मेरे दिमाग़ के दो हिस्सों में लड़ाई छिड़ी हुई थी, एक हिस्सा चाय पिलाने की हिमायत कर रहा था और दूसरा कोई बहाना बनाकर टालने की...
अहा! एक बेहतरीन बहाना सूझ गया- चायपत्ती ख़त्म' कहकर कोल्ड ड्रिंक मंगवा लेती हूं, एक-एक बोतल पकड़ा दूंगी, बर्तनों का बवाल ही नहीं.
बेटे के दोस्तों से मैं बड़े उत्साह से मिल रही थी, "मां, ये लोग आपके हाथ की स्पेशल चाय पीने आए हैं. ये सुनील है, ये रोहन और ये..."
आख़िरी नाम सुनते ही मेरे उत्साह पर बाल्टी भर पानी पड़ गया. दनदनाते हुए पतिदेव के पास गई, "सुनिए, दोस्ती-यारी अपनी जगह है, लेकिन दूसरे धर्म के दोस्तों को घर बुलाकर खिलाना-पिलाना... आपको पता है ना ये सब नहीं अच्छा लगता है मुझे!"
" हां, पता है.. तुम्हारे मायके में भी यही नियम था, अलग बर्तन रहते थे... बकवास! बाहर निकलो पुरानी बातों से. कोचिंग से सीधे आ रहे हैं बच्चे, कुछ दो इनको." ये आदतन बड़बड़ाए.
मेरे दिमाग़ के दो हिस्सों में लड़ाई छिड़ी हुई थी, एक हिस्सा चाय पिलाने की हिमायत कर रहा था और दूसरा कोई बहाना बनाकर टालने की...
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अहा! एक बेहतरीन बहाना सूझ गया- चायपत्ती ख़त्म' कहकर कोल्ड ड्रिंक मंगवा लेती हूं, एक-एक बोतल पकड़ा दूंगी, बर्तनों का बवाल ही नहीं. अपने को शाबाशी देते हुए मैं बाहर कमरे में आई.
"क्या हुआ मां?.. चाय?"
भूखे-प्यासे बच्चों को देखते ही कोल्ड ड्रिंक वाली बात गले में ही अटक गई. मन अजीब सा हो गया और दो धर्मों की आपसी लड़ाई में एक तीसरा धर्म जीत गया, "चाय बाद में, पहले सब लोग हाथ धोकर डायनिंग-टेबल पर आओ, खाना लगा रही हूं."
- लकी राजीव
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