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कविता- एक लंबा ख़त… (Poetry- Ek Lamba Khat…)

एक लंबा ख़त

लिखा तुम्हें मैंने

बरसते पानी में

इंद्रधनुष को निहारते हुए

पेड़ों पर छिपे

पक्षियों से बतियाते हुए

एक लंबा ख़त

लिखा तुम्हें मैंने

उंगलियों से तुम्हारी

आहट को‌ टटोलते हुए

फूल नहीं, देह नहीं

गंध को खंगालते हुए

एक लंबा ख़त

लिखा तुम्हें मैंने

अक्षर नहीं, शब्द नहीं

पत्र में कोई भी संबोधन नहीं

काग़ज़ नहीं, पाती नहीं

रूठने का कोई भी अनुमोदन नहीं

एक लंबा ख़त

लिखा तुम्हें मैंने...

- पूरन निर्दोष

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Photo Courtesy: Freepik

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