जैसा कि शीर्षक से ही आप समझ गए होंगे कि वो पीढ़ी जिन पर एक तरफ़ बच्चों की अच्छी परवरिश की ज़िम्मेदारी रहती है, तो वहीं अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल का भी दायित्व रहता है. यह वो पीढ़ी है, जो दोहरी रिस्पॉन्सिबिलिटी अपने अकेले कंधे पर उठाती हुई चलती है.
अमूमन 35-40 से लेकर 50 तक की उम्र के लोग सैंडविच जेनरेशन में आते हैं. इसे सिलसिलेवार समझें, तो इस उम्र में शादी व करियर-बिज़नेस के उतार-चढ़ाव से गुज़रने के साथ-साथ उन्हें अपने उन तमाम कर्तव्यों को भी निभाना पड़ता है, जो उनके हिस्से में है. इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिक रेखा कुंदर से हमने विस्तार से बातचीत की.
यदि घर में एक ही कमानेवाला हो, तो सैंडविच जनरेशन के लिए स्थिति थोड़ी और भी संघर्षपूर्ण हो जाती है, जैसे-
* पत्नी की हर छोटी-बड़ी ज़रूरतों का ध्यान रखना. यदि गर्भवती है, तो मां-बच्चे दोनों की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करना.
* उस पर बच्चे की परवरिश, स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई-लिखाई से लेकर शादी करने और सेटल करने तक की ज़िम्मेदारी.
* इन सबके साथ-साथ बुज़ुर्ग हो रहे माता-पिता के स्वास्थ्य से लेकर दवा, अन्य ज़रूरतों पर होने वाले ख़र्चों का वहन करना. साथ ही उनके कंफर्ट और आराम का भी ख़्याल रखना.
डबल इनकम का फ़ायदा
हां यदि पति-पत्नी दोनों ही कमाते हैं, तो यह बोझ थोड़ा हल्का ज़रूर हो जाता है, लेकिन कम नहीं होता. किंतु यह भी मानी हुई बात है कि यदि आप अपने हर काम को सूझबूझ के साथ मैनेज करते हैं, तो बहुत कुछ आसान होता चला जाता है.
अपने तो अपने होते हैं…
बिज़नेसमैन यज्ञनेश त्रिवेदी का कहना है कि यूं तो मैं अपने सभी काम को व्यवस्थित करने की पूरी कोशिश करता हूं, लेकिन कई बार परेशान भी हो जाता हूं. ऐसे में मेरी पत्नी का पूरा सहयोग मिलता है. वो परिवार से जुड़ी हर ज़िम्मेदारियों को इतनी ख़ूबसूरती से संभाल लेती है कि मैं एक तरह से अपनों से जुड़ी आवश्यक ज़रूरतों के प्रति निश्चिंत हो जाता हूं. उसे फायनेंस में भी रुचि है. इस कारण मैं अपने महत्वपूणर्र् इंवेस्टमेंट्स को लेकर उसे बताता रहता हूं और वो भी उपयोगी सलाह देती रहती है. रही पैरेंट्स की बात, तो उनका साथ भी दायित्वों को कम करने में हमेशा ही सहयोगी रहता है. हां, बेटी चूंकि जेन जी है तो उनसे हम क्या ही आशा रखें. लेकिन मेरा हमेशा से ही मानना रहा है कि यदि फैमिली के साथ आपकी बॉन्डिंग अच्छी हो और हर कोई एक-दूसरे को पूरी तरह से सहयोग दे, तो सब कुछ आसान हो जाता है. पैरेंट्स और वाइफ के इसी साथ के कारण मैं सैंडविच जनरेशन का होने के बावजूद दोहरी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी निभा पा रहा हूं. वो कहते हैं ना, अपने तो अपने होते हैं. फिर तो हर सपने सच होते हैं.
यूं मैनेज करें अपनी ज़िम्मेदारियों को…
– अपने इस दोहरे बोझ को कम करने के लिए सबसे पहले अपने सभी आवश्यक दायित्वों को योजनाबद्ध तरी़के से अलग-अलग कर लें, जैसे- फाइनेंशियल स्थिति को मज़बूत करना, छोटे-छोटे सेविंग से लेकर इंवेस्टमेंट करना, ताकि इमर्जेंसी में काम आ सके.
