अब एक तल्खी जाग उठी थी दोनों बहनों के बीच में. बस हमेशा इसी तरह होता था. सीमा कुछ देर बड़े सब्र से, मन मार कर, बहन की बातें सुनती रहती थी. अन्त में, उससे सहन नही हो पाता था और किसी बात पर उसे उलटा जवाब दे बैठती थी, तब बहन और ज़्यादा तल्ख हो उठती थी.
सीमा खिड़की में से बाहर देख रही थी कि सड़क पर उसे अपनी बड़ी बहन दिखाई दी. वह उसके घर की ओर ही आ रही थी. उसे बहन का आना कुछ अच्छा लगा. उस समय उसका मन चाह रहा था कि किसी से बातें करे पर साथ ही, उसने मन में कहा, ‘वह न ही आए तो अच्छा है.’ वह बहन से मिलकर कभी ख़ुश नहीं हुई थी. उससे मिलने और बातें करने पर हर बार मन टर तल्खी पैदा होती थी. खैर, आ रही है तो आ ही जाए, उसने मन में कहा.
बहन दरवाज़े पर आई तो सीमा उठकर उसकी ओर बढ़ी, दोनों मिलीं. फिर जब वे अंदर जाकर बैठीं तो बहन ने कहा, “तुम आई नहीं पिछली बार?”
“नहीं आ सकी.” सीमा ने कहा.
बहन ने अपने घर में पति के दो दोस्तों को सपरिवार भोजन पर बुलाया था और सीमा को’ भी आने के लिए कहा था, पर सीमा का मन जाने के लिए नहीं माना था. वहां जाकर वह कभी हल्का मन लेकर नहीं लौटी थी. वहां जाने पर उसे लगता था कि वह बहन के घर में नहीं, किसी पराई स्त्री के घर में आई है. वहां वह ज़्यादा देर बैठ न पाती और किसी बहाने उठकर आ जाती.
बहन सामने बैठी हुई थी तो सीमा की नज़र उसकी साड़ी पर थी. न चाहते हुए भी वह उसे देख रही थी. बहुत बढ़िया साड़ी थी वह. नई ही ली होगी, सीमा ने सोचा. उसे बहन की सभी साड़ियों के बारे में पता था. बहन ने अपनी हर साड़ी के बारे में उसे बताया हुआ था कि वह उसने कितने की ली है, कहां से ली है, किस तरह ली है?
सीमा बातें करती हुई कुछ देर उसकी साड़ी की ओर देखती रही. वह साड़ी के बारे में कुछ भी पूछना नहीं चाहती थी, न ही चाहती थी कि बहन उसका ज़िक्र करें. उस साड़ी को देखकर सहना कठिन था. उसके बारे में बातें सुनकर सहना और भी कठिन था.
आख़िर सीमा ने साड़ी की ओर से नज़र हटा ली.
तभी बहन ने कंधे पर से सरक आया साड़ी का पल्ला ज़रा ऊपर उठाते हुए कहा, “पिछले हफ़्ते ली थी. आज फस्ट टाइम ही पहनी है. साढ़े आठ सौ की आई है. मैंने सोचा, इस काले रंग के ब्लाउज़ के साथ ख़ूब मैच करेगी. लेने का आइडिया तो नहीं था, पर ले ही ली. कैसी लगी?”
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“अच्छी है.” सीमा ने धीमे से कहा.
“बड़ा अच्छा रंग है.”
अब सीमा बहन के ब्लाउज़ की ओर देख रही थी.बिना बांहों का छोटा सा ब्लाउज़ था वह, जो शरीर के साथ चिपका हुआ लगता था. पता नहीं सिकुड़ गया है या बहन ही कुछ मोटी हो गई है. सीमा ने सोचा या शायद जान-बूझकर तंग कर लिया है. भला इतने कसे हुए ब्लाउज़ में इसकी तबीयत नहीं घबराती?
