"असल में, धरती के चांद तो तुम हो, जो उसे रोशनी देना चाहते हो. धरती पर अन्धेरा है और तुम उसे रोशनी देना चाहते हो. पता नहीं, तुम्हारी रोशनी लोगों को अन्धेरा क्यों महसूस होने लगी है? लोगों की आंखों पर कैसा पर्दा पड़ गया है?"
रात बहुत साफ़ थी. उसके हल्के में अंधेरे में देखा जा सकता था. आकाश में चौथ का चांद था. नीचे चारों ओर खेत फैले हुए थे. उनमें फसले लहरा रही थीं. जसवन्त उन खेतों में से पगडंडी पर चलता हुआ एक कुएं के पास आकर रुका. उस कुएं के चारों ओर शीशम के पेड़ों का सघन झुरमुट था. जसवन्त ने वहां खड़े होकर पश्चिम की ओर बसे हुए छोटे से गांव को देखा, उसमें कहीं-कहीं कोई बत्ती टिमटिमाती हुई दिखाई दे रही थी. फिर जसवन्त ने उस रास्ते की ओर देखा, जो गांव से उस कुएं की ओर आता था. उस रास्ते पर कोई नहीं था. पता नहीं बंसी कब आए, जसवन्त ने सोचा, पर आएगी ज़रूर.
कुछ देर के बाद वह कुएं की जगत पर जाकर बैठ गया. उसकी टांगों में थकावट और हल्की-सी टीस थी. वह लेट जाना चाहता था, सो जाना चाहता था. पर वह बैठा रहा और उसके कान सतर्क होकर किसी के कदमों की आहट सुनने की प्रतीक्षा में लगे रहे. तभी ऊपर एक पेड़ पर किसी चिड़िया ने अपने पंख फड़फड़ाए और फिर दो-तीन बार चूं-चू किया. जसवन्त ने ऊपर देखा. उसे चिड़िया कहीं दिखाई न दी. पर उस पेड़ की विरल सी टहनियों में से चांद दिखाई दिया. चांद उसे किसी बाली के समान लगा. कान में झूलती हुई बड़ी सी बाली के समान. बंसी बालियों पहनती है तो उसका चेहरा कैसा गोल सा बन जाता है. उसने मन में कहा, 'बंसी के कानों में बालियां झूलती रहती है. क्या वह भी दिन आएगा, जब...
तभी पेड़ पर बैठी चिड़िया ने फिर चूं-चूं की और उसके साथ ही जसवन्त ने कदमों की आहट सुनी. हां, बंसी ही है, उसने सोचा. कदमों की आहट एक क्षण के लिए रुकी. बंसी खड़ी होकर भांप रही थी कि कोई उसे देख तो नहीं रहा? जसवन्त हल्का सा खांसा. तभी कदमों की आहट उसकी और बढ़ने लगी. फिर जसवन्त ने बंसी को एक पेड़ की ओट से निकल कर अपनी ओर आते हुए देखा.
बंसी उसके सामने जाकर रुकी, तो जसवन्त खड़ा हो गया, "आ गई?" उसने कहा और धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया. बंसी चुप रही.
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"बहुत ठंडा है तुम्हारा हाथ." जसवन्त ने उसके हाथ को दबाते हुए कहा.
"हां." बंसी के मुख से निकला, फिर उसने कुछ सम्भल कर कहा, "बड़ी मुश्किल से आई हूं."
"मुझे पता था, तुम आओगी."
"न आती तो?"
"मुझे पता था, तुम आओगी." जसवन्त ने फिर कहा.
"तभी तो आई हूं." बंसी ने कहा.
फिर दोनों एक क्षण के लिए चुप रहे.
"आओ, वहां बैठे." जसवन्त ने एक पेड़ की ओर संकेत करके कहा.
"किसी ने देख लिया तो?" बंसी ने कुछ घबराहट में कहा.
"तो देख ले." जसवन्त हल्का- सा हंसा.
"नहीं, वहां अन्धेरे में कोई भी देख नहीं पाएगा. हां, हम एक-दूसरे को ज़रूर देख पाएंगे."
वे दोनों पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए. उनके सामने खेत फैले हुए थे और दूर क्षितिज पर खेतों को छूता हुआ तारों भरा आकाश ऊपर उठा हुआ था.
"बंसी." जसवन्त ने कहा तो बंसी को उसका लहज़ा कुछ बदला हुआ लगा.
"हां." बंसी ने उसकी ओर मुंह मोड़ा.
