“जानते हो, पहले मुझे लगता था कि प्यार का मतलब है किसी का बार-बार यह कहना कि वह हमसे कितना प्यार करता है. अब लगता है, प्यार तो वहहै जब इतने साल बाद भी कोई हमारे पास बैठना चाहे, हमारी छोटी छोटी बातें याद रखे और दिन ख़त्म होने पर हमें अपने पास पाए.”
करवा चौथ की सुबह नंदिनी आलमारी साफ़ कर रही थी. त्योहार से पहले घर की सफ़ाई का
काम हर साल होता था, लेकिन इस बार पुराने सामान को समेटते हुए उसके हाथ एक छोटा सा डिब्बा लग गया. उसमें कुछ पुरानी तस्वीरें थीं, शादी के कार्ड थे और नीचे दबा हुआ एक लिफ़ाफ़ा था. लिफ़ाफ़े पर विवेक की लिखावट थी.
नंदिनी ने उसे खोला. भीतर एक पुराना प्रेमपत्र था, जो विवेक ने शादी से पहले उसे लिखा था.
उसने पढ़ना शुरू किया तो चेहरे पर धीरे धीरे मुस्कान आ गई.
विवेक ने उस पत्र में लिखा था कि वह हर दिन उसे प्यार करने की एक नई वजह देगा. वह चाहता था कि नंदिनी को कभी ऐसा न लगे कि शादी के बाद प्यार कम हो गया है. वह उसके साथ घूमना चाहता था, ख़ूब बातें करना चाहता था और ज़िंदगी की हर छोटी-बड़ी ख़ुशी में उसका साथी बनना चाहता था.
पत्र पढ़कर नंदिनी को हंसी भी आई और थोड़ा आश्चर्य भी हुआ. पच्चीस साल पहले यही विवेक था, जो उससे मिलने के लिए बेचैन रहता था. कभी मिलने का बहाना बनाता, कभी फोन पर देर तक बातें करता. और आज वही विवेक सुबह चाय पीते हुए अख़बार पढ़ता रहता था और कई
बार उसकी बात का जवाब भी बिना नज़र उठाए दे देता था.
हालांकि, ऐसा भी नहीं था कि उनके बीच प्यार ख़त्म हो गया था. विवेक अब भी उसके लिए
बाज़ार से उसकी पसंद की जलेबी ले आता था. नंदिनी की तबीयत ख़राब हो तो काम में हाथ
बंटाता था. घर लौटने में देर हो जाए तो फोन करके पूछता था कि खाना खाया या नहीं. बस,
अब इन बातों पर दोनों अलग से ध्यान नहीं देते थे. ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी और
प्यार उसी में कहीं शामिल हो गया था.
नंदिनी ने पत्र वापस लिफ़ाफ़े में रखा और सोचने लगी कि विवेक को इसके बारे में बताए या
नहीं. फिर उसने तय किया कि शाम को ज़रूर बताएगी.
शाम को विवेक घर लौटा तो नंदिनी करवा चौथ की तैयारी में लगी थी. उसने लाल साड़ी पहनी
थी और बालों में गजरा लगा रखा था. विवेक दरवाज़े पर कुछ पल रुककर उसे देखता रहा.
“क्या हुआ? ऐसे क्या देख रहे हो?” नंदिनी ने पूछा.
“कुछ नहीं. आज अच्छी लग रही हो.”
“आज ही? बाकी दिन क्या बुरी लगती हूं?”
“अरे, मेरा मतलब है कि आज कुछ ज़्यादा अच्छी लग रही हो.”
“अच्छा, चलो. अब हाथ-मुंह धो लो. चाय रखी है.”
विवेक मुस्कुराता हुआ अंदर चला गया. नंदिनी भी अपनी मुस्कान नहीं रोक पाई. इतने सालों बाद भी उसकी तारीफ़ सुनकर उसे अच्छा लगता था, भले ही वह ऊपर से कुछ और कहती.
