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कहानी- छोटा बड़ा (Short Story- Chhota Bada)

संगीता माथुर

 

 

 

संगीता माथुर

“मैं तुम्हें छोड़ दूंगा. लेने आ जाऊंगा. साथ चलकर क्या करूंगा? इतने बड़े लोगों के बीच मैं कहां फिट होऊंगा?”
“यह छोटा बड़ा क्या होता है? बड़ा वह होता है, जो सामने वाले को छोटा महसूस न होने दे. मैम  इतने प्यार और अधिकार से बुला रही हैं. हम अवश्य चलेंगे. वहां सभी कपल होंगे. मैं अकेले क्यों जाऊं?”

 

पूनम ऑफिस के लिए लगभग तैयार हो चुकी थी, लेकिन चंदा का अभी तक भी कोई अता-पता नहीं था.
‘आज तो लगता है बिना नाश्ते के ही निकलना पड़ेगा. पहले से पता होता तो ख़ुद ही कुछ तैयार कर लेती.’
अब तक सुधीर भी तैयार होकर कमरे से बाहर आ गए थे. तभी हड़बड़ाती चंदा घर में प्रविष्ट हुई.
“आप और साहब पहले नाश्ता कर लीजिए. देर हो रही होगी.” कहते-कहते उसने अपने थैले में से एक कटोरदान निकालकर टेबल पर रख दिया.
“गरम-गरम पोहे हैं. घर के लिए बनाए थे. देर हो रही थी, तो आपके लिए भी साथ ही बना लाई.”
पति-पत्नी एक-दूसरे को देखने लगे थे.
“मेरी तो अभी एक क्लाइंट के साथ मीटिंग है. नाश्ता उसी के साथ लूंगा.” सुधीर के चेहरे पर शांति से बच निकलने के से भाव थे. पूनम ने पति को घूरकर देखा मानो शिकायत कर रही हो कि ख़ुद तो सफ़ाई से निकल गए और मुझे फंसा दिया.
“अरे तुम्हें भी तो आज ऑफिस जल्दी पहुंचना था. चलो मैं छोड़ता हुआ निकल जाऊंगा.”
पूनम ने राहत की सांस ली. किंतु गौर किया कि चंदा के चेहरे पर मायूसी पसर गई थी. शायद वह वस्तुस्थिति समझ गई थी. तभी ‘गुड मॉर्निंग!’ कहते हुए नन्हा प्रखर लॉबी में प्रविष्ट हुआ, तो सबका ध्यान उसकी ओर चला गया. चंदा के चेहरे पर फिर से मुस्कान खिल उठी.
“अरे मेरा राजा बेटा उठ गया! देखो आपके लिए नाश्ते में आज क्या है? आपका मनपसंद पोहा!” कहते हुए उसने कटोरदान खोल दिया और प्रखर को गोद में उठाकर दिखाने लगी.
“अरे वाह, इसमें तो अनार भी है. प्रखर बेटे के फेवरेट! अब जल्दी से पहले ब्रश कर लेते हैं. फिर मज़े से खाएंगे.” चंदा प्रखर को वॉशरूम ले जाने लगी, तो पूनम ने अब घर से निकलने में ही भलाई समझी.
“ठीक है चंदा, हम निकल रहे हैं. प्रखर का बैग मैंने तैयार कर दिया था.” सुधीर के साथ पूनम भी निकल ली. जबकि हमेशा वह उसके जाने के बाद निकलती थी.
ऑफिस टाइम था, इसलिए सड़क पर भारी ट्रैफिक थी. सुधीर का पूरा ध्यान ड्राइविंग पर था. पूनम सशरीर गाड़ी में उपस्थित होकर भी मानो घर पर ही रह गई थी. चंदा के भरोसे ही वह इतनी कुशलता से अपनी नौकरी कर पा रही है. प्रखर और घर दोनों की ज़िम्मेदारी पूरी तरह चंदा पर सौंपकर वह एकदम निश्‍चिंतता से अपनी अन्य ज़िम्मेदारियां भी निभाए जा रही है.
छह साल पूर्व प्रखर के जन्म के समय चंदा ने नैनी के तौर पर घर में प्रवेश किया था. तब से वह प्रखर के साथ-साथ इस घर और घर की ज़रूरतों से भी जुड़ती चली गई. घर के अन्य कामों के लिए दूसरी बाई थी. चंदा का काम स़िर्फ और स़िर्फ प्रखर को संभालना था. उसे नहलाने, खिलाने, सुलाने के अलावा वह स्वेच्छा से उसके लिए कुकिंग भी कर लिया करती थी. प्रखर स्कूल जाने लगा, तो चंदा का कार्यभार अपेक्षाकृत बहुत घट गया. लेकिन पूनम ने उसके पैसे कम करने की बजाय उसे कुकिंग की ज़िम्मेदारी सौंप दी. चंदा को इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना भी ख़ूब भा रहा था. वह सवेरे जल्दी आकर सबका नाश्ता-भोजन बना देती थी. पूनम और सुधीर के ऑफिस चले जाने के बाद प्रखर को तैयार करती और पास ही के स्कूल छोड़ अपने घर लौट जाती.
दिन में प्रखर को घर लाकर उसके कपड़े बदलवाती, खाना खिलाती, सुलाती. फिर रात का खाना तैयार करती. पूनम और सुधीर के घर लौटते ही वह निकल जाती.

