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कहानी- लिख कर फाड़ी गई चिट्ठी… (Short Story- Likh Kar Fadi Gayi Chitthi…)

"तुमसे तीस दिन के अलगाव ने ही मेरे सोचने का नज़रिया कुछ बदल दिया है. न तो वह प्यार था, न ज़िस्मानी ज़रूरत, न अधेड़ावस्था का भावनात्मक लगाव. वह केवल वासना थी."

मुझे नहीं मालूम, तुम्हें मेरे पत्र की प्रतीक्षा है या नहीं. न ही यहां आने के बाद मैं यह निर्णय ले सका कि मुझे तुम्हें यूं पत्र लिखना चाहिए या नहीं. फिर भी मेरे भीतर का खोखलापन मुझे लगातार कचोटता रहा कि मैं तुम्हें पत्र लिखूं.

अभी पिछले दिनों मैं दौरे पर था. एक विचित्र दृश्य मैंने गांव के रास्ते पर देखा. एक मरियल-सा कुत्ता, एक कुतिया के पीछे सूंघता हुआ लगातार आक्रमण की कोशिश में था. मैंने रुककर सारा नज़ारा देखा. मेरे ख़्याल में वह पहले वाला कुत्ता अपनी कोशिश में ज़रूर कामयाब हो जाता, अगर दूसरा कुत्ता गुर्राता हुआ न आता. जानवर भी आदमी की तरह सोचने लगे हैं. पहले वाले कुत्ते ने दूसरे कुत्ते की गुर्राहट में न जाने क्या देखा-सुना कि चुपचाप किनारे हो लिया, कुतिया भी असहाय भाव से समर्पण कर बैठी.

मुझे लगा, हम भी कहीं इस दृश्य में हैं या हो सकते हैं या थे, लेकिन अब नहीं होंगे.

जबलपुर और इन्दौर में कोई ख़ास फ़र्क़ मुझे नज़र नहीं आता, रहन-सहन, खान-पान में मामूली अंतर है, लेकिन आदमी की अंतिम सोच एक जैसी है. -हर जगह स्थिर, सामाजिक और पारिवारिक मूल्यहैं. व्यवस्थाओं की बनावट एक-सी है. एक सहमा-दबा विद्रोह हर किसी के भीतर है, जो अपने से कमज़ोर पिण्ड पर ही टूटता है.

तुमने एक बार कहा था, "राहुल, हो सकता है यह प्यार न हो, ढलती उम्र का अनिवार्य भावनात्मक लगाव हो या जिस्मानी ज़रूरत हो." तब मैं ऐसी बातों के विश्लेषण की स्थिति में नहीं होता था, क्योंकि तुम केवल तुम मेरे सामने होती थी. उस छोटे-से वक़्त में जितना बड़ा वक़्त मैं जी लेना चाहता था, जी लेता था.

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तुमसे तीस दिन के अलगाव ने ही मेरे सोचने का नज़रिया कुछ बदल दिया है. न तो वह प्यार था, न जिस्मानी ज़रूरत, न अधेड़ावस्था का भावनात्मक लगाव. वह केवल वासना थी.

सुधा अक्सर तुम्हें याद करती है. याद क्या करती है, मुझे तुम्हारी याद दिलाने की कोशिश करती है.बबली और अंशु भी अपनी माथुर आंटी को याद करते हैं. मेरे ख़्याल में अपेक्षा और दीक्षा भी हमें याद करती होंगी. पिछले हफ़्ते माथुर साहब के मिले पत्र में संक्षिप्त रूप में ऐसा ज़िक्र था.

माथुर साहब जैसा अनुशासित, व्यवहारकुशल और बुद्धिमान प्रशासनिक अधिकारी मैंने जीवन में कभी नहीं देखा, न ही देखना चाहता हूं. समान पद पर रहते हुए भी मैं उनका सम्मान करता हूं, क्योंकि उनके यही गुण उनके पारिवारिक जीवन में लागू होते मैंने देखे हैं.

फ़ुर्सत में अक्सर मैं सोचता हूं, पहल कहां से हुई थी तुमसे या मुझसे? शायद एक साथ दोनों से. फिर परिणाम क्या हुआ? जिस काम को हम एक झटके मेंअंज़ाम दे सकते थे, उसकी भूमिका हम दो साल तक क्यों बांधते रहे? हम भयभीत थे. मैं सुधा से और तुम माथुर साहब से, लेकिन माथुर साहब की मौन और सुधाकी स्पष्ट स्वीकृति पढ़ लेने के बाद भी हम उसी रूटीन पर रहे. बढ़ते, समझदार होते हुए बच्चों की वजह से था कि हम एक- दूसरे पर संदेह कर रहे थे या प्रतीक्षा कि अब वास्तविक पहल कौन करे? तुम सोचती होगी, पुरुष होने के कारण यह उत्तरदायिल मेरा है. मैं सोचता था, अगर तुम्हें मेरी ज़रूरत है तो यह उत्तरदायित्व तुम्हारा है, लेकिन थोड़ा फ़र्क़ था. तुम्हें अपने पति के विकल्प की पूरी संभावना मेरे व्यक्तित्व में दिखती थी. मैं तुम में ही सुधा देख लेता था. मैं यह नहीं कह रहा कि तुम में भटकाव था. मुझमें नहीं था.

