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कहानी- बकासुर (Short Story- Bakasur)

"जो असमर्थ है. मेरी बेटी को अपने बलबूते पर ख़ुद कमा कर सुख से नहीं रख सकता, उसे मुझे बेटी नहीं देनी. और जो समर्थ है, सब सारा सामान ख़ुद जुटा सकता है, पर भीख मांग रहा है, तो ऐसे भिखारी को भी मुझे बेटी नहीं देनी. मेरी बेटी में सभी योग्यताएं हैं. उसे सिर्फ़ उसके लिए ही जो चाहेगा, उसे ही मुझे बेटी देनी है." कहते कहते उसका मुंह तेज से चमक उठा.

सुबह की ट्रेन से रोहित आए हैं. परसों गए थे और आज सुबह आ गए, पर लगता है सफ़र उतना छोटा नहीं बड़ा लंबा था. लगता है युग-युग से चलते आए हैं और बेहद थक कर चूर हो गए हैं. उनका थका उदास चेहरा देखकर नीरजा की सांस मानो कंठ में ही रुक गई है. चुपचाप पानी का ग्लास लाकर दे गई और चाय रखने रसोई में चली गई. कितने ख़ुश और हंसते हुए गए थे! क्या हो गया एक ही दिन में कि चेहरा इतना निस्तेज हो गया.

नीरजा के मन में धकधक्की लग गई, पर मन को समझाया थके आए हैं, थोड़ी नींद लेने दूं. चाय-नाश्ता कर तरोताज़ा हो जाएं, तो ख़ुद कुछ बताएंगे कि ऐसा क्या हो गया! अमृता भी सहमी सी हो गई है. चुपचाप पापा का गंभीर चेहरा देख कर मां का हाथ बंटाने की जगह अपने स्टडी रूम में चली गई और धीमे से दरवाज़ा बंद कर‌ लिया.

ठीक भी है, उसकी परीक्षा का अंतिम चरण है. डॉक्टरी आख़िरी साल का आख़िरी पेपर, वह डिस्टर्ब ना ही हो तो अच्छा है. नीरजा ने चाय की ट्रे लाकर पास के स्टूल पर धीमे से रख दी. रोहित पांव पसारे आंखें मींचे सीधे हाथ से माथा दबाते अधलेटी मुद्रा में पड़े थे. आहट पा कर उन्होंने आंखें खोल दीं. नीरजा का सकपकाया चेहरा देख कर फीकी हंसी हंसते हुए बोले, "और कैसा रहा? सब ठीक रहा न? अमृता का पेपर कैसा हुआ? ठीक हो गया न?"

"हां, उम्मीद तो बड़ी है. मेहनत भी काफ़ी की बेचारी ने, पर तुम बोलो-इतने थके हुए क्यों हो?" उतावली सी नीरजा ने पूछा.

"अरे, दो रात ट्रेन में बीती, ट्रेन में भला नींद आती है कहीं? थकूंगा नहीं? अब उम्र रह गई है क्या ऐसे सफ़रों की? लाओ, चाय दो और ज़रा गरम पानी कर दो नहा लूं, थोड़ा फ्रेश हो जाऊं." कहते हुए उन्होंने चाय का प्याला हाथ में ले लिया.

चुप सी नीरजा उठ गई. जानती है, जब बताना होगा, तभी बताएंगे. लाख वह कितनी पूछती रहे, शुरू से ही यह आदत है उनकी गुम हो जाने की. पहले तो कभी-कभी वह झगड़ती भी थी, पर अब धीमे-धीमे समझ गई है. ना पूछे पर फिर ख़ुद ही स्वस्थ हो कर धीरे-धीरे मन खोल देते हैं, पूछने पर, ज़ोर देने पर, तो उनके मन पर ताले पर ताले लगते चले जाते हैं, जिन्हें एक-एक कर खोलना कितना भारी हो जाता है- नीरजा जानती है.

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बाथरूम में गर्म पानी और कपड़े रख वह किचन में चली गई. जब तक नहाए-धोए, तब तक दाल-सब्ज़ी से ही निबट जाए तो पास बैठने का मौक़ा तो मिलेगा, नहीं तो वे फ़ुर्सत से होंगे और वह रसोई में खटपट करती होगी.

