ज़िम्मेदारियों को कंधे से उतार
खिड़की के पास खड़े होकर
दूर गगन को कुछ पल निहार लूं
छत पर खड़े होकर ढलती शाम के
सिंदूरी गुलाल को गालों पर लगा लूं
बस यूं ही थोड़ी देर
पूनम के चंद्रमा को तकती रहूं
घूंट भर चाय का स्वाद मन में उतार सकूं
बरसती बूंदों की ताल पर
गुनगुना लूं कोई अनकहा सा
रूमानी गीत
कभी किसी नदी या झील किनारे
भीगे पत्थरों को सहलाऊं
किसी सुबह को देर तक सोती रहूं
फिर किसी दोपहर को अलसाई सी
करवटें बदलती रहूं बिस्तर पर
ज़्यादा नहीं ऐ ज़िंदगी
बस इतनी सी ही तो चाहत है मेरी…
– विनीता राहुरीकर

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Photo Courtesy: Freepik
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