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कहानी- आईं तुम याद मुझे… (Short Story- Aai Tum Yaad Mujhe…)

भावना प्रकाश


भावना प्रकाश

वो दिन मैं कभी भूल नहीं सकती जब मुझे बेतहाशा रोते देख मम्मी मुझे गले लगाकर चुप कराने लगी थीं. थोड़ी देर बाद मुझे एहसास हुआ था कि जिन पलों में मुझे मम्मी को संभालना चाहिए, उन पलों में वो मुझे संभाल रही हैं. बहुत कहा उनसे मैंने और भइया ने अपने साथ चलने को, पर अपनी खुद्दारी और पापा की यादें छोड़ किसी पर निर्भर होकर रहना उन्हें गंवारा न हुआ.

यादों का बंडल पर्त दर पर्त खुल रहा है. मैं हौले से सीढ़ियां चढ़ रही हूं. रेलिंग पर धूल की चादर चढ़ी है. डस्टिंग करती मम्मी की मुस्कान कौंध जाती है मन में. बरामदे में मुख्य दरवाज़े के बाहर वही बोर्ड लगा है- स्वीट आशियाना.
वही डाइनिंग टेबल, उसके ऊपर क्रोशिया का मम्मी के हाथ का बनाया कवर, उसके साइड वाली दीवार पर वही घड़ी जिसके चारों ओर हम भाई-बहनों की बचपन से बड़े होते की तस्वीरें गोलाकार बनाते हुए लगी हैं. किचन में जाती हूं. एक-एक बर्तन छूती हूं.
“ये रहा तेरा मुरब्बा और ये रहा निमय का अचार...” मर्तबान देखकर वो दृश्य फुदककर आंखों के आगे आता है, फिर कहीं खो जाता है. मम्मी के कमरे में जाती हूं. मम्मी का बेड छूती हूं. मन करता है लेट जाऊं.
“आ सिर में तेल लगा दूं. सारी थकान दूर हो जाएगी.” मम्मी की तेल लेकर खड़ी तस्वीर जैसे बादल में बिजली की तरह कौंधती है. वॉर्डरोब खोलती हूं. करीने से तहे कपड़े जमे हैं.
“देख बेटा ऐसे तह करते हैं कपड़े कि प्रेस कराने की ज़रूरत ही न रहे...” लगा मम्मी कह रही हैं. पर पलटकर देखती हूं, वो कहीं नहीं हैं. बालकनी में जाती हूं. चिड़िया के दाने-पानी के लिए नांद रखी है, जिसमें एक नन्हीं चिड़िया दाना-पानी ढूंढ़ रही है, उसमें कुछ नहीं है. पर चिड़िया फिर भी गर्दन टेढ़ी करके जाने क्या ढ़ूंढ़े जा रही है. जैसे उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा कि उसमें अब कुछ नहीं है. मुझे लगा वो चिड़िया मैं ही हूं.
मेरा मन चीत्कार कर उठता है.
“क्या ढूंढ़ रही है पगली!” पर दिल नहीं मानता. कहता है वो यहीं कहीं हैं. तो क्या वास्तव में मम्मी चली गईं? नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता. उन्होंने कहा था, “तेरे साथ एक महीना बिताए बिना कहीं नहीं जाऊंगी.” वो अपना वचन कभी नहीं तोड़तीं. वो कैसे जा सकती हैं मुझे छोड़कर? बिना बताए, बिना कुछ कहे, बिना संकेत दिए.
“मुझे मम्मी चाहिए... नहीं मम्मी तुम ऐसे नहीं जा सकतीं... मैं तुम्हें ढूंढ़कर रहूंगी...” चीत्कार करता मन शीशे के सामने खड़ा था. शाम का धुंधलका था. आंखें खोलीं, तो उसमें अपना वो अक्स दिखाई दिया जो मेरा होकर भी मेरा नहीं था. मुझ पर व्यंग्य करता अक्स, मुझे धिक्करता अक्स. क्या वाकई में उन्होंने कुछ नहीं बताया? कोई संकेत नहीं दिया? या तुमने सुना नहीं... हुंह... अब पछतावे होत क्या जब... अक्स विलेन की तरह हंस पड़ा और मैं ठगी सी खड़ी रह गई.
चलो मेरे साथ... अक्स डपटता है और सच में मन आज्ञाकारी बच्चे सा अतीत की यात्रा पर निकल पड़ता है.    
बेटियां पापा की लाड़ली होती हैं, जैसे मैं थी. मेरे पापा कितने बुद्धिमान हैं, मेरे पापा एक बार मैं जो मांगू, दिला देते हैं... मेरे पापा मुझे बहुत प्यार करते हैं... मेरे पापा मुझे सब कुछ सिखाते हैं, मेरे पापा मेरे और मेरी हर समस्या के बीच दीवार हैं. मेरे पापा मुझे बहुत ऊंची ऑफिसर बनाना चाहते हैं!..  पापा!  पापा!  पापा!..
बाल मन की प्यारी उक्तियां! सच था, पर एक सच और था, जिसकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया. मां की बुद्धिमानी, उनकी संवेदनशीलता, उनका धैर्य, उनकी कर्मनिष्ठा, उनके अनवरत संघर्ष! और इन सबसे बढ़कर उनका ख़ामोश प्रेम! कब ध्यान दिया था मैंने... बचपन में तो उनसे चिढ़ने से फ़ुर्सत न थी.  