 

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“अरे क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोक दी?” झटके से गाड़ी एक रेस्तरां के बाहर रुकी, तो पूनम की विचार श्रृंखला भंग हुई.
“नाश्ता नहीं करना?” गाड़ी से उतरते हुए सुधीर ने सवाल उछाला.
“पर आपका तो क्लाइंट के साथ… ओह समझी!” उसकी तरह सुधीर भी चंदा के घर से बनकर आया नाश्ता अवॉइड करना चाह रहे थे. भले ही चंदा भी घर की एक सदस्या बन चुकी थी. घर पर भी रोज़ उसी के हाथ का बना खाते थे. पर इसका यह मतलब तो नहीं कि वे उसके घर से आया भी खा लें. प्रखर छोटा है, नासमझ है. वह यह सब भेद नहीं समझता. उसने अवश्य पोहे खाए होंगे. उस नादान को तो रोका भी नहीं जा सकता. वैसे भी क्या कहकर रोकते? कहीं हम ही तो ग़लत नहीं हैं? लेकिन चंदा ने आज ऐसा किया क्यों? कॉफी का सिप लेती पूनम ने पति की ओर ताका. वे नाश्ता टूंगने और मोबाइल देखने में व्यस्त थे.
‘ये मर्द लोग भी ना?’ पूनम मन ही मन झुंझला उठी. यदि सुधीर चंदा के लाए पोहे खा लेते, तो वह भी पीछे नहीं हटती. उनके बहाने ने ही उसे भी हिचकिचाने पर मजबूर कर दिया था. बेचारी चंदा! समझ तो गई होगी. कितना बुरा लगा होगा उसे! … अरे याद आया, उसे शाम को ज़्यादा देर रुकने का भी तो बोलना था.
पूनम का नाश्ता हो चुका था, तो उसने चंदा को फोन लगा दिया.
“प्रखर को छोड़ दिया स्कूल? अच्छा सुन, हम दोनों को शाम को एक पार्टी में जाना है. प्रखर जो खाए, उसे बनाकर खिला देना और सुला देना. वैसे तो जल्दी लौटने का प्रयास करेंगे, पर देर हो जाए तो रुक जाना.”
“रात को रुकने में मुझे कोई परेशानी नहीं है. आप आराम से आ जाना. अभी दो-चार दिन बस सुबह जल्दी आने की थोड़ी द़िक्क़त होगी. क्या है कि बहू को सुबह किसी मांजी को तैयार करने का काम मिल गया है. वे तो रात को भी वही रुकाना चाहते हैं. पर मेरा बेटा तैयार नहीं हुआ, तो वह सुबह जल्दी निकल गई. पति और बेटे को भी काम पर जाना होता है, तो मुझे उनका नाश्ता तैयार करने के लिए रुकना पड़ा. मन में आया आपके यहां पहुंचते-पहुंचते देर हो जाएगी. फिर बनाऊंगी, तब तक आप रुकेंगे नहीं, तो साथ ही आपका भी बनाकर ले आई.”

 


