मां को दुख होगा ये सोच विपिन चुप्पी साथ गया था. न चाहते हुए भी उनकी बातें उन्हें सुनाई दे जातीं. सुनकर वे कान तो नहीं बंद कर सकती थीं. लड़ाई करते बहू का स्वर सप्तम पर होता, उसके चीखने-चिल्लाने पर उनके कलेजे में एक हुक सी उठती. उनका दिल पहले ही कमज़ोर था. वे गहरे अवसाद में डूब जातीं.
आज मृत्युशय्या पर लेटे-लेटे विगत के दृश्य चलचित्र की तरह उनकी आंखों के आगे से गुज़र रहे हैं. कितने चाव से उन्होंने विपिन का ब्याह किया था. उस दिन जब बेटा बारात वापस लेकर आया था ख़ुशी के मारे उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. ख़ूब दिल खोलकर ख़र्च किया था उन्होंने विपिन की शादी में. सभी नाते-रिश्तेदारों को बुलाया था. पहली शादी जो थी. मित्र, परिवार, दूर-दूर के संबंधी कोई भी नहीं बचा था आने से. जाते हुए उन्होंने सबको ढेरों फल-मिठाई, उपहार में महिलाओं को बढ़िया साड़ी, बच्चों के लिए कपड़े तथा पुरुषों को टीके के रुपए दिए थे. सब ख़ुशी-ख़ुशी बिदा हुए थे.
सुंदर-सलोनी, पढ़ी-लिखी कृतिका को बहू के रूप में पाकर वो निहाल हो गईं. ब्याह कर आई तो वह चुपचाप-सी ही रही थी. जब वह उनके पैर छूने झुकती ख़ुशी से गद्गद हो वे उसे गले लगा लेतीं. उसे ज़रा भी काम को हाथ लगाने न देतीं. प्यार का स्रोत था कि उबल-उबल पड़ता. उन्हें लगता क्या कर दूं अपनी दुलारी बहू के लिए.
उनके घर में किसी भी तरह की कमी न थी. पति काफ़ी धन-संपत्ति छोड़ गए थे, विपिन डॉक्टर था. उसकी प्रैक्टिस अच्छी चलती थी. छोटा बेटा अरविंद, मनीपाल में इंजीनियरिंग के तृतीय वर्ष में पढ़ रहा था. घर में आधुनिक सुख-सुविधा के सभी साधन थे. काम करने के लिए नौकरानी थी. खाने-पहनने का स्तर ऊंचा था. फल, मिठाई से फ्रिज भरा रहता, जेवर कपड़ों से उन्होंने बहू की आलमारी भर दी थी.
अरविंद शादी के तुरंत बाद पढ़ाई करने लौट गया था. मेहमान भी एक-एक कर सब बिदा हो गए. विपिन सुबह आठ बजे ही क्लीनिक पर चला जाता. अब घर में वे और कृतिका ही रह जाती. वह स्वभाव से बहुत शांत थीं, शायद यही शांति बहू को खलने लगी. अपनी ऊब मिटाने के लिए उसने सास से बेवजह पंगे लेने शुरू कर दिए. वे पहले तो हैरत में आकर गईं. हालांकि उन्हें उसके व्यवहार से गहरा सदमा पहुंचा था. लेकिन उन्होंने धैर्यंता का परिचय देते हुए बहू की हर ज्यादती को अनदेखा, अनसुना करने की कोशिश की थी.
बहू की चालाकियों का कोई अंत न था. रसोई में वह सिर्फ़ सब तैयारी हो जाने पर छह-सात चपातियां सेंक लेती और दिखाती ऐसे जैसे उसी ने सारा खाना बनाया हो और वह ही हमेशा रसोई का कार्यभार संभाले रहती हो. गैस-चूल्हे पर उफना दूध, फैला हुआ आटा, दाल, चावल, छिलके आदि उठाने का काम उनका था.
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कोई भी काम करना उसे अपनी शान के ख़िलाफ़ लगता, उसे हमेशा अपने हाथ मैले होने का डर लगा रहता.
नौकरानी अक्सर छुट्टी कर जाती तो सारा काम उन्हीं के जिम्में आ जाता. कृतिका पैर पर पैर रखे बरामदे या छत पर बैठी स्टीरियो लगाकर नॉवेल पड़ती रहती. स्टीरियो की आवाज़ वो जान-बूझकर ऊंची कर देती, ताकि उसे कोई व्यवधान न पड़े व दूधवाले, धोबी आदि के लिए उसे दरवाज़ा न खोलना पड़े.
