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कहानी- खंडहर (Short Story- Khandhar)

भोलू के बगैर उसका जीना संभव हो सकेगा! हर सांस के सामने भोलू को देखने की अभ्यस्त उसकी दिनचर्या क्या एक तिल भी आगे सरक सकेगी?

कमली दीदी अपना तन बदन निहारती है तो खंडहर में तब्दील एक अभिशप्त भुतहा मकान जेहन में उग आता है, जिसकीदीवारें लाख मरम्मत के बावजूद टूटती-फुटती राहती है और अंतत: एक भयानक वीरानी, उदासी और ख़ामोशी ही उसकी नियति होती है. दीदी ने लाख चाहा कि सार्थक ज़िंदगी की थोडी सी चहल-पहल अपने आंचल में भर ले, मगर कोई अदृश्य सुराख रहता है शायद, जो हर बार उसे लील जाता है और फिर वह ताउम्र कोशिश करके भी अपनी ज़िंदगी के अर्थ मालूम नहीं कर पाती.

ऐसे में कमली दीदी ढह जाती है, दरो-दीवार की तरह ही.

पांच बार दीदी मां बनने की तैयारी करती है और पांचों बार आठवें महीने में उनका गर्भपात हो जाता है. अपूर्ण मां की लहूलुहान पीड़ा से दीदी हर बार घायल होते-होते विचलित हो जाती है. पांचवी बार उनकी देह और दिमाग़ दोनों पर प्रश्नचिह्न लग जाता है. वह अत्यंत कृशकाया और सनक मिजाज़ हो जाती है.  तीरथ जीजा बुरी तरह घबरा जाते हैं. भागे- भागे वे पहुंचते हैं कमली दीदी के इकलौते भाई सुन्दर बाबू के पास. सुन्दर भैया को आठ महीने पहले तीसरा लड़का हुआ है. वे दोनों पति-पत्नी कमली दीदी की गंभीर अवस्था पर विचार-विमर्श करते हैं. बहुत सकुचाते हुए सुन्दर भैया पत्नी के सामने, तीसरा बेटा दीदी को सुपुर्द कर देने का प्रस्ताव रखते हैं. भाभी तिलमिला जाती हैं. बेटी रहती तो आसानी से दान दिया जा सकता था. मगर बेटे को दान करने में उसे बड़ा मोह होताहै. भैया समझाते हैं कि दीदी के पास पच्चीस बीघा के लगभग अच्छी ज़मीन-जोत है. बबुआ भोलू को दान कर देने पर वही उसका वारिस बनेगा, इस बहाने आने वाले दिनों में अपनी हैसियत बड़ जाएगी. आख़िर अपना बेटा तो अपना ही होगा, फिर अपनी भी तो बहुत सीमित आय है. ऐसे में तीन-तीन बेटों का भरण-पोषण करना और लिखाना-पढ़ाना कोई हंसी-खेल नहीं है.

इस तरह जब दूर की सूझती है भाभी को तो वह सहमत हो जाती हैं. भैया की स्थिति सचमुच उस समय अच्छी नहीं थी. किसी सरकारी ऑफिस में वे उपेक्षित मेज़ के क्लर्क थे. गांव में भी कोई ख़ास ज़मीन नहीं थी. बड़ी मुश्किल से वे जैसे तैसे घर चला रहे थे.

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दीदी की गोद में जब तीरथ जीजा आठ महीने के मासूम भोलू को रखते हैं तो टूटी बिखरी और पस्तहाल दीदी तुरंत सामान्य हो जाती है. उन पर सवार सारे ख़तरे तिरोहित हो जाते हैं. वसंत की एक अलौकिक गंध और उमंग समा जाती है उसमें.

गोद भरने की लालसा में उसने सैकड़ों देवी देवताओं की मन्नतें मानी थीं. वह सब पूरी करती हैं. कई कई तीर्थ स्थल जाकर भोलू का मुंडन कराया जाता है. इस तरह कि जैसे वह अपना ही कोखजाया हो. तीरथ जीजा टोकते हैं तो वह दलील देती हैं कि भगवान की मर्ज़ी हुई तब ही तो किसी न किसी जुगत से उसने उसकी मांग पूरी की, तब ही तो सुन्दर और उसकी घरवाली के मन में ऐसा दयामय विचार आया.