जल्दी-जल्दी दाल-चावल चढ़ा कर वह बाहर झांकने आई. रोहित नहा धोकर, फ्रेश हो कर धुला कुर्ता-पायजामा पहन कर आराम कुर्सी पर पसर गए थे. हाथ में आज का न्यूज़ पेपर था. वह भी पास में आ बैठी कुर्सी खींच कर. सेम की सब्ज़ी रोहित को बहुत पसंद है. ट्रे में भर कर ले आई थी. साथ में छोटा भगौना ले आई थी साफ़ कर-काट कर उसमें रखने को. धीमे-धीमे उसके रेसे खींचती कनखियों से कभी-कभी रोहित का चेहरा पढ़ने की कोशिश करने लगी, थोड़ी देर चुप्पी में ही बीती.

पेपर पलट कर रोहित ने ही कहा, "निरंजन मिला था. उसकी पोस्टिंग फिर सीमा पर हो गई है. फैमिली कहां किस पर छोड़े. लड़कियों की फाइनल परीक्षा का वक़्त है, ना जाते बनता है ना रहते. बड़ा परेशान था."

"अरे फिर तो बड़ी मुश्किल में पड़ गए. स्कूल, कॉलेज हैं भी कितनी दूर उनके घर से. एक भी बेटा होता, तो बीवी और दोनों बेटियों को उसके सहारे छोड़ जाते." सेम काटते हुए नीरजा ने कहा. आंखें उसकी नीचे झुकी हई फली पर ही गड़ी थी. कीड़े अंदर छिपे रहते हैं और ध्यान न दो, तो कटे बिन कटे फिर पेट में ही जाएंगे, सो कीडों से होशियार रहना है तो उन पर निगाह भरपूर रखनी ही है. उसे पता है अब रोहित ज़रूर कहेंगे, "हूं, बेटा क्या कर लेता? आज की बेटी क्या बेटों से कम हैं?" पर रोहित चुप पेपर पलटते रहे. सो हाथ रोक कर उसने आंख उठा कर गौर से उन्हें देखा.

भौंहें सिकोड़े वे पेपर पढ़ रहे थे सच यही लगता है बुढ़ापा आ गया है अब. माथे पर कितनी लकीरें आ गई हैं, पर ये लकीरें दो दिन पहले तो नहीं दिख रही थीं.

उसका जी किया उन्हें झिंझोड़ दे. चीख-चीखकर पूछे ऐसा क्या हो गया? यह क्यों नहीं समझते कि ऐसी चुप्पी कितनी जानलेवा होती है, पर अंदर से उठते हुए आवेग के तूफ़ान को उसने रोक लिया. फिर तो वह लाख सिर पटके, उनका मुंह नहीं खुलेगा. सो दो मिनट का धैर्य भला. सत्ताइस साल से साथ रहते-रहते इतनी ट्रेनिंग तो वह पा ही चुकी है.

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पर रोहित चुप्पी ही साधे बैठे रहे.

नीरजा ने जो थोड़ी सी सेम साफ़ कर ली थी, उन्हें छोटे भगौने में रखने को उठाया. भगौना छोटा था, पर मज़बूत व बड़ा सुंदर था. हाथ में उसे लेते ही मां की याद आ गई. बर्तन ब्याह के ख़रीदते वक़्त पिताजी से यही ज़ोर देती रही थीं कि देखो, टिकाऊ और मज़बूत चीज़ लेना, जो बेटी के काम आ सके. और सच मैंने उनका दिया सब सामान आज इन सत्ताइस सालों में भी वैसा ही नया रखा है.

