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कहानी- शुरुआत नई सी (Short Story- Shuruaat Nai Si)

“नहीं. हम एक-दूसरे से प्रेम करते थे.” अभय को लगा जैसे कमरे में अचानक कोई ऐसी चीज़ आ गई हो, जिसके लिए उसके घर में जगह नहीं थी. “तुमने मुझसे कभी बताया क्यों नहीं.” “तुमने कभी पूछा नहीं.”

“क्या तुम्हें लगा नहीं कि मुझे यह जानने का हक़ है?”

 

अभय को हमेशा लगता था कि वह अपनी पत्नी को अच्छी तरह जानता है. पच्चीस साल का साथ, दो बच्चे, एक घर और ज़िंदगी की तमाम छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां. उसे मालूम था कि सविता को चाय में कितनी चीनी पसंद है, वह नाराज़ होने पर कितनी देर चुप रहती है और किस बात पर उसकी आंखें भर आती हैं. उसे यह भी लगताथा कि सविता के जीवन में उससे पहले और उसके अलावा कुछ ऐसा नहीं था, जिसे जानना उसके लिए दिनों की कुछ यादें थीं, बिछड़ने का दुख था और अंत में एक वाक्य था, जिसने अभय को भीतर तक बेचैन कर दिया.

“तुम्हारे साथ जीवन बिताना मेरे हिस्से में नहीं आया, लेकिन तुम्हें प्रेम करना मेरे जीवन का वह हिस्सा है, जिसे मैं झुठला नहीं सकता.”

अभय ने पत्र दोबारा पढ़ा. फिर तीसरी बार.

उसके भीतर अचानक एक ऐसे आदमी की कल्पना जन्म लेने लगी, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता था, लेकिन जो कभी सविता के जीवन में उससे पहले आया था. वह आदमी कैसा होगा. क्या सविता उससे प्रेम करती थी. क्या उसने भी कभी उसके साथ जीवन बिताने के सपने देखे होंगे. क्या दोनों ने एक-दूसरे से विवाह करने का वादा किया था.

सबसे अधिक उसे इस बात ने परेशान किया कि पच्चीस वर्षों में सविता ने कभी इस व्यक्ति का ज़िक्र नहीं किया था.

उस शाम सविता रसोई में थी. अभय ने पत्र उसकेसामने रख दिया.

सविता ने एक नज़र पत्र पर डाली और फिर अभय की ओर देखा. उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी, लेकिन एक पुरानी स्मृति के अचानक सामने आ जाने से उपजी असहजता ज़रूर थी.

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“तुम्हें यह कहां मिला?”

“तुम्हारी आलमारी में. कौन है यह आदमी?”

सविता कुछ देर चुप रही. फिर बोली, “मेरे कॉलेज के दिनों का एक परिचित.”

“सिर्फ़ परिचित?”

सविता ने उसकी आंखों में देखा.

“नहीं. हम एक-दूसरे से प्रेम करते थे.”

अभय को लगा जैसे कमरे में अचानक कोई ऐसी चीज़ आ गई हो, जिसके लिए उसके घर में जगह नहीं थी.

“तुमने मुझसे कभी बताया क्यों नहीं?”

“तुमने कभी पूछा नहीं.”

“क्या तुम्हें लगा नहीं कि मुझे यह जानने का हक़ है?”

सविता ने कोई जवाब नहीं दिया. वह पत्र उठाकरवापस लिफ़ाफ़े में रखने लगी.

अभय ने पहली बार उसकी आवाज़ में एक थकान महसूस की, जो रोज़मर्रा के काम से पैदा होने वाली थकान से अलग थी.

उस रात अभय सो नहीं सका. उसके मन में पच्चीस वर्षों की ज़िंदगी घूमती रही. सविता के साथ बिताए शुरुआती दिन, बच्चों का जन्म, आर्थिक परेशानियां, पिता की बीमारी, घर बदलना और वे तमाम अवसर जब दोनों ने एक-दूसरे के लिए अपनी सुविधाएं छोड़ी थीं.