“पर ऐसे कितने दिन चलेगा?” वास्तविकता जानकर पूनम के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं. वह बाहर आकर चहलकदमी करते हुए बतियाने लगी.
“बस दो-चार दिन की बात है. बहू को स्कूटी चलानी आती है, तो बेटा अपने गैराज मालिक से एक सेकंड हैंड स्कूटी किस्तों पर ले रहा है. वह आ जाएगी, तो बहू सवेरे नाश्ता बनाकर उसी पर निकल जाया करेगी और मैं पहले की तरह समय पर आ जाया करूंगी.”
“ठीक है.” पूनम ने राहत की सांस लेकर फोन बंद कर दिया.
“चलें.” सुधीर आ गए थे. गाड़ी की ओर बढ़ते पूनम को ध्यान आया.
“मेरा पर्स नहीं लाए आप? वहीं दूसरी कुर्सी पर रखा था.”
“ओह, लाता हूं.”
धूप तीखी थी. थोड़े इंतज़ार के बाद पूनम भी अंदर चली गई.
“क्या हुआ?”
“हमारा वाला वेटर किचन में गया बताते हैं. वही पर्स के बारे में बताएगा… भाई कितनी देर लगेगी? बुलाओ ना उसे.” सुधीर ने किचन के अंदर जाते दूसरे वेटर से कहा.
“भेजता हूं.” वह अंदर घुसा, तो जाने क्या सोचकर खुलते दरवाज़े से पूनम भी किचन में प्रविष्ट हो गई. पीछे-पीछे सुधीर भी चले गए
“अरे आप अंदर नहीं आ सकते. अलाउड नहीं है.” वेटर चिल्लाता ही रह गया.
अंदर की अव्यवस्था और गंदगी का साम्राज्य देख पति-पत्नी स्तंभित रह गए. मुरझाई, सड़ी-गली सब्ज़ियों के ढेर में से ही एक आदमी बिना दस्ताने पहने खांसते हुए सब्ज़ियां काट रहा था. पास ही जूठन का ढेर लगा था. मक्खियां भिनभिना रही थीं. पूनम को उबकाई सी आने लगी. तभी उनका वाला वेटर बदहवास सा उन्हें ठेलते बाहर ले आया.
“उधर रिसेप्शन पर रखा है आपका पर्स.”
पूनम ने पर्स लेने के बाद खोलकर चेक करने की जहमत भी नहीं उठाई. और आकर गाड़ी में बैठ गई. रास्ते में सुधीर के आग्रह पर उसने एक बार टटोलकर चेक कर लिया, पर मूड उखड़ा ही रहा.
“डायनिंग एरिया तो एकदम साफ़ सुथरा और व्यवस्थित था.” सुधीर धीरे से बोल उठे. मानो उस होटल में लाकर उन्होंने कोई भूल कर दी हो.
“चंदा इससे लाख गुना सफ़ाई से खाना बनाती है. जाने कितनी बार तो बीच में हाथ धोती है. एक-एक बर्तन पोंछकर काम लेती है. सब्ज़ी-फल ज़रा सा भी ख़राब लगता है, तो निकाल देती है. कहती है ज़रा सा लालच स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है. स्वच्छता जिसकी आदत में शुमार हो, वह घर हो या बाहर हर जगह सफ़ाई ही रखेगा. चंदा की पैरवी करती पूनम मानो एक तरह से अपने सुबह के व्यवहार के लिए पति को दोषी ठहरा रही थी. प्रत्युत्तर में सुधीर मौन किंतु गंभीर थे. शायद वह भी पूनम की बातों से सहमत नज़र आ रहे थे.
पूनम का ऑफिस आ गया था. आज बॉस छुट्टी पर थीं. पूरे ऑफिस को पता था कि उनके घर आज कोई बड़ी पार्टी है. लेकिन उसमें पूनम भी अपने पति सहित आमंत्रित है, यह कोई नहीं जानता था. एक दिन पूर्व ही जब वह उनके चेंबर में कोई फाइल लेकर गई थी तो उन्होंने साइन करने के बाद उसे रोक लिया था.

 

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“कल मैं छुट्टी पर रहूंगी. घर पर दोस्तों और रिश्तेदारों का एक गेट टुगेदर रखा है. तुम्हें भी आना है.”
“म.. मैं?” पूनम चौंक गई थी. पर अंदर ही अंदर गुदगुदी उठी थी.
“हां. कोई परेशानी?”
“नहीं! पर…”
“मैं तुम्हारे काम की सुघड़ता, सुप्रबंधन से प्रभावित हूं. मैं चाहती हूं पार्टी का प्रबंध भी तुम देखो. वैसे तो सब व्यवस्था हो चुकी है. केटरर आएगा. पर मैं चाहती हूं घर का यानी अपना कोई सदस्य सब कामों पर नज़र रखे. गर्म खाना सर्व करवाता रहे. सब तक सब पहुंच रहा है या नहीं, चेक करता रहे. तुम कर सकती हो मुझे भरोसा है.” अपनी प्रशंसा सुन पूनम फिर एक बार अंदर तक गुदगुदा उठी थी.
“पर मैं रोज़ ऑफिस से पति के साथ घर निकल जाती हूं. रात को देर हुई तो?” पूनम को लगा अब वे कहेंगी कि मैं ड्राइवर के साथ छुड़वा दूंगी. पर वे कुछ सोचकर बोलीं, “अपने पति को भी साथ ले आना. और जल्दी आने की कोशिश करना. पर ऑफिस टाइम ख़त्म करके आना, ताकि किसी को पता ना चले कि तुम यहां निमंत्रित हो, क्योंकि मैंने और किसी को नहीं कहा है.”
“ठीक है मैम!” पूनम के मन में लड्डू फूट रहे थे. उसे वीआईपी जैसी अनुभूति हो रही थी. सुधीर को उसने चहकते हुए इस बारे में बताया था. उत्साहित पूनम ने अपने लिए एक नई ड्रेस भी ऑर्डर कर ली थी. पर सुधीर ने कोई उत्साह नहीं दिखाया था.
“मैं तुम्हें छोड़ दूंगा. लेने आ जाऊंगा. साथ चलकर क्या करूंगा? इतने बड़े लोगों के बीच मैं कहां फिट होऊंगा?”
“यह छोटा बड़ा क्या होता है? बड़ा वह होता है, जो सामने वाले को छोटा महसूस न होने दे. मैम इतने प्यार और अधिकार से बुला रही हैं. हम अवश्य चलेंगे. वहां सभी कपल होंगे. मैं अकेले क्यों जाऊं?” पूनम का मन रखने के लिए सुधीर ने सहमति दे दी थी.
पूनम का ख़ुद का घर दूर था. इसलिए सुधीर के दोस्त के घर जाकर दोनों कपड़े बदलकर तैयार हुए. कपड़े पूनम ने रात में ही बैग में रख लिए थे. वहां भी पूनम ने बड़े गर्व से बॉस की पार्टी में शरीक होने की बात शेयर की.

