"मां, ये तुम पर कैसा दोष मढ़ रही है. तुम कैसे यह सब सुनती हो? चुप क्यों हो मां... बोलो... मुझसे यह सब नहीं देखा जाता." मेरी बात मां ने सुनी ही नहीं. वह निश्चल बैठी रही. भाभियों के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ अब भी आ रही थीं.
मां ख़ामोशी ओढ़े बैठी रहीं. मुझे भीतर तक कुछ तोड़ गया. मां कुछ कहती क्यों नहीं? बड़ी भाभी अब भी बरस रही थी, "मांजी ने अंगूठी ली है. सुबह से मेरे कमरे में कोई आया नहीं. ड्रेसिंग टेबल पर रखी थी, उड़ तो जाएगी नहीं."
मुझसे नहीं रहा गया. मैं तुरंत बड़ी भाभी के पास पहुंची, "ये क्या कह रही हो भाभी? मां पर इल्ज़ाम लगा रही हो? मां को अंगूठी से क्या लेना-देना? वहीं कहीं होगी, एक बार और देख लो."
"पूरा कमरा खोज लिया, कहीं नहीं है. तुम तो मां की तरफ़दारी करोगी ही, बेटी हो. एक महीना इस घर में रहो, सब कांच सा साफ़ हो जाएगा. कोई चीज़ नहीं बचती. शक्कर, चायपत्ती, वॉशिंग पाउडर तक गायब हो जाता है. अभी पिछले हफ़्ते ये पांच किलो घी गांव से लाए... डिब्बे में मुश्किल से एक किलो बचा है."
मेरे तन-मन में आग लग गई. भाभी कैसी अनर्गल बात कह रही है. मां पर कीचड़ उछाल रही है. जिसने सारी ज़िन्दगी सुख नहीं जाना. विपदाओं को झेलकर परिवार चलाया. बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया, एक क्षण विश्राम नहीं किया कि बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएं, कमाने-खाने लगें. आज जब वक़्त आया, दोनों भाई काम करने लगे, भाभियां आ गईं तो मां पर ऐसा दोषारोपण..!
मन तो हुआ कि भाभी को करारा जवाब दे दूं. एक-एक कलई उतार दूं कि आज तुम जिस स्थिति में हो, यह सब मां की देन है. मां इतनी तपस्या नहीं करतीं तो बड़े भैया प्रोफेसर न होते और न छोटे इंजीनियर, लेकिन भैंस के आगे बीन बजाने से फ़ायदा क्या? इनके मट्ठर दिमाग़ में कुछ घुसेगा ही नहीं, उल्टे मुझे ताने देंगी.
क्या सोचकर मैं मायके आई थी कि एक हफ़्ता आराम से कटेगा, भाभियों के साथ सैर-सपाटे करूंगी, मां के पास बैठूंगी, क़िस्से-कहानियां सुनूंगी. सब धरा रह गया. किसी को यहां बात करने की फ़ुर्सत ही कहां? बड़े भैया तो बड़े भैया, छोटे भैया भी उखड़े उखड़े दिखे.
क्या हो गया इस घर को? कितना बदल गया. ये कमरे, ये दीवारें, ये खिड़कियां, जो कभी मेरी आहट सुन जाग उठती थीं, आज इतनी पराई कैसे हो गईं कि छूने से ही मन कंपकंपा गया.
बड़े भैया एक क्षण भी मुझे चिन्तित देखते तो बेचैन हो जाते. तुरंत गले लगाकर कहते, "चल पिक्चर चलते हैं." पिक्चर की बात सुनते ही सारी चिंताएं एक झटके से उड़ जातीं. मैं उछलकर कहती, "चलो भैया." आज वह सब सपना सा लगा, बड़े भैया को एक हफ़्ते से मुझसे बात करने की फ़ुर्सत नहीं मिली. तभी छोटी भाभी पैर पटकती हुई आईं, "मेरा पर्स देखा है मीरा..?"
"कैसा पर्स?" अचकचा कर मैंने पूछा.
"अरे पर्स नहीं जानती? छोटा है, नीला. अक्सर मैं लिए रहती हूं. अभी बाज़ार से आई, कपड़े बदले और गायब..?"
"वहीं कहीं होगा भाभी, देखो... मुझे क्या मालूम?"
