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बच्चों को प्यार के साथ-साथ दें ज़रूरी संस्कार (Along with love, instill essential values ​​in children)

वक़्त के साथ साथ पैरेंटिंग भी बदल गई है, लेकिन वो बेहतरी के लिए बदली है या फिर बात कुछ और है? आजकल पैरेंट्स अपने बच्चों को कई तरह की सुविधाएं देने को ही प्यार समझते हैं. उनको लगता है कि जो हमको हमारे पैरेंट्स नहीं दे पाए, वो हम अपने बच्चों को दें, लेकिन वो भूल जाते हैं कि उनके पैरेंट्स उन्हें भले ही उतनी सुविधा नहीं दे पाए हों, लेकिन अपना समय ज़रूर देते थे और अनुशासन व संस्कारों का भी पूरा ध्यान रखते थे. आज इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार देने कितने ज़रूरी हैं.

सबसे पहले इसे एक उदाहरण से समझेंगे… सुमन अपने चार साल के बेटे आर्यन के साथ अपनी सहेली सरिता के घर गई. वहां पहुंचते ही आर्यन ने झट से सरिता का फ्रिज खोला और पहले तो पानी की बोतल निकालकर सीधे पानी पीने लगा और उसके बाद फ्रिज में रखी चॉकलेट्स उठाकर ले आया. सरिता काफ़ी हैरान थी कि सुमन अपने बेटे को रोक-टोक भी नहीं कर रही.
सरिता ने कहा, “बेटा आर्यन जब आप किसी और के घर जाते हो, तो अपने आप ऐसे फ्रिज नहीं खोलते, ये बैड मैनर्स होते हैं.”
इतने में ही आर्यन ने कहा, “चुप!” और फिर वो हंसने लगा.
सुमन भी हंसते हुए बोली, “ये तो ऐसा ही है, अभी बच्चा है तो समझ नहीं है. ये तो हमारे फैमिली डॉक्टर के क्लिनिक पर जाते ही उनका फ्रिज खोलकर चॉकलेट्स निकाल लेता है.”
सरिता आर्यन के बिहेवियर से कहीं ज़्यादा हैरान सुमन के व्यवहार और रिएक्शन पर थी. उसने सुमन को समझाया, “बच्चों को संस्कार देने की यही उम्र होती है और इस उम्र में जो वो सीखेंगे, वो उनके संस्कार बनते हैं. अब जैसे आर्यन ने मुझे चुप कहा, तब तुझे उसे समझाना चाहिए था कि बड़ों से ऐसे बात नहीं करते.”
“सरिता, तू कुछ ज़्यादा ही सोच रही है. अभी ये महज़ चार साल का बच्चा है. बड़ा होकर ख़ुद समझ जाएगा. चल मैं चलती हूं.”
– ये महज़ एक उदाहरण नहीं है, आजकल के पैरेंट्स अपने बच्चों की परवरिश इसी तरह से करते हैं.
– दरअसल उनके पास वक़्त होता नहीं, बच्चों के हाथ में मोबाइल पकड़ाकर ख़ुद भी रील्स बनाने में बिज़ी रहते हैं.
– बच्चे ने ज़िद की, तो उसे कुछ ख़रीदकर दे दिया.
– बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हें समझाना, अपने संस्कार और संस्कृति के बारे में बताना, रात में कहानियां सुनाना इन सबकी जगह अब मोबाइल फोन ने ले ली है.