पार्टी में पहुंचते ही उत्साहित पूनम पति को बॉस से मिलवाने उनकी ओर लपक ली.
“नमस्ते मैम! ये मेरे पति सुधीर!”
“नमस्ते!” उन्होंने उचटती सी नज़र सुधीर पर डाली.
“इतनी देर कैसे कर दी?.. अच्छा अब किचन देखो. अभी तक ड्रिंक और स्टार्टर सर्व नहीं हुए हैं.”
सुधीर को एक टेबल पर बैठाकर पूनम किचन की ओर चली गई. सब सर्व करवाते हुए वह पसीने-पसीने हो गई. मेकअप बह निकला. नई ड्रेस चिपचिपाने लगी.
चलो हो गया. राहत की सांस लेते हुए वह बाहर आकर सुधीर को ढूंढ़ने लगी.
“अरे आप इधर कोने में क्यों खड़े हो? कुछ लिया?” पूनम ने पास से गुज़रते वेटर को रोका. उससे मॉकटेल और स्टार्टर्स लिए और एक टेबल पर बैठ गए. ड्रिंक ख़त्म कर उसने मंचूरियन का एक टुकड़ा मुंह में रखा ही था कि कहीं दूर से मैम ने उसे देख लिया और आवाज़ लगा दी.
“मैं आती हूं. आप लो.”
“मेन कोर्स लगवा दो. बहुत देर हो गई है. और हां ध्यान रखना सब गर्म हो. स्टार्टर्स भी तेज़ गरम नहीं थे.”
“यह क्या कैटरिंग वालों की ओर से है?” मैम के साथ खड़ी एक सजी-धजी महिला ने पूछा.
“नहीं, मेरे ऑफिस की एम्पलाई है. मैंने मदद के लिए बुला लिया था.” इसके साथ ही उपस्थित महिलाओं में खुसर-पुसर आरंभ हो गई थी.
“फ्री की सर्विस लेने का अपना ही मज़ा है!”
“फ्री क्यों? अपने पति के साथ खाना खाकर जाएगी यहां से. वह उधर कोने में बेचारा अकेला सा जो बैठा है, शायद वही इसका पति है.” महिलाओं में उंगली उठाकर उचक-उचककर सुधीर को देखने की होड़ सी लग गई थी. पूनम का मन हुआ धरती फट जाए और वह उसी पल उसमें समा जाए.
तभी उसका मोबाइल बज उठा. दूसरी ओर चंदा थी.
“प्रखर बाबा सो गए हैं. आप उनकी चिंता मत करना. मैं यही हूं उनके पास.” पूनम को मानो किसी ने संजीवनी बूटी सुंघा दी हो.
“अच्छा सुन, मैं और साहब निकल ही रहे हैं. खाना घर आकर खाएंगे. तेरा भी बना लेना. और हां बाद में साहब तुझे ख़ुद घर छोड़कर आएंगे.” पूनम एक पल रुकी. फिर मानो इतने से ही संतुष्टि नहीं हुई हो, इसलिए आगे बोली.
“… और हां एक बात और कहीं भूल ना जाऊं. कल उपमा बना लाना. हम सबको तेरे हाथ का उपमा बहुत पसंद है.” गर्व से ग्रीवा तान सधे कदमों से पूनम सुधीर की ओर बढ़ गई.

 

 

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