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कहानी- ज़रीना‌ (Short Story- Zarina)

"चाहो तो यह रख लो, चाहो तो फाड़ डालो, पर मैं चाहता हूं कि प्यार के इस ताजमहल को नष्ट न किया जाए. यह प्यार अपनी जगह है और विश्वास रखो कि यह कभी भी हमारे वैवाहिक जीवन में रोड़ा नहीं बनेगा. यह अलग क़िस्म का प्यार है जात-पांत से ऊंचा, धर्म-मज़हब से ऊंचा!.."

मेरी ज़िंदगी में जवानी आई थी, तो जवानी के साथ ज़रीना आई थी. जवानी तो ख़ास सुन्दर नहीं थी, भला ज़ख़्मों और अधूरे सपनों से भरे हुए बचपन के बाद जवानी कितनी सुन्दर हो सकती है. पर ज़रीना इतनी सुंदर थी कि जवानी गुलमोहर के वृक्ष की भांति फूलों से भर गई थी. वह ज़रीना जैसी ही सुंदर बन गई थी, ज़रीना जैसी ही कोमल और महकती हुई.

ज़रीना मेरी बुआ के गांव की लड़की थी. उस गांव में मुसलमानों के कई घर थे. मैं साल में दो बार बुआ से मिलने जाया करता था. बस जाता था, तो फिर आने को दिल ही नहीं चाहता था. वह गांव था कि स्वर्ग था. वहां की हर वस्तु सुंदर लगती थी. वहां के वृक्ष और वहां के खेत, वहां के घर और वहां के लोग और वहां का तारों भरा आकाश. वैसे तो आम गांवों जैसा गांव था वह, पर लगता था जैसे किसी सपने में देखा हुआ गांव हो. ज़रीना भी तो सपने की लड़की प्रतीत होती थी.

ज़रीना- एक अलौकिक सपना!

और ज़रीना के संग दिन कितने छोटे प्रतीत होते थे. ज़रीना के बिना रातें कितनी लंबी हो जाती थीं. जब मैं ज़रीना के गांव से लौटकर अपने गांव में जाता था तो रास्ता ख़त्म होने में ही नहीं आता था. फिर न दिन ख़त्म होने में आते थे, न रातें ख़त्म होने में आती थीं. और फिर कुछ ऐसा वसीला बना कि मैंने दो वर्ष बुआ के गांव में रहकर ही काटें. हाईस्कूल हमारे गांव से बहुत दूर पड़ता था, पर बुआ के गांव से बहुत निकट था. सो, नौवीं और दसवीं में पढ़ते हुए मैं बुआ के यहां रहने लगा था और कभी-कभार ही अपने गांव आता था.

वे दो वर्ष उड़ते हुए निकल गए थे. फिर लगा था समय जैसे एक स्थान पर खड़ा हो गया हो. वह बहुत देर तक एक ही स्थान पर खड़ा रहा था. दिन अपनी जगह खड़े रहते, रातें अपनी जगह खड़ी रहतीं और मेरी आंखों में शून्य आकाश था. ज़रीना चली गई थी तो बाकी कुछ भी नहीं रह गया था.

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कुछ चीज़ें होती हैं, जो सदा के लिए दिल में घर कर लेती हैं. ज़रीना का प्यार ही नहीं, उसकी तीन मौतें भी मैं भूल नहीं सकता.

हां, तीन मौतें. ज़रीना एक बार जन्म लेकर तीन बार मरी थी और अब यह चौथी बार मरेगी. शायद मर ही गई हो. जब उसके पिता ने उसका किसी फौजी नौजवान से निकाह कर दिया था तो ज़रीना ने मुझसे कहा था, "समझ लो, ज़रीना तुम्हारे लिए मर गई है. वैसे मैं ख़ुद भी अपनी नज़रों में मर गई हूं. निकाह तो मेरी लाश के साथ हुआ है."