कमली दीदी कई कई मौलवी, फकीर, ओझा औघड़ और साधू सन्यासी से प्राप्त गंडों और तावीज़ों से उसे लाद देती हैं तथा एक मिनट भी अपनी नज़र से ओझल होने नहीं देतीं. पता नहीं ममता का कैसा अशेष ख़ज़ाना रहता है दीदी के पास कि भोलू पर हृदय खोलकर बेपनाह लुटाते हुए भी उसमें कुछ कमी नहीं आती.

भोलू भी कमली दीदी और उसके गांव घर की आत्मीयता से इस क़दर जुड़ जाता है कि थोड़ा भी इनसे अलग रहकर व्याकुल हो उठता है.

सुन्दर भैया के यहां दीदी भोलू को लेकर जब कभी जाती हैं, वह दो दिनों में ही तंग करने लग जाता है, “मैया अब अपने घर चलो.” उसे गांव के हमजोली लड़के-लड़कियों की शायद याद आने लगती है अथवा गाय गोरू और खेत खलिहान के सानिध्य की कमी महसूस होने लगती है, शहरी आबोहवा, तड़क भड़क और दिनचर्या भोलू को बड़ी अटपटी लगती है. वह अकेले घर में कमली दीदी के स्नेह पर एकाधिकार का अभ्यस्त हो जाता है.

इस बीच सुन्दर भैया की स्थिति अच्छी हो जाती है. ऑफिस में उन्हें तरक्की के साथ आकर्षक आमदनी वाली एक मेज़ मिल जाती है. घर में वे टीवी, फ्रिज, स्टीरियो, स्कूटर आदि रख लेते हैं. भोलू जब यहां आता है तो इन्हें आश्चर्य से देखता ज़रूर है, मगर ऐसा नहीं कि इन्हें वह अपने जीवन से जोड़ने को लालायित हो. भोलू की ठेठ गंवई भाषा और पहनावे पर उसके भाई बड़ा मज़ा लेते हैं. एक बार की बात है‌- वे उंगली से बता बताकार भोलू से पूछते हैं, “देखो, मेरे पास टीवी है, फ्रिज है, स्टीरियो है, स्कूटर है, तुम्हारे पास क्या है?”

भोलू इनके साथ सगे भाई के रिश्ते से अनभिज्ञ बिना अपने को नीचा महसूस करते हुए कहता है,”मेरे पास भैंस है, गाय है, जामुन आम अमरूद के पेड़ है और बैलगाड़ी है, तुम्हारे पास हैं?”

कमली दीदी सुनकर सन्न रह जाती है. गर्व से उसका सीना तन जाता है कितना अच्छा जवाब दाग डाला भोलू ने. वह उसे गोद में भरकर माथा चूमती हुई रोज़ बलाय लेने लगती हैं, “तूने इतनी बुध्दि दी है इसे भगवान तो उम्र भी देना.”

सुन्दर भैया और भाभी पता नहीं क्यों इस जवाब से अन्दर ही अन्दर कुढ़ जाते हैं. शायद इस बात पर कि गांव में रहकर भी यह लड़का उनके बराबरी की अक्ल रखता है. उन्हें ईर्ष्या हो उठती है. कमली दीदी ने भोलू पर इस तरह जादू कर डाला कि उसे लेशमात्र एहसास तक नहीं कि वे लोग उसके माता-पिता और सगे भाई हैं.

कमली दीदी जब भी भाई के पास शहर आती हैं, दो चार दिनों में गांव में उसके बिना हो रहे हर्जे को सोचकर वापस लौट जाती. इस बार सुन्दर भैया भोलू को कुछ दिन और रोकना चाहते हैं, मगर दीदी कहती जाती हैं कि भोलू के बिना उसका जाना और न जाना बराबर है. एक भी दिन उसकी गैरहाज़िरी में उसका मन कहां स्थिर रह सकेगा. दीदी इस पर जितना बेचैन हो उठती है, भोलू भी उतना ही परेशान हो उठता है. दीदी के बिना उसे भी नींद नहीं आती है और अन्न गले से नीचे नहीं जाता है, इसलिए कमली दीदी का पल्लू पकड़े हुए ही वह आता और पकड़े ही वह वापस जाता. इन दोनोंमें इतना लगाव देखकर भैया और भाभी

को पता नहीं क्यों अच्छा लगने की जगह रश्क हो उठता. उन्हें बड़ा अजीब लगता‌ यह बात कि उनका बेटा… और क़रीब न रहना चाहे. भाभी कभी अपने निर्णय को कोसने लगती है, फिर तसल्ली भी कर लेती है ख़ुद को कि बड़ा हो भोलू जब दीदी की सारी सम्पतिका मालिक बनेगा तो उसे सब मालूम हो जाएगा और फिर तो वह उनके पास आएगा ही.

