गई. गुम्मन में न स्वाभिमान था न आत्म सम्मान. उसने हुलस कर नोट उठा लिया.
“पचास रुपए का क्या करेगी गुम्मन?”
“तात-फुलकी (चाट फुलकी) खाऊंगी. तप्पल (चप्पल) तूली औल क्लिप खलीदूंगी.” छोटी बच्ची की छोटी-छोटी हसरतें. निरंजना की प्रसाधन मेज और टीवी के विज्ञापन उसे क्रीम, लोशन, तेल, शैंपू व परफ्यूम का उपयोग और प्रयोग बता रहे थे. प्रसाधन मेज़ में सजी सुंदर शीशियों को ललक कर देखती.
निरंजना ने उसे पुरानी क्लिप और बैक पिन दे दी. “ले. बालों में तेल लगा कर तरी़के से बांध लिया कर.”
“हौ.” गुम्मन सौग़ात घर ले जाती. मनी और मझली चुरा लेंती. उनसे पूछताछ करने के ज़ुर्म में गल्ला बाई, गुम्मन को पीट देती. वे दरअसल सौग़ात ही नहीं, गुम्मन का साम्राज्य बल्कि फंतासियां थीं. साम्राज्य को सुरक्षित करने के लिए उसने जूते के खाली बड़े डिब्बे को निरंजना के गैरेज के दूर वाले कोने में रख दिया. उसमें सहेजने लगी स्कार्फ, मोजे, क्लिप, एक जोड़ी चप्पल, बेल्ट, क्लिपें, डियो, लोशन, परफ्यूम की खाली सुंदर शीशियां, रुमाल, एक हाफ स्वेटर... बस गई एक पूरी दुनिया, जिसे देख कर ख़ुश हो जाती.
इस बीच विज्ञान फिर विमान स्कूल पास कर बाहर पढ़ने चले गए. उनकी अनुपस्थिति को गुम्मन ने अपनी उपस्थिति से अच्छा भरा. निरंजना चाहने लगी गुम्मन इतना ज़रूर पढ़ ले कि अपने हिस्से की लड़ाई को ठीक तरह लड़ सके. वह एक-डेढ़ घंटे गुम्मन को पढ़ाती. “गुम्मन आज क्या सबक मिला?”
गुम्मन पुस्तक खोलती, “मम्मा दी, यहां इतकूल है फिल दोनों भैया बाहल पलने क्यों तले गए?” “विज्ञान डॉक्टर बनने गया है और विमान इंजीनियर.”
“मैं ख़ूब पल कल क्या बनूंगी?” कठिन प्रश्न... क्या बनेगी? अपनी बात शुद्ध रूप में कैसे कह पाएगी? तुतलाते देख लोग हंसते हैं. आनंद लेते हैं. चिढ़ाते हैं. मज़ाक बनाते हैं. आरंभिक दिनों में विज्ञान और विमान इसे बार-बार बोलने के लिए बाध्य करते थे. उनके साथ निरंजना भी हंसती थी.
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“ख़ूब पढ़. फिर बताऊंगी, क्या बनेगी.”
“कैसे पलू? आदी कहती है मैं बली हो गई हूं. मदूली (मजदूरी) कलने दाऊं.”
“पढ़. मैं गल्ला बाई को समझा दूंगी.”
“हौ.” मामला प्रतिस्पर्धा का बनता गया. गल्ला बाई ने फौजदारी बढ़ाई. गुम्मन ने प्रतिरोध. निरंजना के नेतृत्व में वैचारिक रूप से समृद्ध हो रही गुम्मन, गल्ला बाई के हुक्म को खारिज करने लगी. गल्ला बाई मारने दौड़ती. गुम्मन पूरी ताक़त से उसका जर्जर हाथ जब्त कर लेती. उसने समझ लिया घर में गल्ला बाई का विरोध नहीं होता है, इसलिए ताक़तवर दिखती है. बाकी इसकी ताक़त ख़त्म हो चुकी है. गल्ला बाई ने समझ लिया निरंजना की मिली-भगत से गुम्मन अपने उत्थान के प्रति सतर्क रहते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहती है. इसके जिगर की आतिश को ठंडा न किया गया तो योद्धा बन जाएगी.
गल्ला बाई वेतन लेने पहुंची, “मलकिन, अब आपका काम हम करब. गुम्मन, मझली के साथ मजूरी करय जइ. रेजा के रेट दुइ सौ पच्चीस रुपिया चल रहा है.” गुम्मन ने गल्ला बाई को पूरी तरह उपेक्षित कर निरंजना से कहा, “अम्मा दी मैं पलूंगी.”
“इसे पढ़ने दो गल्ला बाई.”