हां, फोन की घंटी बजते ही वह उचक कर अटेंड करती. इससे घर में उसे अपनी सत्ता दिखाने का मौक़ा जो मिलता.
उनकी हर बात पर मुंह टेढ़ा करके जवाब देना, हमेशा नकारात्मक और व्यंग्यात्मक लहजे में बात करना कृतिका ने यही रवैया अपना रखा था. उन्हें तड़पाकर जाने उसे कौन सा सुख मिलता.
उदार होने पर भी अपनी भाभी की एक सीख उन्होंने पल्ले बांध ली थी, "जीजी कुछ भी हो, बहू चाहे कितनी लल्लो चप्पो करे या धमकियों से काम ले तुम अपने सारे गहने अभी से उसे मत सौंप देना, वो तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी है." और सही में कृतिका ने बातों बातों में कई बार उन्हें सुनाकर ये जताना चाहा कि वे गहने अगर अभी ही वह न पहन सकी तो फिर उसके किस काम के. ख़ासकर उनकी चालीस तोले की करधनी पर उसकी बहुत निगाह थी.
"आजकल तो फिर से पुराने गहनों का फैशन चल पड़ा है. भाभी के कहने की देर थी अम्मा ने झट अपनी करधनी निकाल कर दे दी. एक दिन उसने उन्हें सुनाते हुए अपनी सखी रेहाना से कहा. वे चुप्पी साध गई थी.
विपिन हमेशा वही बात करता जो तर्कसंगत और न्यायसंगत होती. मां की वह इक्तता करता था. उनका दिल दुखे ऐसी बात कभी न करता. कृतिका के साथ भी वह धैर्य से पेश आता और उसे समझाता, लेकिन उसने तो न समझने की शपथ उठा रखी थी.
वे रसोई बहुत स्वादिष्ट बनाती थीं. उनके हाथ की बनी चीज़ें सब तारीफ़ करके खाते. कृतिका को इस बात से बेहद ईर्ष्या होती. यह हमेशा उसमें कमी निकालती. वे इस कान से सुन दूसरे कान से निकाल देतीं. बच्चों की बात का क्या बुरा मानना, वे दुखी मन को समझातीं, कोई असर न होते देख उसने उन्हें उकसाने के लिए अब सीमाओं का अतिक्रमण करना शुरू कर दिया था.
"आपके हाथ का इतने तेल वाला खाना खाकर तो कल को मरनेवाला आज ही मर जाए."
"बेटी मैं क्या तुम लोगों का बुरा करना चाहूंगी." उन्होंने आहत होकर पूछा.
"क्या पता." कहकर झन्न से प्लेट पटक कर वह वहां से खिसक गई और महरी से छोले-भटूरे मंगवाकर खाए. विपिन उन दिनों मेडिकल कॉन्फ्रेन्स अटेंड करने लखनऊ गया हुआ था. विपिन की गैरमौजूदगी में तो उसे उन्हें प्रताड़ित करने की पूरी आज़ादी मिल जाती. उसे पता था वे कभी बेटे के आगे मुंह नहीं खोलेंगी. दरअसल, वह उनकी भलमनसाहत का ही फ़ायदा उठा रही थी.
एक दिन पड़ोस की कांता बहन के सामने जब कृतिका ने उनकी फल खा लेने की प्यार भरी मनुहार पर तिरस्कृत करते हुए पलटकर जवाब दिया, "मांजी बुढ़ापे में ज़ुबान ज़्यादा चटोरी होती है. हर समय कुछ न कुछ खाने को चाहिए. खाली जो बैठे होते हैं इस उम्र में लोग. हमें खाने के सिवा और भी बहुत काम होते हैं."
कांता बहन से रहा न गया उन्होंने समझाते हुए कहा, "बहूरानी, बड़े पुण्य, प्रताप से बड़े-बूढ़ों का साया नसीब होता है. हम लोग तो डाल में टंगे पीले पत्ते हैं, अब झड़े कि तब झड़े जितने दिन हैं सास का मान करना सीखो."
"ये बातें आंटी आप अपनी बहू को ही सिखाएं. जहां तक मरने की बात है, मांजी में अभी भी हम सबसे ज़्यादा दमखम हैं. ये अभी कहीं नहीं जाने वाली. ये तो मेरी अर्थी उठाकर ही अपनी उठवाएंगी."