उसे याद आया कि सविता ने उसकी मां की बीमारी के दौरान महीनों बिना शिकायत उनकी देखभाल की थी. जब अभय की नौकरी पर संकट आया था, तब उसने अपने गहने बेचने का सुझाव दिया था. बच्चों की पढ़ाई और घर के ख़र्चों के बीच उसने अपनी कई इच्छाएं टाल दी थीं.

फिर भी उस रात अभय के मन में एक अजीब सवाल बना रहा. क्या इन सबके बीच सविता के भीतर कोई ऐसा हिस्सा था, जहां उसकी पहुंच कभीनहीं हुई?

अगले कुछ दिनों तक दोनों के बीच एक अनकही दूरी बनी रही. अभय सामान्य व्यवहार करता, लेकिन जब भी सविता उसके सामने आती, उसे उस अज्ञात व्यक्ति का ध्यान आ जाता. उसे लगने लगा कि वह अपनी पत्नी के जीवन का एक ऐसाअध्याय पढ़ रहा है, जिसकी शुरुआत उससे पहलेहुई थी और जिसका अंत शायद अब तक नहीं हुआ था.

एक शाम उसने फिर बात छेड़ी.

“क्या तुम आज भी उससे प्रेम करती हो?”

सविता ने सिलाई करते हुए हाथ रोक दिए.

“तुम्हें इस सवाल का क्या जवाब चाहिए, अभय?”

“सच.”

“सच यह है कि मैं उससे प्रेम करती थी. यह भी सच है कि मैंने तुमसे विवाह किया. और यह भी सच है कि पिछले पच्चीस वर्षों से मैं तुम्हारे साथ अपना जीवन जी रही हूं. इनमें से कौन-सा सच दूसरे को झूठा बना देता है?”

अभय के पास कोई उत्तर नहीं था.

सविता ने सिलाई एक तरफ़ रख दी.

उसने बताया कि कॉलेज के दिनों में वे दोनों विवाह करना चाहते थे. लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलीं. उस युवक के परिवार ने कहीं और विवाह तय कर दिया और सविता के सामने भी अपने परिवार की जिम्मेदारियां थीं. कुछ समय तक दोनों ने संपर्क बनाए रखा, फिर धीरे धीरे बातचीत बंद हो गई.

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वर्षों बाद वह युवक एक बार उससे मिला था. तब तक सविता की शादी हो चुकी थी. उसने जाते समय वह पत्र दिया था. सविता उसे फेंक नहीं पाई. उसने उसे संभालकर रख लिया, जैसे हम अपनी ज़िंदगी के उन पुराने पन्नों को संभाल लेते हैं, जिन्हें दोबारा पढ़ने का इरादा नहीं होता, लेकिन मिटाने का मन भी नहीं करता.

“मैंने तुम्हें यह बात इसलिए नहीं बताई कि मैं तुमसे कुछ छिपाकर कोई दूसरा जीवन जी रही थी.” सविता ने कहा.

“मैंने इसलिए नहीं बताई क्योंकि वह मेरी ज़िंदगी का एक पुराना हिस्सा था. मैं नहीं चाहती थी कि तुम हर बार मेरे किसी फ़ैसले में उस आदमी को खोजने लगो.”

अभय ने धीमे स्वर में पूछा, “और अगर मैं भी तुम्हें अपने अतीत के बारे में कुछ ऐसा बताऊं तो?”

सविता ने कहा, “तो मैं सुनूंगी. शायद कुछ सवालकरूंगी. शायद मुझे बुरा भी लगे. मैं कोई संत नहीं हूं. लेकिन तुम्हारे अतीत को जान लेने से हमारेसाथ बिताए वर्षों का अर्थ अपने आप नहीं बदल जाएगा.”

कुछ देर बाद वह उठकर कमरे से बाहर चली गई.

अभय वहीं बैठा रहा. उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह सविता के प्रेम का हिसाब किसी पुराने पत्र के आधार पर लगाने लगा था. जैसे पच्चीस वर्षों के साथ का मूल्य तभी तय होगा, जब वह यह सुनिश्चित कर ले कि उसकी पत्नी ने कभी किसी और को नहीं चाहा था.