“पढ़के मास्टर बनी? तोतल से बोलत बनत हय?”
“पढ़ने दो गल्ला बाई.”
“मलकिन, गुम्मन का न भड़काइए. कंडा बेच के अउर अपना के वेतन से हमार ख़र्चा नहीं चलय. मनी कमात रही पै ओकर बियाह (ब्याह) कइ (कर) दिहेन. मझली मजूरी करत ही. एक दिन ऐहू के बियाह होइ जइ. तोतल से कोउ बियाह न करी. मजूरी करने लगे त आपन अउर हमार ज़िंदगी का सहारा देई.”
“मम्मा दी, मैं पलूंगी.”
“गुम्मन को पढ़ने दो गल्ला बाई.”

“मालकिन, अपना का गुम्मन बहुत पियार ही त अपने घर मा बइठा लेई. मास्टर बने या कलेश्टर हम फ़ुर्सत होई.” प्रक्षेपास्त्र छोड़ कर गल्ला बाई चली गई.
गुम्मन दृढ़ थी, “मैं पलूंगी.” निरंजना को गुम्मन दयनीय लगी. जब आई थी अक्षर ठीक से नहीं पहचानती थी. अब तुतलाते हुए लेकिन अच्छे विश्वास के साथ तेज़ गति और लय में अख़बार पढ़ती है. अख़बार में छपे समाचारों का अर्थ जानना चाहती है. गुम्मन सुबह काम करने आई. आंगन में बैठी निरंजना अख़बार पढ़ रही थी. गुम्मन समीप आकर खड़ी हो गई, “क्या समाताल थपा है मम्मा दी?”
“ले पढ़ कर सुना. ज़ोर से पढ़ने से आत्मविश्वास आता है.” गुम्मन तुतला कर पढ़ने लगी, “वर्तमान दौर में समाज के प्रत्येक वर्ग को चाहिए चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा से जोड़ कर समाज की मुख्यधारा में लाएं. बालश्रम के कलंक को मिटाने के लिए सामूहिक भागीदारी की ज़रूरत है. कम उम्र के बच्चों से काम कराने वाले संस्थान-संचालकों का सामाजिक बहिष्कार हो. बाल मजदूरी के कारण देश में गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी बढ़ रही है. छापामार कार्यवाही अभियान चलाना चाहिए...” गुम्मन अर्थ समझने के लिए रुकी. “मम्मा दी, थापामाल अबियान क्या होता है?”
बेसिन पर शेव कर रहे एकनाथ ने स्पष्ट किया, “गुम्मन, इसका मतलब है चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से घरेलू काम कराना क़ानूनी तौर पर ग़लत है... निरंजना तुम्हारी रिपोर्ट कर दी जाए तो तुम्हें तीन साल की सज़ा मिलेगी. दस हज़ार रुपया ज़ुर्माना देना पड़ेगा.”
निरंजना सहमत न हुई, “सरकार से पूछो जिस लड़की की मां न हो, पिता बेकार हो, आजी मारती हो वह क्या करें? मैं गुम्मन को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करती हूं. हमारे घर में इसने गुण सीखे हैं. मैं चाहती हूं पढ़ कर यह अपनी ज़िंदगी तरी़के से जिए. चार पैसे कमा सके. अपनी सुरक्षा कर सके. स्कूल के बाद इसे कौन सा कोर्स कराया जाए कि जॉब मिलने में आसानी हो?”
गुम्मन आशय न समझे अतः एकनाथ अंग्रेज़ी में बोले, “निरंजना, इसका तुतलाना बहुत बड़ी अयोग्यता है. इसे अच्छा जॉब कैसे मिलेगा? तुम्हीं ने बताया गल्ला बाई भड़क कर कह गई, इसे अपने घर में बैठा लो. हम एक सीमा से आगे इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते.”
निरंजना को लगा गुम्मन को वह झूठा आश्वासन देती रही है. लेकिन गुम्मन आश्वस्त थी. उसे भरोसा था उसके अच्छे भविष्य के लिए निरंजना बंदोबस्त करेगी. इसी भरोसे पर गल्ला बाई से शत्रुता ठानी है. गल्ला बाई के आक्षेप और आपत्ति के बावजूद ठीक व़क्तपर निरंजना के घर आती है. इसीलिए निरंजना को नहीं लगा गुम्मन पूरे सप्ताह नहीं आएगी.
अगले सप्ताह गल्ला बाई आई, “मालकिन, गुम्मन भाग गई.”
निरंजना को गल्ला बाई फरेबी लगी.
“क्या कहती हो गल्ला बाई?”