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हर समय पापा के साथ पुस्तकों में ज्ञान की दुनिया खोजती उनकी लाड़ली को मम्मी का व्यावहारिक जगत में खींचकर लाना कभी पसंद न आता.
“खाना ठीक से खाओ, समय पर खाओ... सामान यथास्थान रखो, अपना ध्यान रखो साथ ही दूसरों का भी, थोड़ा-थोड़ा हर काम सीखो, घर का इतना काम करना ही करना है...” उफ़! मम्मी हैं या उपदेशों का कैसेट और निर्देशों की दुकान.
छोटी थी, जब मम्मी हर नए फैशन की ड्रेस सिलकर हम बहनों को पहना दिया करतीं. ख़ुशी होती थी, पर इसके लिए न कभी उनकी तारीफ़ की न धन्यवाद दिया. सोचती, ‘हां कर लेती हैं मम्मी सिलाई, शौक है उनका...’ कभी कोई उनके बनाए अचार, चटनी, मुरब्बों आदि की तारीफ़ करता तो मन ही मन कहती, “बनाया नहीं बनवाया है नौकरों से, इसमें कौन सी बड़ी बात है.”
हर नए फैशन का स्वैटर बुनकर हमको ही नहीं पहनाना, बल्कि घर में मेहमान बनकर आए पूरे परिवार को बिदाई के रूप में बांटना. तब उनकी अनोखी और निरर्थक हॉबी लगती थी. इन सबके पीछे छिपी मेहनत, परिवार को स्नेह सूत्र में पिरोकर रखने की इच्छा-शक्ति, कलात्मक अभिरुचि और नौकरों से काम कराने के लिए आवश्यक व्यवस्थापन की दक्षता को पहचानना शायद उम्र और अनुभव के साथ ही आता है.
पर मम्मी को हीन समझने का एक कारण और था. मैं बहुत छोटी थी तब मम्मी आधे समय दादी-बाबा और गांव की गृहस्थी की देखभाल के लिए गांव चली जातीं और आधे समय दादी-बाबा हमारे साथ रहने आ जाते. मम्मी तब थोड़ा घूंघट करतीं, दादी से देहाती भाषा में बात करतीं और घर के कामों में लगी रहतीं.
मम्मी की अनुपस्थिति में हम बच्चों को संभालने के लिए जो बेबी सिटर रखी गई थी वो ट्रेंड ईसाई महिला थी, जो फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलती थी. उसका पहनावा और रहन-सहन मेरी नज़र में आधुनिक था और मम्मी की छवि एक गंवार महिला की बन गई थी जिसे वक़्त ने ही तोड़ा.  
हुआ यों कि हाईस्कूल में मेरी रैंक पहले स्थान से सीधे दसवें पर आ गिरी. पापा बहुत व्यावहारिक इंसान थे. रोते देखा तो स्नेह से डांटकर कहा, “मैंने तुझे योग्यता को अंकों की कसौटी पर नापना कब सिखाया जो रो रही है?” अपने काम पर लग गए. पर मम्मी ने उस दिन शायद पहली बार मेरी इच्छा के ख़िलाफ़ भी मुझे गले लगाया, मेरे आंसू पोंछे और कहा, “तू उदास मत हुआ कर. तेरी उदासी मेरा दिल चीर जाती है.” तब भी मुझे मम्मी की ममता महसूस न हुई, बल्कि दूसरे दिन जब मम्मी को पापा से ये कहते सुना कि मुझे इंटर में ह्यूमैनिटीज़ दिला दी जाए.
मैं फट पड़ी. एक तो बचपन से चली आ रही इमेज टूटने से इगो को लगा धक्का, उस पर से दोस्त और टीचर्स के ताने और इन सबसे बढ़कर वो उम्र, जिसमें शायद हर बेटी को मां अपनी सबसे बड़ी दुश्मन नज़र आती है.
मैं उन पर फट पड़ी, “तुम मुझे भी अपने जैसी बुद्धू बनाना चाहती हो?..” और न जाने क्या-क्या मैं कहती गई.
पापा ने मेरा एडमीशन ह्यूमैनिटीज़ में करा दिया और मम्मी से मेरा ऑफिशियल शीतयुद्ध शुरू हो गया. पर दो महीने में ही समझ आ गया कि पापा ने एडमीशन कराते समय ठीक ही कहा था, “तुम्हारे मार्क्स कम आने का कारण साइंस में तुम्हारी अभिरुचि न होना है. बेटा साइंस को अच्छा या ऊंचा समझना एक ग़लती है. इंसान के लिए अच्छा विषय वो होता है, जिसमें उसकी रुचि होती है. तुम्हारी मां मनोविज्ञान की मेेधावी विद्यार्थी हैं. उन्होंने बरसों तुम्हारा ‘एप्टीट्यूट’ परखा है.”
बिल्कुल बेमन से लिए गए विषय जल्द ही रुचिकर लगने लगे. रुचि के साथ ज्ञान बढ़ा तो संघर्ष और उपलब्धियां भी. मैं हमेशा टॉप पर रहने की चाह में टफ टास्क उठा लेती. फ्रस्टेटेड होती तो मम्मी हाथ फैलाकर कहतीं, “ला, सारी चिंताएं मुझे दे दे.”
शुरू में मैं मुंह फेर लेती, पर एक दिन मैंने हाथ उनके हाथ में दे ही दिया. मन की परतें खुलीं तो पहली बार लगा मम्मी से दूरी बनाकर बहुत बड़ी ग़लती कर दी है. कितनी अनकही बातें थीं दिल में, जो स़िर्फ मम्मी के साथ बांटी जा सकती थीं. बारहवीं में प्रथम स्थान आने के साथ ही देश के सबसे बड़े विद्यालय में मनपसंद विषयों के साथ चयन हो गया.