लेकिन क्या उसने स्वयं कभी ऐसा सोचा था कि सविता से मिलने से पहले उसके अपने जीवन में भी कुछ इच्छाएं, आकर्षण और कल्पनाएं रही होंगी, जिनका उसने कभी ज़िक्र नहीं किया?

अगली सुबह उसने वह पत्र सविता को लौटा दिया, “तुम इसे रखना चाहती हो तो रख सकती हो.”

सविता ने लिफ़ाफ़ा उसके हाथ से ले लिया. उसने धन्यवाद नहीं कहा,न कोई भावुक बात की. बस उसे वापस उसी पुराने डिब्बे में रख दिया, जिसमें उसके जीवन के कुछ दूसरे काग़ज़ भी रखे थे.

कई दिन बाद अभय ने उससे पूछा कि क्या वह कभी उस व्यक्ति से दोबारा मिलना चाहती थी.

सविता ने कहा, “कभी कभी मन में आया था कि पता नहीं वह कहाँ होगा, कैसा होगा. लेकिन किसी को याद करना औरउसके पास लौटना एक ही बात नहीं है.”

अभय ने पहली बार इस वाक्य को बिना किसी आपत्ति के सुना.

उस दिन के बाद उनके जीवन में कोई चमत्कारी बदलाव नहीं आया. सविता अब भी सुबह चाय बनाती थी, अभय अख़बार पढ़ता था, बच्चे फोन करते थे और महीने के अंत में ख़र्चों का हिसाब बनता था. उनके बीच प्रेम का कोई नया प्रदर्शन शुरू नहीं हुआ.

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लेकिन अभय के भीतर कुछ बदल गया था. अब वह सविता को केवल अपनी पत्नी के रूप में नहीं देख पाता था. वह सोचने लगा था कि उससे मिलने से पहले भी उसकी एक ज़िंदगी थी, जिसमें कुछ फ़ैसले उसने ख़ुद लिए थे, कुछ सपने देखे थे और कुछ अनुभव ऐसे थे जो केवल उसके अपने थे.

एक शाम उसने सविता से पूछा कि क्या वह कभीफिर से पढ़ाई करना चाहेगी. सविता ने हैरानी से उसकी ओर देखा. उसने बरसों पहले पढ़ाई आगे बढ़ाने की इच्छा जताई थी, लेकिन घर और बच्चोंके बीच वह बात कहीं पीछे छूट गई थी.

“अब इस उम्र में?” उसने मुस्कुराकर पूछा.

“उम्र तो मेरी भी हो रही है.” अभय ने कहा, ‘लेकिन शायद अभी कुछ चीज़ें की जा सकती हैं.”

सविता ने कोई जवाब नहीं दिया. वह उठकर अपनी आलमारी से पुराने प्रमाणपत्र निकालने लगी.

अभय उसे देखता रहा. उसे लगा कि इतने वर्षों में उसने अपनी पत्नी के बारे में बहुत कुछ जाना था, लेकिन जानने के लिए अब भी बहुत कुछ बाकी था.

उस रात वह देर तक सोचता रहा कि प्रेम शायद किसी व्यक्ति के अतीत को मिटा देने का नाम नहींहै. न ही यह इस बात का आश्वासन है कि उसके मन में कभी कोई दूसरा नाम नहीं आया होगा.

शायद प्रेम का अर्थ यह स्वीकार करना भी है कि जिस व्यक्ति के साथ हम अपना पूरा जीवन बिताते हैं, वह फिर भी अपने भीतर कुछ ऐसी जगहें बचाकर रख सकता है जहां हमारी पहुंच नहीं होती.

और उन जगहों का होना हमारे प्रेम का अपमान नहीं है.

अभय ने करवट बदलकर देखा. सविता सो चुकी थी. उसके चेहरे पर दिनभर की थकान थी और माथे पर कुछ सफ़ेद बाल बिखरे हुए थे.

उसे पहली बार लगा कि वह इस स्त्री को पच्चीस वर्षों से प्रेम करता आया है, लेकिन शायद अब जाकर उसे जानने की एक नई सी शुरुआत कर रहा है.

– आरती मिश्रा

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