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कहानी- पराजित अहंकार (Short Story- Parajit Ahankar)

विजय के मन में भी इंदु के लिए प्यार था, मगर जितना प्यार था उससे कहीं अधिक उसमें पुरुष होने का अहंकार था. वह हमेशा यही कहता कि लड़की आख़िर लड़की ही होती है, उसे पुरुष की छाया में ही रहना होता है.

नर्सिंग होम के एक साफ़-सुथरे कमरे में जहां आराम के लिए ज़रूरत भर की सभी वस्तुएं मौजूद हैं, सफ़ेद चादर से लिपटे एक बेड पर इंदु लेटी हुई है. उसके बिस्तर के चारों ओर रिश्तेदारों और दोस्तों की भीड़ है. शाम के चार बज रहे हैं. आज अस्पताल में इंदु की यह दसवीं शाम है. इसी तरह हर शाम उसके रिश्तेदार, उसका कोई न कोई सहकर्मी या दोस्त उससे मिलने चले आते हैं, पर वह कहां है. जिसके लिए हर वक़्त इंदु की आत्मा तड़पती रहती है. उसकी सूनी आंखें हर पल उस दरवाज़े पर टिकी रहती हैं, जो ठीक उसके बिस्तर की सीध में है और जहां से कोई न कोई शुभाकांक्षी उससे मिलने आ रहा है.

इंदु जिसे भी देखती है, उसके लिए उसकी वही पुरानी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर बिखर जाती है, पर आगंतुक बड़ी मुश्किल से अपने चेहरे पर मुस्कुराहट ला पा रहे हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि इंदु अब चंद घड़ियों की मेहमान है. इंदु भी जानती है कि अब वह बहुत जल्द मुक्ति पा लेगी, उसे जो रोग हुआ है, उसमें बचने की कोई उम्मीद नहीं होती. जीने की तमन्ना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो गई थी. उसकी अंतरात्मा बहुत पहले ही मर चुकी थी. बचा था उसका शरीर और वह भी ख़त्म होने को था. डॉक्टर ने जवाब दे दिया था. इंदु को ब्लड कैंसर हुआ है.

आज तक किसी ने कभी इंदु को उदास नहीं देखा, हमेशा एक मासूम हंसी से उसका चेहरा नाज़े गुलाब की तरह खिला रहता था. किसे पता था कि उसकी यह मुस्कुराहट सिर्फ़ एक पर्दा मात्र है, जो उसके ग़मों के ढेर को ढंके रहता है. जिसे अपने बेजान दिल को ज़िंदा दिल साबित करने के लिए इंदु ने बनाए रखा है. किसी को यह मालूम नहीं था, किसी को भी नहीं, यहां तक कि उसके अपने विजय को भी नहीं, जो तीन सालों से उसके क़रीब है. उसे जानता है. यह भी कैसे कह सकते हैं. अगर जानता ही होता तो क्या उसके मन की वेदना को महसूस न किया होता? यही तो इंदु का दर्द है जिसे पिछले तीन सालों से वह अपने मन से एक पल के लिए भी जुदा नहीं कर सकी. उसी विजय ने इन तीन सालों में एक बार भी इंदु के मन में झांक कर देखने की कोशिश नहीं की. भाग्य ने अजीब मज़ाक किया इंदु के साथ.

आज से चार साल पहले की बात है. वह चुपचाप बरामदे में खड़ी थी. जाते-जाते राहगीरों पर उसकी नज़र पड़ती. राहगीरों की भी उस पर नज़र पड़ती, पर यह कोई विशेष बात नहीं थी. घर के बगल से होकर अगर कोई रास्ता गुज़रता हो तो ऐसा होता ही है, पर अचानक उस दिन इंदु की नज़र ऐसे ही एक अनजान युवक पर पड़ी. वह इंदु को देखकर मुस्कुराया तो वह उसे अचरज भरी नज़रों से देखने लगी. वह युवक चला तो गया, पर इंदु की आंखों में जैसे उसकी तस्वीर क़ैद हो कर रह गई. लंबा कद, छरहरा बदन, कुछ-कुछ घुंघराले बाल और निमंत्रण देती हुई सी आकर्षक आंखें. कौन था वह? वह क्यों मुस्कुराया मुझे देखकर? क्या वह मुझे जानता है? लेकिन मैंने तो उसे पहले कभी नहीं देखा.