घंटों फोन पर बतियाते नए प्रेमियों जैसी बातें, बीच-बीच में खुसुर-पुसुर उन दिनों सचमुच जीवन को आंदोलित करती थी. ऐसा क्यों होता है, मैं कभी नहीं समझ सका. संभव है, बहुत सुख एक साथ भोग लेने की लालसा, मगर पैतालीस -पचास की उम्र में वैसी अनुभूति हासिल कर पाना भी साधारण बात नहीं, जो हमने की थी. बस, इसी उपलब्धि के सहारे हम बढ़ते रहे.

माथुर साहब के पत्र के उत्तर में मैंने लिखा था, आदरणीय भाभीजी को मेरा प्रणाम कहिएगा. यहपढ़कर माथुर साहब मुस्कुराए होंगें.

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शायद तुम्हें भी अजीब लगा होगा. उम्र और 'ऐसे' संबंधों के मामलों में तुम मुझे अमृता प्रीतम का उदाहरण देती थी. मैं गांधीजी का उदाहरण देता हूं, जब उन्होंने ब्रह्मचर्य धारण कर लिया था, तब वे 'बा' को, अपनी पत्नी को, मां कहने लगे थे. उस दर्शन का अनुसंधान या विश्लेषण करने की क्षमता मुझमें नहीं, लेकिन सारी दुनिया ऐसी बातों को सामाजिक विकृति के रूप में नहीं लेती, क्योंकि अमृता प्रीतम या गांधी, जीवन की तमाम सूक्ष्मताओं से गुज़रे सफल यात्री थे.

मैं पूछता था, इस संबंध का अंत क्या होगा?

तुम कहती थी, यह एक अंत का अंत है. यानी एक अंतहीन सिलसिला था यह.

मैंने सच्चे मन और पूरे सच से तुम्हें विदुषी स्वीकारा है. तुम्हारा शरीर मेरा लक्ष्य नहीं था. अलबत्ता तुम्हारी संगमरमरी कमर का गुलाबी तिल मेरे अचेतन की एकमात्र उपलब्धि थी है. तुम कहती थीं, यह सौंदर्यबोध की चरमसीमा है. यह भाव तीव्र रूप से टैगोर और निराला में भी था. यह अपने अपने स्तर की तुलना थी.

इतने दिनों तक हम एक ही जगह फुसफुसाहटों पर रुके रहे. आख़िर क्यों? हमारे ऊपर घर-गृहस्थी के प्रति कर्तव्य थे या हम भी मन में कमज़ोरी लिए वहीं रुके रहना चाहते थे. काश! कि हम वहीं रुके रहते. तुमने भी शायद ऐसा चाहा हो, मगर ज़ाहिर कभी नहीं होने दिया, अपने-अपने घर को टूटने से बचाए रखने की कोशिश थी यह.

तुम कहती थी, हमने अभिजात्यता का आवरण ओढ़ रखा है. मेरे संस्कार इसे नहीं स्वीकारते थे. अगर माथुर साहब और मैं प्रशासनिक अधिकारी न होकर, सरकारी बंगलों के वाशिंदे न होकर झोपड़ों के रोज़मर्रा के मज़दूर होते तो इस संबंध की नियति क्या होती? सुधा तुम्हारे बालों का झोंटा पकड़कर गाली देते हुए कहती, "मेरी गृहस्थी में क्यों आग लगा रही है? अपने मर्द से क्या तेरा बदन नहीं संभलता?" तुम कहती, "चुड़ैल, घर-गृहस्थी की इतनी फ़िक्र है तो अपने ख़सम को क्यों काबू में नहीं रखती?"

मैं जानता हूं, मेरी इन बातों का तुम कतई बुरा नहीं मानोगी, न ही अन्यथा लोगी. तुम्हारे स्वभाव की यह खूबी मुझे बहुत अच्छी लगती है. अक्सर पार्टियों में, अकेले में मौक़ामिलते ही तुम मेरे घुंघराले बालों में अपनी उंगलियां फिराने से बाज नहीं आती थीं और न मैं तुम्हारे शकमर के तिल को चिकोटी काटने से ख़ुद को बचा पाता था. हमारी ये हरकतें ठीक है? क्या हम समाज में गंदगी नहीं बनते जा रहे? तुम कितने निश्चिन्त स्वर में कहती थीं, "ठीक और ग़लत केजाल में मत पड़ो राहुल. तुम्हारी यह तर्कहीन बात कभी मेरे गले नहीं उतरी, कोशिश की तो सचमुच अपना घर तोड़ बैठोगे और मेरा भी. क्योंकियह जाल हमारे तुम्हारे लिए नहीं बना है."

