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कहानी- काश! (Short Story- Kash!)


लकी राजीव

काश! ये सब सच न होता. वो मोटरसाइकिल, उसकी पीछे वाली सीट और आगे बैठकर चलाने वाला... सब कुछ मेरा होना चाहिए था न, एक पल में मुझसे छीन कर किसी और को दे दिया गया... क्यों? पैरों के नीचे जैसे किसी ने जलती हुई आग रख दी हो.

गुड्डी ने आंखें उचका कर हैरानी से पूछा, “सच!”
सुमित चिल्ला कर बोला, “हां रे पगलिया, तैयार हो के आ जल्दी. ठीक नौ बजे फिल्म चालू हो जाती है. वैसे तैयार भी मत हो, इतनी सुंदर तो लग रही हो.”
गुड्डी गोल मोल, सिकुड़ती हुई मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर चिपक गई. आगे बैठे चालक की तरफ़ से हड़का दिया गया, “ठीक से बैठो, जैसे वाइफ लोग बैठती हैं.”
वो थोड़ा और आगे खिसक आई.
मोटरसाइकिल पूरी स्पीड से दौड़ती हुई गली के मोड़ तक दिखी, फिर खो गई. बगल वाले घर में छज्जे पर छुपकर खड़ी मैं, सब कुछ देखती रही. काश! ये सब सच न होता. वो मोटरसाइकिल, उसकी पीछे वाली सीट और आगे बैठकर चलाने वाला... सब कुछ मेरा होना चाहिए था न, एक पल में मुझसे छीन कर किसी और को दे दिया गया... क्यों? पैरों के नीचे जैसे किसी ने जलती हुई आग रख दी हो. ये सब मेरे साथ क्यों हुआ? क्यों मेरे पापा-मम्मी नहीं समझ पाए कि मेरे लिए सुमित से अच्छा और कोई हो ही नहीं सकता था. क्यों मेरी शादी ऐसे आदमी से कर दी गई, जिसके भीतर दिल तो धड़कता था, लेकिन केवल काम भर का. दिल के भीतर उत्साह या उमंग जैसा कुछ था ही नहीं! अभी जिस तरह सुमित और गुड्डी सिनेमा देखने गए, इस तरह के पल तो मेरे जीवन में आए ही नहीं. उसी तरह छज्जे पर खड़े-खड़े, यही सब सोचते हुए दस बज गए. भीतर से मम्मी की आवाज़ आई, तो मुझे होश आया, “लो दामादजी से बात करो. तुम्हारा फोन उठ नहीं रहा था, तो मेरे फोन पर मिला दिया.” मम्मी ने अपना फोन आगे बढ़ा दिया, “हां, बोलिए.”
“फोन कहां रखती हो अपना? चार बार किया, तुम जानती हो, लापरवाही मुझे पसंद नहीं.”
मैं चुप ही रही. मुझे पता था, नाराज़ होने के बाद ही नवीन असली बात बताएंगे, “मैं ये कह रहा था कि एक हफ़्ते के लिए मेरी ट्रेनिंग है मुंबई में, तो तुम थोड़ा और रुककर वापस आओ, यहां अकेले क्या करोगी.”
केवल ‘हूं’ कहकर मैंने फोन रख दिया. मन में तो आया था कि कह दूं, “जब आप उसी शहर में, उसी घर में साथ होते हैं तब भी मैं अकेली ही होती हूं.” सारी बातों पर मुझे एक साथ ग़ुस्सा आ रहा था.
स्कूल में छुट्टियां लगते ही मम्मी का फोन आ गया था, “मायके आ जाओ ना थोड़े दिन! वैसे भी तुमको स्कूल में पढ़ाने से ही ़फुर्सत नहीं है. मेरे पास तो रह नहीं पाती हो.”