मगर होनी को कुछ और ही मंजूर होता है. सात वर्ष का ही रहता है भोलू कि तीरथ जीजा एक भयंकर बीमारी से ग्रस्त हो उठते हैं. उनके गुर्दे में ख़राबी आ जाती है. बहुत पैसा ख़र्च करना पड़ता है, ज़मीन बिकने लगता है. अंतत: डॉक्टरों के परामर्श पर उसे मद्रास स्थित बेलोर अस्पताल जाना पड़ता है. लंबा इलाज चलता है एक तरफ़ का गुर्दा निकालना पड़ता है. पानी सदृश पैसा बहाने के बाद जीजा कुछ-कुछ स्वस्थ हो पाते तब तक उनकी तीन चौथाई जमीन हाथ से निकल जाती है. साथ ही स्वयं खेत -गृहस्थी करने लायक वे रह भी नहीं जाते हैं.

सुन्दर भैया जब जानलेवा बीमारी के जबड़े से निकले जीजा को देखने का औपचारिक फर्ज़ पूरा करने आते हैं तो पूरी स्थिति का जायज़ा लेकर दंग रह जाते हैं. भोलू के निकर पर कई पैबंद दिखाई पड़ते हैं, बालों में तेल नहीं होता है, सेहत काफ़ी गिरी रहती है. दीदी और जीजा भी एकदम फटेहाल नज़र आते हैं. इस अवस्था पर तरस खाने, कुछ मदद करने य कम से कम ढाढ़स बंधाने की जगह, मन ही मन वे भोलू को देने के निर्णय पर भारी अफ़सोस करने लग जाते हैं. वे सोचते हैं कि अब भोलू को अपने साथ चलने को कहेंगे तो वह तुरंत साथ हो लेगा और दीदी जीजा की तरफ़ से भी कोई ऐतराज़ नहीं होगा. किन्तु वे भोलू को ज्यों ही कहते हैं, सुनकर वह ऐसे गायब होता है कि उनके वहां रहने तक नज़र नहीं आता. दीदी भी घिधिया उठती हैं कि ये तो बीमार हैं ही, भोलू के बगैर कहीं वह भीबीमार न हो जाए!

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दीदी की यह बात सुन्दर भैया को कोरी भावुकता और निरा दिखावा मालूम पड़ता है.

भोलू के बगैर उसका जीना संभव हो सकेगा! हर सांस के सामने भोलू को देखने की अभ्यस्त उसकी दिनचर्या क्या एक तिल भी आगे सरक सकेगी? वह तो वह, इस सदमे को तीरथ जीजा भी शायद ही बर्दाश्त कर सकें, इससे तो अच्छा था कि वह भोलू को उसे देता ही नहीं कभी, मगर दीदी को क्या पता कि भोलू को देने की कृपा इन लोगों ने क्यों की थी?

दीदी यह सब कहना और पूछना फ़िज़ूल समझती हैं. फिर भी आंचल में आंसुओं को समेटती हुई रूंधे गले से गिड़गिड़ाती हुई एक अन्तिम प्रयत्न करती है, “सुन्दर, तू एक मौक़ा और दे दे. हम भोलू को बहुत अच्छी तरह रखेंगे. ख़ुद चाहे भूखे रहना पड़े, तू विश्वास कर, उसे कोई तकलीफ़ नहीं होने देंगे.”

“तू व्यर्थ ही चेष्टा कर रही है इसके लिए भला तुम्हें मदद की ज़रूरत ही क्या है? हम लोगों ने अब तय कर लिया है कि भोलू यहीं रहेगा.” सुन्दर बेलाग कह देते हैं.

“तुम्हारी जैसी मर्ज़ी.” दीदी पस्त हो जाती है.

“भोलू को यह सब बताने की ज़रूरत नहीं.”

सुन्दर एक और तीर छोड़ते हैं दीदी के सीने पर, “वह तुम्हारे साथ जाने की ज़िद पर अड़ने की कोशिश करेगा. इसलिए, तुम कल बहुत सुबह, जब भोलू नींद में ही रहे, उठ जाना. मैं स्कूटर से तुम्हें बस स्टॉप छोड़ आऊंगा.”

“ऐसा अन्याय मत करो सुन्दर.” दीदी एकदम कातर हो उठती है, “दो-तीन दिन मुझे यहां और रह लेने दो. पता नहीं भोलू को फिर देखने का मौक़ा मिल भी पाए या नहीं.”