तब मुझे लगा था कि हमारे अलग-अलग अस्तित्व भी हैं. एक मेरा घर!है, एक तुम्हारा. इस संबंध में मैंने सुधा से स्पष्ट बात की थी तो वह हंसते हुए बोली थी, "मैं तो 'सिलसिला' की जया भादुड़ी हूं. मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला." मुझे और तुम्हें लेकर कितनी बेफ़िक्र थी वह, जैसे इस सबका कोई वजूद ही न हो.

तुम भी अनमनेपन से यही कहती थीं, "राहुल, हमारा यह संबंध या प्यार कभी किसी भी नज़रिए से घातक नहीं हो सकता और सचमुच नहीं हुआ. क्यों नहीं हुआ के चक्रव्यूह में अब तक भटक रहाहूं.

तुम नहीं कहती थीं, घातक होता है टीनएज का

प्यार, जिसमें तुम 'मेरा नाम जोकर' फिल्म का हवाला देती थीं मनोज कुमार, सिम्मी और ऋषि कपूर वाले दृश्य का. इस हद तक मैं कुछ समझ सकता था, लेकिन तुम्हारे कई समझ न आने वाले शब्दों में यह भी शामिल है. यह हमारी शारीरिक मांग नहीं है तो फिर क्या है? ऊब नहीं हो सकती?मैं आज्ञाकारी बच्चे की तरह तुम्हारी हर ऐसी बातन समझते हुए भी मानता चला गया. हालांकि मैं तुम्हारे सम्मोहन में नहीं था, यह तुम भी स्वीकारती थीं,

प्रेमिका और पत्नी में यही अंतर होता है शायद, जो तुममें और सुधा में होना चाहिए. सुधा के दिलकी हर बात मैं बख़ूबी समझ सकता हूं, तुम्हारे दिल की नहीं. हालांकि मुझे भी इस बात का यक़ीन नहीं होता, लेकिन यह सच है कि सुधा से ज़्यादा रोमांटिक वक़्त मैंने तुम्हारे साथ गहराई और मूड से गुज़ारा है.

यहां तबादला होते होते मैंने तुमसे आख़िरी बार पूछा था.

"सरल, तुम्हें यह बात कभी कचोटती नहीं कि तुममाथुर साहब जैसे पति के साथ विश्वासघात कर रही हो? स्त्री के लिए समाज द्वारा निर्मित सीमाओं का उल्लंघन कर रही हो?"

तब मैंने पहली बार तुम्हें भावुक होते और गम्भीर देखा था. इस मामले में तुम्हारे इस संक्षिप्त जवाब का विश्लेषण मैं संभवतः कभी नहीं कर पाऊंगा. "शायद हां, शायद नहीं."

यानी तुम्हारे मन में भी कहीं द्वंद्व था. यह अलग बात थी कि मेरे जैसा व्यापक नहीं था. काम से फ़ुर्सत के बाद मेरे पास सोचने को बस यही सवाल था, लेकिन इस दौरान मुझे सुधा ने कभी यह सोचने नहीं दिया कि मैं घर से, परिवार से, बच्चों से, उनके उत्तरदायित्व से कटता जा रहा हूं. मुझे लगता है, इस वक़्त सुधा ने पति की भी भूमिका निभाई थी.

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शायद हां, शायद नहीं. के दूसरे दिन जब तुमने यह कहा था, "सच जानना राहुल, मैं ख़ुद भी सतही तौर पर अपने इस संबंध को केवल स्वभाविक समझती रही, लेकिन तुमने जो पुरुष प्रधान अहम् सवाल किया था, जिससे पुरुषत्व झलक रहा था, मेरे नारीत्व को झंझोड़कर रख गया. अब मेरे जीवन में कोई राहुल नहीं आने पाएगा. तुम पहले और आख़िरी राहुल थे. तुम्हारे इस तरह मेरे भीतर प्रविष्ट होने की पूर्ण वजह थी. माथुर साहब का अपने काम मेंइतना बिजी हो जाना कि मैं अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगी. लच्छेदार बातें, रूप-सौन्दर्य, व्यावहारिक प्रशंसा, जो माथुर साहब से सुनने की अपेक्षा रखती थी, तुमसे मिली. इसका यह मतलब कतई नहीं समझना कि तुम मेरे 'पार्ट टाइम हसबैंड' हो गये थे. एक अच्छा मित्र होने के नाते मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूं, मैं माथुर साहब को राहुल की सुधा बनकर दिखाऊंगी."

मुझे बेहद शांति मिली थी. कि हमने कोई ग़लती अगर की भी थी तो उसकी इससे बेहतर सुखद समाप्ति नहीं हो सकती थी.

तुम्हारा, 

राहुल

- भारत भूषण श्रीवास्तव

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