यहां आकर मुझे क्या हासिल हुआ था? आते ही पता चला था कि सुमित की शादी हो गई है, साथ ही यह भी पता चला था कि वह अपनी नई नवेली दुल्हन के आगे-पीछे घूमता रहता है. उसकी ये बातें मोहल्ले में चर्चा का विषय थीं, लेकिन मेरे घाव पर तो वह नमक छिड़कने का काम करती थीं. कितने सालों पहले से यह तो मैं मन कर ही बैठी थी कि मिसेज़ सुमित अगर किसी को बनना होगा तो वह मैं ही बनूंगी. मुझे नहीं पता था कि मम्मी-पापा के मन में क्या चल रहा था.

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“सुमित से दोस्ती ही रखना, आगे का कभी मत सोचना... ठीक लड़का नहीं है, कभी इस लड़की के साथ नाम जुड़ता है, कभी उस लड़की के साथ.”
मैंने डरते हुए टोका था, “नहीं पापा, हम दोस्त ही हैं. वैसे वो सब बेमतलब की बातें हैं. सुमित ट्यूशन पढ़ाता है. वह सब लड़कियां उसकी स्टूडेंट हैं.”
“बिना आग के धुआं नहीं होता. और तुम क्यों उसकी वकील बन रही हो? तुम्हारी अच्छी-ख़ासी नौकरी है स्कूल में. किसी ऊंची पोस्ट वाले से ही शादी भी करेंगे तुम्हारी.”
क्या कहूं मैं अब? जिस ऊंची पोस्ट वाले लड़के से मेरी शादी हुई है, उसके पास मुझसे करने के लिए बातें ही नहीं हैं! दिन-रात काम में उलझा रहता है. मेरे भीतर का अकेलापन बढ़ता जा रहा है, ना उसको घूमने-फिरने का शौक है, ना ही कभी मेरे मन के भीतर उठ रहे सवालों के जवाब देने की ़फुर्सत है. मम्मी अक्सर मेरा उतरा चेहरा देखकर पहले पूछती थीं, “क्या हुआ? कोई बात है?”
जब मैं नवीन की उदासीनता के बारे में बताती थी, तो मम्मी हंसने लगती थीं, “यह भी कोई बात है दुखी होने की? इतने अच्छे से रहती हो, रानी जैसा जीवन जी रही हो. कोई ज़िम्मेदारी नहीं है तुम पर, तुम्हारी जैसी ज़िंदगी के लिए तो लोग तरसते हैं.”
मैंने धीरे-धीरे मम्मी से भी सब कुछ कहना बंद कर दिया था और मान भी लिया था कि इन बातों पर रोने का कोई फ़ायदा भी नहीं है. जिसका जैसा स्वभाव है, वह कभी भी नहीं बदला जा सकता है. लेकिन जब से यहां आई थी, अजीब सी बेचैनी मन में आकर बैठ गई थी. बगल वाले घर में ही वह प्रेमी युगल इस तरह ज़ोर-ज़ोर से हंसता था कि उनके हंसने की आवाज़ कानों में पिघले लावे की तरह उतरती थी.
अगले ही दिन दोनों छत पर मुझे दिख गए थे. सुमित ने एक बार कनखियों से मुझे देखा, फिर गुड्डी के साथ बातें करने में मशगूल हो गया था. गुड्डी मुझे देखकर मेरे पास चली आई थी, हमारे घरों के बीच की दीवार पर कुहनी टिकाकर वह बात करने लगी थी, “आंटी जी बता रही थीं कि आप आने वाली हैं. हमारा तो मिलना ही नहीं हुआ! यह आपकी बहुत बातें करते हैं, बताते हैं आप लोग साथ में पढ़े हैं. बहुत तारीफ़ भी करते हैं आपकी.”
मैंने धीरे से सुमित की ओर देखा. वह बार-बार मुड़-मुड़ कर हम दोनों को देख रहा था.
“आप शादी में क्यों नहीं आई थीं?”
“मैं स्कूल में टीचर हूं ना, उस समय छुट्टी नहीं मिल पाई थी.”
इतना कहकर मैं वहां से हटने ही वाली थी कि गुड्डी ने फिर रोक लिया, “अच्छा तो ठीक है आज शाम को आप आइए, शादी वाली पार्टी आज ही सही.”
