“… अब हमारी बिटिया भी इस दुनिया में आएगी दीदी. अपनी जिजी संग वो भी हमारे आंगन में खेलेगी.” ख़ुशी से बहते आंसुओं को अपनी उंगलियों में संभाले ईशानी ने कहा, “इन बूंदों को भी अपने साम्राज्य की शक्ति का पता चल गया पृथा!
“ओह ईशानी! तुम भी न… फ़ालतू ही परेशान हो रही हो. इन स्त्रियों को इतना समझाने का कोई फ़ायदा नहीं है. ये अपनी दुनिया में, उन्हीं घिसे-पिटे रस्मों-रिवाजों के साथ ही जीना चाहती हैं. अब कुछ बोलोगी भी या आज फिर गांव भ्रमण करवाना है.”
“आज सरपंच जी की छोटी बहू, कुसुम का फोन आया था, मिलना चाहती है.”
“मिलना चाहती है! क्यों? ससुरालवालों का नया दुखड़ा सुनाने के लिए.
उंह! ख़ुद तो कुछ करेंगी नहीं बस रोने के लिए ईशानी दीदी मिल गई हैं सबको.”
जानती हो ईशानी, ये ख़ुद भी मान चुकी हैं कि इस पुरुष प्रधान समाज में इनकी हैसियत समंदर में पानी की एक बूंद से ज़्यादा नहीं है.”
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“अब चुप हो जा पृथा, कुसुम आ रही है. आओ कुसुम कैसी हो?”
“प्रणाम दीदी, आप बहुत दिनों से आई नहीं! आपको एक बात बतानी थी.”
“हां बोलो कुसुम.”
“दीदी, इस बार भी मेरे पेट में लड़की ही है, सब हमको सफ़ाई करने के लिए कह रहे थे. पर… इस बार हमने साफ़ मना कर दिया. जानती हो दीदी, इस बार हमारा साथ हमारी दोनोंजेठानियों और छुटकी ननद जी ने दिया. वो तो बिल्कुल अड़ ही गईं सरपंच जी के आगे.
अब हमारी बिटिया भी इस दुनिया में आए गी दीदी. अपनी जिजी संग वो भी हमारे आंगन में खेलेगी.”
ख़ुशी से बहते आंसुओं को अपनी उंगलियों में संभा ले ईशानी ने कहा, “इन बूंदों को भी अपने साम्राज्य की शक्ति का पता चल गया पृथा!जब ये बूंदें, अपने साम्राज्य से एकजुट होकर धरती के लिए निकलती हैं तो बड़ी से बड़ी ताक़त भी स्वयं को बचाने के लिए एक आड़ खोजती है.”
– पल्लवी विनोद
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