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लघुकथा- गांठ… (Short Story- Ganth…)

हर समस्या का समाधान होता है. धैर्य से हर गांठ सुलझ जाती है. समय रहते ही उलझन को आपसी समन्वय और सामंजस्य से सुलझा दिया जाए तो गांठें बनने ही नहीं पाती.

सुरभि 15 दिनों से मायके आई हुई थी. गुमसुम, उखड़ी हुई सी थी. पूछने पर कुछ बताती नही थी माता-पिता को, फिर भी वे समझ रहे थे कि सुरभि और उसके पति के बीच कुछ तो अनबन हुई है.

पिता सुभाष एक सुबह उससे बात करने के लिए उसके कमरे में गए तो देखा सुरभि अपने लंबे घने बालों को सुलझाते हुए बुरी तरह झल्ला रही थी. बालों में गांठें पड़ गई थीं. सुरभि कैंची लेकर काटने ही जा रही थी कि सुभाष ने उसके हाथ से कंघी लिया और बाल सुलझाने लगे. सुभाष को पता था वह अपने अंदर की भड़ास निकाल रही है.

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"कोई भी उलझन ऐसी नहीं होती बेटा कि उसे सुलझाया न जा सके. हर समस्या का समाधान होता है. धैर्य से हर गांठ सुलझ जाती है. समय रहते ही उलझन को आपसी समन्वय और सामंजस्य से सुलझा दिया जाए तो गांठें बनने ही नहीं पाती. उलझन चाहे रिश्तो में हो चाहे बालों में उन्हें समय से और धैर्य से सुलझाना चाहिए. यदि सुलझाने की बजाय काटने की प्रवृत्ति रखें तो बालों की तरह ही रिश्ते भी एक दिन ख़त्म हो जाएंगे. काट देना किसी गांठ से छुटकारा पाने का तरीक़ा नहीं है. नुकसान अपना ही होता है." सुभाष ने उसके बाल सुलझा दिए थे.

"थैंक्स पापा!" सुरभि की आंखें भर आईं.

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शाम को सुरभि का पति उसे लेने आया और वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर जा रही थी.

- विनीता राहुरीकर

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Photo Courtesy: Freepik

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