दीदी के स्वर की दीनता का सुन्दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. झुंझलाकर बेरुखी से वे कहते हैं, “अब बेकार ही तुम भावुक हो रही हो, पराई चीज़ पर ज़्यादा लट्टू नहीं होना चाहिए. हर बार तो तुम दूसरे हीं दिन लौटने की ज़िद करने लगती थी.”

सुनकर दीदी एक गंदी और नग्न गाली की तरह झेलती है इस वाक्य को. वह आगे सोचती हैं कि पत्थर पर दूब जमाने की कोशिश बेकार है. अच्छा है, वह सुबह ही चली जाएगी.

रात में खाना दीदी के कंठ से हरगिज़ नहीं उतरता है. कौर दो कौर ही सूंघकर वह उसे घर के पालतू कुत्ते को दे देती है. रातभर उसे नींद भी नहीं आती है. करवट में सोये भोलू को वह पूरी रात देखती रह जाती है. मन फिर भी नहीं अघाता है. सुन्दर की हल्की पुकार जब सुनाई पड़ती है तो दीदी बहुत हौले हौले छाती से लिपटे हुए भोलू को अलग करने लगती है. इसी समय उसकी नींद खुल जाती है. भोलू को शायद पूर्वाभास हो जाता है. दीदी लाख बहाने करके सुलाने की कोशिश करती है उसे, मगर वह नहीं सोता.

अन्ततः दीदी का जाना उस दिन स्थगित हो जाता है.

संयोग से यही प्रक्रिया लगातार दो तीन दिनों तक चलती है. सुन्दर चिढ़ जाते हैं और फिर वे साफ़ साफ़ भोलू को बता देते हैं कि उसे अब हर हाल में यहीं रहना है और दीदी को अभी वापस जाना है.

यह सुनते ही वह दीदी से जोंक की तरह लिपट जाता है. रोते हुए गुहार मचाने लगता है, “मैं हरगिज मैया के बिना यहां नहीं रहूंगा.”

दीदी कलेजे पर पत्थर रखकर समझाने लगती है, “ये तुम्हारे मां पिता हैं भोलू अब ये तुम्हें अपने पास रखना चाहते हैं.”

भोलू एकदम अधीर हो उठता है, “नहीं, मैया, नहीं ऐसा मत कहो. तुम कह दो मैया कि ये मेरे मां बाप नहीं हैं, यह झूठ है… यह ग़लत है.”

भोलू की भोली बात सुन कमली दीदी का कलेजा पानी पानी हो जाता है. वह कोसने लगती है अपनी ज़िंदगी को कि इस घड़ी के आने से पहले वह मर क्यों नहीं गई.

सुन्दर कमली दीदी के कान में आकर कहते हैं, “तुम कठोर होकर कहो कि अब इसे तुम नहीं रखना चाहतीं. अब उसकी परवरिश की ताक़त तुम में नहीं है.”

कमली दीदी फूट फूटकर रो पड़ती है, “नहीं, सुन्दर नहीं, ऐसा कहने को मत कहो मुझे इतना पत्थर हृदय मुझसे नहीं बना जाएगा.”

सुन्दर ग़ुस्से से भर उठते हैं, “तो ठीक है, तुम जाओ. मैं इसे संभाल लूंगा.”

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इतना कहकर वे जबरन भोलू को कमली दीदी से खींचकर अलग कर देते हैं. भोलू, “मैया मैया…” कहते हुए गला फाड़कर चिल्लाने लगता है.

कमली दीदी को यूं प्रतीत होता है कि सुन्दर उसका भाई नहीं, एक कसाई है. सुन्दर बुरा सा मुंह बनाकर उसे डांटते हुए आदेश देते हैं, “तुम जल्दी निकल जाओ यहां से.”

इस बात से दीदी को ऐसा लगता है जैसे घर से निकालने के लिए एक ज़ोरदार और बेरहम धक्का दे रहा है. बलि के बकरे की तरह छटपटाते हुए भोलू को एक नज़र देखकर वह आगे बढ़ना चाहती है. मगर वह तेजी से बढ़ नहीं पाती, मानो पत्थर से बंध गये हों उसके पैर. भोलू के रोने और तड़पने की आवाज़ उसके हृदय में नश्तर की तरह चुभती है और बदहवास से बस स्टॉप की तरफ़ बढ़ते हुए उसके पांव बर्फ़ की तरह जम गए.

जब वह बस में बैठ गई तो उसकी नज़र अपनी सूनी गोद पर पड़ी और उसने महसूस किया कि जैसे उसकी गोद एक वीरान खंडहर हो.

– जयनंदन

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