
विजया कठाले निबंधे
“... ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करती, पर प्यार... प्यार बहुत बड़ा शब्द है. इसमें स्वार्थ नहीं हो सकता और यही निस्वार्थ प्रेम मैंने दस साल पहले अविनाश से किया था. आज परिस्थितियां बदल गई हैं तो स़िर्फ अपने स्वार्थ के लिए मैं रास्ता बदल लूं, यह तो ग़लत होगा ना!..”
प्रेम क्या है...? आधी दुनिया जहां इस सवाल का जवाब ढूंढ़ रही है, वहीं आधी दुनिया इस सवाल में ही उलझ कर रह गई है. ठहराव, जुड़ाव, आसक्ति या फिर साहस... क्या है आख़िर यह प्रेम? अपने आपको, अपनी अपेक्षाओं को किसी और में देखना. क्या इसे आप प्रेम कहेंगे या फिर किसी और की ज़रूरतों, सपनों को अपने भीतर देखने को आप प्रेम कहेंगे? नौजवान प्रेम, प्रौढ़ प्रेम, कुंठित प्रेम, मुखर प्रेम... पर क्या हो, जब हो जाए बायपोलर प्रेम!
जब से काग़ज़ी फाइलों का चलन समाप्त हुआ है, तब से काम का बोझ कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है. छोटे-छोटे पेन ड्राइव्स में रखी ना दिखने वाली फाइलों ने तो नाक में दम कर दिया है. बालों का अधबना सा जूड़ा, जिसमें एक पेंसिल खोंसी हुई थी. आंखों पर काजल की धार के साथ एक चश्मा, गले और कान में पहने चांदी के गहने उसके सांवले रंग पर बहुत जंच रहे थे. कंधे और गर्दन सुडौल और ज़िम्मेदारियों को उठाते-उठाते परिपक्व भी हो गए थे. यह है पूर्वी, एक सरकारी बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत है. उसकी सुबह से शाम बैंक के बही खातों के जोड़ने-घटाने में गुज़र जाती है. स्वभाव से शांत और धैर्यवान है, इसलिए जीवन के गणित भी अक्सर अच्छे से सुलझा लेती है. उसने अपना तीस साल का अभी तक का जीवन किसी समय सारिणी की तरह जिया है. जिस समय जो जैसा आया, उसे वैसा ही स्वीकार कर लिया. जीवन से कोई शिकायत या अपेक्षा नहीं.
आज भी पूर्वी किसी अन्य दिन की भांति अपने काम में व्यस्त थी. सरकारी बैंकों में तीन-चार बजे तक किसी को मरने की भी ़फुर्सत नहीं होती. पूर्वी की मेज़ पर रखा फोन बार-बार बज रहा था, पर पूर्वी कंप्यूटर में किसी गहन गणित में उलझी हुई थी. दूर किसी दूसरे मेज़ से पूर्वी की सहकर्मी ने फोन उठाया और पूर्वी को आवाज़ दी, “पूर्वी... फोन... आओ पूर्वी...” पूर्वी ने सिर उठाकर इशारे से पूछा कि क्या बात है. दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “अरे... फोन उठाओ, तुम्हारे पापा का फोन है, कह रहे हैं तुम्हारा मोबाइल बंद है.” पूर्वी ने पहले अपना मोबाइल देखा जिसकी बैटरी ख़त्म हो चुकी थी. उसने फोन का रिसीवर उठाया और बोली, “हां पापा, बोलिए.” आगे पापा ने जो भी कहा, उसे सुनकर पूर्वी की उंगलियों की पकड़ फोन पर ढीली पड़ने लगी. आंखें भर आईं. वह अपना संतुलन खो कर गिर पड़ती, उससे पहले उसकी सहेली श्वेता ने उसे आकर पकड़ा, “पूर्वी... पूर्वी क्या हुआ? किसका फोन था? सब ठीक तो है.” पूर्वी ने कांपते शब्दों में कहा, “श्वेता मां को दिल का दौरा पड़ा है, उन्हें अस्पताल में एडमिट किया है.” इतना सुनना था कि श्वेता ने पूर्वी का सामान बैग में डाला. उसे पीने के लिए पानी देते हुए बोली, “पूर्वी मैं मैनेजर को बताकर आती हूं, मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं.”