अपमानित कांता बहन तभी उठकर चल दी थी. वे देर तक आंसू पोंछती रहीं. बार-बार उन्हें विपिन के बाऊजी याद आते. जितना सुख, आराम उन्होंने अपने राज में दिया सब का मूल्य चुकाना पड़ रहा है शायद. कहते हैं न कि कोई चीज़ इस दुनिया में मुफ़्त नहीं मिलती.
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उस दिन कृतिका ने अपने घर किटी पार्टी दी थी. मांजी सुबह से काम में लगी थीं. रामरति अकेली क्या-क्या कर लेती, कृतिका को बनाव-सिंगार और फूल सजाने से ही फ़ुर्सत न थी. थकान से दूसरे दिन उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया, चाहकर भी वे उठ नहीं पा रही थीं. विपिन ज़िद करके डॉक्टर को ले आया था. ब्लड प्रेशर नापा तो काफ़ी ज़्यादा था. डॉक्टर ने पूरी तरह आराम करने की हिदायत दी. ब्लड प्रेशर की दवा तो वे ले ही रही थीं. डोज कुछ और बढ़ा दी गई.
बीमारी में भी कृतिका उनके पास न फटकती. वे अपनत्व के लिए तड़पतीं, लेकिन वह उनसे दूरी बनाए रखती. अलगाव और उपेक्षा से वह जान-बूझकर उनके दिल को ठेस पहुंचाने में ही सुकून पाती.
वो फोन पर सहेलियों से हंस-बोल लेती. उन्हें घर बुला लेती या उनके साथ घूमने-फिरने, शॉपिंग करने या होटल में खाने-पीने निकल जाती, मगर उनकी दुनिया तो बस घर में ही सिमट कर रह गई थी.
घर में पसरा बेगानापन उनकी आत्मा को कचोटता. चुप्पी तोड़ने का वे बहाना खोजती रहतीं. बहू का मुंह जोहती. ज़रा उसके तेवर नरम पड़ते ही वे उसे कुछ खा लेने का आग्रह करतीं. तरह-तरह से लाड़ जताना चाहतीं, लेकिन कृतिका कुछ न कुछ ऐसी चुभती बात कह जाती, जो उनके कलेजे में तीर सी चुभ जाती. वे रो-रोकर जी हल्का कर फिर घर के कामकाज में लग जातीं.
दूसरों के सामने वह बहुत भली बनने का नाटक करती. ईश्वर ने उसे मधुर आवाज़ दी थी, जिससे वह सब को प्रभावित कर हमेशा वाहवाही लूटने के लिए तत्पर रहती. उसकी धूर्तता और बदतमीजियों का अंत न था.
उसको जब बेटा पैदा हुआ सबसे ज़्यादा ख़ुशी उन्हें ही हुई थी, शायद मां बनकर बहू में कुछ परिपक्वता आ जाए, लेकिन मां बनकर तो वह और भी मग़रूर हो गई. बच्चे को वह उन्हें हाथ न लगाने देती, "जाने कैसी तो बीमार रहती हैं कहीं मेरे एकांश को छूत न लग जाए." विपिन समझाता, "तुम पढ़ी-लिखी हो, क्या इतना भी नहीं जानती कि हाई ब्लड प्रेशर कोई छूत की बीमारी नहीं."
"आप तो हमेशा मां की तरफ़ से ही बोलेंगे, चाहे मेरा बेटा बीमार होकर मर ही क्यों न जाए. एक ब्लड प्रेशर क्या और भी तो बीमारियां हैं उन्हें. कभी जोड़ों का दर्द, कभी पीठ दर्द..."
"ये सब तो बुढ़ापे में चलता ही रहता है ये कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है. पूछ लो किसी भी डॉक्टर से." विपिन अपनी तर्कसंगत बात उससे मनवाना चाहता.
"बेटा मेरा है, मेरी मर्ज़ी, जिसे चाहूं खिलाने दूं, जिसे चाहूं नहीं."
"पोते को खिलाने का हक़ उन्हें भी है."
"ठीक है, फिर अपना हक़ जताने आएं वो. मैं कल ही मेरे मम्मी पापा के घर जा रही हूं. इस चिपकू बुढ़िया से मैं तंग आ गई हूं.” अन्दर का जहर उगलते हुए वह बोली.
