वहां भीड़ में अचानक एक नवयुवक से मैं टकरा गई और उसके क़ीमती चश्मे का फ्रेम टूट गया. मुझे काफ़ी अफ़सोस हुआ, पर उसने कुछ नहीं कहा. जब तक हम स्टेशन पर मौजूद रहे, वह छुपी छुपी निगाहों से मुझे देखता रहा. उसके व्यक्तित्व में एक ज़बर्दस्त आकर्षण था, जिससे मैं उसकी ओर मन ही मन खिंचती चली गई.
प्यार क्या होता है, इसके बारे में अक्सर अपनी सहेलियों से सुनती रहती थी, पर प्यार कैसे होता है, इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता नहीं था.
एक बार हमारी बुआजी दिल्ली से हमारे यहां आई. उन्हें स्टेशन से लेने के लिए पापा और मैं गए थे. वहां भीड़ में अचानक एक नवयुवक से मैं टकरा गई और उसके क़ीमती चश्मे का फ्रेम टूट गया. मुझे काफ़ी अफ़सोस हुआ, पर उसने कुछ नहीं कहा. जब तक हम स्टेशन पर मौजूद रहे, वह छुपी छुपी निगाहों से मुझे देखता रहा. उसके व्यक्तित्व में एक ज़बर्दस्त आकर्षण था, जिससे मैं उसकी ओर मन ही मन खिंचती चली गई.
घर आने के बाद मुझे उसी की याद आती रही. कुछ महीनों के बाद घर में मेरी शादी की बातें होने लगीं, पर मुझे तो सिर्फ़ उसी का ख़्याल आता था. हर वक़्त मैं उसी के बारे में सोचती रहती थी और उदास रहती थी.
एक दिन मम्मी ने कहा, "आज लड़के वाले तुम्हें देखने आ रहे हैं, तैयार हो जाओ." मैंने मम्मी से साफ़-साफ़ कह दिया कि मैं शादी नहीं करना चाहती. मुझे अभी कॉलेज का अंतिम साल पूरा करना है.
मैं बहुत रोई-धोई, पर मां के आगे मेरी एक न चली. आख़िर लड़का और उसके माता-पिता घर आ ही गए. मां ने मुझे तैयार होने को कहा, पर मैंने साफ़ मना कर दिया. आख़िर मम्मी मान गई, पर उन्होंने कहा, "जब वे लोग घर आ ही गए हैं तो एक बार लड़का देख लो. इज़्ज़त का सवाल है. अगर पसन्द न आए तो मना कर देना." मैं मान गई और चाय लेकर उनके कमरे में गई.
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लड़के को देखे बिना ही मैं वापस मां के पास आई और मना कर दिया.
पापा ने बताया, "लड़के का नाम विक्की है और लड़के वाले चाहते हैं कि अंजू और विक्की कुछ देर अकेले में मिलें, बातें करें, फिर दोनों का जो फ़ैसला होगा, वही आख़री माना जाएगा." पहले तो मैंने और मां ने मना किया, पर पापा के बहुत ज़्यादा ज़ोर देने पर मैं मान गई.
विक्की के मम्मी-पापा और मेरे मम्मी-पापा दूसरे कमरे में चले गए. मैं विक्की से कुछ दूर बैठ गई, पर विक्की मेरे पास आया और बोला, "कितने इंतज़ार के बाद आज मिली है, मेरी ज़िंदगी मुझे." मैंने जब निगाहें ऊपर उठाई तो दंग रह गई. ये स्टेशन वाला वही लड़का था, जिसका चश्मा मुझसे टूट गया था.
"मुझे भी..." मारे ख़ुशी के मैं बस इतना ही कह पाई और वहां से भाग आई. मां ने पापा से बताया कि अंजू को लड़का पसंद नहीं है और वे लड़के वालों को मना कर दें. पापा ने मुझसे पूछा कि तुम्हें लड़का पसंद है या नहीं तो मैं शर्म के मारे मां से लिपट गई और उनके कान में कहा, "हां."
मां दंग रह गई, पर ख़ुश भी हुई. और कुछ दिनों बाद हमारी शादी हो गई.
यही था मेरी ज़िन्दगी का पहला अफेयर, जिसे मैंने चाहा, वो मुझे मिल गया. तभी से मुझे 'प्यार' शब्द से बड़ा प्यार हो गया, मैं सोच भी नहीं सकती थी कि मेरा पहला अफेयर इतनी ख़ुशियां लाएगा.
- बबिता गोयल

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