रीना- गर्मी ने तो तबाही मचाई है. है न भावना जी? ये आपके हाथ में झोलों का बंडल कैसा? मैं पूरी बात बताकर कहती हूं- लैंडफिल पर जो कचरा जलाया जाता है उसमें पॉलीथीन के जलने से निकलने वाली मीथेन गैस भी गर्मी के लिए ज़िम्मेदार है. अच्छा होगा अगर आप भी मेरे साथ चलें. संगठन में...
पॉलीथीन! फिर एक रोंगटे खड़े कर देने वाला वीडियो. वीडियो में दिखाई गई डॉक्यूमेंट्री पॉलीथीन पर थी. कचरे के ढेर से पॉलीथीन में बंधा कूड़ा खाती गायें फिर उनके तड़पने का हृदय विदारक दृश्य. फिर एक इंसान का संकल्पबद्ध होना. एनजीओ का निर्माण, फिर कूड़े के ढेरों से प्लास्टिक अलग करवाकर मशीनों और टीम की सहायता से उनकी कुर्सियां बनाना. यही नहीं कई सब्ज़ीवालों के यहां झोले रखवाकर पॉलीथीन को झोलों से रिप्लेस करवाने की आदत डालना.
मेरी आदत है, सोशल मीडिया पर मैं ज़्यादा समय बिताती नहीं, पर जितना भी बिताती हूं, मेरे फेवरेट चैनल वो हैं, जिनमें दुनियाभर में कहीं भी कुछ सफल नेक प्रयासो द्वारा किसी सकारात्मक परिवर्तन की डाक्यूमेंट्री होती है. ज़्यादातर पर्यावरण से संबंधित. पर ऐसी कोई दिल दहला देने वाली कथा देखती हूं तो मेरे सिर की नसें झनझनाने लगती हैं और मैं मन में हलचल और दिल में बेचैनी लिए कमरे में टहलने लगती हूं.
'क्या वास्तव में इस समस्या के लिए हम अपने स्तर पर कुछ नहीं कर सकते?’ कुछ तो कर ही सकते होंगे’ नहीं, कुछ होना-वोना है नहीं!!’ के विरोधी भावों की लड़ाई मन मथने लगती है. फिर हमेशा की तरह ‘कुछ तो करेंगे’ का भाव जीत ही जाता है और मैं शुरू कर देती हूं घर की सारी वॉर्डरोब्स की सफ़ाई.
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घर के सदस्य समझ जाते हैं कि मेरे दिमाग़ में कुछ तो कौंध गया है और घरेलू सिलाई मशीन पर पुराने कपड़ो से बना मेरा पहला झोला बनते ही मेरा विचार विस्फोट की तरह सबके सामने आ जाता है.
बहुत नानुकुर, आनाकानी के बाद मेरे घर में सबकी वेहिकिल में झोले रहने लगते हैं. सारा सामान पॉलीथीन की बजाय झोलों में आने लगता है. इस दौरान मैं बीस-पच्चीस झोले सिल डालती हूं. और निकल पड़ती हूं मिशन पर.मैं अपने सब्ज़ी वाले को ये झोले दूंगी और कहूंगी कि वो पॉलीथीन रखना बंद करें. लोगों को पैसे लेकर झोले में सब्ज़ी दे. अगली बार वो झोला न लेकर आएं तो पैसे लैप्स. अगला झोला ख़रीदना पड़ेगा.
पति (आंखें फाड़कर)- और तुम्हारे कहने से वो तुम्हारी बात मान लेगा? मुझे नहीं पता था कि मेरी पत्नी इतनी बड़ी नेता है.
मैं (चिढ़कर)- आप के पास खिल्ली उड़ाने के अलावा कोई काम है?
पति- अरे मैं तो कोशिश कर रहा था कि ज़माना तुम्हारी खिल्ली न उड़ाए. जाओ मेरी झांसी की रानी. ऑल द बेस्ट!
पति ने झांसी की रानी बोला और मुझे डॉन सुनाई दिया.
शांति अपने गेट पर खड़ी पड़ोसी से बतिया रही थी.
शांति- कहिए भावना जी किधर को?
मैं पूरी बात बताकर कहती हूं- आप भी चलिए मेरे साथ. एकता में बल है.