मां को दुख होगा ये सोच विपिन चुप्पी साथ गया था. न चाहते हुए भी उनकी बातें उन्हें सुनाई दे जातीं. सुनकर वे कान तो नहीं बंद कर सकती थीं. लड़ाई करते बहू का स्वर सप्तम पर होता, उसके चीखने-चिल्लाने पर उनके कलेजे में एक हुक सी उठती. उनका दिल पहले ही कमज़ोर था. वे गहरे अवसाद में डूब जातीं.
"हे ईश्वर, बस अब नहीं सहा जाता. अच्छा हो अब तू मुझे उठा ले, अब जीने की चाह नहीं."
लेटे-लेटे उन्होंने दूसरी तरफ़ करवट बदली तो उन्हें चक्कर सा आ गया. तबियत ज़रा संभली तो आंखों से अश्रुधारा बह चली.
अब नहीं बचूंगी, आज ही विपिन से छोटे को तार देकर बुलवा लूंगी. उसके ब्याह की ज़िम्मेदारी अधूरी रह जाएगी, इसका उन्हें मलाल था. चलो बहू तो सुखी हो जाएगी. हमेशा उन्हें न मरने का ताना देती थी. बात चाहे घुमा-फिरा के कहती मगर वो इतनी नादान तो थीं नहीं कि न समझतीं.
दो महीने तक जब बहू की मायके से कोई खैर-ख़बर न आई तो उन्होंने ही विपिन को क़समें देकर उसे लिवाने भेजा था. विपिन किसी भी तरह जाने को राज़ी न था.
"अपनी मर्ज़ी से गई है, मर्ज़ी से ही आएगी. मां, तुम मुझे मजबूर मत करो. आकर तुम्हें और दुखी ही करेगी. रहने दो कुछ समय और अपने आप आएगी. ससुराल से भागकर आई लड़की को कितने दिन रख सकेंगे उसके मां-बाप."
मां के आग्रह को विपिन टाल न सका, उसे कृतिका को लेने जाना ही पड़ा. पीहर से आते ही उसने चेहरा बिगाड़कर कहा, "मुझे मालूम था आख़िर तो मेरी ही गरज पड़ेगी. बुढ़ापे में इतनी अकड़ अच्छी नहीं, जिसका दिया खाना पड़े, उसके आगे तो झुकना ही पड़ता है."
"मैं तेरे पैर पड़ती हूं बेटी. अब मैं तुझे सचमुच ज़्यादा दिन तंग नहीं करूंगी. क्या करूं, आत्महत्या की हिम्मत में नहीं जुटा पाती. पिछले पापों की सज़ा इस जनम में भुगत रही हूं. जब इस जनम में जान-बूझकर वे पाप कैसे करूं."
कहीं बुढ़िया सच ही कुछ कर न बैठे ये सोच कृतिका वहां से खिसक गई थी.
विपिन कहता, "मां तुमने शुरू से बहू को इतनी ढील देकर अच्छा नहीं किया, इसीलिए वह काबू के बाहर हो गई है." वे मन में सोचती दबकर रहने पर ये हाल है अगर जो कुछ करती तो जाने क्या होता. विपिन भी उन्हीं का ख़्याल करके ख़ामोश हो जाता. वरना एक बार उसने हाथ ही उठा दिया होता, उन्होंने उठकर बीच-बचाव किया तो उल्टे कृतिका उन्हीं से उलझ पड़ी. "पहले बेटे को सिखाती हो और फिर मेरे सामने भली बनने का नाटक करती हो." उन्होंने तो नीलकंठ की तरह गरल पीना सीखा ही लिया था. अब तो जैसे उन्हें पीड़ाओं से घिरे रहने की आदत हो चली थी. इससे हटकर कोई सुखी जीवन भी जिया जा सकता है, यह बात उनके लिए अकल्पनीय हो गई थी.
सपने तो उनके सच पूछो तो पति के जाने पर उन्हीं की तरह चिर-निद्रा में खो गए थे. विपिन तब तीन साल का था और अरविंद के होने में एक माह की देर थी, तभी वह भयानक हादसे में सदा के लिए छोड़कर चले गए थे. मां-बाप जीवित थे तब तक वे पीहर में रहीं, लेकिन उनके गुज़रते ही भाई-भाभी ने उन्हें अलग घर ले दिया. पिता अपने जीवनकाल में ही वसीयत में आधा हिस्सा उनके नाम कर गए थे. सब कुछ होते हुए भी पति के बगैर जीवन काटना ही रह गया था, जीना नहीं. अपने भीतर उन्होंने इच्छाओं को पनपने ही नहीं दिया. जीवन के प्रति एक शून्यता उनकी आंखों में सदा के लिए ठहर गई थी.