पूर्वी के माता-पिता पूर्वी के घर से कुछ ही दूरी पर रहते थे. पूर्वी अपने माता-पिता की इकलौती औलाद थी. पूर्वी की मां को आईसीयू में रखा गया था. पूर्वी और श्वेता अस्पताल पहुंचे. चाहे पूर्वी ख़ुद घबराई हुई थी, पर उसने अपने पापा को ढा़ंढस बंधाते हुए कहा, “पापा, बिलकुल चिंता ना करें. मां बिल्कुल ठीक है, और जल्दी ही घर आ जाएगी.” इतने में डॉक्टर वहां आए. पूर्वी ने उनके पास जाकर पूछा, “डॉक्टर मां... मां कैसी हैं?”
डॉक्टर ने कहा, “अभी तो सब ठीक है. उनकी रिपोर्ट्स कल आएगी, तभी मैं आपको ठीक से बता पाऊंगा. अभी चार-पांच दिन तो अस्पताल रुकना पड़ेगा. डोंट वरी आपकी मां बहुत बहादुर हैं, वो ठीक हो जाएंगी. पर ख़्याल रहे, उन्हें कोई मानसिक तनाव ना हो.” इतना कहकर डॉक्टर चले गए.
पूर्वी पापा के पास जाकर बैठी और बोली, “पापा, मां को दिल का दौरा मेरी वजह से आया ना? मैं जानती हूं उनके जीवन में तनाव का कारण मैं ही हूं.”
पापा ने कहा, “कुछ भी सोचती रहती है. रात काफ़ी हो गई है. अब तू घर जा, अविनाश तेरी राह देखता होगा. मैं यहां रुकता हूं. अविनाश को ज़्यादा देर अकेले छोड़ना ठीक नहीं है.”
पूर्वी ने हामी में सिर हिलाया और ना चाहते हुए भी अपने घर की ओर रवाना हो गई. घर जाते समय कार में पूर्वी की आंखों के आंसू रुक नहीं रहे थे. श्वेता ने पूर्वी से कहा, “पूर्वी, मुझे लगता है, तुम्हें आज अस्पताल में रुक जाना चाहिए था. अब रातभर बेचैन रहोगी.”
पूर्वी ने श्वेता की बात का जवाब देते हुए कहा, “श्वेता, क्या मेरा मन मां के पास रुकने को नहीं किया, पर तुम मेरी हालत और मेरे हालात दोनों जानती हो. अभी अविनाश ठीक है, पर कब उसकी मानसिक दशा बदल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. उसे अकेला नहीं छोड़ सकती.”
विराम के बाद पूर्वी ने गहरी सांस भरते हुए कहा, “श्वेता, मां ठीक तो हो जाएगी ना..? मन बहुत ख़राब है मेरा. कुछ अच्छा नहीं लग रहा.”
श्वेता ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “पूर्वी, शांत हो जा, सब ठीक होगा, रात-बेरात कुछ भी ज़रूरत हो, तो मुझे कॉल कर लेना और कल की छुट्टी के लिए मैनेजर को मेल डाल देना.”
पूर्वी को उसके घर छोड़ श्वेता वहां से चली गई. पूर्वी बहुत टूटी हुई थी. चाहती थी कि बस अविनाश के सामने अपने आंसुओं का बांध खोल दे और अविनाश उसे अपनी बांहों में समेट ले. पर वह नहीं जानती थी कि वह एक युद्ध भूमि से निकल कर दूसरी युद्ध भूमि में प्रवेश कर रही है.
पूर्वी जैसे ही घर के बाहर पहुंची, उसे दरवाज़े के अंदर से ज़ोर-ज़ोेर से गानों का शोर सुनाई दे रहा था. उसके कई बार घंटी बजाने के बाद भी जब दरवाज़ा नहीं खुला, तो उसने अपने पर्स में रखी चाबी निकाली और दरवाज़ा खोला.