मुझे तो जाना ही नहीं था उनके घर, ना मैं गई. सोचा फिर कभी दिखेगी, तो कोई बहाना बना दूंगी. लेकिन यह नहीं पता था कि घंटे भर मेरा इंतज़ार करने के बाद वह सारा सामान लेकर मेरे ही घर आ धमकेगी.

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“आपका इंतज़ार करते रहे और आप ग़ायब! तो हमने सोचा कि चलो आपके घर आकर ही पार्टी दे देते हैं, खाकर देखिए सब कैसा बना है.”
बहुत सारा खाने का सामान लेकर आई वो लड़की, मुझे तो बड़ी प्यारी लगी. मुझे तो बार-बार लग रहा था कि कहीं सुमित भी ना आ जाए, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. हां, यह बात ज़रूर थी कि हमारी बातों में वह बराबर वहीं उपस्थित रहा. गुड्डी हर दूसरी बात में सुमित का ज़िक्र करती थी. दही वड़े खाने लगी तो बोली, “हमारे यह तो कहते हैं कि तुम्हारे जैसे दही वड़े कोई नहीं बना पाता.”
उसके बाद छोले और पूरियां प्लेट में निकालते हुए मम्मी की ओर देखकर बोली, “आंटी, यह इतने बेशर्म हैं कि सबके सामने कह देते हैं मेरी बीवी जैसे छोले बनाने किसी को आते ही नहीं हैं.”
अपनी ही बात पर वह शरमा कर ख़ुद ही हंसती थी. उसके प्रति मेरे मन में जो जलन की भावना थी, धीरे-धीरे गायब होती जा रही थी. थोड़ी देर बाद जब मम्मी अंदर चली गईं, तो वह मुझे मेरी गृहस्थी, मेरे पति के बारे में सब पूछती रही. एकदम से बोली, “आपके हस्बैंड का नाम नवीन है ना! वह आपको बहुत प्यार करते होंगे.”
उसके इस अनूठे सवाल पर हैरानी जताते हुए मैंने कहा, “हां! क्यों, क्या सुमित नहीं प्यार करता तुमको?”
मेरे मन में बैठा कोई चोर था, जो मुझे यह सवाल पूछने को उकसा रहा था. वह एकदम से चौंक कर बोली, “हमारे ये तो हमको इतना चाहते हैं कि लगता है इससे अच्छा पति पूरी दुनिया में होगा ही नहीं. उस दिन मेरी एक अंगूठी नाली में गिर गई थी, सोचिए.. इन्होंने हाथ पर पन्नी चढ़ा कर ख़ुद अंगूठी ढूंढ़ी. हमको दुखी नहीं देख पाते हैं.”
गुड्डी की इन बातों से इतना तो साफ़ हो ही गया था कि इसे मेरे और सुमित के बारे में ख़बर ज़रूर लगी थी. यही कारण था कि वह अपने रिश्ते को मेरे सामने सिद्ध करना ही चाहती थी और इसीलिए पार्टी का बहाना बनाकर वह मेरे पास आई थी.
उसके जाने के बाद मैं चुपचाप आंखें मूंदें लेटी रही. पापा कब ऑफिस से आए, मुझे पता नहीं चला. रात में मम्मी-पापा के कमरे से आती आवाज़ मेरा मन और भारी करती जा रही थी. पापा धीरे से कह रहे थे, “इसका मुंह क्यों उतरा रहता है? ख़ुश नहीं है क्या वहां पर?”
इसके जवाब में मम्मी ने धीरे से कुछ कहा, जो मैं सुन नहीं पाई, लेकिन एक तसल्ली हुई. मेरा उतरा चेहरा इन लोगों को दिखता तो है. बहुत सारी बातें ध्यान में आती रहीं. कभी सुमित, कभी गुड्डी, कभी नवीन, कभी स्कूल... यही सब सोचते-सोचते कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला.
