कभी-कभी जब उसकी तबीयत कुछ ज़्यादा ही रोमांटिक होती, वह कल्पना करता कि वह किसी हसीना के साथ बारिश में भीग रहा है... फिर उसने किसी खंडहरनुमा उजाड़ मकान में शरण ली है... फिर लकड़ियां जलाकर अपने-अपने कपड़े सुखाते हुए वे दोनों एक दूजे की आंखों में झांकते हुए गुनगुना रहे हैं- "रूप तेरा मस्ताना...
मॉन्टी उर्फ़ मनोज कुमार गिटार बजा लेता है. उम्र- पच्चीस वर्ष, शिक्षा- बी.ए. और एक राष्ट्रीयकृत बीमा कम्पनी में सहायक की नयी-नयी नौकरी.
मॉन्टी की शादी की चर्चा उसके घर में यदा-कदा उठने लगी है, किन्तु मॉन्टी अभी शादी करना नहीं चाहता. उसके अन्दर रह-रहकर बस यही इच्छा उठती है कि वह पहले किसी से प्यार करे... जींस-शर्ट में किसी छरहरी, गौरवर्षीय युवती का हाथ अपने हाथ में लेकर, पार्क के बीचोंबीच ईलू... ई... लू... चिल्लाते हुए दौड़ लगाए और थक जाने के बाद, किसी कोने की बेंच पर बैठकर, एक ही दोने में साथ-साथ गोलगप्पे खाए!
कभी-कभी जब उसकी तबीयत कुछ ज़्यादा ही रोमांटिक होती, वह कल्पना करता कि वह किसी हसीना के साथ बारिश में भीग रहा है... फिर उसने किसी खंडहरनुमा उजाड़ मकान में शरण ली है... फिर लकड़ियां जलाकर अपने-अपने कपड़े सुखाते हुए वे दोनों एक दूजे की आंखों में झांकते हुए गुनगुना रहे हैं- "रूप तेरा मस्ताना...
लेकिन मॉन्टी की इस कल्पना को साकार करने लायक कोई लड़की उसे न मिल सकी. मध्यमवर्गीय, संस्कारी परिवारों की लड़कियों में इतना साहस कहां?
मॉन्टी का एक दोस्त था. उसकी एक बहन थी. वह मॉन्टी के हिसाब से निहायत ही रूढ़िवादी थी. रंग गोरा, नैन-नक्श आकर्षक, भरी हुई देह और मैट्रिक पास का प्रमाणपत्र. पिछले तीन-चार वर्षों से अपने विवाह की बाट जोहती हुई घर में अचार, पापड़, बड़ियां आदि बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही थी.
वह लड़की जब-जब मॉन्टी को देखती, कल्पना करती कि उसका भावी वर भी ऐसा ही हो... स्मार्ट, छैला, गिटार बजाने वाला... वह मॉन्टी को दूर से ही मीठी-मीठी नज़रों से निहारती. उस घर में आते-जाते मॉन्टी को लगा मानो लड़की उसे चाहने लगी है.
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उसने एक दिन विचार किया- 'यदि इसी लड़की को थोड़ा मॉडर्न बना दिया जाए तो जी-भरकर रोमांस करने के बाद इससे शादी की जा सकती है.' अतः मौक़ा पाकर उसने लड़की से अंग्रेज़ी के तीन अक्षरों वाला फिल्मी डायलॉग आख़िर बोल ही दिया. सुनकर लड़की का चेहरा शर्म से लाल हो उठा और वह भागकर बाथरूम में जा छुपी. मॉन्टी आधे घंटे तक जवाब की प्रतीक्षा में किसी प्रकार डटा रहा, किन्तु वह उसके सामने नहीं आई.
अब मॉन्टी जब भी उसके घर आता, वह लड़की सब की नज़र बचा उसे देखकर मुस्कुरा देती. अपने हाथों से बनाए व्यंजन नाश्ते के लिए भिजवाती और इन व्यंजनों की तारीफ़ सुनने के वास्ते दरवाज़े के पीछे चिपकी रहती.
एक दिन जब मॉन्टी उसके घर आया तो संयोग से वह घर में अकेली थी. घर का दरवाज़ा बन्द था. खटखटाने पर वह बगल की खिड़की पर आई और बोली, "जो भी कहना हो, कह दीजिए, मैं भैया को बोल दूंगी."
मॉन्टी बाहर गली में आकुलता से दरवाज़ा खोलने की प्रार्थना कर रहा था. उसने धीमे स्वर में कहा, "दरवाज़ा तो खोलो, मैं तुम्हीं से कुछ कहना चाहता हूं."
लड़की का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया, फिर उसने आंखों में दुनिया भर की शरारत भरते हुए कहा, "जो भी कहना हो, यहीं कह दीजिए. दरवाज़ा नहीं खोल सकती मैं."
मॉन्टी ने कहा, "कल पार्क में मिलो न. पांच बजे, ठीक."
लड़की ने कहा, "मैं अकेली घर से बाहर नहीं निकलती."
मॉन्टी ने अनुनय भरे स्वर में कहा, "तो फिर किसी सहेली के संग नून शो ही देखने आ जाओ. प्लाजा के बाहर मैं प्रतीक्षा करूंगा."
लड़की ने सपाट स्वर में कहा, "मैं मां के संग ही फिल्में देखने जाती हूं."
मॉन्टी झुंझला उठा, "तो फिर प्यार क्यों करती हो मुझसे?"
लड़की ने इठलाते हुए कहा, "मैं एक हिन्दुस्तानी लड़की हूं... जिसके संग फेरा लूंगी, प्यार उसी से करूंगी."