पिछले कुछ वर्षों में बहन बहुत बदल गई थी. अपने माता-पिता के घर में सीमा और वह लगभग एक जैसी ही लगती थीं, जैसे जुड़वां बहनें हों. हां, बहन का रंग कुछ ज़्यादा गोरा था और सीमा के नक्श कुछ ज़्यादा तीखे थे. बड़ा प्यार था दोनों में, पर जब कमल सीमा के जीवन में आया था तो बहनों के प्यार में दरार पड़ गई थी. सीमा और कमल की निकटता बहन से सहन नहीं हो सकी थी. वह शायद स्वयं कमल के निकट होना चाहती थी. उसने कोशिश भी की थी, पर कमल उससे एक दूरी पर ही रहा था. फिर वह दूरी बढ़ गई थी. जब बहन को उसके और सीमा के प्यार के बारे में पता चला था. उसने बड़ी रुकावटें डाली थीं उनके प्यार में, पर वह प्यार सभी रुकावटें पार कर गया था. फिर कुछ समय के बाद बहन का विवाह हो गया था.
जिस व्यक्ति के साथ जब उसका विवाह हुआ था,तब वह बहुत साधारण सा व्यक्ति था. वैसे देखने में वह ऊंची-लंबी डील डौल वाला नौजवान था, स्वस्थ और तगड़ा और बहुत शौकीन. वह आंखों में हमेशा सुरमा डालकर रखता और बड़े फैशनदार कपड़े पहनता, पर वे कपड़े उसे सुहाते नहीं थे. वे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा न लगते. उन दिनों वह एक कारखाने में मैकेनिक था. वैसे, वह चलता पुर्जा आदमी था और उस कारखाने में टिक न सका. कारखाना छोड़ने के बाद उसका भाग्य ऐसा चमका कि अब उसक ख़ुद का कारखाना था. कारखाने के अलावा उसका एक ट्रक चलता था और दो टैक्सियां चलती थीं. बहुत कमाई थी उसकी और वह बड़े ऐश से रह रहा था. वह असली अर्थों में ‘खाने-पीने और ऐश’ करने वाला आदमी था. उसकी कमाई की बदौलत सीमा की बहन भी ऐश करने लगी थी. उसने सोचा भी नहीं था कि वह यह दिन देखेगी. बस, क़िस्मत ही बदल गई थी उसकी. वह बहुत ख़ुश थी. वैसे पति की ‘ऐश की ज़िंदगी’ से वह ख़ुश नहीं थी. कभी वह सोचती और सब लोग भी तो ऐसे ही हैं. पैसा हो, तो आदमी ऐश करता ही है. मनमर्ज़ी का खाता है, पीता है. फिर दोस्तों में उन जैसा बनना पड़ता है. घर की चारदीवारी के घेरे से वह बाहर निकल आई थी. अगर उसका पति दोस्तों की पत्नियों के साथ खुलकर हंस-बोल लेता था तो वह भी उसके दोस्तों के साथ खुलकर हंस-बोल लेती थी. इसमें उसे एक छिपी हुई ख़ुशी महसूस होती थी.
हां, बहन बदल गई थी. अब वह देखने में सीमा की बहन लगती ही नहीं थी. उसके नक्श अब सीमा के नक्शों से भी तीखे बन गए थे. भौंहे तराशी हुई और आंखें काजल की रेखाओं में कानों तक खींची हुई थी. नित्य नये फैशन के संवारे हुए बालों के कारण चेहरा कैसे नई शक्लें धारण कर लेता है! लिपिस्टिक द्वारा होंठ पतले लगने लगते हैं और उनकी मुस्कुराहट बड़ी शोख बन जाती है.
आज भी सीमा को उसका चेहरा बहुत भिन्न प्रतीत हुआ. नीले नगों वाले झूलते हुए लंबे कांटों की बदौलत वह चेहरा ज़्यादा लंबा लग रहा था. भला इतना लंबा चेहरा भी क्या हुआ? सीमा ने सोचा, इतने लंबे चेहरे तो चित्रों में ही अच्छे लगते हैं. असलियत में तो वे बनावटी से लगते हैं…
“बहुत एंजॉय किया उस दिन पार्टी में.” बहन बता रही थी, “बक्शी साहब थे और मेहताजी. लंच के समय मेहता की मिसेज को कांटा ही न पकड़ना आया. वैसे भी कांटा दाएं हाथ में पकड़ा हुआ था और उसके होंठों की लिपिस्टिक देखने लायक थी. बस, थोपी हुई लगती थी. खाना खा चुकने पर बस थोड़ी-सी ही और वह भी कहीं-कहीं लगी रह गई थी. इतना सेन्स नहीं कि बाथरूम में जाकर फिर से लगा ले. पता नहीं, मेहता की उससे कैसे बनती है? मैं तो कहूंगी कि बहुत लकी है, जो मेहता जैसा हस्बैंड मिला हुआ है. तुमने तो शायद नहीं देखा उसे, बड़ा हंसमुख है और बहुत अच्छी बातें करता है. सुनकर पेट भरता ही नहीं. मेरे बनाए साग वाले मटन की उसने बड़ी ही तारीफ़ की. सभी के सामने कहने लगा…”
सीमा ने सोचा, अब यह पार्टी का पूरा ब्यौरा देकर ही रहेगी. भला मुझे मेहता से क्या और बक्शी से क्या? जब देखो, पार्टियों की बातें, पिकनिक की बातें. मेहताओं की, बक्शियों की, उप्पलों की बातें. नई ख़रीदी चीज़ों की बातें. वैसे मुझे पता है, यह सब बातें क्यों करती है.