घर में पार्टी सा माहौल था. रंगबिरंगी रोशनी, स्पीकर पर तेज आवाज़ में गाने चल रहे थे और हॉल के बीचोंबीच अविनाश नाच रहा था. उसने पूर्वी को देखा, उसने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ नचाने लगा.
पूर्वी ने अपना हाथ छुड़ाया और अविनाश से पूछा, “ये सब क्या चल रहा है अविनाश...” अविनाश ने अपनी ही मस्ती में जवाब दिया, “मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा.” पूर्वा ने ग़ुस्से में स्पीकर बंद किया और कहा, “अविनाश ये सब क्या है? तुम्हें पता है मां को हार्ट अटैक आया है. वह अस्पताल में है. मैं भी वहीं से आ रही हूं.”
अविनाश कुछ देर शांत रहा और बोला, “तो तुम कपड़े चेंज कर लो और देखो मैंने तुम्हारे लिए सरप्राइज़ प्लान किया है.”
और वह पूर्वी को खींचते हुए डाइनिंग टेबल के पास ले गया और बोला, “देखो तुम्हारी पसंद का चायनीज़ मंगवाया है मैंने और कोल्ड कॉफी भी... मैं आज बहुत ख़ुश हूं... बहुत ज़्यादा... तुम्हें पता है मैंने आज जॉब छोड़ दिया, अब बहुत मजे से ज़िंदगी कटेगी. तुम वो कैफे खोलना चाहती थी ना, अब हम दोनों मिलकर कैफे चलाएंगे. मैंने सब सोच लिया है. कैफे का नाम... जगह सब कुछ... और तुम जानती हो...”
पूर्वी ने अविनाश की बात को बीच में काटते हुए कहा, “अविनाश... सुनो अविनाश.. कौन सा कैफे? वो कॉलेज के दिनों की बचकानी बात थी. कॉलेज ख़त्म होकर दस साल हो गए हैं और हमारी शादी को पांच साल. तुमने जॉब छोड़ दिया.. हे भगवान! अविनाश तुमने अपनी दवाइयां ली हैं ना?”
अविनाश अपनी ही धुन में था, वह बोला, “क्या यार दवाइयां... दवाइयां करती रहती हो. नहीं ली. ख़त्म हो गई हैं. पर यह सब छोड़ो मैं बहुत ख़ुश हूं. चलो खाना खाते हैं.” पूर्वी ने अविनाश को अपने पास सोफे पर बिठाया और पूछा, “अविनाश दवाइयां कब से नहीं लीं तुमने?”
अविनाश ने बेफ़िक्री में जवाब दिया, “पूर्वी मैं बिल्कुल ठीक हूं. तीन-चार दिन दवाई ना लेने से कुछ नहीं होगा, और कल हम शॉपिंग के लिए जाएंगे और तुम्हारे लिए कुछ अच्छे कपड़े ख़रीदेंगे.”
पूर्वी पथराई नज़रों से बस अविनाश को एकटक देख रही थी. उसने दराज़ से एक इमर्जेंसी दवाइयों की किट निकाली. अविनाश को दवाइयां दीं, खाना खिलाया. कुछ ही देर में अविनाश सोफे पर पूर्वी की गोद में सिर रखकर सो चुका था. पूर्वी अभी भी ऊपर-नीचे होती अपनी भावनावों के साथ संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी. अविनाश के बालों में उंगलियां घुमाते हुए अस्पताल में अपनी बीमार मां के बारे में सोच रही थी. अविनाश के शांत चेहरे पर नज़र पड़ते ही उसे अपने और अविनाश के कॉलेज के दिन याद आ गए. कितना ज़िंदादिल और होशियार था अविनाश. हर पार्टी, हर समारोह की जान हुआ करता था.