सच तब कितना अच्छा-बढ़िया व टिकाऊ सामान मिलता था और भले ही तब नहीं लगता था, पर आज कितना सस्ता लगता है. उसके ब्याह की पांचों भारी साड़ियां असली जरी की थीं और वह भी डेढ़-दो सौ में पड़ी थीं. अब असली जरी तो सपना हो गई. झूठी ही मिलती है और वह भी हज़ारों रुपयों में. तब बर्तनों में मां ने ज़्यादा पैसे नहीं डाले थे. उसी समय तब स्टेनलेस स्टील नया-नया चला था. कांच का डिनर सेट भी आया था, जिसे उसने आज तक संभाल कर रखा है. उन बर्तनों से उसकी गृहस्थी की गाड़ी अभी तक मज़े से चल रही है. ज़रूर बढ़ोतरी हुई है. मेले माइन का सेट आ गया. नए नए डिज़ाइन के कांच के बर्तनों से आलमारी भर गई. कुछ हज़ारों में ही उसका आठ-नौ तोले सोने का सेट बन गया था, तब डेढ़ हज़ार तनख्वाह पाने वाले सरकारी अफ़सर बड़े ऊंचे पे (वेतन) वाले माने जाते थे और इससे ज़्यादा अपनी बेटी को वह क्या दे सकता था. प्रॉविडेंट फंड से रुपया ले कर खींचतान करते भी तेरह-चौदह हज़ार लग गए थे और पिताजी उन दिनों कितना परेशान रहते थे.

एक बार वह मां से लड़ भी पड़ी थी.

"मां, यह रिवाज़ क्या है? अरे बेटी का नया घर बन रहा है. ठीक है. बर्तन‌ और थोड़ी बहुत मदद चाहिए. पर यह बताओ कि यह इक्कीस साड़ियां दहेज़ में और सास के जेवर यह सब क्यों?"

धीमी हंसी हंस कर मां ने कहा था, "यह सब तो उनका नेग है."

"अरे, नेगों की सीमा है क्या? बनाते जाओ-बनते जाएंगे."

"भई सास को अपने बेटे के ब्याह में ससुराल के दिए साड़ी-ज़ेवर पहन कर बहू का स्वागत करना होता है तो उसे तो देना ही है." उसे समझाते हुए मां ने कहा था.

"पर क्यों मां? क्या उसका पति इतना बेकार है कि अपनी बीवी के लिए अपने बेटे के ब्याह में एक अच्छी साड़ी नहीं ख़रीद सकता, जिसे पहन कर वह बेटे की‌ बहू का स्वागत कर सके और तुम जो कहती हो कि बाकी साड़ियों ससुराल में जो-जो मेहमान आते हैं, वे रिश्ते नाते वालों को बांटते हैं, सो भला क्यों? उन्होंने आ कर उपहार दिए, सो जब उनके घर में काम होगा, तो उन्हें भी मिल जाएगा. पर यह क्या उनके उपहार के बदले इसी वक़्त उन्हें करो और वह भी अपनी जेब में से नहीं, वधू पक्ष से कराएं. यह सब कैसी रीतियां हैं?" झु़झला कर उसने पूछा था.

बचपन से ही वह बहुत तेजस्वी रही है. हर अन्याय के आगे झट लड़ने को आतुर. बेटी के उत्तेजित चेहरे को देख मां ठंडी सांस ले उठ खड़ी हुई थी.

"नहीं, मां, नहीं, जैसे सती प्रथा रुकी, हिंदू कोड बिल बना इसे भी रोकना है. हिम्मत तो करो."

एक क्षण मा ने बेटी को गौर से देखा. हौले से माथे को चूम कर फिर उठते हुए कहा, "करना बेटा, हिम्मत करना. नई पीढ़ी पर ही तो हम पुराने लोग आस लगाते हैं. तुम्हारे ज़माने तक शायद यह सब ख़त्म हो जाए, भगवान करें, आशीर्वाद देती हूं."

... और बेटी गोद में आने पर नीरजा ने मां की बात रखी, अपनी इकलौती बेटी को उसने बड़े चाव से डॉक्टरी पढ़ाई.

उसने देखा है- एक लड़के का पिता अक्सर उसकी पढ़ाई पर किए गए ख़र्चे का हवाला दे कर शादी में क्या मिलेगा के लिए परेशान रहता है. वह इस बेतुकी बात पर हैरान सोचती रही है- बेटे को ऊंची पढाई कराई तो अब कमाई तो बेटे वाले के घर ही जाएगी. कोई कमा कर अपनी पत्नी का तो घर नहीं भर रहा. फिर उस पढ़ाई का ख़र्च पत्नी के घर से क्यों मांगा जाता है. और रही ताज़िंदगी पत्नी को खाना खिलाने का ख़र्च तो क्या उस बिना तनख्वाह की नौकरानी फिर कुल चलाने वाली से वह सब क्या ज़्यादा ही वसूल नहीं हो जाता? सो यह ख़र्च की मांग क्यों? आज उसकी बेटी डाक्टर बन रही है. वह कमाएगी तो अपनी ससुराल में ही देगी. ब्याह पीछे- ऐसे में तो लड़की वालों को पढ़ाई का ख़र्च मांगने का हक़ है भी, पर ऐसा तो लड़की वाले सोच भी नहीं सकते. क्या यह सरासर अन्याय नहीं? तिक्त मुस्कान नीरजा के होंठों पर आ गई. उसका ध्यान फिर सेम की फली पर चला गया. सच कितनी ख़राब है. रोहित की पसंद के मारे ले ली और अब इतने कीड़ों से भरी दिख रही है. काटने को चाकू उसने लिया ही था कि अचानक रोहित ने कहा, "लाल साहब के घर भी हो आया हूं."

