आजकल लड़कियां संयुक्त परिवार की बजाय एकल परिवार को ज़्यादा तरजीह दे रही हैं. वे शादी के बाद अपने ससुराल वालों के साथ नहीं रहना चाहतीं. लेकिन ऐसा क्यों है?
तुलना करना एक बड़ी वजह है
ससुराल वालों की आदत होती है बहू की तुलना कभी अपनी बेटी से करेंगे, तो कभी जेठानी से. तुलना मतलब आप अच्छे और उनके जितना समझदार नहीं हो यह ताना बात-बात में देना और फिर जब बात ननद की हो, तो सास की बेटी जितना परफेक्ट तो कोई हो ही नहीं सकता. ये बातें बहू को इरीटेट करती हैं और वह ये सब सुन-सुन कर वो इतना पक जाती है कि कई बार उसे लगता है कि मेरी तो कोई पहचान है ही नहीं या फिर मैं तो किसी काम में अच्छी हूं ही नहीं. उसका कॉन्फिडेंस ख़त्म होने लगता है और तब वो फ़ैसला करती है कि मुझे यहां रहना ही नहीं है.
घर की कुछ ज़रूरी बातें उसके सामने ना करना
इसका मतलब साफ़ है जैसे ही बहू ड्रॉइंगरूम में आती है और वहां होने वाले कन्वर्सेशन का पार्ट बनना चाहती है, तो सब चुप हो जाते हैं और टॉपिक बदल देते हैं. ये सब विजिबल होता है. घर की बातें छिपाना या झूठ बोलना, ये कुछ ऐसे व्यवहार हैं, जो सास-ससुर अक्सर कर बैठते हैं. ये सब बातें बहू को तकलीफ़ पहुंचाती हैं और उसे लगता है कि मैं तो इस घर का हिस्सा हूं ही नहीं और धीरे-धीरे इन्हीं बातों की वजह से उसे यह घर अपना नहीं लगता, बल्कि पराया लगने लगता है और वह अपने ख़ुद के घर का सपना देखने लगती है.
प्राइवेसी और स्पेस चाहिए होता है
आजकल की लड़कियां अपनी निजी ज़िंदगी में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करतीं. वे चाहती हैं कि घर में वे अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहन सकें, जब चाहें सो सकें और जब चाहें बाहर जा सकें. संयुक्त परिवार में अक्सर हर काम के लिए बड़ों की अनुमति या उनके अनुशासन का पालन करना पड़ता है, जो उन्हें बंधन जैसा महसूस होता है. इसलिए ससुराल में, लड़कियों को अक्सर लगता है कि वे किसी के अधीन हैं और उनके हर काम पर नज़र रखी जा रही है. ऐसे में यह ससुराल से ज़्यादा एक कैदखाना बन जाता है और बहू इससे बाहर निकलना ही पसंद करती है.
सास के साथ एडजस्ट करना मुश्किल लगता है
कुछ घरों में सास ख़ुद को उस घर का बॉस समझती है और उस घर में जेलर की तरह व्यवहार करती है. सास हमेशा बहू को बताती है कि उसके घर में क्या नियम हैं, उसके परिवार में कैसे रहना है, क्या किया जाता है और उसके समय में क्या होता था. ये सब बातें बताने के साथ-साथ वह यह भी चाहती है कि वह जल्द ही इसे अपना ले. इन सब बातों के लिए लड़की मानसिक रूप से तैयार नहीं होती. यह सारी जानकारी लड़की के लिए नई होती हैं और उनमें से कुछ बातें उसकी विचारधारा से मेल नहीं खातीं. ऐसे में दोनों के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है, जिससे तनाव हो सकता है.
