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पहला अफेयर- ख़ामोश अफ़साना… (Pahla Affair- Khamosh Afsana…)

मैं मंत्रमुग्ध सी उसकी बातें सुनती रही. वह मेरे दिल में उतरता चला गया. पूरी रात वह मेरे ख़्यालों में उतरता-चढ़ता रहा.

प्रेम की डगर वो बंद लिफ़ाफ़ा है, जिसके खोलने पर ही पता चलता है कि इसमें कोई रूहानी इबारत लिखी है या फिर किसी ने ख़ामोश अफ़साना दर्ज़ किया है. उम्र यदि लड़कपन की हो और ख़्वाबों की ताज़ा-ताज़ा बयार चली हो, तब कल्पना भर से ही तन-मन का पुलकित होना स्वाभाविक है. बात उस समय की है जब मैं बीए कर रही थी. अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए मैंने कोचिंग ज्वाइनिंग किया था. कोचिंग दूर होने की वजह से मैं सिटी बस से ही आती-जाती थी.

सर्दियों के दिन थे. शाम जल्दी विदा हो जाती और रात जल्दी से आकर डेरा डाल देती. उस दिन कोचिंग से आते वक़्त रास्ते में बस ख़राब हो गई. दूसरी बस ठसाठस भरी हुई थी, जिस पर चढ़ना तो दूर पैर रखना भी मुश्किल था. वह बस मैंने छोड़ दी. उसके बाद कोई बस आई ही नहीं. साथ वाली सवारियां तितर-बितर हो चुकी थीं. रात गहराती जा रही थी और इसके साथ ही मेरा मन भी डर से सिमटता जा रहा था.

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जब कोई उम्मीद नज़र नहीं आई, तो मैं पैदल ही घर की ओर बढ़ने लगी. पांच मिनट बाद अचानक एक कार मेरे पास आकर रुकी. बिना संबोधन के उसने कहा, “चलिए, मैं आपको छोड़ देता हूं.” मैंने उसे संशय की नज़रों से देखा.

“घबराएं नहीं, मैं आपके पड़ोस में रहने वाले संदीप के मामा का बेटा सुदीप हूं.” उसने बहुत सलीके और शालीनता से अपना परिचय दिया. उस पर मुझे तुरंत विश्‍वास हो गया और मैं कार के पीछे का दरवाज़ा खोलकर बैठ गई.

औपचारिक बातों के दौरान पता चला कि वह शहर में घूमने आया था और यहां की प्रदूषण मुक्त हवा और सुविधायुक्त शहर होने के कारण यहीं बस जाने की सोच रहा था.

मैं मंत्रमुग्ध सी उसकी बातें सुनती रही. वह मेरे दिल में उतरता चला गया. पूरी रात वह मेरे ख़्यालों में उतरता-चढ़ता रहा. दिल में एक अरमान जाग गया कि उससे दूसरी मुलाक़ात ज़रूर हो.

ये इश्क़ भी अजीब शै है, न पता ना ठिकाना, बस जो मन भा गया, उस अनजान डगर पर चल पड़ा. अब मेरी नज़रें बार-बार पड़ोसी के आंगन पर टिक जाती. उसके दीदार का बेसब्री से इंतज़ार रहने लगा.

दूसरे दिन संदीप के साथ सुदीप मेरे घर आया. उसके हाथों में मिठाई का डिब्बा था. उसकी नौकरी दूसरे शहर में लग गई है. अब वह वहीं रहेगा. मेरे यह पूछने पर कि, “आपको तो यह शहर बहुत पसंद आया था. आप यहां क्यों नहीं रुक जाते.”

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उसने कहा. “काश! मेरी नौकरी इस शहर में लगी होती. फिर होंठों पर एक लंबी मुस्कान लाते हुए बोला, शहरों का क्या है वह तो एक न एक दिन छूट ही जाते हैं. जहां रहे, वही पसंद बन जाता है.”

वह चला गया मेरे मन में हलचल छोड़कर. फिर कभी उससे मुलाक़ात नहीं हुई. 22 साल गुज़र गए. आज भी वह शख़्स मेरे दिल में बसा है और उससे जुड़े एहसास टीस देते हैं. अक्सर यही ख़्याल आता है, काश उसकी नौकरी इसी शहर में लगी होती! काश वह इस शहर में बस गया होता, तो शायद मेरा प्यार मुकम्मल हुआ होता.

मेरे प्रेम की डगर एक अनजान राह थी जिस पर कदम तो बढ़े, मगर मंज़िल कभी सामने आई ही नहीं. काश.. और काश में अटकता मेरा मन...

- शोभा गोयल

Photo Courtesy: Freepik

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