जसवन्त चुप रहा.
"क्या बात है?" बंसी ने उत्सुकता से पूछा.
"कुछ नहीं." जसवन्त जैसे टाल गया. फिर वह बोला, "बंसी, याद है, मैं तुम्हें पहली बार इसी कुएं पर मिला था?"
"भला मैं भूल सकती हूं?" बंसी ने कहा, "उसके बाद भी दो बार और यहीं मिले हो और एक बार यहां नहीं मिले."
"हां, उसके तीन दिन पहले ही मुझे पोश हो जाना पड़ा था. मिलना मुमकिन नहीं था. सच जानो किसी तरह भी मुमकिन नहीं था."
"मैं कोई गिला तो नहीं कर रही." बंसी ने कहा.
"तुम कभी भी गिला नहीं करोगी." जसवन्त ने उसका हाथ पकड़ कर दबाया.
"गिला करने वाली होती, तो मेरे जैसे आदमी को न अपनाती."
"तुम्हारे जैसा आदमी?"
"हां, जिसका घर है, पर घर नहीं है. सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं है.”
"इसीलिए तो."
"इसीलिए क्या?"
"इसीलिए तुम्हें अपना बनाया है."
एक साल पहले इसी कुएं पर उनकी मुलाक़ात हुई थी. दोपहर का समय था. रहट चल रहा था और बंसी जगत पर बैठी बैलों को हांक रही थी. उसका पिता वहां से दूर एक खेत की मेड़ पर बैठा फसल को पानी दे रहा था. जसवन्त कुएं पर आया था. वह जैसे लम्बा सफ़र तय करके आया था और उसके चेहरे पर थकावट थी. उसने भूरे रंग का पाजामा और खद्दर की सफ़ेद कमीज़ पहनी हुई थी. पांवों में देसी जूते थे, जो धूल से भरे हुए थे. वह धूल जसवन्त के चेहरे पर भी थी, पर उसकी आंखों में वह धूल नहीं थी. उसकी आंखों में चमक थी.
वह एक तरफ़ बैठ गया था. वह पानी पीने से पहले कुछ देर सुस्ताना चाहता था. उसने अभी तक बंसी को देखा नहीं था. वह थका हुआ और अन्यमनस्क सा बना बैठा रहा, पर बंसी हर चक्कर में उसे देख रही थी. उसे पहचानने का यत्न कर रही थी. तभी उसे याद आया कि उसे उसने एक जलसे में भाषण देते हुए सुना था. किसान सभा का वह जलसा था और उसमें अन्य वक्ताओं के साथ जसवंत ने भी भाषण दिया था. उसके शब्दों में सुलगती हुई आग थी और वह आग किसानों के दिलों में दहक रही थी. हां, वही है यह, बंसी ने मन में कहा था और उसे कुछ डर सा लगा था. उसके दिल में आया था कि जगत पर से उठे और उस खेत की ओर चली जाए. जहां उसका पिता बैठा था और उसे यहां भेज दे, पर वह उठ नहीं सकी थी.
तभी जसवन्त उठा था और पानी की धार की ओर बढ़ा था.
उसी समय बंसी भी जगत पर से उठी थी और सहसा उसके मुंह से निकला था, "लस्सी है. लस्सी पी लो."
जसवंत ने मुंह मोड़कर देखा था. फिर वह उठकर बंसी के निकट आकर बोला था, "लाओ, बड़ी प्यास लगी है."
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बंसी चौंकी थी. वह झट से मुड़ी थी और एक पेड़ के पास पड़ी लस्सी की मटकी उठा लाई थी. उसने लस्सी ग्लास में डाली थी और ग्लास जसवन्त की ओर बढ़ा दिया था.
ग्लास की लस्सी ख़त्म करके जसवन्त ने ग्लास बंसी की ओर बढ़ाया था. बंसी ने उसमें और लस्सी डाली थी. जसवन्त लस्सी की ओर देखता हुआ बोला था, "एक बात कहूं?" और वह मुस्कुराया था.
बंसी को लगा था, उसके होंठ जैसे आपस में जुड़ गए थे. वह 'हां' कहना चाहती थी, पर बोल नहीं पाई थी.
"ऐसी लस्सी मैंने पहले कभी नहीं पी." जसवन्त ने कहा था, "किसी भी गांव में नहीं पी. अपने घर में भी नहीं पी."
बंसी के होंठ हल्का सा मुस्कुराए थे, पर उसे लगा था कि वे अभी भी जुड़े हुए थे.