"मांजी से पूछा..?" बड़ी भाभी बीच में बोल पड़ीं, "ज़रूर मांजी ने लिया होगा."
"हां... शक तो मुझे उन्हीं पर है..." ये शब्द मुझे कांटे से चुभ गए. मैं चींख पड़ी, "कैसी बात करती हो? शर्म नहीं आती? मां पर कीचड़ उछालती हो? बूढ़ी, असहाय हैं तो इसके मायने यह नहीं, कुछ भी कहो."
"अरे सब बहाना है. जब भी कोई चीज़ खोती है, मांजी तबीयत ख़राब कह, पड़ी रहती हैं. कई बार मैंने चोरी करते पकड़ा है."
"क्या चोरी की... बोलो?"
"अरे, तुम तो ऐसे चीख रही हो, जैसे मांजी सती सावित्री है."
"हां हैं... इसमें क्या शक है."
"अगर मैंने चोरी पकड़ दी तो..?"
"यह नहीं हो सकता. मैं नहीं मान सकती... मां चोरी नहीं कर सकतीं. आप झूठ बोलती हैं." इतना कहकर मैं आ गई. मां के पास बैठ गई. मां वैसी ही उदास, ख़ामोश बैठी थीं.
"मां, ये तुम पर कैसा दोष मढ़ रही है. तुम कैसे यह सब सुनती हो? चुप क्यों हो मां... बोलो... मुझसे यह सब नहीं देखा जाता."
मेरी बात मां ने सुनी ही नहीं. वह निश्चल बैठी रही. भाभियों के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ अब भी आ रही थीं.
"मांजी का अलग इंतज़ाम कर दो. एक कमरे में रहें, अपना खाएं-पिएं, अब बर्दाश्त नहीं होता."
मेरे आंसू आ गए. मैंने सिसकते हुए कहा, "मां, तुम क्यों इनकी खरी-खोटी सुनती हो? ये घर तुम्हारा है. ये तुम्हें निकालने वाले कौन होते हैं?"
मां लंबी निश्वास भर कर रह गईं. मुझसे चुप नहीं रहा गया, मैने पुनः कहा, "मां, बड़ी भाभी, छोटी भाभी कैसी बातें करती है, तुम पर चोरी का इल्ज़ाम लगाती है. तुम कैसे सहन करती हो? मुझसे यह नहीं देखा जाता,"
"कहने दो बेटी, मैं तो कुछ ध्यान ही नहीं देती. एक कान से सुन दूसरे से निकाल देती हूं. अपने आप शान्त हो जाएंगी. मेरा क्या? सब उन्हीं का है... भगवान अब न जिलाए... बहुत जी लिया बेटी..."
"मां कैसी बात करती हो? ऐसी अशुभ बात मत निकालो. आज तुम्हारे दोनों बेटे अच्छी नौकरी पर हैं, कमाते-खाते हैं. दोनों बेटियां ससुराल में सुख से हैं. क्या दुख है तुम्हें?"
मां ने सरसरी नज़र से मुझे देखा, जैसे मुझे कुछ ज्ञात न हो. एक क्षण को मेरा माथा ठनका, कहीं दीदी... नहीं, उसकी शादी तो बड़ी धूमधाम से हुई थी. जीजाजी जैसा व्यक्तित्व और लेखक..! मुझे लगा, मां कुछ कहते-कहते रुक गई है. शब्द गले में कहीं फंस गए हैं.
"मां कुछ तो बोलो... तुम्हारा चुप रहना ही तुम्हारे दुख का कारण है. तुम क्या हो? यह क्यों नहीं सोचती? इस घर की असली मालकिन तुम हो. इस घर में बिना तुम्हारी इच्छा के बड़े भैया ने कैसे घर का बंटवारा कर लिया? क्या सुख मिला तुम्हें अपने बेटों से? आज तुम्हें पिताजो की पेंशन नहीं मिलती तो ये तुम्हें खाने को नहीं पूछते. तुम किसी की एहसानमंद नहीं हो. पेंशन तुम्हें मिलती है, जो तुम्हारे दो वक़्त के खाने के लिए पर्याप्त है. तुम क्यों इनकी बकवास सुनती हो?"
