शहर की संवेदनहीनता और अपनी स्थिति पर उसकी आंखें भर आईं. चलते हुए उसे ध्यान ही नहीं रहा कि कब वह शहर के ऐसे हिस्से में पहुंच गया जहां कोई गरीब बस्ती थी. बड़ी हिम्मत करके उसने आवाज़ लगाई-"नाक-कान छिदवा लो..."
कुछ पैसा कमाने की ख़ातिर वह बड़े शहर चला आया था. गांव में तो बस दाल-रोटी भर मिल पाती है. शहर में शायद अच्छा नेग मिल जाए. दो दिन से घूम रहा था शहर भर. बड़े-बड़े आलीशान मकानों को देखकर उसकी आंखें विस्मय से चौड़ी हो रही थीं. लेकिन अधिकांश जगह उसे अंदर ही नहीं जाने दिया गया.
"अरे ये बड़ा शहर है. यहां ऐसे नाक-कान नहीं छिदवाते. बड़े सुनारों के यहां सोने से छिदवाते हैं. तू पहली बार शहर आया है क्या, चल भाग..."
हर जगह दरबानों ने उसे भगा दिया. कई घरों में लोगों ने उसे ऐसे देखा मानो वह कोई अजूबा हो. पानी मांगने पर भी झिड़क दिया.
कंधे पर लौंग और बालियों की आलमारी टांगे वह थक गया था. आज तो शहर के ऐसे हिस्से में था जहां पानी तक नसीब नहीं हुआ. पन्द्रह रुपए बस में अलग ख़र्च हो गए. दो दिन से घर से लाया सत्तू खाकर गुज़ारा कर रहा है.
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अब खाली हाथ वापस लौट कर अम्मा को क्या मुंह दिखाएगा.
शहर की संवेदनहीनता और अपनी स्थिति पर उसकी आंखें भर आईं. चलते हुए उसे ध्यान ही नहीं रहा कि कब वह शहर के ऐसे हिस्से में पहुंच गया जहां कोई गरीब बस्ती थी.
बड़ी हिम्मत करके उसने आवाज़ लगाई-
"नाक-कान छिदवा लो..."
वह बस्ती में कुछ दूर ही गया होगा कि एक घर से आवाज़ आई-
"अरे रुकना भाई, जरा रुकना."
वह तुरंत पीछे मुड़कर रुक गया. एक महिला बड़े उत्साह से उसे बुला रही थी. उसने भीतर से अपनी बहू को बुलाया.
बहू ने कच्चे आ़गन में ही दरी बिछाई, उसे सम्मान से बिठाया. फिर अपनी छह माह की बिटिया को ले आई. तब तक सास ने आस-पड़ोस में भी आवाज़ लगा दी.
जब तक उसने नन्ही बच्ची के कान छेदकर बालियां पहनाईं तब तक दो-तीन औरतें और आ गईं अपनी बेटियों को लेकर. वह बड़ा सम्भलकर उनके कान में बालियां पहनाने लगा. इस काम में तो उसे पुश्तैनी महारत हासिल थी. ज़रा भी दर्द नहीं होता बच्चों को. सास ने जी भर आशीर्वाद दिया.
ज़रा देर में और भी महिलाएं, लड़कियां आ गईं. कोई कान तो कोई नाक में बाली पहनने को. सबने अपनी स्थिति अनुसार उसे नेग और बालियों के पैसे दिए.
तभी सास सबके लिए गुड़-नारियल का प्रसाद ले आई. उसे अलग से चिवड़ा-मिठाई दी. आज उनके लिए छोटा सा उत्सव ही तो था.
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खाकर पानी पिया तो उसका जी ठिकाने हुआ.
उन सबके दमकते चेहरे और भरी जेब लेकर वह वहां से चलने को हुआ. अभी भी शुष्क संवेदनहीन शहरों के बीच में कहीं-कहीं जीवन का आनंद-उत्सव और संवेदनशीलता बची हुई है. वह तेज़ी से चलने लगा. अब उसे बीमार अम्मा के पास पहुंचने की जल्दी थी.
- विनीता राहुरीकर

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