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कहानी- साल में एक रात (Short Story- Saal Mein Ek Raat)

रामकिशोर बाबू ने कांपती आवाज़ में साथ दिया. दोनों की बूढ़ी आवाज़ें चांदनी में घुल गईं. फिर उन्होंने पत्नी के कंधे पर उंगली से वही नज़्म लिखनी शुरू की, जो ब्याह के बाद पहली बार रची थी. सावित्री हंस पड़ीं, किसी नई दुल्हन की तरह. “गुदगुदी होती है.”

शहर की चौदहवीं मंज़िल पर अमन बालकनी में खड़ा था. सामने इमारतों के बीच चांद था, जैसे किसी ने उसे भी ऊपर  चढ़ा दिया हो. नीचे गाड़ियों का शोर था, ऊपर बस एक अकेला चांद. उसने तस्वीर खींची और मां-बाबूजी को भेज दी. फिर मन ही मन बुदबुदाया:

शहर की भीड़ में चांद भी तन्हा निकला है, हर खिड़की में रोशनी है, पर कोई छत पर नहीं आता.

उधर गांव के घर की छत पर दरी बिछ चुकी थी. बीच में स्टील के कटोरे में खीर ढकी रखी थी. रामकिशोर बाबू ने पत्नी सावित्री का हाथ थामकर उन्हें सीढ़ियां चढ़ाईं. पैंतालीस बरस से यही नियमथा. बच्चे बड़े शहरों में जा बसे थे, फोन पर त्योहार मना लेते थे, पर यह रात इन दोनों की अपनी थी.

इस बार सावित्री कुछ अलग थीं. महीनों से उनकी याददाश्त धुंधली हो रही थी. कल उन्होंने चाय देने आए पति से पूछा था, “आप किसके घर से आए हैं?” रामकिशोर बाबू देर तक आंगन में बैठे अपनी हथेलियां देखते रहे थे.

छत पर कभी आंचल उंगली में लपेटतीं, कभी पूछतीं, “हम यहां क्यों आए हैं? अम्मा डांटेंगी.”

रामकिशोर बाबू मुस्कुराकर कहते, “आज चांद देखना है, अम्मा ने ही भेजा है.”

वे जान चुके थे कि अब सच से ज़्यादा काम झूठी तसल्ली आती है.

पूरब में बादल हटे और चांद उगा. पूरा, गोल, हल्दी में नहाया हुआ. तभी सावित्री चुप हो गईं. उनकी आंखें चांद पर टिक गईं. होंठ हिले, पहले बिना आवाज़ के, फिर एक धुन फूट पड़ी.

वही पुराना गीत, जो रामकिशोर ने ब्याह की पहली शरद पूर्णिमा पर उन्हें सुनाया था. शब्द उन्हें एक एक याद थे.

वो भूल गई है अपने बेटे का नाम भी अब, पर चांद देखा तो पूरी धुन होंठों पर आ गई.

रामकिशोर बाबू ने कांपती आवाज़ में साथ दिया. दोनों की बूढ़ी आवाज़ें चांदनी में घुल गईं. फिर उन्होंने पत्नी के कंधे पर उंगली से वही नज़्म लिखनी शुरू की, जो ब्याह के बाद पहली बार रची थी.

सावित्री हंस पड़ीं, किसी नई दुल्हन की तरह.

“गुदगुदी होती है.”

“होने दो.” उन्होंने कहा.

“साल में एक ही रात तो है.”

सावित्री ने उनके कंधे पर सिर टिका दिया.

“आप बहुत अच्छा गाते हैं. मेरे उनको भी यह गीत बहुत पसंद है.”

पहचान तो गई, पर चेहरा याद नहीं रहा, दिल को मगर हर सुर का पता याद रहा.

रामकिशोर बाबू की आंखें भर आईं, होंठों पर मुस्कान बनी रही.

“उनसे कहना, वे आपको बहुत चाहते हैं.”

“कह दूंगी.” सावित्री ने आंखें मूंदकर कहा.

“वे रोज़ आते हैं मुझसे मिलने.”

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उसी वक़्त शहर में अमन के फोन पर मां बाबूजी की तस्वीर आई. दोनों छत पर, चांदनी में, एक दूसरे के कंधे से टिके. नीचे बाबूजी ने बस इतना लिखा था- “तुम्हारी मां ने आज पूरा गीत गाया.”

अमन देर तक बालकनी में खड़ा रहा. फिर उसने चांद की तरफ़ देखकर धीमे से वही गीत गुनगुनाना शुरू किया, चौदहवीं मंज़िल से, सैकड़ों मील दूर.

चांद वही है, बस पते बदल गए हैं, मां-पिता गांव में रह गए और हम शहर में बह गए.

रात के आख़िरी पहर में चांद बुझने लगा. रामकिशोर बाबू ने

पत्नी के माथे पर विदा का चुम्बन रखा और फुसफुसाए, “अगले बरस फिर मिलेंगे.”

नींद में डूबती सावित्री ने हामी भर दी.

याद चली जाती है, चेहरे भी धुंधला जाते हैं, पर सच्चे प्रेम की धुन कहीं न कहीं बची रह जाती है.

– तेजस मिश्रा

 

 

 

 

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Photo Courtesy: Freepik

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