“हर समस्या का समाधान हुआ करता था तुम्हारे पास... तुम्हारे साथ सुखी जीवन के कितने सपने देखे थे मैंने. सोचा था अब मेरे सुख-दुख बांटने के लिए मेरे पास मेरा अपना कोई होगा, पर तुम्हारी बायपोलर मानसिक परिस्थिति ने मुझे ही दो ध्रुवों में बांट दिया. अविनाश तुम्हारी भावनाओं के ज्वार-भाटों ने मुझे थका दिया है. आज मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी. काश तुम मुझे संभाल लेते, काश तुम मुझे गले लगा लेते और मैं तुम्हारे सीने पर सिर रखकर जी भर कर रो लेती. काश तुम मुझसे कहते पूर्वी तुम चिंता मत करो, मैं कल अस्पताल जाकर डॉक्टर से बात करूंगा. तुम्हें फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है.”
ऐसे कितने काश में पूर्वी का जीवन पिछले तीन सालों से उलझा पड़ा है. अविनाश को पूर्वी दस सालों से जानती थी, पर उसकी बायपोलर मानसिक स्थिति के बारे में उसे दो साल पहले ही पता चला था. अपनी इस स्थिति के बारे में अविनाश ख़ुुद भी नहीं जानता था. पूर्वी अविनाश से बहुत प्यार करती थी. पर अब वह थक गई थी. अविनाश के साथ रोज़ भावनाओं के पहाड़ चढ़ते-उतरते अब वह थक गई थी.
दूसरे दिन सुबह पूर्वी ने अविनाश की दवाइयां लाईं और सीधे अस्पताल पहुंची. पापा आईसीयू के बाहर बैठे हुए थे. पूर्वी ने पूछा, “पापा, मां कैसी है अब.” पापा जवाब देने ही वाले थे कि डॉक्टर बाहर आए,
पूर्वी और पापा डॉक्टर से मुखातिब हुए. डॉक्टर ने कहा, “चियर अप, अच्छी ख़बर है. आपकी माताजी की रिपोर्ट नॉर्मल तो नहीं, पर बहुत ख़राब भी नहीं है. कुछ दवाइयों और परहेज़ के साथ सब ठीक हो जाएगा. आज मैं उन्हें वॉर्ड में शिफ्ट कर रहा हूं. कल आप उन्हें घर ले जा सकते हैं.”
डॉक्टर ने पूर्वी की ओर देखते हुए कहा, “आप मेरी ओपीडी में आकर मिलिए. मैं आपको उनको रिपोर्ट्स और देखभाल के बारे में समझा देता हूं.”
दो एक दिनों में पूर्वी की मां घर भी आ गई. और अब अविनाश भी सामान्य था, पर पूर्वी की मानसिक और भावनात्मक थकान ज्यों की त्यों थी. कई बार इतनी सारी ज़िम्मेदारियां उसे उलझन में डाल देती थी. कई बार उसने अविनाश के माता-पिता से बात करने की भी सोची, पर उनकी वृद्धावस्था और लाचारी देखकर वह चुप हो जाती. पिछले कितने सालों से ना तो वह कहीं घूमने गई थी और ना ही किसी शादी-समारोह में उसने शिरकत की थी.
अविनाश की बायपोलर स्थिति ने उसे पंगू बना दिया था. ऐसा नहीं है कि पूर्वी को अविनाश से प्रेम नहीं था. पर अब उसकी थकी देह और मन एक ऐसा कोना चाहते थे जहां वह कमज़ोर होकर ढह सके.
अविनाश कभी उसको टूटकर प्रेम करता, तो कभी अजनबी पथराई नज़रों से उसके और अपने बीच एक दीवार खड़ी कर देता. और पूर्वी कभी उसके प्रेम की गहराइयों में गिरती, तो कभी उस ब़र्फ की दीवार को तोड़ने की कोशिश करती.
पूर्वी ने जीवन से अपेक्षाएं रखना छोड़ दिया था. पर वो कहते हैं ना कि जीवन आपको चौंकाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता और ऐसा ही कुछ पूर्वी के साथ हुआ.