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दो-तीन दिनों के बाद फिर उसने उस युवक का गुज़रते हुए देखा. इंदु को उसने पहले की ही तरह देखा और मुस्कुराता हुआ अपनी नज़रें नीचे कर चला गया. इसी तरह दिन गुज़रते गए. कभी इंदु उसे आते-जाते रास्ते में मिल जाती, तो कभी अपने घर के सामने. जब भी इंदु उसके सामने से गुज़रती, दिल तो करता कि एक बार न‌ज़रें उठा कर उसे देखें, पर दूसरे ही क्षण एक लज्जा उसकी पलकों पर आ कर बैठ जाती और उसके बोझ से उसकी पलकें भारी हो‌ जातीं. वह सिर्फ़ एक बार नज़रें उठा कर देखता था. फिर नज़रें झुका कर चल देता था, लेकिन अब वह आते-जाते जितनी दूर तक इंदु दिखाई देती थी, पलट-पलट कर उसे देखा करता था. इंदु उसकी इन हरकतों को देखती और उसकी हरकत को एक मजाक समझती थी.

इसी मज़ाक ही मज़ाक में न जाने कब अनजाने में उस युवक ने इंदु के मन में अपना बसेरा बना लिया. अगर इंदु उस वक़्त घर पर रहती तो एक अजीब आकर्षण शक्ति उसे खींच कर बाहर बरामदे में ला खड़ा करती थी. अब भी इंदु समझ नहीं पाई थी कि क्या होने जा रहा है. इसी बीच वह एक महीने के लिए बाहर घूमने चली गई, वहां जाकर भी उसने पाया कि शाम के वक़्त उसे एक अजीब सी बेचैनी घेर लेती है. उससे शाम सही नहीं जाती, चाहे कहीं भी वह रहती, उस वक़्त उसे युवक की याद जरूर आती थी.

इंदु के वापस आते ही वह युवक और भी अधीर हो उठा. अब वह इंदु से परिचित होना चाहता था, क्योंकि क़रीब एक साल हो गया वह इंदु को देख रहा है. दो-तीन बार वह इंदु से परिचय करने के लिए गुज़रे हुए रास्ते से लौट गया. दरअसल, इंदु डरती थी कहीं कोई उसके कोमल मन को विश्वास में लेकर उसे बाद में धोखा दे दे, तो वह शायद मर जाएगी, उसका जीना असंभव हो जाएगा, इसलिए वह उससे आंखें चुरा कर भाग जाती थी.

एक दिन की बात है, छुट्टी का दिन था. इंदु अपने छोटे भतीजे को लेकर टहलते हुए घर से काफ़ी दूर निकल गई, रास्ते में उसे वह युवक दिखाई दिया. उसे भी चैन नहीं था, इंदु के आकर्षण ने उसे बेचैन कर दिया था. इंदु जानती थी कि उसमें ऐसी ख़ासियत ज़रूर है, जिसके कारण उसकी ओर लोग अधिक आकर्षित होते हैं, पर इसके लिए उसके मन में कोई अहंकार नहीं था. वह बिल्कुल सीधी-सादी थी.

माना भगवान ने उसे सिर्फ़ ख़ुश रहने के लिए ही धरती पर भेजा हो. रास्ते में युवक को देखते ही वह घर की ओर लौटने लगी. पर आज तो जैसे इस एकांत में कोई डोर उस युवक को उसकी ओर खींचे ले आ रही थी. फिर तेजी से इंदु के समीप आ कर आगे बढ़कर उसने कहा, "सुनिए, काफ़ी दिनों से आपको देख रहा हूं, आपको देखने के बाद आपसे परिचय करने की तीव्र इच्छा है. अगर बुरा न मानें तो मैं आपसे दोस्ती करना चाहता हूं."