जॉइंट फैमिली में जॉब करना मुश्किल हो जाता है
जी हां, ये सही बात है. पहली बात तो जॉइंट फैमिली में बहू से यह अपेक्षा की जाती है कि वह शादी के बाद अब स़िर्फ अपना घर संभालें और बच्चे पैदा करें. लेकिन आजकल की लड़कियां अपने करियर को लेकर बहुत गंभीर हैं और उसे नहीं छोड़ना चाहतीं. अगर उसे जॉब करने की इज़ाज़त मिल भी जाए, तो भी उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह ऑफिस के साथ घर की भी सारी ज़िम्मेदारी उसी तरह से निभाएं. अगर बहू ऑफिस वाली है, तो बहू कुछ दिन और छुट्टी ले लो. हम भी तो बहू का सुख ले लें... और अगर बहू काम नहीं करती तो ‘आओ बेटा अब से ये घर की ज़िम्मेदारी तुम्हारी. सब तुमको संभालना है...’ ‘बहू सुबह जल्दी उठे. नाश्ता बना दे. चाय बना दे. दोपहर का खाना बनाए. फिर एक घंटा आराम कर ले. हमने कहां रोका. शाम की चाय-नाश्ता के बाद खाना बना ले, तो अरे हमने 30 साल वही किया है.’ वह उस लड़की को एक इंसान नहीं, बल्कि स़िर्फ बहू समझते हैं जिसका फ़र्ज़ है ऑफिस से आकर खाना बनाए और पूरा घर संभाले. अगर वह ऐसा नहीं कर पाती है, तो उसे ताने दे देकर मार दिया जाता है. हर लड़की ऐसी सिचुएशन में पड़ने से बचने के लिए अलग रहने का विकल्प चुनती है.
जेनरेशन गैप भी वजह बनती है
पुराने समय के तौर-तरीक़ों और आज की आधुनिक सोच में काफ़ी अंतर है. खान-पान, बच्चों की परवरिश और ख़र्च करने के तरीक़ों को लेकर अक्सर सास-ससुर और बहू के बीच मतभेद होते हैं. ये छोटी-छोटी बातें रोज़ के झगड़ों का कारण बन जाती हैं, जिससे बचने के लिए अलग रहना उसे एक बेहतर विकल्प लगता है.
ससुराल बहू के लिए कई बार डिप्रेशन का कारण बन जाती है
महिलाओं में बढ़ते डिप्रेशन का एक बड़ा कारण, हर छोटी-छोटी बातों के लिए अपने ससुराल वालों या पति से इजाज़त लेना है. यह इतने स्तर पर होता है कि धीरे-धीरे कैद सा महसूस करने लगती हैं महिलाएं और इसका सीधा असर उनकी मानसिक हालत पर पड़ता है. महिलाएं दुखी होती हैं कि उन्हें अपने मायके जाने की इजाज़त नहीं मिलती है. उसके दोस्तों के घर आने पर पाबंदी है. एक महिला ने तो बताया कि उसका भाई विदेश से स़िर्फ कुछ घंटों के लिए आया था, लेकिन ससुराल वालों ने उसे एयरपोर्ट पर इसलिए नहीं जाने दिया, क्योंकि शादी के वक़्त उस भाई ने कुछ कह दिया था, वह इस बात की खुन्नस इस तरह से निकालना पसंद करते हैं.
पति के साथ क्वालिटी टाइम बिताने का मौक़ा कम ही मिलता है
जब सास-ससुर साथ होते हैं, तो पति-पत्नी को हर समय एक मर्यादा का पालन करना पड़ता है. वे घर में खुलकर हंसी-मज़ाक नहीं कर पाते, सोफे पर साथ बैठकर फिल्म नहीं देख सकते या बिना किसी झिझक के एक-दूसरे के प्रति प्रेम व्यक्त नहीं कर पाते. इस तरह हमेशा सतर्क रहना उनके रिश्ते की सहजता को कम कर देता है. कभी-कभी पति-पत्नी के छोटे-मोटे झगड़ों में बड़े सदस्य अनजाने में दख़ल दे देते हैं. इससे जो मुद्दा आपस में सुलझ सकता था, वह और बढ़ जाता है. क्वालिटी टाइम का मतलब स़िर्फ घूमना नहीं, बल्कि साथ बैठकर शांति से अपनी समस्याओं को सुलझाना भी है, जो भीड़भाड़ वाले घर में मुश्किल हो जाता है. अक्सर जब कपल बाहर डिनर या फिल्म के लिए जाना चाहते हैं, तो उन्हें परिवार के प्रति अपराधबोध महसूस कराया जाता है या उन्हें सबको साथ ले जाने की सलाह दी जाती है. इससे उनकी डेट नाइट्स या प्राइवेट आउटिंग्स ख़त्म हो जाती हैं.
- शिखा जैन