और दूसरी बार ज़रीना तब मरी थी, जब निकाह के पौने दो वर्षों के पश्चात् उसका खाबिन्द युद्ध में मारा गया था और वह विधवा हो गई थी. उसके दो महीने पश्चात् उसके बेटी जन्मी थी. उसके कुछ नक्श पिता पर थे, पर अधिकांश मां पर. और तीसरी बार ज़रीना तब मरी थी, जब कुछ वर्षों के पश्चात् पाकिस्तान बनने पर पंजाब में साम्प्रदायिक फसाद शुरू हुए थे. चारों ओर भगदड़ मच गई थी. पंजाब उजड़ने लगा था. गांव फूंके जाने लगे थे. एक दहशत फैल गई थी. मुसलमानों ने हिन्दू-सिख स्त्रियों की खुलेआम बेइज़्ज़ती और हिन्दू-सिखों ने मुसलमान की. और जब ज़रीना के गांव में भी लूट मची, मुसलमानों के घरों को आग लगाई जाने लगी और स्त्रियों की बेइज़्ज़ती होने लगी, तो ज़रीना ने कुछ और स्त्रियों के साथ कुएं में छलांग लगा दी थी. तब वह तीसरी बार मर गई थी. पर फिर, पता नहीं कैसे वह जी उठी थी. कुछ स्त्रियों के साथ वह कुएं में से निकाल ली गई थी. आख़िर काफ़िलों के साथ गिरती-पड़ती, अपनी लाश को घसीटती हुई, वह पाकिस्तान पहुंच गई थी.

पाकिस्तान! लहू के दरिया के उस पार बसा हुआ एक देश. साझी धरती से टूट कर पराई बन गई धरती. भाइयों से टूट कर बेगाने बन गए भाई. एक आदि काल का रिश्ता, जिस पर खून की लकीर फिर गई और जिसके बीच में नफ़रत की दीवार खड़ी हो गई, क्या कभी यह दीवार ढहेगी? कभी पराए अपने बनेंगे?

मैंने उस पराए बन गये देश और पराई बन गई धरती पर ज़रीना को आंखों के सामने लाने का यत्न किया. वह कितनी दूर प्रतीत हो रही थी. वह पूर्णरूप से आंखों के सामने आ नहीं रही थी.

कुछ समय पहले मैं पाकिस्तान गया था, तो ज़रीना से मिला था. बस, उसी से मिलने गया था. मन में कई बार आया था कि एक बार देख आऊं, कैसी है. सचमुच वह बहुत दूर चली गई लगती थी. दो देशों के बीच की उस सीमा ने उसे कितना दूर कर दिया था. उस सीमा को पार करना इतना आसान नहीं था. उस सीमा पर दोनों देशों की संगीनें थीं, जो परवाने के बिना पार करने की आज्ञा नहीं देती थीं.

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मैं उस गांव में पहुंचा था, जिसमें ज़रीना रह रही थी. ज़रीना के घर के सामने जा कर एक क्षण के लिए मेरे कदम रुक गए थे. मैंने देखा था, ज़रीना आंगन में बैठी, हाथ पर थाली रखे, सिर झुकाए, दाल बीन रही थी. मेरी आहट पाकर उसने मुंह ऊपर उठाया था और फिर स्वयं भी उठ खड़ी हुई थी. पहले तो पहचानी ही नहीं गई थी. एक उजड़ी हुई स्त्री थी वह. बस, कुछ वर्षों में ही बूढ़ी बन गई थी. अपनी आयु से बारह-पंद्रह वर्ष बड़ी लगती थी.

उसका छोटा सा कच्चा घर था किसी उजड़े हुए हिन्दू या सिख परिवार का घर. और यद्यपि ज़रीना उसमें बसने लग गई थी, फिर भी वह घर उजड़ा हुआ ही प्रतीत हो रहा था. एक उजड़ा हुआ मकान, जिसमें कहीं भी नए जीवन निर्माण के चिह्न दिखाई नहीं देते थे. आख़िर उसमें एक उजड़ा हुआ परिवार ही तो बस रहा था. वह नए जीवन का निर्माण क्या करता? वह छोटा सा घर था और उस घर का छोटा सा आंगन था. आंगन में एक नीम का पेड़ था, जो एक तरफ़ से झुलसा हुआ था. एक कोने में काले धब्बों वाली एक सफ़ेद बकरी बंधी हुई थी.

ज़रीना के साथ उसकी बूढ़ी सास थी और बेटी थी, जो अब बड़ी हो गई थी. उसे देखकर तरस आता था. एक दर्द था उसके चेहरे पर और उसकी आंखों में साम्प्रदायिक फसादों की आग में झुलसा हुआ एक फूल था.

ज़रीना के साथ मेरी वह बहुत दर्दभरी मुलाक़ात थी. हम दोनों कितना बदल गए थे. वर्षों ने और ज़माने के तूफ़ानों ने हमें कितना बदल दिया था. अब जवानी के वे दिन कितने पीछे रह गए थे. वे दिन-प्रतिदिन और पीछे रहते जा रहे थे.

