अब डर की जगह ग़ुस्से ने ले ली और अगले कुछ समय में ही मेरे चप्पल की मार से वो तड़प रहा था. दरवाजे के बाहर भीड़ लगी थी और उस भीड़ में छिपे कुछ कॉकरोच नालियों की तरफ़ भाग रहे थे.
सपनों की इस नगरी में बहुमंजिला इमारत में बने मेरे ऑफिस में भी कॉकरोच दिख ही जाते थे. मैं आज भी उन्हें देखते ही रास्ता बदल लेती थी. बचपन में मां कहती थी, “रसोई में झूठे बर्तन नहीं छोड़ना चाहिए, वरना कॉकरोच आते हैं.”
पूरी ज़िंदगी यही कोशिश करती रही कि सब कुछ साफ़ रखूं! कॉकरोच से बहुत डर लगता था. पता नहीं डर लगता था या घिन आती थी उसे सामने देख कर ही मैं वहां से भाग जाती थी.
पढ़ने का बहुत शौक था तो आगे की पढ़ाई के लिए शहर आ गई. मां के बिना रहना बहुत मुश्किल था, लेकिन उनकी हिदायतों के साथ एक नए सफ़र पर निकल पड़ी थी. जब वहां भी कॉकरोच दिखता तो मैं सोचती, मां तो कहती थी कॉकरोच गंदगी देख आते हैं, पर यहां… फिर सोचा मैं अकेली थोड़े ही रहती हूं.बहुत भीड़ है लोगों की किसी और ने गंदगी कर दी होगी. कॉकरोच से डर ख़त्मनहीं हुआ था उसे सामने देख कर ही अजीब सी हालत हो जाती, लगता उसके हाथ पैर सब मुझ पर रेंग रहे हैं.
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मेरी नौकरी लगने का समाचार सुन मां बहुत ख़ुश थी. कह रही थी, “अब तो मेरी बिट्टो को कॉकरोच से डर नहीं लगता होगा!”
मेरे हां कहने पर हंसने लगीं, बोली, “बाज़ार में इन्हें भगाने की बहुत सी दवाइयां आने लगी हैं.”
आजकल एक स्प्रे हमेशा पर्स में रखा रहता है. मां कहती है, “तू फालतू ही इतना डरती है. चप्पल निकाल कर मार दिया कर.” अब मां को क्या बताती मेरी चप्पल भी तो गंदी हो जाएगी!
सुबह से सिर भन्ना रहा था. प्रमोशन पाने की सच्ची हक़दार तो मैं हूं फिर सुनैना को प्रमोशन देने की बात क्यों चल रही है. सर से कारण पूछने के लिए उनके केबिन में गई थी.
अभी मैं अपनी बात कह ही रही थी कि वहां कॉकरोच निकल आया. मैंने ध्यान से देखा वहां कोई गंदगी तो नहीं थी फिर भी… मैं कांप रही थी, लेकिन वो पूरी निर्लज्जता से आगे बढ़ रहा था. मैंने आंखें मूंद कर अपने कदम पीछे किए तब तक वो मेरे पांव तक आ चुका था. पूरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई. तब तक लगा मां सामने खड़ी है.
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अब डर की जगह ग़ुस्से ने ले ली और अगले कुछ समय में ही मेरे चप्पल की मार से वो तड़प रहा था. दरवाजे के बाहर भीड़ लगी थी और उस भीड़ में छिपे कुछ कॉकरोच नालियों की तरफ़ भाग रहे थे.
– पल्लवी विनोद
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