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ख़ुशी बहुत थी, पर उस दिन पहली बार लग रहा था कुछ छूट रहा है. कुछ रह गया है, कोई टीस है, जो बयां नहीं हो पा रही. और ये तब स्पष्ट हुआ जब हॉस्टल में पहली रात लेटी और आंखें बंद करते ही कौंध गया सालों से रिपीट होता एक दृश्य.
मैं हल्की नींद में होती थी. मम्मी कमरे में आतीं. मेरी किताबें हौले से उठाकर बुक-मार्क लगाकर रखतीं. मेरा चश्मा उतारतीं और मुझे चादर ओढ़ाकर लाइट बंद करके मेरे सिर पर बहुत हौले से हाथ फेर देतीं. उस दिन पहली बार उन्हें याद करके रोई थी. पछताई थी कि दिल की बातों के झरने को पहले क्यों नहीं बहने दिया.  
फाइनल में थी, जब परीक्षाओं के कुछ दिन पहले भयानक जॉन्डिस हो गया. पढ़ना तो दूर, आंख खोलते ही सिरदर्द करने लगता था. फिर डॉक्टर की हिदायतें भी हॉस्टल में रहकर पूरी करना संभव न था.
पापा ने तो बड़े स्नेह से कह दिया, “मैं आ जाता हूं वापस लेने. साल ही तो ख़राब होगा. जान है तो जहान है.” पर दूसरे दिन वार्डेन ने बताया कि मम्मी भी आई हैं, तो कानों पर विश्‍वास न हुआ. बिस्तर पर लेटी बेटी की बंद आंखों से गिरते गर्म आंसुओं को पोंछ मम्मी प्यार भरी झिड़की देते हुए बोलीं, “बस इतने में हिम्मत हार गई मेरी पढ़ाकू और हिम्मती बेटी.”    
“पर मम्मी...” आगे के शब्द हिचकियों में डूब गए. मम्मी ने बिल्कुल बचपन की तरह पुचकार कर चुप कराया, फिर बोलीं, “सुनो, तुम्हें लग रहा है कि परीक्षा के दिन तक तुम लिखने जाने लायक हो जाओगी. चाह ये रही हो कि कोई तुम्हें आंखें बंद किए हुए ही रिवीज़न करा दे. है न?”