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चौंक कर नीरजा ने मुंह उठाया. चुप देखती रही. एक मिनट मौन के बाद रोहित ही फिर बोले, "कह रहे थे. हमारे पास बर्तन आदि काफ़ी हैं. लड़के को इलेक्ट्रॉनिक का बड़ा शौक है, सो उसकी जगह उसे कलर टी.वी. दे दें, तो अच्छा है."

हकबका कर नीरजा बोल उठी, "पर इतनी महंगी चीजें बर्तनों की बजाय कहां से आ सकती हैं? ये तो बड़ी महंगी होती हैं और बर्तन तो रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ें हैं. आज साथ रह रहा है, पर ट्रांसफर की नौकरी है- चार दिन बाद तबादला हो जाने पर यही चीज़ें कितनी ज़रूरी हो जाएंगी."

"और हां! कहते हैं, उनके शहर से ही शादी की जाए, वह भी शहर के सबसे बड़े होटल में." आंख गड़ा कर गौर से नीरजा के पीले पड़ते मुख को देखते हुए उन्होंने कहा. सन्न सी नीरजा बैठी रह गई.

सेम में से कीड़ा बिलबिला कर नीरजा की उंगली पर चढ़ गया था. चौंक कर नीरजा ने उसे दूर झटक दिया. इतने सालों में ख़त्म होने की जगह दहेज़ का राक्षस बकासुर बन गया है. मुंह फाड़े बैठा है. भक से डालते जाओ, डालते जाओ, पर उस डालने का अन्त नहीं

और उसे मां की याद आई, "करना बेटा, हिम्मत करना. नई पीढ़ी पर ही तो पुरानी पीढ़ी आस लगाती है."

मुंह उठाकर उसने पूछा, "तो फिर क्या जवाब दे आए?" रोहित चुप रहे. प्रश्न पूछती दृष्टि से उसे ही देखते बैठे रहे. नीरजा ने अमृता के कमरे की ओर दृष्टि डाली. अमृता के कान भी इसी ओर लगे थे. तभी दरवाज़ा खोले वह सामने ही खड़ी थी, सब सुन चुकी थी.

अमृता का मुंह फीका हो गया था. नीरजा को एक क्षण याद आया. अमृता को लड़के से मिलवाया था. उसे पसंद आ गया था, पर यह मांगें! ये अनुचित अपेक्षाएं!

उसने झुक कर सेम की थाली ज़मीन पर रख दी. खड़ी हो कर एक निगाह अमृता पर डाली और फिर रोहित पर. दोनों सन्नाटा साधे उसे देख रहे थे.

"जो असमर्थ है. मेरी बेटी को अपने बलबूते पर ख़ुद कमा कर सुख से नहीं रख सकता, उसे मुझे बेटी नहीं देनी. और जो समर्थ है, सब सारा सामान ख़ुद जुटा सकता है, पर भीख मांग रहा है, तो ऐसे भिखारी को भी मुझे बेटी नहीं देनी. मेरी बेटी में सभी योग्यताएं हैं. उसे सिर्फ़ उसके लिए ही जो चाहेगा, उसे ही मुझे बेटी देनी है." कहते कहते उसका मुंह तेज से चमक उठा.

अमृता को देखते हुए उसने पूछा, "ठीक है न, अमृता?" अमृता ने दौड़ कर मां को गले से लगा लिया. उसकी नई पीढ़ी ने. बकासुर को मारने के लिए नए युग की कुंती के आह्वान को स्वीकार कर लिया है.

- उषा भटनागर

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