स्क्रीन के सहारे भोजन की आदत
चारू को ऑफिस जाने में देर हो रही थी. उसने घर से निकलते समय अपनी सास मालती से कहा, “मम्मी, अगर चिराग खाने में आनाकानी करे तो उसे यू-ट्यूब दिखाकर खिला दीजिएगा.” आज के समय में यह दृश्य आम हो गया है, जहां बच्चे मोबाइल या टीवी देखते हुए खाना खाते हैं. माता-पिता को लगता है कि इससे बच्चा बिना परेशानी के खाना खा लेगा.
दादी की समझदारी भरी पहल
मालती जी जानती थीं कि स्क्रीन दिखाकर खाना खिलाना सही आदत नहीं है. उन्होंने चिराग के सामने सजी हुई थाली रखी और प्यार से कहा, “देखो, मम्मी ने कितना स्वादिष्ट भोजन बनाया है. आओ, मैं तुम्हें बालकृष्ण की कहानी सुनाती हूं.” कहानी सुनते-सुनते चिराग ने ख़ुशी-ख़ुशी खाना खा लिया. मालती का मानना था कि भोजन करते समय ध्यान केवल खाने पर होना चाहिए.
क्या है माइंडलेस ईटिंग?
विशेषज्ञों के अनुसार, जब बच्चा स्क्रीन देखते हुए खाता है, तो उसे यह पता नहीं चलता कि वह क्या और कितना खा रहा है. इस आदत को ‘माइंडलेस ईटिंग’ कहा जाता है. इसमें बच्चा कभी ज़रूरत से ज़्यादा खा लेता है तो कभी कम. परिणामस्वरूप उसका वज़न बढ़ सकता है या वह कुपोषण का शिकार हो सकता है. इसके विपरीत जब सजग होकर भोजन किया जाए तो उसे ‘माइंडफुल ईटिंग’ कहते हैं.

स्क्रीन के सामने खाने से बच्चे का मन पूरी तरह उसी में डूब जाता है. शरीर को यह संकेत नहीं मिल पाता कि पेट भर गया है या नहीं. इससे पाचन क्रिया प्रभावित होती है और भोजन का पूरा पोषण नहीं मिल पाता. कई बार माता-पिता संतुष्ट हो जाते हैं कि बच्चा खा तो रहा है, लेकिन यह संतोष अधूरा होता है.
सही आदत कैसे विकसित करें?
बच्चों में भोजन के प्रति रुचि जगाना ज़रूरी है. उन्हें कहानी सुनाते हुए, हल्की बातचीत करते हुए या प्राकृतिक दृश्य दिखाते हुए खिलाया जा सकता है, ताकि उनका ध्यान खाने पर भी बना रहे.
संक्षेप में भोजन के समय बच्चे का ध्यान केवल खाने पर होना चाहिए. माइंडलेस ईटिंग से बचाकर ही हम उन्हें स्वस्थ और संतुलित जीवन की ओर ले जा सकते हैं.
- वीरेंद्र बहादुर सिंह

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