सीमा जानती थी कि बहन उसे नीचा दिखाना चाहती थी. कमल के सिलसिले में उन दिनों जो ईर्ष्या उसके मन में जन्मी थी, वह आज भी कायम थी. फिर उसका विवाह भी अच्छे घर में नहीं हुआ था और शुरू-शुरू में पति भी साधारण-सा ही था. वैसे वह स्वयं भी मुश्किल से आठवीं तक पढ़ी हुई थी. आठवीं फेल. सो और कितना अच्छा वर मिल सकता था? उसके माता-पिता उसका सौभाग्य समझते थे कि उसके लिए ऐसा लड़का मिल गया था, पर बहन को वह पसन्द आने पर भी पसन्द नहीं आया था. उन दिनों उसे इस बात का अफ़सोस था कि माता-पिता ने सीमा के लिए तो डॉक्टर लड़का ढूंढ़ा था और उसके लिए हाथ से काम करने वाला कारीगर. पर फिर वह सब कुछ अपने भाग्य के सिर डालकर और मन मार कर रह गई थी. वह सोचती कि सीमा का भाग्य शुरू से ही उससे अच्छा रहा था. सीमा को माता-पिता का लाड़-प्यार भी ज़्यादा मिला था और कुदरत की तरफ़ से दिमाग़ भी. वह उससे पढ़ी भी ज़्यादा थी. फिर उसके जीवन में कमल आया था और उस रोमांस में उसका रंग-रूप एकदम निखर उठा था. वह उससे कहीं ज़्यादा सुन्दर बन गई थी. इस सब कुछ को सहन करना उसके लिए आसान नहीं था, लेकिन वह कुछ करनहीं सकती थी. उसके मन में कई गांठें पड़ गई थीं.
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लेकिन अन्त में उसके भाग्य ने कुछ ऐसा पलटा खाया था कि दुनिया ही बदल गई थी. अब सीमा का उससे क्या मुक़ाबला था? सो, उसके मन की कुछ गांठें खुल गई थीं, पर कुछ गांठें और भी कस गई थीं,
पार्टी के बारे में बताते हुए बहन अब उस अंग्रेज़ी फिल्म का ज़िक्र करने लगी थी, जो उसने दो दिन पहले देखी थी, “एक बार फिर देखने को दिल चाह रहा है.” उसने कहा, “टेक्नीकलर है और बड़ी फाइटिंग है उसमें. वैसे, लव-सीन भी बहुत बढ़िया हैं. उसमें एक महिला है, जो एक ही साथ चार पुरुषों से लव अफेयर करती है. मैं तो एक बार फिर से देखने वाली हूं. कहो तो इन्हीं दिनों में चलें. टिकट मंगा कर रखूंगी.”
“नहीं, मैं नहीं जा सकूंगी,” सीमा मे कहा.
“क्यों?”
“मैंने एक और ट्यूशन कर ली है इन दिनों. समय नहीं मिलता, और फिर…” सीमा ने बात पूरी नहीं की.
“फिर क्या?’
“फिर कभी सही.”
“यह भी कोई ज़िंदगी है?” बहन ने हमदर्दी जताते हुए और उस हमदर्दी द्वारा सीमा पर चोट करते हुए कहा, “आख़िर इस तरह कैसे चलेगा? सत्यपाल को काम मिला कहीं?”
“नहीं, पर एक जगह उम्मीद है मिलने की.”
“पता नहीं, जमकर काम क्यों नहीं करता? आख़िर बात क्या है?”