"बेटी, अपनों से क्या झगड़ना? मुझे अब करना क्या है? भगवान से एक ही बिनती है, मौत दे दे... बहुत जी लिया."
"फिर वही बात... मां तुम ऐसा अशुभ क्यों सोचती हो? भैया अगर तुम्हें रखने से कतराते हैं तो दीदी और मैं तो हूं ही. बेटियों का भी तो कुछ फर्ज़ होता है. मेरे साथ चलो, बहुत आराम से रहोगी, तनिक भी तकलीफ़ नहीं होगी. मैं तर जाऊंगी मां... चलो मेरे साथ... छोड़ो यहां का झमेला..."
"नहीं बेटी... मेरी डोली इसी घर में आई थी, अर्थी भी यहीं से उठेगी." मां अपने निश्चय पर अटल रहीं. मेरे आंसू आ गए.
"तुम क्यों रोती हो बेटी? तुम तो बड़े सुख से हो."
"ऐसा सुख भी किस काम का मां? मुझसे तुम्हारा दुख नहीं देखा जाता, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी तो नहीं कर पा रही."
"छोड़ मेरी चिंता... मेरा क्या? इतने दिन कट गए, कुछ और कट जाएंगे." मां ने उठते हुए कहा, "मैं मंदिर जा रही हूं... तू भी घूम आ... जा..." मां को जाते मैं देखती रह गई. कितना और निचुड़ेगी मां? बड़ी-बड़ी आंखें कैसी घंस गई हैं. पूरी देह काली पड़ गई. सिर के आधे बाल झड़ गए... एक-एक हड्डी दिखने लगी.
मां का वह रूप मुझे याद हो आया, जब हम शिमला गए थे. मैं उस समय छोटी थी, छह में पढ़ती थी. छोटे भैया आठ में और बड़े भैया दस में थे. मां का सौन्दर्य देखते बनता था. साड़ी ब्लाउज़ बदन पर ऐसी फबती कि देखने वाले चकित रह जाते. चार सन्तान की मां होने की कल्पना कोई कर न पाता, मां का अंग-अंग तराशा सा था, चंदन-सा गमकता था, लेकिन पिताजी की अकस्मात मौत ने मां को बहुत जल्दी निर्बल कर दिया.
पिताजी अच्छे-भले एक शादी में सम्मिलित होने लखनऊ गए थे. लौटते समय बस का एक्सीडेंट हो गया. आठ लोग स्पॉट पर ही ख़त्म हो गए. उनमें से पिताजी भी एक थे. इस दर्दनाक ख़बर ने हम सब के होश उड़ा दिए. मां को जैसे लकवा सा मार गया था, आंखें पथरा सी गई थीं. मां मौन बैठी रहतीं, किसी से एक शब्द नहीं बोलतीं. हम सब डर गए कि कहीं मां चल न दें. बहुत समझाने-बुझाने पर मां ने मौन तोड़ा, दवाइयां लीं. महीनों ठीक होने में लग गए. लेकिन चेहरे पर कान्ति नहीं आई, पिताजी की मृत्यु के साथ ही विलीन हो गई.
पिताजी हम सबकी शादी कर गए थे. बड़े भैया की नौकरी लग गई थी. छोटे भैया का पॉलीटेक्नीक का डिप्लोमा मां ने पूरा कराया. उसकी पढ़ाई में उन्होंने क्या कुछ नहीं किया। ज़ेवर भी गिरवी रख दिए थे. चार-पांच वर्ष तक घर में सब ठीक चला, बहुओं का सुख भी मां को मिला. परिवार के हर सदस्य ने मां का ख़्याल रखा. उन्हें किसी बात की तकलीफ़ नहीं होने दी. मैं दो-तीन बार मायके आई, मां को ख़ुश देखा.
लेकिन इस बार घर में प्रवेश करते ही माथा चकरा गया. एक-एक ईंट को बदला हुआ पाया. बड़े भैया में ऐसा परिवर्तन आ सकता है, मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी. बडी भाभी को तो मैं पूर्व में ही समझ गई थी कि इनकी किसी से पटेगी नहीं, लेकिन घर में ऐसा तूफ़ान उठा देंगी, कल्पना के बाहर था.