उस दिन पूर्वी के बैंक मैनेजर ने अपने केबिन में बुलाया और कहा, “पूर्वी, देअर इज़ ए न्यूज़... मेरा तबादला हो गया है. और मैंने बैंक मैनेजर की पोस्ट के लिए तुम्हें रेकमेंड किया है. अगले सोमवार से तुम्हें अपना नया पद संभालना है. और हां बधाई, तुम्हारी तनख़्वाह में भी इजाफ़ा होगा.”
पूर्वी बहुत ख़ुश थी. अविनाश की नौकरी जाने के बाद उसे ख़र्चों की चिंता सता रही थी, जो आज दूर हो गई. पूर्वी चहकते हुए घर पहुंची. बहुत दिनों बाद उसके जीवन में ख़ुशी आई थी. वह इस ख़ुशी को अविनाश के साथ बांटना चाहती थी. उसने घर का दरवाज़ा खोला. लाइट जलाई. अविनाश कमरे में सोया हुआ था. उसने अविनाश का सिर अपनी गोद में रखा और उसके माथे को प्यार से चूमा, “अविनाश... उठो...” सिर सहलाते हुए बोली, “अविनाश. सुनो तुम्हें कुछ बताना है.” अविनाश दवाइयों के कारण नींद के नशे में था. अधजगी अवस्था में वह बोला, “पूर्वी मैं जाग रहा हूं बोलो...”
पूर्वी ने किसी बच्चे सी चंचलता से कहा, “अविनाश पता है मेरा प्रमोशन हो गया है. अब तुम्हें काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है. तुम स़िर्फ अपनी तबियत को ठीक करो, बाकी मैं सब संभाल लूंगी. और तुम ठीक ही कहते थे, हम अपने सपनों का कैफे खोलेंगे. मैं तुम्हें अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास लेकर जाऊंगी. तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे.”
बहुत देर बात करने के बाद पूर्वी ने कहा, “बहुत हुआ अविनाश, अब उठो, चलो बाहर चलते हैं. हम दोनों की पसंदीदा वेनिला आइसक्रीम खाते हैं.”
अविनाश ने जैसे कुछ सुना ही नहीं, ऐसा उत्तर दिया, “पूर्वी, मैं सोना चाहता हूं. मुझे बहुत नींद आ रही है. तुम जाओ.”
अविनाश कुछ ही क्षणों में फिर से सो चुका था. पूर्वी अपनी ख़बर और ख़ुशी के साथ अकेली खड़ी थी. उसने अपना बैग उठाया और अकेली ही एक आइसक्रीम पार्लर चली गई. उसने बहुत सारी वेनिला आइसक्रीम मंगवाई और अपने अकेलेपन को भुलाने के लिए अपने मुंह में आइसक्रीम ठूसने लगी. पूर्वी का मन आक्रोश से भरा हुआ था. आंखों से आंसू निकल रहे थे. हाथ कांप रहे थे, नाक और गाल शोक और विलाप से लाल हो गए थे. वह ज़ोर से चिल्लाना चाहती थी. अपने आक्रोश को सब पर ज़ाहिर करना चाहती थी. अपनी टूटी अंतरात्मा की पीड़ा सबको बताना चाहती थी. अब उससे सहन नहीं हो रहा था. उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी भीड़ से भरे मेले में वह अकेली घबराई हुई दिशाहीन खड़ी है.
भावनाओं के आक्रोश के शोर में पूर्वी को अचानक एक आवाज़ से होश आया, “मिस पूर्वी... राइट?” पूर्वी ने खोई खोई नज़रों से आवाज़ की ओर देखा और विस्मय भाव से हां में सिर हिलाया. दूसरी तरफ़ से आवाज़ फिर आई, “हेलो, शायद आपने मुझे नहीं पहचाना. मैं आपके माताजी का इलाज कर रहा हूं डॉ. महेश...”
