"तू ज़्यादा उसकी तरफ़दारी मत कर. जब देखो तब मुझे टोकती रहती है. तुझे क्यों इतना प्यार आता है उस पर..." मालती अब अपनी बेटी पर झल्ला गई.
"पता नहीं क्या ऊटपटांग पका कर रख देती है. खाया भी नहीं जाता. कल से तो अपना खाना लगता है ख़ुद ही बनाना पड़ेगा." मालती जी अपनी बेटी को थाली में खाना परोसते देखकर बड़बड़ा रही थीं.
"क्या हुआ मा़ कितना तो अच्छा खाना बनाती है भाभी. फिर भी तुम हमेशा मीनमेख निकाल कर उसे ताने मारती रहती हो." सुमि ने मालती को टोका.
बेटे की पसन्द से घर में आई दहेज विहीन बहू मालती को फूटी आंख नहीं सुहाती थी. बेटे पर तो ज़ोर चला नहीं, लेकिन बहू पर अपनी भड़ास निकालने का कोई मौक़ा वह छोड़ती नहीं थीं.
"तू ज़्यादा उसकी तरफ़दारी मत कर. जब देखो तब मुझे टोकती रहती है. तुझे क्यों इतना प्यार आता है उस पर..." मालती अब अपनी बेटी पर झल्ला गई.
"इसलिए कि मां तुम भूल रही हो कि की कल मुझे भी किसी सास की बहू और किसी की भाभी बनकर नए घर में जाना है... अगर मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया जाएगा तो मुझे क्या बुरा नहीं लगेगा तो मैं भाभी से ऐसा बर्ताव क्यों करूं.
और हां तब तुम मेरी सास को कुछ मत कहना, क्योंकि अपनी बहू के लिए तुम भी तो ऐसी ही हो."
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सुमि ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया और अपनी और भाभी की थाली परोसकर उसे आवाज़ लगाई, "भाभी चलो खाना खा लो."
मालती अवाक सी खड़ी रह गई.
- विनीता राहुरीकर

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