बस, साधारण सी बातें हुई थीं ज़रीना के साथ. पुराने दिनों के बारे में बात करते हुए डर लगता था. दिल रोने को चाहता था पर आंखों में आंसू नहीं आ सके थे और फिर, उसके घर में एक दिन और एक रात रह कर मैं आ गया था. मैं ही जानता हूं, मैं कैसे आया था, कैसे अपने घर तक का वह रास्ता काटा था. और अपने गांव आकर बार-बार सोचता रहा था काश, कहीं ज़रीना यहां आ जाए, मेरे साथ इस घर में जीने लग जाए. मुझे वह अब भी स्वीकार थी. पर फिर सोचा, ऐसी हालत में गांव वाले उसे तो क्या, मुझे भी यहां रहने नहीं देंगे.

और फिर अपने घर में रहते हुए मेरा दिल डूबने लगा था. हर क्षण दिल उचाट सा बना रहता. दिन ख़त्म होने में न आता. रात में ऐसे-ऐसे सपने देखता, जैसे पहले कभी नहीं देखे थे. खून की दरिया में बहती जा रही चीखें... आकाश से लटका हुआ एक कच्चा घड़ा, जिस पर सांप बैठा हुआ, किसी गहरे अंधेरे कुएं में एक स्त्री कच्चे धागों का जाल बुन रही और उस जाल में फंसी हुई मछलियों जैसी अनगिनत आंखें...

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मैं कई बार सोचता, आखिर ज़रीना से मिलने क्यों गया था? न ही जाता तो अच्छा था. उसके जीवन की सारी वीरानी मेरे दिल में भर गई थी. वह मर ही जाती तो अच्छा था. किसी ने क्यों उसे कुएं में से निकाला था? अब भी तो वह जीवन के वैसे ही कुएं में जी रही है. जीवन का कुआं, जिसमें कच्चे धागों का जाल और उसमें फंसी हुई अनगिनत आंखें...

ज़रीना पहले ही क्या कम दूर थी, जो अब और दूर चली गई थी. मुझे चैन नहीं मिल रह था. आख़िर एक दिन मैं बुआ के गांव के लिए चल पड़ा था. वहां मैं ज़रीना के घर गया था, जहां एक सिख परिवार रहता था. वह घर तब ज़रीना का घर नहीं रहा था. वह बदल गया था. ज़रीना के निकाह हो जाने के बाद भी वह घर काफ़ी अरसा ज़रीना का घर ही रहा था, पर पाकिस्तान बनने के बाद वह ज़रीना का घर नहीं रहा था. उसका कुछ भाग पक्का बन गया था, कुछ और भी परिवर्तन हो गए थे उसमें. आंगन में लगा आम का पेड़ अब बहुत बड़ा हो गया था. और उस पर बौर महक रहे थे. उस स्थान पर ईंधन का ढेर लगा हुआ था.

वहां से लौटने पर मैंने अपनी मेज़ की दराज़ में से एक डायरी निकाली थी. वह ज़रीना की डायरी थी. उसमें उसके प्यार की कहानी थी. और अन्त में उसके प्यार की वीरानी थी. निकाह के कुछ समय पश्चात् ज़रीना ने मुझे वह दी थी और कहा था, "तुम्हारी चीज़ है, अब तुम्हीं रख लो, मैं क्या करूंगी?" और जब मैंने डायरी पढ़ी थी, तो मेरी आंखों में आंसू ही आंसू थे. कितना सुंदर लिखती थी वह. यद्यपि कई जगह ग़लत भाषा थी, पर प्यार का कितना सुंदर वर्णन था. कहीं कोई बनावट नहीं थी. बस, जिस तरह अनुभव किया था, उसी तरह लिख दिया था. वह दिल की स्वाभाविक भाषा थी.

आज तक मैं उसे कई बार पढ़ चुका हूं. मेरी पत्नी ने भी उसे कई बार पढ़ा था और उसने अपने प्यार को ज़रीना के प्यार जैसा ही बना लिया था. विवाह होने पर मैंने पत्नी से वह डायरी छिपाई नहीं थी. उसे देकर कहा था, "चाहो तो यह रख लो, चाहो तो फाड़ डालो, पर मैं चाहता हूं कि प्यार के इस ताजमहल को नष्ट न किया जाए. यह प्यार अपनी जगह है और विश्वास रखो कि यह कभी भी हमारे वैवाहिक जीवन में रोड़ा नहीं बनेगा. यह अलग क़िस्म का प्यार है जात-पांत से ऊंचा, धर्म-मज़हब से ऊंचा!.."

पत्नी मान गई थी और वह डायरी पढ़-पढ़ कर स्वयं ज़रीना बन गई थी.

- सुखबीर

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