अनुज ने हवा में घुलते रंगों की ओर देखते हुए कहा, “सच कह रहा है यार! हम रंगों के मर्म को समझे बिना ही उन्हें धर्म और जाति में बांट देते हैं. देख- हवा में उड़कर सारे रंग एक हो जाते हैं. काश! हम भी इसी तरह एक हो पाते.”
जगह-जगह रंग-अबीर और गुलाल उड़ रहे थे. गलियों में बच्चों की पिचकारियों की आवाज़ गूंज रही थी, तो कहीं युवाओं की टोलियां हंसी-ठिठोली के साथ होली मना रही थीं. हर तरफ़ उत्सव का रंगीन शोर था.
मगर उसी माहौल से कुछ दूर, छत पर खड़े अनुज और सोहेल इन उड़ते रंगों से अलग-थलग खड़े थे. बाहर रंगों की बारिश थी और उनके मन में चुप्पियों की धुंध.
तीन साल पहले की होली आज भी उन्हें साफ़-साफ़ याद थी। उसी दिन, होली खेलते समय कुछ लड़कों ने सोहेल से बदसलूकी करते हुए कह दिया था कि उसके मज़हब में होली नहीं होती, इसलिए वह इस त्योहार का हिस्सा नहीं बन सकता. यह सुनकर अपने दोस्त के लिए अनुज उनसे भिड़ गया था. उसे अच्छी तरह पता था कि होली समाज को बांटने का नहीं, जोड़ने का त्योहार है.
पर उस दिन के बाद, झगड़े और बढ़ते तनाव के डर से दोनों ने होली खेलना ही छोड़ दिया. घरों में भी सख़्त हिदायत दे दी गई कि अब वे किसी तरह का जोख़िम न लें.
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फिर भी हर साल होली आते ही उनके मन में एक टीस उठती- रंगों से दूर रहने की टीस.
नीचे रंगों की उड़ान देखता हुआ सोहेल उदासी भरे स्वर में बोला, “इंसानों की तरह रंगों का भी अपना कोई इतिहास रहा होगा. न जाने किसने लाल को लाल और पीले को पीला कहा होगा? रंगों को पहचान देने वाले ने यह तो नहीं सोचा होगा कि एक दिन यही रंग आपसी द्वेष और मतभेद की वजह बन जाएंगे.”
अनुज ने हवा में घुलते रंगों की ओर देखते हुए कहा, “सच कह रहा है यार! हम रंगों के मर्म को समझे बिना ही उन्हें धर्म और जाति में बांट देते हैं. देख- हवा में उड़कर सारे रंग एक हो जाते हैं. काश! हम भी इसी तरह एक हो पाते.”
तभी नीचे से आवाज़ आई, “सोहेल… अनुज… नीचे आ जाओ. होली नहीं मनानी क्या?”
दोनों चौंककर सीढ़ियों की ओर दौड़े. नीचे का दृश्य देखकर वे कुछ पल के लिए ठिठक गए.
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सोहेल की अम्मी, अनुज की मां को मलमल के रंग लगा रही थीं और अनुज की मां सोहेल की अम्मी को. हंसी के बीच रंगों की हल्की परतें उनके चेहरों पर खिल उठी थीं. पास ही एक बाल्टी में रंग घुला पानी रखा था मानो दोनों मांएं उनका ही इंतज़ार कर रही हों.
उसी बीच वे दोस्त भी आ गए, जिनके लिए रंगों का मतलब धर्म या जाति नहीं, बल्कि प्यार और भाईचारा था.
दोनों दोस्त मुस्कुराते हुए आगे बढ़े और फिर रंगों की बौछार में डूब गए. ऊपर छत की उदासी नीचे आंगन की हंसी में घुल गई.
मांएं रंग साफ़ कर रसोई में चली गईं. कहीं गुजिया तलने की ख़ुशबू उठी, कहीं पकवानों की तैयारी होने की.
मुठ्ठी भर दोस्तों की बेफ़िक्री, दो मांओं की सादगी भरी दोस्ती और अपने ऊपर उड़ते रंगों को देखकर अनुज के मन में एक उम्मीद जागी.
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उसे लगा- देश में चाहे नफ़रत के रंग फैलते जा रहे हों, पर थोड़े ही सही… प्यार के रंग अब भी बाकी हैं.
काश, ये रंग हर होली पर और गहरे हों… और हर दिल पर चढ़ जाएं!

पूर्ति खरे
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