उन्हें उनकी जड़ता ने झिंझोड़ा या कृतिका की विषबुझी बातों ने, अपने गर्म आंसुओं में पिघलती यो शनैः शनैः मृत्यु पथ पर बढ़ रही थीं.
उन्हें लगा अंत समय आ गया है. उस दिन उनकी तबियत ज़्यादा ख़राब थी बहू... बमुश्किल ही वह पुकार सकी थी, अजब घरघराती, अटपटी आवाज़ थी.
कृतिका की प्रतिक्रिया एक ऊब भरी चिढ़ से हुई, "अब नाम लेना भी छोड़ दिया है. कृतिका से अब मैं बहू हो गई. आती हूं सासू जी. आपका हुक्म तो मानना ही पड़ेगा चाहे मर भी रही होऊं. इस घर में सदा से हुकूमत आपकी ही तो चलती आई है." व्यंग्य से मुंह तिरछा कर उसने कहा. क्रोध से पैर पटकते वह उनके कमरे में दाख़िल हुई.
"बड़ी नाटकबाज औरत है." वह बड़बड़ाई, मगर उनकी हालत देख वह सकते में आ गई. नहीं, नाटक नहीं, ये तो सच ही जा रही है. घर में कोई भी तो नहीं था. उनकी सांस उखड़ने लगी थीं. उन्होंने बड़ी ही बेचारगी से कृतिका की ओर देखा. उसका हाथ अपने हाथ में लेने की कोशिश में उनका आधा उठा हाथ क्षणांश में ही लटक गया, जैसे कोई जानवर दम तोड़ रहा हो. वह निर्विकार, निर्लिप्त सी उन्हें जाते हुए देखती रही.
इस समय उसकी अजीब हालत थी. न ग़म, न ख़ुशी, जैसे कोई फिल्मी दृश्य देख रही हो. महरी के आते ही उसने नाटक शुरू किया.
वहीं घिसे-पिटे बोल बोलकर जो वो हज़ारों बार हिंदी फिल्मों और टीवी सीरियलों में सुनती आई थी.
"हाय मां! हमें किसके सहारे अकेला छोड़ गई, अब कौन करेगा ऐसा लाड़-दुलार. हमें ज़रा भी सेवा का मौक़ा न दिया. आपकी जगह ईश्वर, मुझे उठा लेता." अब तक काफ़ी भीड़ जमा हो गई थी. फोन पर ख़बर सुनते ही विपिन दौड़ा आया था. मां के चरणों में बैठकर वह बच्चों की तरह फूट पड़ा था.
कृतिका के मगरमच्छ आंसू किसी को प्रभावित नहीं कर सके. शायद अंदर से वह भी इसे समझ रही थी. आज वे बर्फ़ की सिल्लियों पर निश्चेष्ट पड़ी थीं. कोई प्यार भरी हिदायत नहीं दे रही थीं. आज उसके कड़वे बोल उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे.
क्रियाकर्म की गहमागहमी हर सुख-दुख के फंक्शन की तरह समान हो गई. अब वह ख़ुद स्वामिनी थी. मांजी के सारे ज़ेवर जिन पर उसकी नीयत थी, अब उसके अधिकार में थे. ये घर, उनका बैंक बैलेंस सभी कुछ तो उसे मिल गया था. वह ख़ुशी के सातवें आसमान पर थी. विपिन ज़रूर ख़ामोश रहने लगा था. किंतु इसे मां के बिछोड़ का ग़म समझ वह, मन को तसल्ली देती. थोड़े दिन की बात है. बच्चे का प्यार जल्दी ही मां की याद भुला देगा.
उसका सोचा ग़लत साबित हुआ. विपिन को उससे नफ़रत हो गई थी. वह उसे ही मां की मौत का ज़िम्मेदार समझता था. मां अभी कुछ साल और जीवित रहती, मगर उनकी तो जीने की इच्छा ही इस हृदयहीन, दुष्ट औरत के कारण मर चुकी थी. इसने जीते जी ही उन्हें नरक की भट्ठी में धकेल दिया था. ठीक है अब भुगते यह भी और विपिन ने भी उसके साथ ठीक वही व्यवहार दोहराना शुरू किया, जैसा वह अपनी सास के साथ करती रही थी. घर में वही बोझिलता, बेगानापन और ख़ामोशी जिसमें मांजी घुट के रह जाती थीं. अब उसका दम घोंटने लगी थी.