सुबह उठी, तो सूरज की धूप पूरे बिस्तर पर फैली हुई थी. पर्दा बंद करने के लिए खिड़की के पास आई, तो ना चाहते हुए भी नज़र बगल वाले घर के आंगन में बैठे दो लोगों पर चली गई. गुड्डी और सुमित ज़मीन पर चटाई बिछाकर बैठे हुए थे. पास ही रखा आम का ढेर और प्लेट में रखी गुठलियां इस बात का गवाह थीं कि इन दोनों ने इतनी सुबह ही कई आम निपटा दिए थे. पता नहीं क्यों मन में आया कि थोड़ी देर पहले आंख खुल जाती, तो मैं देखती कि प्यार में पड़े दो लोग आम कैसे खाते हैं! क्या हुआ होगा? गुड्डी ने आम काटकर सुमित की ओर बढ़ाया होगा, सुमित ने ख़ुद खाने से पहले गुड्डी को खिला दिया होगा. क्या पता थोड़ा सा आम उसके चेहरे पर भी मल दिया हो और उसकी इस शरारत पर गुड्डी खिल-खिलाकर हंस पड़ी हो. मुझे अपने घर का नाश्ता-खाना याद आया... मैं और नवीन बिना कुछ बोले चुपचाप अपनी प्लेट में देखते हुए नाश्ता करते हैं. छुट्टी के दिन दोपहर का खाना भी हम चुपचाप ही खाते हैं, कभी-कभी तो मुझे लगता है जैसे मेरे पास भी शब्द ख़त्म हो चुके हों.
दोपहर को गुड्डी आम का टोकरा लेकर हमारे घर आई, आते ही बड़े उत्साह से बोली, “देखिए गांव से आम आए हैं. इतने मीठे हैं कि केवल एक नहीं खा पाएंगी, दो-तीन खा जाएंगी.” वह बच्चों की तरह चंचलता से आम की बातें कर रही थी. उसके बाद फिर सुमित की तारीफ़ करने लगी. मेरा मन जलन से भरने लगा था. अभी यहां आए मुझे कुछ ही दिन हुए थे, हफ़्ता-दस दिन और मुझे रहना था. इस तरह यह हर दिन मिलती रही और हर दिन अपने प्रिय की बातें मुझे बताती रही, तो मैं तो जल कर स्वाहा ही हो जाऊंगी. मुझे इससे मिलना कम करना पड़ेगा, लेकिन ये संभव हो नहीं पाया. अप्रैल महीने की गर्मी मुझे कहीं भी बाहर जाने से रोक लेती थी. दिनभर मुझे घर पर ही रहना पड़ता था और उसका हमारे यहां हर दिन आना तय था.
धीरे-धीरे वह मुझसे खुलती जा रही थी. कभी अपने मायके के बाज़ार की बातें बताती, कभी दूसरे गांव में रह रहे अपने सास-ससुर की बातें बताती. हैरानी की बात थी कि सबको याद करते हुए उसकी आंखों में आंसू आ जाते थे. मैंने एक दिन उससे पूछा भी, “क्या गुड्डी! तुम मायके के गोलगप्पे याद करते हुए रोने लगती हो. यह भी कोई बात हुई?”
उसने हड़बड़ा कर अपने आंसू पोंछ लिए थे. ऐसा नहीं कि पहली बार मैंने उसकी उदासी पर ध्यान दिया था. पहले भी उसके चेहरे पर रुक-रुक कर उदासी की एक लहर आती तो थी ही! एक दिन मुझसे बच्चों के बारे में बात करने लगी, “परिवार बढ़ाने का आपका मन नहीं करता या अभी आप लोगों ने सोचा ही नहीं?”
मैंने गर्दन हिला कर ’नहीं’ में जवाब दिया. मैंने उसे इस बारे में कुछ नहीं पूछा, वह ख़ुद ही बताने लगी, “मेरा तो बहुत मन करता है, लेकिन क्या करें, शायद भगवान की मर्ज़ी नहीं है अभी! सोचती हूं एक प्यारा सा बच्चा घर में होता तो.”
इतना कहते ही वह रुआंसी हो गई थी. मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर थपथपा दिया, “जीवन में तुम्हें इतनी ख़ुशियां तो मिली हैं, जब उस ख़ुशी का वक़्त आएगा वह भी मिल जाएगी. अभी शादी को टाइम ही कितना हुआ है?”
