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कहानी- जस्ट एन एवरेज गर्ल (Short Story- Just An Average Girl)

प्रोफेसर वर्मा अपनी पत्नी पर बिगड़ पड़े, "विभा, मेरा इतना क़ाबिल बेटा, हाइली क्वालीफाइड, ऊंचे पद पर... और वो लड़की... क्या है वो उसके सामने? मेरे कॉलेज में पढ़ती थी, जानता हूं मैं उसे 'जस्ट एन एवरेज गर्ल..."

"ये मेरा आख़री फ़ैसला है, मेरे जीते जी वो लड़की इस घर में कदम नहीं रख सकती." ग़ुस्से से भरे स्वर में कहते हुए प्रो. वर्मा ने अपनी छड़ी उठाई और घर से बाहर चले गए.

विजेन और उसकी मां डॉ. विभा स्तंभित से एक-दूसरे की ओर ताकते ही रह गए. विजेन की आंखों की वेदना और उसके अहं को लगी चोट को मां की आंखों ने तुरंत पढ़ लिया. धीमे से मुस्कुराकर बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने उसे सांत्वना दी.

मां का सहारा पाकर उसके मुख से आहत किंतु दृढ़ स्वर निकल पड़े," मम्मा, मैं और तन्वी बरसों से एक-दूसरे को जानते और समझते है, पापा के झूठे आडंबर के लिए मैं अपनी चाहत, अपनी ख़ुशी ज़िदगीभर के लिए दांव पर नहीं लगा सकता."

"मैं तुझे समझ रही हूं बेटे, बचपन से आज तक मैं समर्थ होते हुए भी तुम दोनों भाइयों के बेहतर भविष्य के लिये कई बार अपने ईगो को ताक पर रख चुकी हूं. सही मूल्यों के लिए तुम्हारे पापा से बहुत बार लड़ाई की है. और आज जबकि तुम्हारी ज़िंदगी का अहम् फ़ैसला करना है तो भला मैं कैसे चुप रह सकती हूं?" मां की बातों ने जैसे एक भरोसा दिया.

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उसे याद है, बचपन में भी जब और जहां वो अनिर्णय की स्थिति में होता, मां का आंचल उसे उबार लेता था. पापा ने भी अपने तरीक़े से उन पर मेहनत की, ताकि हम कुछ बन जाए... मगर पता नहीं शुरू से ही उनकी यह प्रवृत्ति बनी रही कि पूरे परिवार में उनका वर्चस्व बना रहे, उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी न खड़क सके. मां-पापा दोनों ने हमारे लिए अपनी जवानी, अपनी ज़िंदगी न्यौछावर कर दी, लेकिन पापा कितनी बड़ी महत्वाकांक्षा हमसे जोड़े हुए हैं. विजेन के ज़ेहन में अपने बचपन की सारी यादें ताज़ा हो उठी थीं.

अगले दिन जब वो तन्वी से मिला. उसकी हैरान-परेशान हालत देखकर वो समझ गई कि माजरा क्या है... हंस कर बोली, "मैं जानती हूं, सर ने तुम्हारे लिए बहुत ऊंचे सपने देखे होंगे. दरअसल, मैं तुम्हारे क़ाबिल हूं भी नहीं. तुम कहां और मैं कहां? आख़िर तुम्हारे लिए उन्होंने ताजिंदगी संघर्ष किया है और किनारे पर आकर तुम उन्हें डिसअपॉइंट कर दोगे? और इसकी ज़िम्मेदार मैं होऊंगी. नहीं विजेन, कहीं कुछ तो ग़लत है."

"यहां इस जगह पर ग़लत तो सिर्फ़ पापा हैं, मैं उनके प्रति अपने कर्तव्यों से इन्कार नहीं करता, मगर उनकी ग़लत बातों के साथ मैं समझौता भी नहीं कर सकता." विजेन के स्वर में जैसे एक ठोस निश्चय झलक रहा था.

"तन्वी, आई लव माय पापा, आई रिस्पेक्ट हिम, लेकिन तुमसे मैंने प्यार किया है... मेरी ख़ुशी क्या मटेरियलिस्टिक है या फिजीकल फीलिंग्स के आगे गौण कर दी गई है." विजेन हाथों से पानी में कंकर फेंकते हुए भिन्नांया था.

"ऐसी बात नहीं है विजेन, ये तो कॉमन ह्यूमन फीलिंग है. अपने इतने अच्छे बेटे के लिए हर माता-पिता एक उच्च शिक्षिता, सुंदर, संपन्न बहु की कामना क्यों न करें." तन्वी ने संजीदा स्वर में भौतिक दुनिया की वास्तविकता उसके सामने रख दी.