बच्चे से वह हंसता-खेलता, लेकिन उसके साथ, निपट रुखाई और कठोरता बरतता. अपना हर काम वह स्वयं करता. पति सेवा का हक़ उसने पूरी तरह से छीन लिया था. घूमने-फिरने, पार्टी आदि में भी वे साथ न जाते. लोगों की पूछताछ और उससे उपजने वाली शर्मिंदगी से बचने के लिए उसने बाहर आना-जाना ही छोड़ दिया.
जिसे हम अपना समझते हैं, चाहते हैं उसकी बेरुखी और बेगानापन सहना क्या होता है, अब कृतिका को इस बात का एहसास होने लगा था. जीने के लिए हर व्यक्ति, कोई न कोई बहाना खोजता है. उसने भी ढूंढ़ लिया था एक तरीक़ा, नफ़रत का. अब जब वो नफ़रत ही न रही, तो उसके जीवन में एक शून्यता आ गई थी. तब वह ख़ुद नफ़रत कर रही थी, आज उसे झेल रही थी.
अरविंद को नौकरी लखनऊ में ही किसी प्राइवेट फर्म में मिल गई. उसने जिस लड़की से सिविल मैरिज की वह कॉलेज में उसके साथ ही पढ़ती थी. लड़की के पिता इनकम टैक्स कमिश्नर थे. इस लड़की ने घर में आकर उससे वही खेल प्रारम्भ कर दिया, जो कभी यह संवेदनहीनता से अपनी सास के साथ खेला करती थी.
वह एकदम अकेली रह गई थी. एकांश को पढ़ने के लिए देहरादून होस्टल में भेज दिया गया. विपिन बच्चे पर उसकी छाया भी नहीं पड़ने देना चाहता था. अरविंद की पत्नी एक सलीकेदार, संस्कारशील, विनम्र, हंसमुख लड़की थी. उसका भोला, मनमोहक सौंदर्य हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता व उसका सामाजिक दायरा काफ़ी विस्तृत था. उसे जेठानी की करतूतों का पता कुछ अरविंद, कुछ जान-पहचान वालों तथा विपिन की पत्नी के प्रति बेरुखी से लग चुका था. अरविंद की शह पर वह, जेठानी को सबक सिखाना चाहती थी. हां, विपिन की वह बहुत इज्जत करती.

कृतिका को अपनी ग़लतियों का एहसास हो चला था, लेकिन अब सिवा पछतावे के उसके पास कोई चारा न था. बीता समय लौटाया नहीं जा सकता था. काश, उसे मम्मी-पापा ने ग़लत बातों के लिए टोका होता. जब वह उनके पास जाकर मांजी का मज़ाक उड़ाती तो न सिर्फ़ उसके भाई-बहन बल्कि वे भी ख़ूब हंसते और उसे ग़लत शिक्षा देते.
"घर में अपना रौब रखा कर विपिन को मुट्ठी में रखना, वरना वो बुढ़िया तो तुझे एक तरफ़ बैठा देगी." इसी तरह की बातें वे उसे समझाते रहते.
दूसरे भाई की शादी के बाद पीहर में उसकी कोई पूछ न रही थी. मां नई बहू की ख़ुश करने में लगी रहती, क्योंकि दहेज से उसने उनका घर भर दिया था.
"मेरी ख़ुशियों में आग लगाकर किस जन्म की दुश्मनी निकाली है मुझसे मम्मी तुमने." वह आत्मालाप करते हुए कहती. गहरे अवसाद में डूबे रहने से उसे कई तरह के मानसिक रोग लग गए.
अब वह सिर्फ़ दया की पात्र बनकर रह गई थी. विपिन ने उसके इलाज में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन उसकी आत्मा को जो धुन लग गया था वह उसे खाए जा रहा था. इसका इलाज डॉक्टरों के पास भी न था. घरवाले अब उससे प्रेम और नरमी से पेश आते. मांजी की आहें उसका पीछा न छोड़ती, वह हर समय इसी सोच में डूबी रहती, "मैं कहां ग़लत थी?"
- उषा जैन 'शीरी'
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