अगले दो दिनों तक गुड्डी हमारे घर नहीं आई. मैंने छज्जे पर खड़े होकर देखा, तो वह घर के आंगन में भी नहीं दिखी. शाम को मैं छत पर गई तो छत पर भी नहीं दिखी. तीसरे दिन उठते ही मैंने आंगन में झांका. सुमित रबड़ की पाइप लिए अपनी मोटरसाइकिल धो रहा था. मैंने झिझकते हुए पूछा, “गुड्डी नहीं दिखाई दी कुछ दिनों से. ठीक तो है ना वह?”
सुमित ने हड़बड़ा कर ऊपर देखा, “हां, उसकी तबीयत ख़राब है.”
मैं सुमित के ऑफिस जाने का इंतज़ार करती रही. उसकी मोटरसाइकिल की आवाज़ सुनते ही मैं और मम्मी गुड्डी को देखने उसके घर जा पहुंचे थे. मम्मी को उससे बड़ा लगाव था. उनको देखते ही गुड्डी बच्चों की तरह सुबक पड़ी थी, “तीन दिनों से बीमार पड़ी हूं आंटी, आज आप देखने आई हैं?”
“मुझे तो पता ही नहीं था कि तुम बीमार हो, तुमने बताया नहीं, तुमको खाना दे जाते.”
“नहीं आंटी! खाना, जूस, दवा... यह सब तो है.”
उसका इतना कहना था कि मुझे फिर से मोटरसाइकिल की आवाज़ सुनाई दी. सुमित हाथ में बड़े-बड़े थैलों में कुछ सामान लिए घर के भीतर दाखिल हो रहा था. आते ही उसने जूस के पैकेट, ताक़त की दवाइयां, फल सब सजा दिए थे. हमारे लिए दो कप चाय बना कर लाया. थोड़ी देर बाद आकर सुमित उसके सिरहाने बैठ गया, प्यार से उसको निहारता रहा. उसके बाद उठकर अंदर चला गया.
ये सब देखने के बाद मुझे लगा था मैं ख़ुद ही बीमार पड़ जाऊंगी. पति इस तरह भी ख़्याल रख सकते हैं क्या? मुझे अपनी बीमारी के दिन याद आने लगे थे. दिनभर नवीन का एक फोन भी नहीं आता था कि मैंने दवा खाई या नहीं, बस घर आकर एक बार पूछते थे, आज बेहतर महसूस हो रहा है? डॉक्टर के यहां जब चलना हो तब बताना.
उसके बाद वह फिर अपनी दुनिया में गुम!
एक बात फिर जलन का कीड़ा मुझे काटने लगा था. ऐसा क्या ख़ास है गुड्डी में, जो उसका जीवनसाथी उसको अपनी दुनिया का केंद्रबिंदु बनाए बैठा है? सुमित के लिए कहीं कुछ और है ही नहीं. बस उसकी पत्नी, उसकी गुड्डी! हमारे पुराने दिनों की कोई याद, उसके चेहरे पर कभी नहीं दिखी मुझे! ऐसा कौन सा रंग गुड्डी ने आकर उसके मन पर मल दिया था जिसके नीचे पुराने सारे रंग दब गए थे? मेरी आंखें भरने लगती थीं, वो रंग मेरे पास क्यों नहीं, जो मैं अपने जीवनसाथी के मन पर लगा सकूं?
शाम को नवीन का फोन आया था. मुंबई की ट्रेनिंग के बारे में दो-चार बातें बताईं, उसके बाद उनके पास हमेशा की तरह बातों का अकाल पड़ने लगा था.
“कभी मेरा हाल भी पूछ लिया करिए.” मैंने टोक दिया था. नवीन चुप रहे, उसके बाद कुछ सोचकर बोले, “तुमको पता है, मुझे बहुत बातें करनी नहीं आतीं.”