कहानी- आईं तुम याद मुझे


ये तो पहले भी कई बार महसूस किया था कि मेरे दिमाग़ में क्या चल रहा है, मम्मी शब्दशः समझती हैं.
“हमने कॉलेज के बगल में फ्लैट देख लिया है. किचन भी है वहां. तुझे लेकर वहां शिफ्ट हो रही हूं. अब ला सारी चिंताएं मुझे दे दे.” कहते हुए उन्होंने हाथ फैला दिया और मैंने फीकी सी हंसी हंसते हुए उनके हाथ पर हाथ रख दिया.
हिदायती खाना और दवाई की ही नहीं, मेरे हमेशा की तरह प्रथम आने के सपने भी उन्होंने अपने हाथ में ले लिए. मुझसे आंखें बंद करवाईं और मेरे नोट्स के रजिस्टर उठाकर शुरू हो गईं और उनके ज्ञान ही नहीं, शिक्षण कौशल की भी पर्तें खुलने लगीं.
“इस प्रश्‍न में दस प्वाइंट्स हैं, अच्छा इन्हें ऐसे याद करो, इन प्वाइंट्स के पहले अक्षर से ये शब्द बन रहा है, इनसे एक कहानी बन रही है...” मैं आश्‍चर्य करती, “तुम्हें अर्थ शास्त्र भी आता है? राजनीति शास्त्र भी? साहित्य भी?”
तो मम्मी हंस पड़ती हैं, “सारे शास्त्रों को घोंटकर गृहिणी नाम का पकवान बनता है.” फिर समझातीं, “ये सब मनोविज्ञान में पढ़ाया जाता है कि कैसे याद करते हैं हमारे दिमाग़.”
“तुमने मनोविज्ञान जैसा विषय इतने अच्छे अंकों से पास करके जॉब क्यों नहीं की?” एक दिन अचानक मेरे मुंह से निकला.
“फिर परिवार और तेरे दादी-बाबा की देखभाल कौन करता?”
मुझे पलकें बंद किए हुए ही लगा उनकी पलकें भर आईं हैं. किसी टूटे सपने की किरचें चुभ रही हैं शायद.
“मम्मी, तुम्हारे साथ रहना है. बहुत सारी बातें करनी हैं.” मैं फूट पड़ी.
“मुझे भी.” उस दिन पहली बार मां-बेटी गले लगकर बहुत देर तक रोए.
“कम से कम एक महीने.”
“प्रॉमिस, एक महीने तेरे साथ बिताए बिना तो मैं यमराज के पास भी नहीं जाऊंगी.”
घर आते समय हम ट्रेन में बतिया रहे थे.
पर वो नियति ने एक बार फिर मुझे मम्मी से झटके से अलग किया. घर आए पंद्रह दिन ही बीते थे कि बड़े शहर में इंटर्नशिप. फिर अगली बार घर आए एक हफ़्ता हुआ था कि जॉब और फिर शादी... हर बार एक कसक, हर बार एक खलिश...    
उनके कौशल की अगली पर्तें खुलनी शुरू हुईं शादी के बाद.
“मम्मी ये अचार कैसे बनता है, वो मसाला कैसे?”
“तुम ये सामग्री लाओ, फिर फोन करो.”
“मेरा सूट दर्जी ने इतना बेकार सिला था, हमने खोल दिया, पर अब सीधी सिलाई नहीं हो रही.”
“ठीक है, अबकी सारे कपड़े एकत्र कर ले आना, ठीक कर दूंगी.”
“मुरब्बा?”
“पहले सुन लो, फिर सामग्री लाना.” रेसिपी इतनी लंबी थी कि सुनने का भी धैर्य नहीं था. मम्मी हंस पड़तीं, “इसीलिए कहा था...”
हमारी रोज़ की टेलीफोन पर बातचीत के अंश...
मेरी तो सारी समस्याओं की चाभी थीं मम्मी. पर उनका खालीपन? कभी-कभी उनकी आवाज़ की खलिश कचोट जाती.
“तेरे पापा तो समाचारों से, पुस्तकों से दिल बहला लेते हैं पर मैं? मेरी दुनिया तो बस परिवार रहा. भाई-बहन, देवर-ननद, बच्चे सब अपने जीवन में व्यस्त हो गए.” और एक दिन उनके जीवन का आधार- पापा भी साथ छोड़ गए.  
वो दिन मैं कभी भूल नहीं सकती जब मुझे बेतहाशा रोते देख मम्मी मुझे गले लगाकर चुप कराने लगी थीं. थोड़ी देर बाद मुझे एहसास हुआ था कि जिन पलों में मुझे मम्मी को संभालना चाहिए, उन पलों में वो मुझे संभाल रही हैं. बहुत कहा उनसे मैंने और भइया ने अपने साथ चलने को, पर अपनी खुद्दारी और पापा की यादें छोड़ किसी पर निर्भर होकर रहना उन्हें गंवारा न हुआ.
“मम्मी, इतनी इंटेलिजेंट और एजुकेटेड होकर तुमने कैसे एडजस्ट किया गांव के माहौल में?”
“तेरे दादी-बाबा का प्यार था. बिल्कुल अम्मा-बाबू की तरह थे वो.”
“इतना बड़े परिवार के लिए सेक्रीफाइस करना कैसे मंज़ूर किया. कोई प्राइवेसी नहीं, कोई...”
“सब तेरे पापा का प्यार था.” कभी नहीं कहा कि मेरा बड़प्पन था. हां इतना ज़रूर कहा, “तू आ जा,  तेरे साथ बहुत सी बातें करनी हैं. तू मेरी सबसे अच्छी सहेली है न! आ तो बताऊं अपनी ज़िंदगी, अपने सुख-दुख...”