लड़की खिड़की से उठकर अंदर चली गई. मॉन्टी झुंझलाता हुआ बाज़ार की ओर निकल गया और एक पिक्चर हॉल में एडल्ट फिल्म लगी देख, झट टिकट लेकर अंदर दाख़िल हो गया.
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मॉन्टी अब यदा-कदा ही जाने लगा है लड़की के घर. अब लड़की मौक़ा निकालकर उससे बातें भी करने लगी है. उसने इधर संगीत भी सीखना प्रारंभ कर दिया है. अब लड़की की माताजी भी उन लोगों के वार्तालाप के मध्य उपस्थित रहने लगी हैं और बीच-बीच में अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणियों द्वारा लड़की की पाककला, सिलाई बुनाई में दक्षता तथा अन्य गुणों को रेखांकित करने लगी है. मां की उपस्थिति से निःशंक एवं उत्साहित होकर लड़की धर्म, अध्यात्म एवं प्रेरक प्रसंगों की खुलकर चर्चा करना चाहती है, जबकि मॉन्टी बातचीत का रुख हिन्दी फिल्मों, टीवी सीरियल्स जैसे हल्के-फुल्के विषयों की ओर मोड़ना चाहता है.
मायूस एवं हताश होकर मॉन्टी जब घर लौटने लगता है तो मौक़ा देखकर लड़की कभी-कभी उसे हाथ हिलाकर विदा देती है, जबकि मॉन्टी ऐसे मौक़ों पर चुम्बन उछालता है. लड़की लजाने का अभिनय करती हुई मुंह मोड़ लेती है.
समय का चक्र घूमता है अब मॉन्टी की शादी हो गई है. लड़की मॉडर्न थी, देखते ही मॉन्टी ने पसंद कर ली. दहेज भी अच्छा मिल रहा था. अतः घरवालों को भी ऐतराज़ नहीं था.
शादी के बाद मॉन्टी की पत्नी उसके परिवार में खप नहीं पा रही थी. उसकी पत्नी चाहती थी कि मॉन्टी अपना घर छोड़कर ससुराल में बस जाए, किन्तु मॉन्टी के अंदर का मध्यमवर्गीय संस्कार अपनी ज़मीन छोड़ना नहीं चाहता था. मॉन्टी की पत्नी चाहती थी कि वह स्कर्ट पहनकर मॉन्टी के संग क्लब में जाए, जबकि मॉन्टी उसे साड़ी के अतिरिक्त कुछ और पहनने देना नहीं चाहता था.
शादी के तीन महीने के अंदर ही मॉन्टी का बैंक बैलेंस समाप्त हो गया. आगे के एक-दो महीने पी.एफ. से लोन लेकर चले, किन्तु पत्नी की फ़रमाइशों का लेशमात्र ही वह पूरा कर पाता. मॉन्टी चाहता कि उसकी पत्नी सुबह नहा-धोकर गर्मागर्म पराठे बनाए, जबकि आठ बजे सुबह बिस्तर छोड़ने वाली उसकी पत्नी की इच्छा होती कि चाय बेड पर ही मिले और सुबह का झमेला ब्रेड और ऑमलेट से निबटा दिया जाए,
मॉन्टी की पत्नी सलवार सूट में उसके संग, हाथों में हाथ डालकर पार्क में दौड़ना चाहती, अपने कॉलेज के कुछ दोस्तों व सहेलियों को घर में पार्टी देना चाहती. जबकि मॉन्टी अब उससे बातें करने से भी कतराता. धीरे-धीरे उनके रिश्तों की कडवाहट बढ़ती गई. एक दिन मॉन्टी की पत्नी उसे अंग्रेज़ी में "बैकवर्ड... कावर्ड..." और न जाने क्या-क्या कहकर अपने मायके चली गई. मॉन्टी उससे तलाक़ लेने की सोचने लगा.
मॉन्टी अब फिर से दोस्त से मिलने के बहाने लड़की के घर जाने लगा है. उसके तलाक़ की चर्चा सुनकर लड़की बार-बार ईश्वर को धन्यवाद देती है, "अच्छा हुआ जो मेरा इससे विवाह नहीं हुआ, वरना मेरी भी यही दुर्दशा होती.."
मॉन्टी ने साहसकर एक दिन उससे विवाह के लिए कहा था, तो उसने दुत्कारते हुए कहा, "पहले क्यों नहीं किया..? तब तो छैल छबीली खोजते थे... खा गए न धोखा..? मेरे खानदान में आज तक किसी लड़की का ब्याह दुजहे लड़के से नहीं हुआ, फिर मैं तुमसे कैसे शादी कर सकती हूं?”
मॉन्टी ने कहा, "सोच लो... तुम्हारी उम्र भी छब्बीस के पार जा रही है... अब तो कोई दुजहा ही मिलेगा."
लड़की ने इठलाते हुए कहा, "अभी मेरे पिताजी और भैया है, देख लेना... कोई राजकुमार ढूंढ़ कर लाएंगे मेरे लिए, तुम्हारे जैसा दुजहा किरानी नहीं."
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दो वर्ष इसी तरह गुज़र गए, दहेज की बढ़ती मांग तले दबे लड़की के हताश पिता तथा दौड़ने-धूपने की परेशानी से तबाह हाल लड़की के भाई को लड़की की मां ने समझाया, "मॉन्टी क्या बुरा है? अब तो उसका विधिवत तलाक़ भी हो गया, अपनी बिरादरी का भी है."
मॉन्टी के यहां बात चली और तय हो गई. सगाई के वक़्त मॉन्टी ने चुपके से लड़की से कहा, "क्यों, आख़िर यह दुजहा क्लर्क ही तुम्हारे पल्ले पड़ा न?"
लड़की ने झेंपते हुए कहा, "ऐसा न कहें, आप तो मेरे देवता हैं."
- संतोष दीक्षित
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