"तो तुम्हारा मतलब है, बिना किसी अपराध के मैं उम्र‌ भर की सज़ा भुगतूं. आख़िर ये मेरी और तुम्हारी, हम दोनों की ज़िंदगी का सवाल है." विजेन ने रुष्ट होकर कहा तो तन्वी मुस्कुरा दी, "मैं तो हमेशा हर कदम पर तुम्हारे साथ हूं. जब और जैसा तुम कहोगे मैं तैयार हूं." सुनकर तन्वी के हाथ अपने हाथों में लेकर उसने अपनी आंखों से लगा लिया.

इधर घर में जैसे दो गुट बन चुके थे, मां-बेटे और पापा के. डॉ. वर्मा जो विश्वविद्यालय में रीडर की पोस्ट पर थीं और अब उम्र की उस कगार पर पहुंच चुकी थीं, जहां पुरुष का वर्चस्व सहन करना उन्हें अनुचित लगने लगा था. वे उन्हें समझा रही थीं, "आप सिर्फ़ पिता नहीं, एक शिक्षित व्यक्ति हैं. किसी बात को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने से पहले बात की गहराई पर तो विचार कीजिए."

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"विभा, मैं भी उसका पिता हूं, कोई दुश्मन नहीं. कितने अरमान थे मेरे दिल में उसकी शादी के लिए."

"मैं समझती हूं तुम्हारी भावनाओं को, लेकिन शादी उसकी है, ज़िंदगी उसे गुज़ारनी है. और इस मामले में, हमारा हस्तक्षेप उचित नहीं. उसकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है."

अब प्रो. वर्मा फिर बिगड़ पड़े, "विभा, मेरा इतना क़ाबिल बेटा, हाईली क्वालीफाइड, ऊंचे पद पर..." तिरस्कार से मुंह बनाकर उन्होंने कहा, "क्या है वो लड़की उसके सामने? मेरे कॉलेज में पढ़ती थी, जानता हूं मैं उसे 'जस्ट एन एवरेज गर्ल', न ख़ूबसूरती, न क्वालीफिकेशन, न संपन्नता..."

"खासियत ये है राजन कि दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं. जब लड़के ख़ुद महसूस करते हैं कि ज़्यादा हाई-फाई लड़की उनके वश की नहीं तो आप उन पर अपनी इच्छा थोपना क्यों चाहते हैं. पड़ोस के सक्सेनाजी के घर का हाल छुपा तो नहीं है तुमसे, आख़िर उन लोगों ने लड़के की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ पैसेवाले की फ़ैशनपरस्त बेटी लाकर क्या पाया? सोसायटी में अपनी एक पहचान बनाने के शौक ने उनका सब कुछ ख़त्म कर दिया. लड़का शराब में डूबा रहता है, बहू आधी रात तक क्लब में रहती है. जिस घर में कभी हंसी और पूजा की घंटियां सुनाई देती थीं, वहां अब आए दिन गालियां और मिसेज सक्सेना की सिसकियां सुनाई देती हैं. मैं कहती हूं राजन, अभी भी वक़्त है, अपनी ज़िद छोड़ दो."

"एक-से-एक रिश्ते आ रहे हैं, मैं रिश्ते मांगने नहीं गया, ये तुम भी जानती हो."

"वो सब लोग हमारे बेटे के करियर के पीछे भाग रहे हैं और तन्वी तब से तुम्हारे बेटे को चाहती है, जब वो कुछ भी नहीं था." विभा के तर्कों के आगे राजन निरुत्त से हुए, लेकिन सिर हिला कर बोले, "अरे पसंद ही करना था तो किसी हाइली, क्वालीफाइड लड़की को पसंद करता."

विभा ने चिढ़कर कहा, "जैसे कि तुमने तो ख़ूब इज़्ज़त बख़्शी है मेरी. आप जैसे लोग नारी को कभी ऊंचा दर्ज़ा नहीं दे सकते. क्या वजूद है मेरा तुम्हारी ज़िंदगी में सिवा एक बांदी के? और इतनी ही ज़रूरत महसूस हुई तो विजेन ख़ुद उसे पढ़ा लेगा, आख़िर उसकी भी तो अपनी कोई प्लानिंग होगी. उसकी ज़िंदगी के निर्णय अब उसे ख़ुद लेने दो, अब वो कोई बच्चा नहीं रहा." कहते-कहते विभा का चेहरा तमतमा उठा था. "हर्गिज़ नहीं, ये घर मेरा है और इस घर में सिर्फ़ मेरी मज़ीं चलेगी. सोचो ज़रा, अगर हाइली क्वालीफाइड लड़की मेरी बहू होगी तो क्या शान होगी हमारी."