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 “बस ये प्रमोशन हो जाए, तो छुट्टी ले लूंगी, वो सेमिनार मेरी बरसों की ख़्वाहिश है, हो जाए, तो आ जाऊंगी...” मैं अपनी कहती रही. मेरी समस्याएं, मेरी उलझनें और वो सुलझाती रहीं. पर कभी मैंने उन्हें सुलझाने की कोशिश की? समझा कब युगों से अंडर रेटेड और टेकेन फॉर ग्रांटेड रही उस शख़्सियत की अहमियत और दर्द? कब दिया उन्हें वो सम्मान और ध्यान जो वो डिज़र्व करती थीं. अक्सर कहने लगी थीं वो, “मेरे जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया...” अक्सर वो बोलते-बोलते चुप हो जातीं, पर हम उनके संकेत कभी समझ ही न सके. कितने महीनों से उनकी ज़ुबान पर बस यही शब्द थे, “एक बार एक महीने के लिए आ जाओ.” हम टालते रहे..  
अचानक लगा मैं अंधेरे कमरे में बैठी रो रही हूं और मम्मी मेरे आंसू पोछकर पुचकार रही हैं. मैं उनके हाथ पकड़ने की कोशिश करती हूं कि मेरे हाथ आर-पार हो जाते हैं. मैं घबराकर उनकी ओर देखती हूं. उनके होंठों पर एक तृप्त और गरिमामयी, लेकिन उदास मुस्कान है.
“तुम्हारी उदासी मेरा दिल चीर देती है, तुम कभी उदास न होना. याद रखना, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं.” कहकर वो पीछे की ओर कदम बढ़ाने लगती हैं.
“मम्मी... मम्मी... कहां जा रही हो? रुको...” कहते हुए मैं उनके पीछे भागती हूं, पर वो गायब हो जाती हैं. मेरी आंखें खुल जाती हैं. बैठे-बैठे झपकी आ गई थी शायद. मन फिर डपटता है. संकेत उन्होंने दिया नहीं कि तुमने समझा नहीं.
भइया मेरे कंधे पर हाथ रखते हैं. मैं ग़ुस्से में उन्हें देखती हूं. आंखों में लिखा है, मुझे समय पर इंफॉर्म क्यों नहीं किया?
“ये पढ़ो.” वो मम्मी की डायरी आगे बढ़ा देते हैं. ममता चंद शब्दों में सिमट आई है, “शमी अपने उस सेमिनार के लिए विदेश गई है, जो उसके बरसों की मेहनत और सपना है. अगर मुझे कुछ हो जाए, तो उसके सेमिनार ख़त्म होने तक कुछ न बताना...”
मैं और पन्ने पलटती हूं, “तू मेरे बारे में जानना चाहती थी न? पर मेरे पास आने का समय न निकाल पाई. कोई बात नहीं. तेरे लिए अपनी कहानी लिखकर जा रही हूं... जब समय मिले, पढ़ लेना.” मैं पागलों की तरह पन्ने पलटने लगी. पूरी डायरी भरी है. मैं डायरी को गले लगाकर जार-जार रोने लगी और रोती ही गई...

कहानी- आईं तुम याद मुझे


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