इस बार जसवन्त ने लस्सी पर से नज़र हटाकर बंसी की ओर देखते हुए कहा था, "दिल चाहता है, जब भी कभी यहां से गुज़रा करूं, लस्सी पीकर जाया करूं."
"पर मैं हमेशा यहां कहां होऊंगी?" अचानक बंसी के होंठ खुले थे. उसे अपने शब्दों पर आश्चर्य हुआ था मानो उसकी जगह कोई और बोला हो.
बस, एक बार होंठ खुल गए तो फिर बंसी चुप नहीं रह सकी थी. वह निःसंकोच होकर बातें करने लगी थी. कुछ बातें करने पर उसे लगा था, वह और बातें करना चाहती है, बहुत सी बातें करना चाहती है. जसवन्त के बारे में उसने सुना हुआ था कि वह कम्यूनिस्ट है और किसानों में काम करता है. वह गांव-गांव घूमता है और किसानों को संगठित करता है. बंसी के गांव से तीन-साढ़े तीन कोस की दूरी पर उसका गांव था. अच्छे घर का लड़का था वह, और किसानों के दर्द को अपना दर्द बनाकर राजनीति में पड़ गया था. फिर वह अपना सुख-चैन खो बैठा था. एक बार वह चार महीने की जेल काट चुका था. उससे बातें करते हुए बंसी ने उसके पूरे जीवन में झांका था और फिर झांकती ही रह गई थी. एक ख़ूबसूरत और रोमांचकारी दुनिया थी वहां, कांटों वाली, लेकिन उन कांटों में फूल भी थे ऐसे फूल, जो बंसी ने पहले कभी नहीं देखे थे.
आख़िर जसवन्त वहां से चला गया था तो बंसी को बहुत अकेलापन महसूस हुआ था. बैलों के गले में घंटियों की आवाज़ उसे कहीं बहुत दूर से आती हुई प्रतीत हुई थी और कुएं के गिर्द खड़े पेड़ों के झुरमुट में उसकी जैसे सांस घुटने लगी थी. जसवन्त कह गया था कि वह कभी उसके घर भी आएगा. उसके पिता से मिलेगा और उसके साथ घर आएगा, पर क्या पता कब आए? बंसी ने उदासी में सोचा था, पता नहीं, कितने दिन बाद आए.
जसवन्त पांचवे दिन आया था. वह बंसी के पिता के साथ उनके घर आया था और काफ़ी देर तक बैठा बातें करता रहा था. उसने वहीं खाना खाया था. आख़िर वह चला गया था. बंसी को लगा था कि वह जाकर भी वही था.
कुएं पर पहली मुलाक़ात के बाद जब वह गया था तो बंसी को जाने कुछ हो गया था. उसके बाद वह जब भी जसवन्त से मिलती उसे हमेशा तृप्ति का आभास होता था.
पर आज जसवन्त से मिलकर उसके मन में अजीब सी बेचैनी जाग रही थी. जसवन्त बदले हुए लहज़े में बातें कर रहा था और उन बातों से बंसी को लग रहा था जैसे वह कहना कुछ और चाहता था, पर कह कुछ और रहा था.
"सोचता हूं." जसवन्त ने कहा, "उस पहले दिन तुमसे मुलाक़ात न हुई होती तो..." उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
"तो क्या होता?" बंसी ने पूछा.
"तो शायद कुछ भी न होता," जसवन्त ने कहा. "शायद मैं आज यहां न होता." बंसी ने ध्यान से उसके चेहरे की ओर देखा.
कुछ देर चुप रहकर जसवन्त ने फैली हुई रात में दूर कहीं देखते हुए कहा, "बंसी, आजकल लोग मेरे बारे में कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं. सुनी हैं न तुमने?"
"करने दो." बंसी ने कहा.
"तुम ठीक रास्ते पर चल रहे हो, तो लोगों की क्यों परवाह करते हो?"
"परवाह कैसे न करूं?" जसवन्त ने कहा, "उन्हीं लोगों में तो मुझे काम करना है. जब से चीन के साथ जंग लगी है, मैं लोगों में पराया सा बन गया हूं. वे समझाते हैं, हमारी पार्टी चीन की है. अब वे बदली हई नज़रों से मुझे देखते हैं. जैसे उनका मुझ पर से विश्वास उठ गया हो."
"वह विश्वास फिर बन जाएगा."
"कैसे बनेगा? अपने आप तो नहीं बन जाएगा. तुम्हारे पिता का रवैया भी बदला हुआ है."