इतना कहकर डॉक्टर ने पूर्वी की और हाथ बढ़ाया. पूर्वी को अपनी अवस्था का एहसास हुआ. वह हाथ मिलाते हुए उठकर खड़ी हुई. उसने किसी को पता ना चले इस तरी़के से अपने आंसू पोंछे. बाल ठीक किए और चेहरे पर एक बनावटी औपचारिक मुस्कुराहट लाकर बोली, “ओह! हेलो डॉक्टर, हां मैं आपको पहचान गई. बस आपको यहां देखने की उम्मीद नहीं थी.”

डॉक्टर महेश अब तक पूर्वी को अच्छे से देख चुके थे. उन्होंने कुछ चिंतित होते हुए अपना अगला सवाल पूछा, “मिस पूर्वी... आप ठीक हैं? मुझे पूछना तो नहीं चाहिए पर क्या आप परेशान हैं?”
पूर्वी कुछ सहम गई और बोली, “हां डॉक्टर मैं बिल्कुल ठीक हूं. दरअसल, आज ऑफिस में काम ज़्यादा था और मां की चिंता भी लगी रहती है, तो बस थोड़ा थक गई हूं.”
“मैं समझ सकता हूं. शायद थकान के साथ-साथ आपको भूख भी काफ़ी लगी है. इतनी आइसक्रीम आप अकेले तो नहीं खां पाएंगी. मैं कुछ मदद करूं?”
इतना कहकर डॉक्टर हंसने लगा. पूर्वी को भी अपनी टेबल पर इतनी सारी आइसक्रीम देखकर हंसी आ गई. दोनों ने लगभग घंटा भर साथ में बिताया. पूर्वी ने अपने प्रमोशन की बात डॉ. महेश को बताई, दोनों ने सेलिब्रेट किया.
पूर्वी बहुत ख़ुश थी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे कई सालों बाद उसने खुलकर सांस ली हो. वह घर लौटी और आज उसे बहुत अच्छी नींद भी आई. सुबह जब बैंक जाने के लिए तैयार हो रही थी, तो उसने आज आईना रोज़ से ज़्यादा समय तक देखा... पूर्वी बहुत देर तक ख़ुुद को निहार रही थी. आज कुछ ज्यादा अच्छे से तैयार भी हुई थी. आज उसमें एक अलग उत्साह था. अब पूर्वी ख़ुश रहने लगी थी. ज़िम्मेदारियों का बोझ तो कम नहीं हुआ था, पर कहीं से कंधों में ताक़त बढ़ गई थी.
घर, ऑफिस, अविनाश, मां... आजकल उसे कुछ नहीं थकाता था. कहीं इसका कारण डॉ. महेश तो नहीं था, जो आजकल इत्तेफाकन पूर्वी से कई बार टकराने लगा था. कभी बैंक में तो कभी बाज़ार में. कभी महेश पूर्वी को शॉपिंग करवाता, तो कभी उससे कहता, “तुम अपनी मां की चिंता बिल्कुल छोड़ दो. तुम आराम से बैंक जाओ, मैं अस्पताल जाने से पहले तुम्हारे घर हो आऊंगा.”
दिन-ब-दिन पूर्वी की दोस्ती गहरी हो रही थी. महेश उसके साथ अधिक समय बिताना चाहता था. उसकी ख़ुशी में ख़ुश होता, उसके दुख में दुखी होता. अब तो लगभग रोज़ शाम को दोनों मिलते. घंटों किसी विषय पर चर्चा करते, मज़ाकिया बातें करते.
कई बार पूर्वी अपनी कोई समस्या महेश के सामने रखती और वह उसे मिनटों में सुनझा देता. पूर्वी के लिए महेश तो जैसे अलादीन का चिराग़ हो गया था. कोई जाने या ना जाने पर पूर्वी अच्छे से समझ रही थी कि यह सब किस ओर जा रहा है, पर वह इसे रोक नहीं पा रही थी. महेश एक अच्छा डॉक्टर होने के साथ-साथ एक अच्छा इंसान भी था. पूर्वी उसे खोना नहीं चाहती थी. पर फिर अविनाश का क्या? यह सवाल पूर्वी की बेचैनी बढ़ा देता, और अक्सर ही वह इस अनुत्तरित प्रश्न को दरकिनार कर देती.