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– आजकल पैरेंट्स को लगता है कि बच्चों की ज़िद पूरी करना ही प्यार है, जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. इसे भी हम एक उदाहरण से समझेंगे.
निहारिका सिंगल मदर थी. वो बैंक में जॉब करती थी और उसकी एक ही बेटी थी निशा, जो अक्सर निहारिका को फोन करके नई-नई डिमांड्स रखती थी. जब तक डिमांड्स छोटी थीं, निहारिका उसे पूरा करती रही यह सोचकर कि मैं सारा दिन काम पर रहती हूं, बच्ची अकेली रहती है. लेकिन धीरे-धीरे निशा की डिमांड्स बढ़ती गईं. उसके शौक महंगे हो चले थे और वो अपनी मां से कभी महंगा फोन तो कभी पार्टी करने के लिए ढेर सारे पैसे मांगती. और जब निहारिका विरोध करती, तो वो ख़ुद को कमरे में बंद करके अपनी जान ले लेने की धमकी देती. धीरे-धीरे निशा का व्यवहार और भी बिगड़ने लगा. मां ने प्यार से समझाना चाहा, लेकिन एक दिन वो एक लड़के के साथ भाग गई और नोट लिख दिया कि उसे ढूंढ़ने की कोशिश न करें. अब वो बालिग है और अपने निर्णय ख़ुद ले सकती है.
– बेहतर होता कि निहारिका बेटी की धमकियों से न डरकर उसे किसी विशेषज्ञ को दिखाती.
– बचपन में उसकी हर डिमांड पूरी न करके उसे पैसों का महत्व समझाती.
– बेटी को वक़्त देती और अच्छे-बुरे का फ़र्क़ समझाती, हमारे संस्कार क्या हैं और उनका कितना महत्व है हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में, यह समझाती.
– दरअसल बच्चे पालना आसान नहीं, उन्हें गढ़ना पड़ता है बचपन से ही, जिसके लिए पैरेंट्स को अपना समय और मेहनत दोनों ही देनी पड़ती है.
– ज़रूरत पड़ने पर बच्चों को डांटना भी ज़रूरी होता है, हर चीज़ हंसी में टालना आगे चलकर भारी पड़ सकता है.
– बच्चों को सिखाएं कि बड़ों को देखकर नमस्ते कहें, बुज़ुर्गों के पैर छूएं, किसी के घर जाने पर चीज़ों को न छेड़ें और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर बात न करें.
– बच्चों को सुबह जल्दी उठने और रात को समय पर सोने का महत्व बताएं. उनके सुबह के रूटीन में पूजा-पाठ भी शामिल करें और यह आदत डालें कि बड़ों के पैर छूकर ही घर से बाहर निकलें.
– उन्हें हमारे वीर-वीरांगनाओं के बारे में बताएं, हेल्दी खाने का महत्व बताएं.
– खाने में बच्चों के पोषण का ख़्याल रखें. कभी-कभार उनकी क्रेविंग्स का भी ध्यान रखें.
– अगर बच्चा बाहर कोई बदतमीज़ी करता है, तो वहां उसे थप्पड़ जड़ने की बजाय घर आकर प्यार से समझाएं कि वो व्यवहार ग़लत
था.
– और सबसे बड़ी बात कि बच्चे लेक्चर से नहीं सीखते, वो देखकर सीखते हैं और यही वजह है कि आजकल के पैरेंट्स पैरेंटिंग में फेल हो रहे हैं, क्योंकि वो ख़ुद देर रात तक मोबाइल चलाते हैं और बच्चे डिस्टर्ब न करें, इसलिए उनको भी फोन ही दे देते हैं.
– बच्चे उपदेश से नहीं आचरण देखकर सीखते हैं. आप झूठ बोलेंगे, तो बच्चा भी वही सीखेगा.
– बच्चों की ग़लतियों को कभी छिपाएं नहीं, बल्कि उन्हें सुधारें. अक्सर माएं अपने बच्चों की शिकायत मिलने पर टीचर या पड़ोसी को ही बुरा-भला कहती हैं, इससे बच्चा और बिगड़ता है, क्योंकि वो समझ जाता है कि आपकी ममता आपकी कमज़ोरी है और फिर वो उसका फ़ायदा उठाने लगते हैं.

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– बेहतर होगा कि बच्चे को उसी वक़्त सॉरी कहने को कहें और घर जाकर प्यार से समझाएं कि सॉरी बोलना कमज़ोरी नहीं, बल्कि मज़बूत व्यक्तित्व की पहचान है.
– बच्चों को सच बोलने का महत्व, अपनी ग़लती स्वीकारना, माफ़ी मांगना, शेयर और मदद की भावना विकसित करना सिखाएं.
– पहले जॉइंट फैमिली में बच्चे अनुशासन में रहते थे. उनके पढ़ने-खेलने और टीवी देखने तक का एक निश्‍चित टाइम टेबल होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. पैरेंट्स के साथ-साथ बच्चों को भी ये सब आउटडेटेड लगता है, क्योंकि अपने आसपास वो रील्स और डिजिटल वर्ल्ड ही देखते हैं और उनके दोस्त भी, दोस्तों के पैरेंट्स भी यही सब करते दिखते हैं. उन्हें फोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट होने लगता है.
– लेकिन यह पैरेंट्स को तय करना है कि वो अपने बच्चों को संस्कारी बनाना चाहते हैं या रीलबाज़ और गालीबाज़. बच्चों को रियल वर्ल्ड से मिलवाएं, अपनों के साथ उनका इंटरेक्शन बढ़ाएं, क्योंकि सारी दुनिया डिजिटल वर्ल्ड में खोई नहीं है, रियल लाइफ, क्वालिटी टाइम और अपनों का साथ कितना अच्छा होता है, इससे वो तभी वाकिफ़ होंगे जब आप उन्हें ऐसी दुनिया देंगे.
– संस्कार एक ऑनगोइंग प्रोसेस होते है, जो हर छोटी-छोटी बातों से आते हैं.
– बच्चों को प्यार ज़रूर दें, लेकिन प्यार के साथ-साथ संस्कार भी ज़रूरी हैं, ताकि आगे चलकर आपको अपने बच्चों के कारण शर्मिंदा न होना पड़े.
– गीता शर्मा

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Sources: Shutterstock

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