बड़े भैया को सोचना था कि वे बड़े हैं. घर की सारी जवाबदारी उन पर है. कैसे कर्तव्योन्मुख हो गए? भाभी के कहने में आ गए. इन सब बातों ने मुझे उद्विग्न कर दिया. तभी छोटे भैया की आवाज़ कानों में पड़ी, "सुनीता, ये तो है तुम्हारा पर्स... खामखा सबको परेशान कर दिया."
"कहां मिला?" भाभी ने बाथरूम से ही पूछा.'
"तकिये के नीचे."
"देखो नोट पूरे है न..?"
"हैं... भई, फालतू इधर-उधर शक करती हो."
मैं यह सुनकर चकित रह गई. अजीब हैं ये लोग... मां का इन्हें ज़रा भी विश्वास नहीं, कितना नीचे गिर गए. बड़ी भाभी की अंगूठी भी वहीं कहीं होगी. कुछ होश रहता नहीं. मां से झगड़ने चली आईं.
दो दिन और ठहर कर मैं वापस आ गई.
चलते समय तक मां से चलने का आग्रह किया, लेकिन मां तैयार नहीं हुईं. बड़े भैया से चिंता व्यक्त कर दी थी कि मां का ख़्याल रखें. इन कुछ दिनों में मां कितनी कमज़ोर हो गईं. किसी डॉक्टर से ज़रूर चेकअप करा लें. बड़े भैया ने हामी तो भर दी थी, लेकिन मैं जानती थी, वे कुछ नहीं करने वाले... भाभी के आगे उनकी चलती ही कहां?
एक दिन मैंने सुना कि मां की तबियत बहुत ख़राब है. मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती है. मैं दौड़ी हुई आई. मां बेहोशी की हालत में लेटी हुई थी. ग्लूकोज की बॉटल लगी थी. सभी की आंखें गीली थीं, मैं आशंका से कंपकंपा गई.
मां को एक क्षण को होश आया. मुझे देखते ही उनकी आंखों में अजीब सी चमक उभरी. मैं उनके सिरहाने जा खड़ी हुई. मां के होंठ बुदबुदाए, जैसे मुझसे कुछ कहना चाह रही हों, लेकिन शब्द गले में ही फंस कर रह गए.
एकाएक उनका सीना ज़ोर से धड़का. मां ने एक लंबी कराह भरी और सिर झटके से एक तरफ़ लुढ़क गया. कमरे में मुर्दानगी छा गई. सभी फूट-फूट कर रो पड़े. मैं निढाल गिर पड़ी. तभी दीदी ने मुझे संभाला और बाहर ले आईं. आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. दीदी की छाती से लगकर मैं सिसक पड़ी. तभी दीदी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "यह सब मेरे कारण हुआ मीरा. मैं दोषी हूं." मैं हतबुद्ध रह गई, "दीदी, यह क्या कर रही हो?"
"मीरा तुम्हें नहीं मालूम, जब ये सस्पेंड हुए, हम पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा. दाने-दाने को मोहताज हो गए. दोस्त-रिश्तेदार कोई काम नहीं आए. मां ने हमारी भरपूर मदद की. पैसा, राशन, दवा बराबर देती रहीं. इसके लिए उन्हें घर में खरी-खोटी भी सुननी पड़ी. चोरी का इल्ज़ाम भी मां पर लगा, लेकिन मां ने कभी मेरा नाम ज़ुबान पर नहीं लिया.
एक दिन बड़ी भाभी ने मां का अलग इंतज़ाम कर दिया और दिनभर उनकी चौकसी करने लगी... बस, मां की तबियत जो बिगड़ी, ठीक नहीं हो सकी. आज मां ने प्राण त्याग दिए. यह सब मेरे कारण हुआ मीरा, मैं ही दोषी हूं. भगवान ने मुझे क्यों न उठा लिया... मैं क्यों यह देखने को रह गई?" दीदी फूट-फूट कर रो पड़ीं.
"सब्र करो दीदी, इसमें तुम्हारा क्या दोष? होनी को कौन जानता है? मां की मौत आ गई थी, चली गईं." मैंने दीदी के आंसुओं को पोंछते हुए कहा. लेकिन भीतर भंवर मंथता रहा. मां ने ऐसा क्यों किया? चोरी-छिपे दीदी की मदद क्यों की? खुलकर भी तो कर सकती थीं....
- योगेश दीक्षित
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