– ज़िम्मेदारियों को आपस में बांटने में संकोच बिल्कुल न करें. अक्सर पार्टनर बहुत सारे काम जीवनसाथी को इस करके भी नहीं करने देते कि उससे नहीं होगा. जबकि हक़ीक़त में ऐसा होता नहीं, ख़ासकर बैंक के काम, पूंजी निवेश करना, फाइनेंस से जुड़े कामों में पति महाशय न तो पत्नी का सहयोग लेते हैं और न ही उन्हें विस्तार से पूंजी निवेश के बारे में बताते हैं. इस तरह अकेले वित्तीय दायित्व का बोझ ढोते रहते हैं.
ज्वाइंट फैमिली का फ़ायदा
यदि आप संयुक्त परिवार में रहते हैं, तो परिवार के सदस्यों को उनकी योग्यता के अनुसार काम बांटें. इसमें पति-पत्नी, भाई-बहन, टीनएज बच्चे सभी आ जाते हैं. ऐसा करने से न केवल काम सही तरी़के से समय पर हो पाएगा, बल्कि हर कोई हल्का भी महसूस करेगा.
अपनों से, घरवालों व परिवार के क़रीबी लोगों से हर मुद्दे पर खुलकर बात करें. इससे वे भी आपके काम के बोझ को अच्छी तरह समझ सकेंगे. साथ ही हर कोई अपनी क्षमता अनुसार मदद भी कर सकेगा.
पैरेंट्स केयर
कई घरों में देखा गया है कि वृद्ध माता-पिता की देखभाल को लेकर भी असमंजसता बनी रहती है, ख़ासकर यदि वे गंभीर रूप से बीमार हैं. ऐसे में यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि उनके लिए अच्छा केयर टेकर रखा जाए. इससे पैरेंट्स की उचित देखभाल हो सकेगी और आप भी थोड़ा समय स्वयं के लिए निकाल सकेंगे.
सब कुछ नहीं कर सकते…
हर व्यक्ति की चाह रहती है कि मैं लोगों के गुड बुक्स में रहूं और यह अच्छी बात भी है. लेकिन रुकिए ज़रा, यदि आपको लगे कि आपके फ्रेंड ने कोई काम आपसे कहा है और दोस्ती व संकोचवश आप उसे ना नहीं कह पा रहे हैं, तो ऐसा बिल्कुल भी न करें. घर-बाहर, ऑफिस-बिज़नेस आदि के कारण ऐसा कई बार देखा गया है कि व्यक्ति के पास अन्य काम के लिए समय नहीं रहता. परंतु भलमनसाहत के चलते और रिश्तों की ख़ातिर वे हां कह देते हैं. कभी-कभी काम के बोझ तले दबने से बेहतर है कि ना कहें या फिर कहें कि आपसे नहीं हो पाएगा. हो सकता है उस व़क्त सामनेवाले को आपकी बात बुरी लगे, पर भविष्य में आपकी स्पष्टवादिता उन्हें सही भी लगेगी.
प्लानिंग है ज़रूरी
अपनी ज़िंदगी में हर दौर की प्लानिंग आपको समय से पहले कर लेनी चाहिए, उदाहरण के लिए फैमिली का मेडिक्लेम, बच्चों की एजुकेशन, घर ख़रीदना, शादी-ब्याह के ख़र्च, रिटायरमेंट को लेकर भविष्य निधि योजना आदि को लेकर यदि पहले से सही तरी़के से प्लानिंग कर लेते हैं, तो बहुत सारे गैरज़रूरी बोझ से मुक्त हो जाते हैं. इसके लिए बजट बनाना और पूंजी निवेश करना बेहतरीन विकल्प है. हां, आपकी हर प्लानिंग कुछ इस तरह होनी चाहिए कि लोन या फिर किसी भी तरह के कर्ज़ लेने से बच सकें.
अपने लिए भी व़क्त निकालें
ख़ुद का ख़्याल रखना न भूलें. पर्सनल स्पेस को महत्व दें. नियमित रूप से सुबह टहलें, योग-प्राणायाम, एक्सरसाइज़ करें. अपनी हॉबीज़ के लिए भी थोड़ा सा समय निकालें.
– ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़ें: ज़िद्दी पार्टनर को कैसे हैंडल करेंः जानें ईज़ी टिप्स (How To Deal With A Stubborn Spouse: Some Easy Tips)
