मुझे झटका लगा... इतना दर्द, इतना कठिन जीवन? और मैं छोटी-छोटी बातों से घबराकर मरने जा रही थी... मुझे अपने आप से घिन आने लगी!
"... तुमने हमेशा अपने घरवालों को सही माना और मुझे दोषी ठहराया. शादी के इतने सालों बाद भी तुम मुझे समझ नहीं पाए. इतना अकेलापन बर्दाश्त नहीं होता, मैं जा रही हूं... अलविदा!"
अंतिम पंक्ति लिखते-लिखते मैं फूट-फूटकर रो पड़ी. दुपट्टा उठाकर मैंने पंखे को देखा...
डिंग-डांग! डिंग-डांग! लगभग ४५-५० साल की एक महिला खड़ी थी.
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"मैं सरोज!.. उस दिन राखी मैडम के यहां हम मिले थे. आपने आज सैंपल देने के लिए बुलाया था."
"हैं!.. अच्छा हां! लेकिन अभी नहीं..." मेरा गला रुंध गया.
"मैडम, एक बार देख लीजिए, इतना सामान लेकर पैदल आई हूं. ये मूंग का पापड़, चावल का.. अचार भी है, देखेंगी?" ना चाहते हुए भी मैं उन्हें अंदर लेकर आई. वो लंगड़ाते हुए चल रही थीं.
"आपके पैर में चोट लगी है शायद... ऐसे में इतना भारी बैग? और कोई नहीं है घर में?"
उनके चेहरे पर दर्द भरी मुस्कान फैल गई, "मैडम, पति जब तक ज़िंदा रहा, खूब मार-पीट होती रही. एक बार मेरी टांग तोड़ दी थी. तब से पैर टेढ़ा ही पड़ता है. दो बेटियां हैं, उनके ख़र्चे, पढ़ाई.. परिवार वाले पूछते नहीं हैं, ऐसे में मुझे ही हिम्मत करनी होगी ना!"
मुझे झटका लगा... इतना दर्द, इतना कठिन जीवन? और मैं छोटी-छोटी बातों से घबराकर मरने जा रही थी... मुझे अपने आप से घिन आने लगी!
"चलिए सरोज जी, मेरी बहन का होटल है. उससे आपको मिलवा देती हूं. हर महीने वहीं सामान दे दिया करिए. इस तरह भटकने की कोई ज़रूरत नहीं है."
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"आप बहुत अच्छी हैं मैडम! इसीलिए कन्हैया जी ने मुझे आपके पास भेज दिया..." वो मेरा हाथ पकड़कर रोने लगीं.
मैं मन ही मन बोली, 'कन्हैया जी बहुत अच्छे हैं इसीलिए आपको ठीक उसी समय मेरे पास भेज दिया!'
- लकी राजीव

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