अगर दुनिया के लिए डॉ. महेश के साथ उसका रिश्ता एक ख़ूबसूरत सपना था, तो पूर्वी सपने को टूटने नहीं देना चाहती थी. कई सालों के बाद वह भावनाओं के संतुलन का अनुभव कर रही थी.
उस दिन बैंक में काम कुछ कम था, तभी पूर्वी के केबिन में श्वेता पहुंची. पूर्वी आजकल श्वेता से भी नज़रें बचाकर चलती थी.
श्वेता ने कहा, “पूर्वी, क्या चल रहा है ये सब. तुम मुझे इग्नोर क्यों कर रही हो?” पूर्वी ने मसरूफ़ियत का नाटक करते हुए कहा, “नहीं तो... मैं क्यों तुझे इग्नोर करने लगी.”
श्वेता सामने कुर्सी पर बैठने हुए बोली, “और ये डॉक्टर आजकल तुमसे मिलने क्यों आता है? क्या चल रहा है पूर्वी? मुझसे बात करो.” पूर्वी ने पेन नीचे रखा और श्वेता की ओर देखा और बोली, “श्वेता, मैं ख़ुद नहीं जानती. बस बहुत सुरक्षित महसूस होता है मुझे जब महेश के साथ होती हूं. कुछ देर का आराम मिलता है, जब उसके साथ होती हूं. मैं जो सहारा अविनाश में ढूंढ़ रही थी वह मुझे
महेश में मिल रहा है...”
श्वेता ने बीच में बात काटते हुए कहा, “पर क्या तुम यह नहीं जानती हो कि महेश अविनाश नहीं है. क्या महेश को तुमने अविनाश के बारे में बताया है?” इस सवाल पर पूर्वी फूट-फूटकर रोने लगी.
“मैं क्या करूं श्वेता, मैं बहुत थक गई हूं. तुम्हें पता है मेरे भीतर अपराधबोध बहुत बढ़ता जा रहा है. जब से महेश मेरा दोस्त बना है, जीवन आसान हो गया है. वह मेरी भावनाओं को समझता है, उनका सम्मान करता है, पर...”
“पर क्या यह स़िर्फ दोस्ती है?” श्वेता ने कहा, तभी पूर्वी के मोबाइल की घंटी बजी. फोन महेश का था.
श्वेता ने पूर्वी को गले लगाया, उसके आंसू पोंछे और वहां से चली गई. पूर्वी ने फोन उठाया, दूसरे छोर से आवाज़ आई, “पूर्वी कल मेरा जन्मदिन है, तो मैं सोच रहा था कि हम दोनों लंच पर चलते हैं. अब यहां मेरे और कोई दोस्त तो हैं नहीं, तो सोचा हम दोनों ही चलते हैं.” पूर्वी ने हामी भर दी, पर श्वेता से हुई बातचीत अभी भी पूर्वी के ज़ेहन में घूम रही थी.
श्वेता ने आज उसके भीतर चल रहे द्वंद्व को आवाज़ दे दी थी. रात को जब पूर्वी घर लौटी, तो अविनाश लैपटॉप पर कुछ लिख रहा था, सामने टीवी भी चल रहा था. पूर्वी हॉल में आई और टीवी बंद करते हुए बोली, “अविनाश अगर टीवी नहीं देखना तो बंद कर दिया करो और ये क्या लिख रहे हो.” अविनाश ने जवाब दिया, “पूर्वी अपना सीवी ठीक कर रहा हूं. एक-दो जगह देना है.”
पूर्वी ने कहा, “क्या फ़ायदा अविनाश, कुछ दिन काम करोगे और फिर छोड़ दोगे. इससे अच्छा है कि रहने दो, मैं संभाल लूंगी.”