फोन रखने के बाद मैं सोचती रही, इतना तो कहना आना चाहिए कि पहली बार मायके गई हो, याद आ रही है. तुम्हारे वापस आने का इंतज़ार कर रहा हूं. फोन हाथ में पकड़े मैं उसी तरह देर तक बैठी रहती अगर मम्मी की आवाज़ न सुनाई देती, “तुम यहां बैठी हो. अभी छत पर गए, तो बगल वालों की छत पर क्या देखा, बड़ा अजीब लगा.”
मुझे पता था, इन्होंने देखा होगा कि सुमित और गुड्डी प्यार भरे पलों में जी रहे हैं. इनको ख़राब लग गया होगा. मैं तो जब से आई थी, अक्सर कुछ न कुछ ऐसा ही देखा था.
“ऐसा क्या देख लिया आपने?”
“गुड्डी कोने में ज़मीन पर बैठी रो रही थी. मैंने आवाज़ दी तो आंसू पोंछते हुए नीचे भाग गई.”
“इसमें इतना चौंकने जैसा क्या था? अपने मायके को याद कर रही होगी. कौन सी ऐसी लड़की है, जिसे शादी के बाद ये सब याद करके रोना नहीं आता?”
“बेचारी को तो वहां बहुत जाने को भी नहीं मिलता न.”
मम्मी क्या कह रही थीं, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था! कौन रोकता होगा इसको वहां जाने से?
कहीं ऐसा तो नहीं कि सुमित ही न जाने देता हो. उससे दो-चार दिनों की जुदाई भी न बर्दाश्त होती हो! मम्मी को कुरेद कर सारी बात जाननी चाही, तो बस इतना ही समझ में आया कि सुमित को कहीं भी उसका अकेले जाना पसंद नहीं. न ही किसी के साथ फोन पर देर तक बात करना पसंद है. मुझे तो कुल मिलाकर इतना ही समझ आया था कि प्यार के पिंजरे में सुमित ने अपनी पत्नी को ़कैद कर लिया था, उसके लिए यही प्यार होता होगा. गुड्डी के लिए दुख तो हुआ. फिर लगा जब उसके पास पति रूप में मिला इतना मनभावन फूल है, तो उसके साथ लगे इन कांटों को तो वो बर्दाश्त कर ही लेती होगी. मैं इतना ही सोचकर गुड्डी की तरफ़ से संतुष्ट हो चुकी थी. मेरी बुद्धि उस दुख की राह को देख ही नहीं पा रही थी, जिस पर वो मासूम अकेले चल रही थी.
“बगल वाले घर में जाना तो ये बर्तन दे आना.”
गुड्डी के कई बर्तन हमारे यहां रखे थे. कामवाली वहां भी जाती थी. मैंने उसको ये ज़िम्मेदारी सौंप दी. वो तो तुरंत भड़क गई,
“हमने काम छोड़ दिया है बगल का, किसी और के हाथ भेज दीजिए.”

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उसका चेहरा बता रहा था कि इसके आगे भी वह बहुत कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन इंतज़ार कर रही थी कि कोई उससे पूछे. मैंने दो कप चाय बना कर उसको अपने पास बुला लिया, “आओ, चाय पी लो फिर आगे का काम करना. क्या हुआ, बगल वाले घर में काम ज्यादा था क्या जो तुमने छोड़ दिया?”
मेरा इतना पूछना था कि वह अपना सारा गुबार निकालने पर आमादा हो गई. कितना कुछ बताती रही वो उस गृहस्थी की जर्जर हालत के बारे में, जिसको मैं सपनों का महल समझती थी.
“इतनी अच्छी है वो औरत, उस आदमी लायक़ है ही नहीं...”
गुड्डी और सुमित के लिए इन्हीं शब्दों का वो बार-बार इस्तेमाल करते हुए भीतर की बातें सामने लाती रही. सुमित के भीतर बैठी शक की बीमारी, गुड्डी का जीवन मुश्किल करती जा रही थी.