“बात क्या होगी?”
“फिर भी?” सीमा चुप रही.
“कोई अपना ही काम शुरू कर दे.” बहन ने कहा.
“कौन सा काम?” सीमा ने कुछ आशावान होकर पूछा.
“कोई भी काम,” तुम्हारे जीजाजी ने भी तो अपना ही काम शुरू किया था, और अब इतने बिज़ी हैं कि फ़ुर्सत ही नहीं मिलती, अब एक डीज़ल ट्रक लेने के बारे में सोच रहे हैं. लाख सवा लाख का आता है. कह रहे हैं कि साल भर में क़ीमत निकाल देगा अपनी. फिर, शायद हम इंग्लैंड जाएं. कह रहे थे, जाऊंगा तो तुझे साथ लेकर ही जाऊंगा, और फिर, भला मैं अकेले जाने दूंगी? वहां जाकर कहीं वहीं के न बन जाएं.”
“जिसे नहीं बनना, उसे यहां भी नहीं बनना.” सीमा ने धीमे से कहा. बहन चौंकी. किसकी ओर इशारा है इसका? उसने सोचा, तभी वह कुछ कहने को हुई, पर चुप रही. इस बात को यहीं ठप्प कर देना चाहिए. उसने मन में कहा और वह कोई और बात करने के बारे में सोचने लगी.
तभी सीमा की बेटी नन्हीं आई. पर दरवाज़े में से अंदर झांककर फिर भाग गई.
“इसका स्कूल बदला कि नहीं?” बहन ने नन्हीं की ओर संकेत करते हुए पूछा.
“नहीं.” सीमा ने कहा.
“कम से कम इसका तो कुछ ख़्याल करो. इंग्लिश स्कूल में फीस ज़रूर ज़्यादा है, पर बच्चे की लाइफ बन जाती है?”
“मैं अंग्रेज़ी स्कूलों के हक़ में नहीं हूं.” सीमा ने कहा.
“बस, वही ज़िद रही तुम्हारी.”
“ज़िद कैसी? बच्चे को जो अपनी भाषा में सीखना है, वह दूसरी भाषा में उतनी अच्छी तरह कैसे सीख सकता है? यह मुझे कुछ समय स्कूल में पढ़ाकर ही महसूस हुआ है.”
“तो फिर, इतने लोग बेवकूफ़ हैं क्या, जो अपने बच्चों को इंग्लिश स्कूलों में भेज रहे है?”
“यह तो वही जानें, पर मैं इसे ठीक नहीं समझती.”
“बुरा न मानना सीमा,” बहन ने जमकर वार करते हुए कहा, “मैं कहने से नहीं रह सकती कि तुम्हारा हाथ जरा खुला होता, तो नन्हीं को इंग्लिश स्कूल में ही भेजती.”
“शायद.” सीमा ने कहा.
“अगर मैंने यह स्कूल की नौकरी न की होती, तो शायद अंग्रेज़ी स्कूल में ही भेजती.”
“तो इसे अपनी मज़बूरी क्यों नहीं कहती?”
“मज़बूरी नहीं, तर्जुबा.”
“खैर, तुम्हारी मज़ीं, मेरा तो कहना ही फर्ज़ है. मैं अपने टीनू मीनू को देखती हूं, तो सोचती हूं कि इंग्लिश स्कूल में जाकर वे आदमी बन गए हैं. इसी उम्र में ऐसी पट पट इंग्लिश बोलते हैं कि आदमी सुनकर हैरान रह जाता है.”
नहीं, सीमा ने कहना चाहा कि वे आदमी तोते बन गए हैं, पर वह चुप रही.
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अब एक तल्खी जाग उठी थी दोनों बहनों के बीच में. बस हमेशा इसी तरह होता था. सीमा कुछ देर बड़े सब्र से, मन मार कर, बहन की बातें सुनती रहती थी. अन्त में, उससे सहन नही हो पाता था और किसी बात पर उसे उलटा जवाब दे बैठती थी, तब बहन और ज़्यादा तल्ख हो उठती थी. फिर अगर सीमा उसके घर गई हुई होती तो सीमा वहां से उठकर आ जाना चाहती, अगर बहन उसके यहां आई हुई होती तो वह उठकर चली जाना चाहती.
