Close

फिल्म समीक्षाः दादी की शादी- हर मां के अनकहे दर्द को बयां करती… (Movie Review: Daadi Ki Shaadi)

अमूमन अधिकतर लोग फिल्म देखने मनोरंजन के लिए जाते हैं. अब यह और बात है कि निर्देशक उसमें एंटरटेन करने के साथ रोमांच, थ्रिलर, कॉमेडी, एक्शन के साथ-साथ कोई न कोई संदेश भी दे देते हैं. इन दिनों इसी तरह की फिल्मों के बीच एक हल्की-फुल्की फिल्म आती है दादी की शादी... शीर्षक से कुछ अटपटी तो कुछ हंसी-मज़ाक की सुगबुगाहट सी होती है, बस इसी पर खरी उतरती है नीतू कपूर, कपिल शर्मा स्टारर फिल्म 'दादी की शादी'...


निर्देशक आशीष आर मोहन ने कोशिश तो बहुत की कि फिल्म में एक अर्थपूर्ण संदेश देने के साथ लोगों को ख़ूब हंसाए-रुलाए भी, लेकिन कथा-पटकथा का कसावट कम होने के कारण वे प्रभावित नहीं कर पाए.
इस तरह की कहानियों पर न जाने कितनी फिल्में अब तक बन चुकी हैं, जहां बच्चे अपनों को ख़ासकर मां को समय नहीं दे पाते. कलाकारों के स्तरीय अभिनय के साथ-साथ भावनाओं व संगीत का प्रभावशाली न होना खलता है.
एक फ्लो में फिल्म चली जा रही है. जहां पोती, सादिया खतीब के रोके पर पता चलता है कि उसकी दादी, नीतू कपूर शादी करने जा रही है और रिश्ता टूट जाता है. दूल्हे राजा टोनी कालरा उर्फ कपिल शर्मा की बेचैनी बढ़ जाती है. क्योंकि अव्वल तो उनकी कहीं शादी नहीं हो पा रही, वहीं कन्नू जिसे वे कॉलेज के दिनों से एकतरफ़ा चाहते थे के साथ रोका होते-होते दादी की शादी की सनसनी ख़बर के कारण रुक जाता है. बस, यही से शुरू होता है दादी के दोनों बेटे-बहू का दादी को मिलने शिमला जाना, जहां वे अकेली रह रही हैं. इसी टोली में टोनी और दादी की बेटी और अन्य लोग भी जुड़ते चले जाते हैं. क्या सभी मिलकर दादी की शादी को रोक पाते हैं? यह जानना दिलचस्प है.

नीतू कपूर ने अपना काम पूरी ईमानदारी से निभाया है. उनका साथ अन्य कलाकारों ने भी दिया, परंतु इन सब के बावजूद फिल्म बांधे नहीं रख पाती. हर कोई जानता है कि आगे क्या होने वाला है.

यह भी पढ़ें: ऐक्ट्रेसेस के ब्यूटी सीक्रेट्स (Beauty Secrets Of Actresses)

इसमें कोई दो राय नहीं कि कपिल शर्मा कॉमेडी के बादशाह हैं, लेकिन गंभीरता में मात खा जाते हैं. कई सीन में उनका सपाट चेहरा भावनाओं को प्रदर्शित करने में कामयाब नहीं हो पाता. कहीं कहीं तो ऐसा लगता है कि हम कॉमेडी शो और उसके पंच लाइन से रू-ब-रू हो रहे हैं.

सादिया खतीब, दीपक दत्ता, जितेंद्र हुड्डा, आर. शरतकुमार, रिद्धिमा कपूर साहनी, तेजस्वनी कोल्हापुरे,अदिति मित्तल, निखत खान, विधान शर्मा, स्वर्णा पांडे, राहुल सिंह हर कलाकार बस कहानी में खानापूर्ति करता सा नज़र आता है. उस पर नीतू कपूर की बेटी रिद्धिमा की तो यह पहली फिल्म है, वे ख़ूबसूरत तो काफ़ी लगी हैं, किंतु अभिनय में उन्हें मेहनत करनी पड़ेगी.
निर्देशक ने साहिल एस. शर्मा और बंटी राठौर के साथ मिलकर आज के संदर्भ को देखते हुए कहानी तो ठीक लिखी, पर पटकथा में चूक गए.


सुरेश बीसवेनी व मार्क नटीकिंस की सिनेमेटोग्राफी प्रभावित करती है. गुलराज सिंह का संगीत ठीक ही है. सोनू निगम, सुनिधि चौहान के गाए गाने भी मूड नहीं बना पाते. मनोज यादव के गीत सामान्य हैं. ढाई घंटे की फिल्म कई जगहों पर नीरस भी लगने लगती है.
जहां प्रोडक्शन से जुड़े हैं- आरटेक स्टूडियोज, शिमला टॉकीज व बीइंगयू स्टूडियोज, वहीं निर्माताओं की फ़ेहरिस्त में कलाकारों के अपने ही हैं कोमल शाहनी से लेकर गुरजीत सिंह, अक्षित लाहौरिया, श्रद्धा अग्रवाल, गिन्नी कपिल शर्मा तक.


‘दादी की शादी’ का सार बढ़िया है. रिश्ते के ताने-बाने से बुनी गई एक साफ़-सुथरी पारिवारिक फिल्म. जो यह एहसास कराती है कि हर मां के लिए उसके बच्चे के साथ से बढ़कर कुछ नहीं, फिर चाहे वो उम्र का कोई भी पड़ाव क्यों न हो.

आख़िर ऐसा क्यों होता है कि मां की कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनकी आंखों के सामने रहे, पर बच्चों को कभी पढ़ाई, कभी करियर, नाम-रुतबा-पैसा, तो कभी अपनी खोखली आज़ादी से इस कदर प्यार रहता है कि मां ही बंधन और रुकावट महसूस होने लगती है. हर एक मां की दिल की बात को फिल्म में तमाम उतार-चढ़ाव के साथ दिखाने की सराहनीय कोशिश है दादी की शादी.
- ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़ें: कपिल शर्मा- ज़िंदगी मेरी अभी ख़त्म नहीं हुई है… (Kapil Sharma- Zindagi meri abhi khatam nahi huyi hai…)

Photo Courtesy: Social Media

Share this article