वो किसी भी आदमी से बात कर ले, तो वो उन्मादी हो जाता था. अपने मायके अकेले चली जाए तो भी तूफ़ान आ जाता था. उसका फोन चेक करता रहता था. छत पर जाए तो भी उसके साथ जाता था. मेरे लिए ये सब समझना, उस पर विश्‍वास करना बहुत मुश्किल नहीं था.
सुमित के स्वभाव की इन कमियों की झलक मैंने पहले भी देखी थी, वो बात अलग थी पत्नी के साथ ये सब प्रचंड रूप में सामने आ गया था.
“लेकिन.. तुमने काम क्यों छोड़ा?”
मेरे लिए ये सवाल अभी भी अनुत्तरित था. कामवाली ने गहरी सांस भरी, “जो आदमी ख़ुद ग़लत होता है, वही इतना शक करता है. उस आदमी को लेकर मुहल्ले भर में कितनी बातें होती हैं. जब देखो तब नई लड़की के साथ नाम जुड़ता है.”
वो थोड़ा रुकी, हिचकते हुए बोली, “उनके यहां काम करते समय, अजीब सा लगता था. बताओ न दीदी, कोई औरत झाड़ू-पोंछा कर रही है और घर का आदमी पीछे-पीछे घूम रहा हो. और एक बार तो हमसे बोला कि...”
उसके आगे जो उसने बोला, वो मुझे सुनाई ही नहीं दिया. मुझे तो वो सारी बातें याद आती रहीं, जो मेरे पापा-मम्मी ने उसे लेकर मुझे कही थीं. सुमित के ढीले चरित्र के बारे में जो-जो बातें उन्होंने मुझसे कही थीं, वह मनगढ़ंत नहीं थीं. मन में बहुत तरह की बातें आ रही थीं. एक दबा-छुपा डर सामने आ रहा था. क्या होता अगर गुड्डी की जगह मैं होती? मैं कैसे बर्दाश्त करती ये सब? जैसे-जैसे वह डर बड़ा होता जा रहा था, वैसे-वैसे नवीन के लिए शिकायतें अपने आप छोटी होती जा रही थीं. जो भी कमियां हैं उनके साथ तो रहा जा सकता है. कम बोलना, चुप रहना, उदासीन होना, ये सब तो शायद समय के साथ बदल भी जाए, लेकिन किसी का चरित्र, वह तो नहीं बदला जा सकता.
“उसकी पत्नी तक उसके क़िस्से नहीं आते? कोई उसको नहीं बताता?”
“उसको सब पता है, तभी तो इतना नाटक करती है...”
“नाटक मतलब?”
दोनों जैसे सबके सामने दिखते हैं, वैसा सब कुछ अच्छा-अच्छा है थोड़ी. बहुत परेशान रहती है. सबसे बताती रहती है, मेरा पति जैसा किसी का नहीं है. ऐसा है न दीदी, जिसका जितना कपड़ा फटा होता है, उतना ही वो ढंकता रहता है.”
यानी गुड्डी तो ज़हर के दो ग्लासों को एक साथ पी रही थी. एक तरफ़ अपने पति की आवारागर्दी बर्दाश्त करती थी, दूसरी तरफ़ अपने ऊपर आती शक की आंच का ताप भी झेलती थी.
बड़ा भारी मन लिए मैं अगले दिन मायके से निकली, मम्मी ने पूछ लिया, “गुड्डी से नहीं मिलोगी? एक बार मिल लेती.”
मैं क्या करती मिलकर, गुड्डी कुछ और ढंकने की कोशिश करती. अपने दुखों की बदबू को नकली इत्र से थोड़ा और महकाती, थोड़ी और बनावटी बातें बनाती.
घर से निकलते समय देखा कि सुमित की मोटरसाइकिल मकान के बाहर खड़ी थी. काश! कभी गुड्डी इतनी हिम्मत करे कि पीछे वाली सीट पर दुबककर बैठने की बजाय झोला उठाकर अकेले मायके निकल ले. एक हसरत और मन में उठी थी... काश! मैं और मेरा जीवनसाथी एक दूसरे को थोड़ा और समझकर, अपने रिश्ते को एक ’नवीन’ रंग से सराबोर कर दें.

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