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अविनाश ने कहा, “पूर्वी मुझे अपनी परिस्थिति के बारे में पता है. कुछ चीज़ें मेरे वश के बाहर हैं, पर मैं जीना नहीं छोड़ना चाहता. जब तक कर सकता हूं काम करूंगा. मैं कोशिश कर रहा हूं जीने की.” इतना कहकर अविनाश अपना लैपटाप उठाकर वहां से चला गया. पूर्वी तराजू के दो पलड़ों के साथ रातभर जूझती रही.
दूसरे दिन जिस तरह तय हुआ था, डॉ महेश पूर्वी को लेने बैंक पहुंचा. पूर्वी भी तैयार थी. रेस्टोरेंट में बैठने के बाद पूर्वी ने महेश को सुंदर सी टाई पिन उपहार में दी और कहा, “महेश, तुम मेरे जीवन में हमेशा इस चमकती हुई टाई पिन की तरह हो जिसने मुझ जैसी बिखर चुकी स्त्री को बड़ी ख़ूबसूरती से बांध कर रखा... जन्मदिन मुबारक हो महेश.”
महेश ने एक हाथ से टाई पिन ली और दूसरे, हाथ से एक अंगूठी पूर्वी की ओर बढ़ाई, “पूर्वी, मेरी भावनाओं से तुम अनभिज्ञ तो नहीं हो. मैं तुमसे बहुत प्यार...” पूर्वी स्तब्ध हो गई और बीच में बोली, “प्यार... प्यार क्या है महेश, मुझे नहीं पता... पर तुम बस यहीं रुक जाओ...” पूर्वी रो नहीं रही थी, पर उसके भावों में गंभीरता प्रकट हो रही थी.
“मैं जानती हूं यह मेरी ही ग़लती है, जो बात मैंने यहां तक पहुंचने दी, पर तुम... तुम मेरी ग़लती नहीं हो.. और ना ही अविनाश...” महेश ने आश्चर्य से पूछा, “अविनाश...?” पूर्वी ने कहा, “हां महेश, मेरी शादी पांच साल पहले अविनाश से हो चुकी है. अविनाश को बायपोलर डिसऑर्डर है, जिससे मेरी ज़िंदगी तूफ़ान बन चुकी थी. फिर तुम जीवन में ठहराव लेकर आए. किसी अडिग पर्वत की तरह मेरे साथ खड़े रहे. मुझे भी कुछ सुकून महसूस हुआ. ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें पसंद नहीं करती, पर प्यार... प्यार बहुत बड़ा शब्द है. इसमें स्वार्थ नहीं हो सकता और यही निस्वार्थ प्रेम मैंने दस साल पहले अविनाश से किया था. आज परिस्थितियां बदल गई हैं तो स़िर्फ अपने स्वार्थ के लिए मैं रास्ता बदल लूं, यह तो ग़लत होगा ना!
महेश तुमने मुझमें खोया विश्वास फिर से जगाया है और उसी विश्वास ने मुझे साहस दिया कि मैं फिर से एक प्रेम को ढूंढू. फिर एक बार अविनाश को पा लूं नए तरी़के से नए सिरे से... मैं जानती हूं इन सबमें मैंने तुम्हें बहुत तकलीफ़ पहुंचाई है.”
महेश सब सुनकर उसे आत्मसात करने की, समझने की कोशिश कर रहा था. उसने कहा, “यार वाकई प्यार करना आसान नहीं है... तुमने एक ही पल में मुझे भावनाओं के भंवर में ढकेल दिया. अब इससे कैसे उबर पाऊंगा पता नहीं. मैं डॉक्टर हूं और वह भी दिल का. किसी तरह कर लूंगा ख़ुुद का इलाज... मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं समझता हूं, पर हां ख़ुश हूं कि तुमने मुझसे सच कहा. प्यार शायद स़िर्फ मैंने किया था. तुम तो कुछ और ही ढूंढ़ने आई थी मेरे पास. अब आगे हम कभी ना मिलें तो मेरे लिए बेहतर होगा. अपने इस बायपोलर प्रेम को मैं हमेशा अपने जीवन का एक ख़ूबसूरत अध्याय बना कर रखूंगा.”

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