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इंदु क्या करें कुछ समझ नहीं पाई. अचानक उसे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा, उसने सोचा भी नहीं था. उसकी ज़ुबान से अचानक हीं निकल गया, "नहीं-नहीं, इसमें बुरा मानने की क्या बात है?"

युवक ने कहा, "मेरा नाम विजय है. मैं वहीं एक सरकारी द‌फ़्तर में नौकरी करता हूं. अगर आप इज़ाज़त दें तो मैं आपका नाम पूछू?"  इंदु मुस्कुराने लगी, क्या किया जाए... सच-सच अपना नाम बता दूं या कोई झूठा नाम?

इतने में युवक ने कहा, "आपने अब तक नहीं बताया कि आपका नाम क्या है?" एक साल के अनजाने प्यार ने उसे सच बोलने के लिए मजबूर कर दिया, "मेरा नाम इंदु है." वह बड़े नपे-तुले ढंग से बोली.

"क्या आप पढ़ती है?"

"मैं ग्रेजुएट हूं, नौकरी करती हूं." वह एक ही बार में बोल गई.

इसी तरह की दो-चार बातें हुईं, फिर विजय चला गया. उसके बाद अक्सर उन दोनों की मुलाक़ातें होती और दोनों घंटों एक-दूसरे से बात करते. न जाने कब वे आप से तुम पर आ गए.

एक दिन विजय ने इंदु से कहा, "क्या तुम कभी मुझे अपने घर नहीं बुलाओगी?" इंदु बोली, "आज ही चलो."

पहले तो विजय ने कहा, "आज नहीं, फिर कभी." पर इंदु की ज़िद के कारण उसे जाना ही पड़ा. इंदु ने अपनी मां से उसका परिचय कराया, "मां यह मेरा दोस्त है."

इसके बाद से ये दोनों फिर कभी रास्ते में न मिलते, बल्कि विजय इंदु से उसके घर पर ही मिलने आ जाया करता. इंदु हर शाम उसका इंतज़ार करती. वह आता, घंटों दोनों बातें करते रहते. दोनों एक-दूसरे के मन के काफ़ी क़रीब आ गए. इंदु धीरे-धीरे अपने सारे दोस्तों से दूर होती गई. अब वह किसी भी शाम कहीं घूमने नहीं जाती. अगर उसका विजय आए और उसे न पाकर मायूस होकर लौट जाए तो... वह पागलों की तरह विजय को प्यार करने लगी, विजय की पसंद के ख़िलाफ़ वह एक भी काम न करती.

इंदु तो विजय की खुले मन से स्वीकार कर एकनिष्ठ प्यार करने लगी, लेकिन वह समझने लगा था कि इंदु तो उसे प्यार करती ही है, ज़रूर उसमें किसी का प्यार पाने लायक बहुत कुछ है. उसे तो हर लड़की इसी तरह प्यार करेगी. विजय के मन में भी इंदु के लिए प्यार था, मगर जितना प्यार था उससे कहीं अधिक उसमें पुरुष होने का अहंकार था. वह हमेशा यही कहता कि लड़की आख़िर लड़की ही होती है, उसे पुरुष की छाया में ही रहना होता है.

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पहले तो विजय इंदु के प्यार को हासिल करने के लिए हर शाम उससे मिलता था, मगर ज्यों ही उसे यह पता चल गया कि इंदु उसके सिवाय और किसी को अब अपने दिल में नहीं बसा पाएगी, तब वह उसके प्यार से खेलने लगा.

अब वह उससे बहुत कम मिलता. एक बार उसने सिर्फ़ एक दिन का समय विजय से अपने लिए मांगा था, मगर विजय उसे एक दिन भी नहीं दे सका. उसने कहा, "इंदु, तुमने आज मुझसे पहली बार कुछ मांगा है, पर क्या बताऊं मुझे कल बहुत काम है, मैं तुम्हारे मन की अवस्था को समझता हूं, पर मजबूर हूं."