घर में कदम रखते हुए पिता के ये शब्द जब विजेन के कानों में पड़े तो वो तिलमिला उठा और अब उसे चुप रहना उचित नहीं लगा.

"वाह पापा, क्या ख़ूब सोचा है आपने अपनी प्रतिष्ठा के बारे में, सोसायटी में अपनी झूठी शान के लिए आप ऐसे झूठे आडंबरों का सहारा लेना अपनी शान समझते हैं. ख़ूब पैमाना है आपके पास किसी को आंकने का."

डॉ. वर्मा ने भी अपने बेटे के साथ सहमति जताते हुए कहा, "विजेन ठीक कह रहा है, आख़िर कितने लोगों को वक़्त पर अपने अनुकूल मिल पाता है? जो समाज से कुछ भी हासिल नहीं कर पाते, क्या उन्हें जीने की तमन्ना भी नहीं रखनी चाहिए? सामान्य होना अपने आप में तो कोई दोष नहीं. अवसर की बात है. और फिर हर इंसान को ईश्वर ने किसी न किसी कार्य के निमित्त ही बनाया है. जो लड़कियां प्रोफेशनल नहीं, उनकी क्षमताएं कुछ और होंगी और जो महत्वाकांक्षी होकर भी ज़माने से प्रेरणा नहीं ले पातीं, उनके भीतर की आग से एक नई कृति जन्म लेती है.

आप जैसे शिक्षित लोग ही जब इनके मनोबल को ऊंचा नहीं उठाएंगे तो समाज तो कभी सफलता की ओर बढ़ ही नहीं पाएगा. मैं पूछती हूं आख़िर क्या दोष है उस लड़की में? क्या सिर्फ़ क्वालीफिकेशन होने से या ख़ूबसूरत और संपन्न होने से कोई लड़‌की अच्छी हो जाती है. उसकी विनम्रता, उसकी शालीनता, उसका सरल सौम्य प्यार क्या ज़िंदगी जीने के लिए कोई मायने नहीं रखता?"

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... विभा को लग रहा था किसी तरह से वो राजन के ज़मीर को जगा दे, जिससे बात भी बन जाए और पिता-बेटे के बीच जो तनाव पैदा हो गया है वो भी ख़त्म हो. प्रो. वर्मा ने रूखे लहजे में कहा, "विभा, ये घर है, तुम्हारा क्लासरूम नहीं."

विभा को कहना पड़ा, "और जो तुम कर रहे हो, पिता के रूप में, तुम्हारा जो प्रेजेंटेशन है क्या वो ठीक है?”

"तुम्हें जो करना हो करो, मैं इस समारोह में शामिल होने वाला नहीं."

विभा ने विस्फारित नेत्रों से पूछा, "यानी कि तुम विवाह की रस्म अदायगी भी नहीं करोगे?"

"नहीं." प्रो. वर्मा ने भावहीन होकर कहा तो विजेन तेजी से पलट कर चला गया और डॉ. वर्मा अनायास उत्पन्न हो गई घर की इस तनावपूर्ण स्थिति पर विचलित सी बैठ गईं.

"राजन, क्यों घर की सीधी शांत ज़िंदगी में ज़बरदस्ती उथल-पुथल पैदा कर रहे हो?" मगर राजन तो जैसे पत्थर हो गए थे. कोई भावना, कोई तर्क उन्हें टस से मस नहीं कर पा रहा था.

लगातार सोचने के बाद डॉ. वर्मा की आंखों में जैसे एक निश्चय उभर आया था. झूठे आडंबर के पीछे वे अपने बच्चे की ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकतीं. चाहे इसके लिए उन्हें अपने पति से भी टक्कर क्यों न लेनी पड़े.

उन्होंने दूसरे ही दिन सरकारी दफ्तरों के खुलते ही विजेन को रजिस्ट्रार के ऑफिस भेजकर शादी के लिए एक अर्जी देने का आदेश दिया. और विजेन भरी-भरी आंखों से ममता की इस मूर्ति की गोद में सिर रखकर बच्चों की तरह बिलख पड़ा.

"मगर पापा..." वो उसकी बात काट कर बोल पड़ी, "ये सब कुछ महीनों का ज्वार है, जब ज्वार उतर जाएगा, सब कुछ सामान्य हो जाएगा.

- कविता मालपानी

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