शांति- मैं आपके जितनी हिम्मती नहीं कि मज़ाक बनने से न डरूं और किसी से बिन मतलब वो कहूं जिसमें न सुनना तय है. मेरी तो समझ में नहीं आता कि अपना मज़ाक बनवाने में आपको क्या मज़ा आता है?
मैं- मगर कोशिश करने में...
कांति- न बाबा! मुझे बख्शें! ये काम आप जैसे पर्यावरण सेनानियों का ही है.
शब्द तो यही थे पर लहज़े से अर्थ ‘सनकी’ निकल रहा था.
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दो कदम चली थी कि रीना घर लौटती दिखी.
रीना- गर्मी ने तो तबाही मचाई है. है न भावना जी? ये आपके हाथ में झोलों का बंडल कैसा?
मैं पूरी बात बताकर कहती हूं- लैंडफिल पर जो कचरा जलाया जाता है उसमें पॉलीथीन के जलने से निकलने वाली मीथेन गैस भी गर्मी के लिए ज़िम्मेदार है. अच्छा होगा अगर आप भी मेरे साथ चलें. संगठन में...
रीना- न बाबा! ‘देश आज़ाद है और हम जिसमें मर्ज़ी सामान बेचें’ यही जवाब मिलने वाला है.
मैं- हां, मगर हम कह सकते हैं कि आज़ादी अपने साथ ज़िम्मेदारी लेकर आती है.
रीना- और आपको लगता है कि सब्ज़ी वाला आपकी बात सुन भी लेगा और मान भी लेगा. बड़ी आशावादी हैं आप.
रीना मुझे आशावादी के रैपर में लपेटी बेवकूफ़ की उपाधि देकर अपने घर लौट गई.
सब्ज़ी वाले के यहां पहुंचकर पूरी बात बताई तो वो सुनते ही भड़क गया.
“क्यों मेरी बिक्री बंद कराने की ठाने हो बहनजी, हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है."
आगे समझाने की कोशिश में जो कहानी सुनाई उससे मेरी आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं.
कहानी का सारांश कुछ इस प्रकार था कि पहले जिस जगह वो ठेला लगाता था वहां मेरी जैसी किसी लेडी, नहीं, नहीं संस्था ने यही कोशिश की थी. कुछ दबंग लोगों को पॉलीथीन में सब्ज़ी न मिलना फिर झोला वापस लाने या झोले के पैसे देने को कहा जाना अपना अपमान लगा और फिर सब्ज़ी वाले का उनसे झगड़ा हो जाना...
“मैंने भी कुछ उलटा-पुलटा बोल दिया. उन्होंने इसे अपनी इगो का प्रश्न बना लिया और फिर उन लोगों के डर से मुझे अपनी जगह छोड़नी पड़ी."
मैंने उसकी कहानी पर खेद जताया, पर वहां से टली नहीं. वहीं खड़े होकर किसी ख़रीदार को समझाकर झोला पकड़ाने लगी.उस ख़रीदार के जाने पर सब्ज़ी वाला हाथ जोड़कर बोला.
“बहनजी, यहां कहां आप धूप में खड़ी रहोगी? मैं आपको उस संस्था वाली बहनजी का नंबर देता हूं. उनके साथ मिलकर मेरी पहले वाली जगह पर कोशिश करो. वहां अब दूसरा ठेला खड़ा होता है. सुना है काफ़ी लोग बात मानने लगे हैं.”
मुझे तो मन चाही मुराद मिल गई. तुरंत फोन किया. बड़ी भली और बिंदास लगीं मुझे कविता जी. अगले ही दिन उन्होंने मुझे अपनी संस्था के ग्रुप में शामिल किया और मुझसे मिलने टीम घर आ पहुंची.
इस बार मेरी कर्मण्येवाधिकारस्ते की भावना ने मुझे इतनी सारी बिल्कुल मेरी तरह सोचने वाली महिलाओं की दोस्ती उपहार में दिला दी. मिलकर दुनिया बदलने की राह दिखा दी. अब लोग पॉलीथीन का इस्तेमाल बंद करें न करें, इसकी जागरूकता फैलाने का सफ़र तो इंटेरेस्टिंग बन ही गया था.

भावना प्रकाश
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