इंदू के दिल को एक टीस सी लगी, पर तुरंत अपने होंठों पर मुस्कुराहट लाती हुई वह बोली, "नहीं-नहीं, मैं कभी नहीं चाहूंगी कि मेरे लिए तुम्हें कोई क्षति उठानी पड़े, तुम अपना काम करो. मैं फिर कभी..."

विजय मुस्कुराता हुआ चला गया, मगर उसने एक बार भी इदु के मन को समझने की कोशिश नहीं की. विजय के इस अजनबीपन के कारण इंदु ने अपने आप को ख़त्म कर लेने तक का निश्चय कर लिया.

वह अक्सर यही सोचती कि सभी कलियों को माली एक ही प्यार से सींचता है, लेकिन इनमें से कुछ कलियां खिलने से पहले ही मुरझा जाती हैं. मैं भी मुरझा जाने वाली कलियों में से ही एक हूं.

मां-पिता की इकलौती बेटी बचपन की अभिमानी इंदु... तो क्या उसे बचपन का दंड अब विजय से मिल रहा है, लेकिन वह तो विजय के लिए अपने को शुरू से ही हार चुकी है. वह जानती है कि विजय से अलग रह कर जीना उसके वश की बात नहीं है, लेकिन उसे अपने प्यार पर भरोसा है. उसके मन में यह गहरा विश्वास कहीं बैठा था कि एक-न-एक दिन विजय उसके प्यार को ज़रूर समझेगा, मगर शायद तब, जब वह उससे बहुत दूर चली जाएगी. वह चाहकर भी अपनी इंदु को नहीं पा सकेगा.

कहानी- पराजित अहंकार

अचानक उसका चेहरा चमक उठा. दरवाज़े पर विजय खड़ा था, वह धीरे-धीरे अंदर आया. उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, "मुझे आज ही तुम्हारी बीमारी की ख़बर मिली. मैं कुछ दिनों से काम में व्यस्त था, इसलिए नहीं आ पाया. आज जब तुम्हारे घर गया, तो पता चला कि तुम अस्पताल में हो."

इंदु ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ बढ़ाया, "मुझे माफ़ कर दो इंदु." इंदु की आंखें तो जैसे बहुत कुछ कहना चाह रही थी, मगर वह कुछ नहीं कह पाई. वह अपने दोनों हाथों से विजय के हाथ को पकड़ कर मुस्कुराई, फिर अपनी आंखें बंद कर ली. ठीक उसी क्षण उसकी सांसें तेज होने लगीं. नर्स दौड़कर डॉक्टर को बुला लाई, डॉक्टर ने आते ही इंदु को देखकर ऑक्सीजन देने को कहा. उसे ऑक्सीजन दिया जाने लगा. विजय उसके पास बैठा फूट-फूटकर रो पड़ा, "मुझे माफ़ कर दो... इंदु प्लीज़, मुझे एक मौक़ा और दो! तुम मुझे यूं अकेला छोड़ कर नहीं जा सकती."

कुछ क्षणों के लिए इंदु को होश आया. उसने विजय को एक बार देखा. उसकी आंखों में वही प्यार भरा हुआ था. उससे कुछ नहीं कहा गया. एकटक विजय को देखती रही और इस दुनिया से कूच कर गई. विजय उसके प्राण हीन शरीर को पकड़ कर फफक पड़ा. शायद आज तक इंदु के प्राण विजय को देखने के लिए अटके हुए थे.

अब विजय को अपने पुरुष होने के अहंकार की गहरी पीड़ा से गुज़रना पड़ रहा है. पुरुष होने का अहंकार, जिसने हमेशा उसे इंदु के मन में झांकने से रोका और इस तरह इंदु को उससे जुदा कर गया. सचमुच इंदु के समर्पित प्यार ने उसे हरा दिया, अब वह कहां जाए? कहां मिलेगी उसे इंदु? इंदु तो बहुत दूर जा चुकी है. वह उसके प्यार और अहंकार, सब कुछ की पहुंच से बहुत दूर जा चुकी है.

- मुनमुन सकरार

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