"उसकी चिन्ता न करो. सब ठीक हो जाएगा."
"कैसे ठीक हो जाएगा? आख़िर कैसे ठीक हो जाएगा?"
"हो जाएगा." बंसी ने कहा, "धीरज रखो."
"हां, हो जाएगा."
जसवन्त ने कहा, "अब सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है."
"कौन-सा?" बंसी ने उत्सुकता से पूछा.
"कि मैं यहां से चला जाऊं."
"कहां? कहां चले जाओगे? और क्यों जाओगे?" बंसी बेचैन हो उठी.
"यह विश्वास दिलाने कि मैं अपने लोगों का हूं, अपनी घरती का हूं."
"कहां जाओगे?" बंसी की आंखों में चिन्ता थी.
"बंसी." जसवन्त ने उसकी ओर मुंह मोड़कर "अगर मैं मोर्चे पर चला जाऊं तो?" कहा.
"मोर्चे पर?" बंसी के मुख से निकला और उसके होंठ कांपने लगे.
"हां, तब शायद लोगों को विश्वास हो जाए. विश्वास हो जाए कि मैं उन्हीं में से हूं, उन्हीं का हूं."
"फिर... फिर..." बंसी आगे बोल न पाई.
"तुम मेरा इन्तज़ार करोगी?"
"आज तक करती रही हूं. हमेशा करती रहूंगी. पर क्या तुम्हारा जाना ज़रूरी है? बहुत ज़रूरी है?"
"बस, यही एक रास्ता है बंसी. मैं लोगों का विश्वास फिर जीत सकूंगा. आख़िर मुझे उन्हीं में तो काम करना है."
बंसी ने उसकी बांह पकड़ ली और चुप रही.
जसवन्त ने कहा, "मैं यहां भी धरती के लिए लड़ रहा हूं, ताकि धरती उसके हक़दारों को मिले. वहां भी धरती के लिए ही लडूंगा, ताकि उस पर कोई और हक़ न जमा ले."
बंसी चुप रही. जसवन्त की बांह पर उसके हाथ की पकड़ और सख्त हो गई.
"बंसी!" जसवन्त ने कहा.
"क्या सोच रही हो?"
"सोच रही हूं कि मैं भी तुम्हारे साथ चल सकती."
"मेरे साथ ही तो चल रही हो." जसवन्त ने सहज भाव से कहा.
"कहां?" बंसी ने हैरानी से पूछा.
" जहां मैं जा रहा हूं."
बंसी चुप रही.
"देखो, चांद डूब गया है और रात बिल्कुल अन्धेरी हो गई है." जसवन्त ने कहा.
"हां, चौथ का चांद बहुत जल्दी डूब जाता है."
"पर धरती का चांद कभी नहीं डूबता," जसवन्त ने कहा, "बंसी, जब से तुम्हें मिला हूं, मुझे कभी कोई रात अन्धेरी महसूस नहीं होती. धरती का कैसा चांद हो तुम?"
बंसी की आंखों में आंसू आ गए.
"असल में, धरती के चांद तो तुम हो, जो उसे रोशनी देना चाहते हो. धरती पर अन्धेरा है और तुम उसे रोशनी देना चाहते हो. पता नहीं, तुम्हारी रोशनी लोगों को अन्धेरा क्यों महसूस होने लगी है? लोगों की आंखों पर कैसा पर्दा पड़ गया है?"
"मैं वह पर्दा हटाने ही तो जा रहा हूं, वह पर्दा हट जाएगा, तो मैं वापस आ जाऊंगा."
"हां, वापस आ जाओगे," बंसी ने कहा, "मुझे विश्वास है, ज़रूर वापस आ जाओगे. मैं तुम्हारा इन्तज़ार करूंगी, लोग भी तुम्हारा इंतज़ार कर रहे होंगे." बंसी की आवाज़ में कम्पन था.
जसवन्त ने उसका कांपता हुआ हाथ दबाया और कहा, "कोई इन्तज़ार करेगा, तो मैं कैसे नहीं आऊंगा?"
दोनों फिर चुप हो गए. आख़िर वे उठे. उन्होंने एक-दूसरे से विदा ली और अपनी-अपनी राह पर चल पड़े. कुछ दूर जाकर दोनों ने मुड़कर एक-दूसरे को देखा, पर अन्धेरे में वे दिखाई नहीं दिए. हां, वे एक-दूसरे के कदमों की आहट सुन रहे थे और वह आहट उनके अपने दिल में से आ रही थी.
- सुखबीर

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