सुबह के शांत, व्यवस्थित और आत्मविश्वास से भरे क्षणों में अक्सर कोई छोटा सा प्राणी आपके आत्मविश्वास को पंजों से खरोंच देता है. मेरे जीवन में यह भूमिका एक काली बिल्ली ने निभाई.
सुबह-सुबह फल लेकर जैसे ही घर में प्रवेश किया, देखा कि एक बिल्ली घर के भीतर उछल-कूद कर रही है. उस क्षण मैं गृहिणी से सीधे ‘आपदा प्रबंधन बल’ की कमांडर बन गई. दोनों दरवाज़े खोले, फल एक ओर पटके और बिल्ली को बाहर निकालने का अभियान शुरू किया. बिल्ली कमरे से आंगन, आंगन से कमरे और मैं उसके पीछे. ऐसे ही गोल-गोल बिल्ली मुझे भगाती और भागती रही.
थोड़ी देर बाद वह कहीं दिखाई नहीं दी, तो मैंने चैन की सांस ली,“ओह… चली गई.”
घर सब व्यवस्थित कर मैं नहाने चली गई. कुछ कपड़े भी धोए. जब एक घंटे बाद बाहर निकली, तो घर कुछ अस्त-व्यस्त सा मिला. कुछ सामान लुढ़का मिला. तभी कुछ बदबू का एहसास हुआ. चारों ओर नज़र दौड़ाई… देखा- ड्रॉइंगरूम में दीवार के किनारे मल है. दिमाग़ भन्ना गया. मैं फ़ौरन सचेत हो गई. तुरंत पड़ोसी को फोन किया, “अरे मेरी मदद करो… बिल्ली को भगाने में.” उन्होंने अपनी बेटी, जो बीसीए की छात्रा है, तुरंत भेज दिया. हम दोनों ने मिलकर एक-एक कमरे से बिल्ली के निकलते ही कमरे बंद करना शुरू किया. बिल्ली हमसे तेज़, हम उससे अधिक घबराए हुए. अंततः लगा कि वह निकल गई है. फिर श्रुति की मदद से घर की धुलाई, सफ़ाई शुरू की- घर फिर से सभ्य बनाया.
तभी देखा पलंग की चादर भी एक तरफ़ से गीली है. ओहो! अभी तो खेल बाकी है, यानी मूत्र विसर्जन भी… चादर, गद्दा सब धोना, धूप में डालना होगा. सब निपटवाकर श्रुति चली गई.
अब तक दोपहर के बारह बज चुके थे. भूख जोरों से लगी थी. नाश्ता करने बैठी. बस कर ही रही थी कि सामने पलंग पर फिर बिल्ली रानी मुझे घूरती दिखाई दीं. मैं हक्की बक्की रह गई… अब मुझसे कुछ भी सटका नहीं गया. नाश्ता बीच में ही छोड़, मैंने किचन को सबसे पहले लॉक किया. फिर से श्रुति को बुलाया और बिल्ली को निकालने की जंग शुरू… भागा-दौड़ी फिर मची. काफ़ी खोज-बीन के बाद पता चला- बिल्ली रानी पलंग के नीचे आराम फरमा रही है. हमने लंबा डंडा लेकर उसको बाहर निकालने की नाकामयाब कोशिश की. अब हम हांफ रहे थे, हंसी भी आ रही थी. मैं खिसिया रही थी. थक कर हम फिर बैठ गए.
तभी गूगल- आधुनिक युग में हर संकट का पहला शरण स्थान की याद आई. बिल्ली भगाने के तरीक़े ढूंढ़ें. गूगल ने बताया कि नींबू आदि सुगंधित चीज़ें बिखरा दो तो बिल्ली चली जाती है. मैंने तुरंत फ्रिज से तीन नींबू निकाले. एक को आधा-आधा काट, दो चौड़ी कटोरियों में रख पलंग के नीचे सरका दिया. दो नींबू साबुत लुढ़का दिए. पर बिल्ली बाहर नहीं आई. हमने झांक कर देखा तो बिल्ली इधर-उधर तो खिसकती रही, लेकिन बाहर नहीं निकली.
अब तक श्रुति और मैं, दोनों बुरी तरह हांफ रहे थे. श्रुति मुझे अब समझाने लगी, “आंटी निकल जाएगी, थोड़ी देर में अपने आप… बस दरवाज़ा खुला रखिए.”
मैं भी परेशान हो ही गई थी. श्रुति चली गई.
आधा घंटा और बीता. मुझे चैन नहीं था. सुबह के नौ बजे से दो बज चुके थे. मैं सहायतार्थ सड़क पर किसी को निरंतर ढूंढ़ रही थी. तभी मोटरसाइकिल पर एक बंदा गुज़रा. मैंने ज़ोर से पुकारा, “भाई, मेरी मदद कर दो… बिल्ली निकालने में.” धीरे से कहा.
वह बंदा रुक गया. मुझ पर शायद उसको रहम आ गया था. मोटरसाइकिल खड़ी कर वह अंदर आ गया और उसने डंडे को तेजी से घुमा घुमा और मुंह से भी आवाज़ कर करके बिल्ली को निकालने की कोशिश की. बिल्ली शायद बहुत डर गई थी. तेजी से पलंग के नीचे से, कमरे से बाहर निकली, लेकिन डर में कभी वह दीवार पर, कभी सोफे पर, मेज पर कूद रही थी… उसे जाने का रास्ता नहीं सूझ रहा था. दो-चार झटकों के बाद उसे अचानक दरवाज़ा दिख गया और वह निकल गई.
हाआआ… मेरा हाथ दिल को थामे हुए था… मेरी जान में जान आ गई थी!
मैंने उस फरिश्ते को धन्यवाद कहा. तुरंत दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर जा पड़ी. आंखें मूंदी ही थीं कि अचानक लगा कि बिल्ली मुझे धमका रही है- “बहुत घरवाली बनती है… निकाल दिया ना मुझे? मैं भी देख लूंगी.” और मैं हड़बड़ाकर उठ बैठी.
– नील मणि

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