“हमार सोन चिरैया. पाले-पोसे. कमाने लायक भई त भाग गय.”
“क्या कहती हो गल्ला बाई?”
“हौ. गुम्मन, अमदरावाली कस बदमास रही. आप नए-नए सलवार-कुरथा पहिना के ओही अइसन चमकुल बना दिहेन के अइसन फर्राटा साइकिल चलाबत रही के टोला के लड़िका आसिक होइ जात रहे.”
“गुम्मन अच्छी लड़की है. उसके साथ कुछ हुआ है. गल्ला बाई थाने में रिपोर्ट लिखाओ.”
“थाना वाले ग़रीब के रिपोर्ट नहीं लिखय.”
“मैं तुम्हारे साथ चलती हूं.”
“गुम्मन के बदनामी होइ. आपौ के होइ.”
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गल्ला बाई बहुरुपिया. रोने में प्रशिक्षण प्राप्त. चालें तय करने वाली कूटनीतिज्ञ. ख़ूब रोई. फिर बर्तन मांजने के लिए आंगन में आ गई. निरंजना अवसाद में. ठीक अभी मिशन असफल हो गया. गुम्मन क्या सचमुच भाग गई? तब तो इस लड़की ने ख़ुद से अधिक निरंजना को ठगा है. यदि किसी के फुसलाने पर गई है तो बेवकूफ़ है.अब वह ऐसी मासूम या मूर्ख नहीं थी, जो बहकावे में आ जाए. आत्मविश्वास और परिष्कार से भर कर अच्छी तैयार हो रही थी. एकनाथ ठीक कहते हैं, इनके लिए एक सीमा से अधिक नहीं किया जा सकता. ये लोग अपनी भलाई नहीं क्षणिक लाभ देखते हैं. लाभ इनकी ज़रूरत ही नहीं मानसिकता भी है. इसीलिए ये लोग पगबाधाओं से नहीं छूट पाते. इनकी ज़िंदगी का विन्यास ही ऐसा है. निरंजना न जान पाती गुम्मन पर क्या बीती, पर परिस्थिति अक्सर अपना प्रमाण दे देती है. सच गवाही दे जाता है. मझली सूखे कंडे लेने आई. कंडे झौआ में रख रही थी. निरंजना ने खिड़की से पुकारा, “मझली, इधर आ.”
“का है मम्मा जी?”
“गुम्मन का कुछ पता चला?”
“नानी ने उसे पता नहीं कहां बेच दिया.” हद दर्जे का खुलासा.
“बेच दिया?”
“हौ. नानी कहती थी गुम्मन मजूरी करे. गुम्मन नहीं मानती रही. नानी उसे मारती-गरियाती थी के मलकिन ने इसे फैसनदार बना दिया है. मजूरी करने में लजाती है. का बताएं मम्मा जी. गुम्मन आपके घर आने को निकली थी, फिर नहीं लौटी. नानी ने बेच दिया.”
“कितने में बेचा?”
“दस हज़ार-बीस हज़ार... पता नहीं मम्मा जी. मेरे टोला से यह चौथी लड़की गायब हुई है. एक मिस्तरी (मिस्त्री) बड़ा बदमास है. नानी पहले उसके ठीहे में काम करती थी. कभी-कभी नानी के साथ बैठ कर दारू पीता है. वह नानी से बता रहा था गुम्मन तोतलाती है, इसलिए दो हज़ार जादा दिलाया हूं. तोतला कर बोलेगी तो लोग ख़ुश हो जाएंगे. मम्मा जी मिस्तरी बहुत बदमास है.” भय, अविश्वास, करुणा से निरंजना की आह निकल गई.
“गुम्मन तोतली है. इतने रुपए में उसे कौन ले गया?” निरंजना ख़रीद ले गया नहीं कह सकी. “पता नहीं.”
“मझली, तुझे गल्ला बाई से डर नहीं लगता?” “नानी मुझे और मनी को मानती है. गुम्मन, दसईया मामा की औलाद नहीं थी, सायद इसलिए नानी ने बेच दिया.”
“गुम्मन की याद आती है... मम्मा जी कुछ करो...” अविश्वास में निरंजना. यह कैसी दुनिया है, कैसा चलन जहां तुतलाना नए-नए रोमांच तलाश रहे नर पशुओं को रोमांच देने जैसी विशेषता बन जाता है? निरंजना जानती है स्किन बिज़नेस में स्पष्ट बोली, भाषा नहीं दैहिक आकर्षण प्रमुख होता है, जो भागी हुई मां और गांजे में धुत्त, अधपगले बाप की बेटी में गज़ब का था. नहीं जानती थी गुम्मन तुतलाती थी इसलिए क़ीमती थी.

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