उस समय बहन हार मानकर जाना नहीं चाहती थी. वह अभी भी अंग्रेज़ी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली के बारे में बोल रही थी और अपने पड़ोसी बच्चों के बारे में बता रही थी, जो अंग्रेज़ी स्कूल में नहीं पढ़ते थे और गंवार लगते थे. “उन्हें न कपड़े पहनने की तमीज़ है, न खाने-पीने की, न ही बोलने की. उनमें और गलियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों में कोई फ़र्क़ नहीं है.”
कुछ ही देर में वह फिर अपने बारे में बातें करने लगी कि किस तरह उनका जीवन पूरी तरह भरा हुआ है. हर तरह का ऐश है उसमें. कौन-सी ऐसी चीज़ है, जिसकी उसे कमी है?
हर बार जब बहन अपने घर और जीवन के बारे में बातें करने लगती थी, तो आख़िर यहीं आकर उसकी बात समाप्त होती थी.
सीमा ने बहुतेरा सब्र किया, पर अन्त में उससे बहन की बातें सहन न हो सकीं. वह भी हार मानना नहीं चाहती थी और उसने पूरी तरह सम्भल कर, संयत स्वर में, गम्भीरता से कहा, “कई बार ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी होती है, तो सब कुछ पाकर भी लगता है कि ज़िंदगी खाली है.” वह रुकी.
बहन इस बार फिर चौंकी और सीमा की ओर देखने लगी कि वह बात पूरी करे, पर सीमा कुछ क्षण चुप ही रही.
आखिर बहन कुछ कहने के बारे में सोच ही रही थी कि सीमा ने कहा, “और कई बार ज़िंदगी खाली होने पर भी किसी एक चीज़ की बदौलत भरी हुई महसूस होती है.”
अब बहन को पता था कि सीमा आगे कोई ऐसी बात कहने वाली थी, जिसे सहन करना उसके लिए बहुत कठिन था. सीमा का यही तरीक़ा था कि वह कोई ख़ास बात कहने के पहले उसकी बुनियाद खोदती, उस बुनियाद में धीरे से, एक ईंट रखती, फिर एक और ईंट रखती, फिर एक और…
बहन ने चाहा कि किसी बहाने जल्दी से उठे और वहां से चली जाए और वह उठने के लिए कोई बात कहने ही वाली थी कि सीमा ने कहा, “ज़िंदगी में प्यार नहीं होता तो कुछ भी नहीं होता है, प्यार होता है तो ज़िंदगी में कोई भी कमी महसूस नहीं होती.”
बहन अन्दर ही अन्दर तड़प उठी. उसे पता था किसीमा का कमल की ओर संकेत था. कमल का सीमा से प्यार था और जो उससे नहीं था, की ओर सीमा का संकेत था. अब सीमा बिल्कुल ही चुप हो गई थी. वह अपने अन्तिम हथियार का प्रयोग कर चुकी थी और उसका भरपूर वार भी हुआ था. बहन तड़प रही थी. अगर और वार किया, तो वह मर सकती थी. मारने में वह मज़ा नहीं था, जो तड़पाने में था.
तभी बहन ने अपना पर्स उठाया, पर्स में से जो चीज़ें सीमा को दिखाने के लिए निकाली थीं तीन अलग अलग शेड के रंग वाली लिपिस्टिक, इत्र की नन्हीं सी शीशी, लाल-सुर्ख बुन्दों की जोड़ी, चांदी का छल्ला उन्हें फिर से उसमें रखा और पर्स बन्द करते हुए कहा, “मैं कहना तो नहीं चाहती सीमा, पर ये बातें तुम्हारे लिए ठीक नहीं हैं. इससे तुम्हारी फैमिली लाइफ सुखी नहीं बन सकेगी. मैं तब भी कहा करती थी और अब भी कहती हूं. आगे अपनी मर्ज़ी की तुम ख़ुद मालिक हो. मैं कौन होती हूं तुम्हारी ज़िंदगी में टांग अड़ाने वाली? अच्छा, अब चलूं, बहुत लेट हो गई हूं. कभी आना तुम भी.”
“आऊंगी,” सीमा ने कहा.
बहन उठी. सीमा भी उठी.
तभी नन्हीं अन्दर आई. बहन ने उसे बुलाया नहीं, उसकी ओर देखा भी नहीं, और साडी ठीक करती हुई दरवाज़े में से बाहर निकली और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गई.
– सुखबीर
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