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रात को पूजा की तैयारी पूरी करने के बाद दोनों कुछ देर साथ बैठे. नंदिनी ने पुराने प्रेमपत्र की बात छेड़ी.
“आज आलमारी साफ़ करते हुए तुम्हारा एक पत्र मिला.”
“मेरा पत्र? कैसा पत्र?”
“शादी से पहले लिखा था. उसमें तुमने वादा किया था कि हर दिन मुझे प्यार करने की एक नई वजह दोगे.”
विवेक हंस पड़ा.
“अच्छा! इतने साल बाद वह भी मिल गया?”
“हां. पढ़कर सोच रही थी कि तुमने अपना वादा कितना निभाया.”
“तो तुम्हारा क्या फ़ैसला है?”
“फ़ैसला अभी नहीं सुनाऊंगी.”
“मतलब कुछ गड़बड़ है.”
“गड़बड़ नहीं है. बस, हिसाब बाकी है.”
दोनों हंस पड़े. फिर नंदिनी ने पूछा, “सच बताओ,तुम्हें वह सब याद है? शादी से पहले हम कितनी बातें करते थे. कभी फोन पर, कभी मिलने पर. लगता था कि बातें ख़त्म ही नहीं होंगी.”
विवेक ने कुछ देर सोचा.
“याद तो है. उस समय लगता था कि प्यार जताने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करनी पड़ती हैं. तुम्हारे लिए कुछ लिख दूं, कोई तोहफ़ा दे दूं, तुम्हें कहीं घुमाने ले जाऊं. बाद में समझ आया कि ज़िंदगी तो इन सबके बीच ही चलती है. कभी तुम्हारी
तबियत ख़राब हो तो तुम्हारे लिए खाना बना देना, कभी तुम्हारे थककर बैठते ही चाय रख देना, कभी बाज़ार से
लौटते हुए तुम्हारी पसंद की जलेबी ले आना. पता ही नही चला कि ये छोटी-छोटी बातें कब
प्यार का हिस्सा बन गईं.”
नंदिनी चुपचाप सुनती रही.
“लेकिन एक बात माननी पड़ेगी,” उसने कहा, “तुमने चाय तो बहुत बार बनाई, पर कभी-कभी
मेरी पसंद की चीज़ें लाना भूल भी जाते हो.”
“अरे, अब पच्चीस साल में दो चार ग़लतियां तो माफ़ होनी चाहिए.”
“दो चार? तुम्हारी ग़लतियों की सूची बनाऊं तो एक अलग डिब्बा रखना पड़ेगा.”
विवेक हंसने लगा.
“ठीक है, कल से सुधार शुरू.”
“कल से क्यों? आज से करो.”
“अभी क्या करूं?”
नंदिनी ने कुछ पल सोचा, फिर बोली, “आज मुझे कहीं घुमाने ले चलो.”
“अभी?”
“हां, अभी. छत पर ही सही. दिनभर घर के काम, पूजा, तैयारी. अब थोड़ी देर मेरे साथ बैठो.”
विवेक ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया.
“हुजूर का हुक्म सिर आंखों पर.”
दोनों छत पर आ गए. आसमान साफ़ था. दूर-दूर तक घरों की छतों पर लोग अपने-अपने काम
समेट रहे थे. कहीं बर्तन रखे जा रहे थे, कहीं बच्चे पटाखों की ज़िद कर रहे थे. हवा में हल्की
ठंडक थी.
नंदिनी रेलिंग के पास खड़ी होकर चांद देखने लगी. विवेक उसके बगल में आकर खड़ा हो गया.
“जानती हो,” उसने कहा, “तुम आज भी उतनी ही अच्छी लग रही हो, जितनी शादी के समय लगती थी.”
नंदिनी ने उसे कनखियों से देखा.
“ये बात तुम हर करवा चौथ पर कहते हो या आज कुछ ज़्यादा ही चांद का असर है?”
“हर बार सोचता कहूंगा, लेकिन कभी कह नहीं पाता.”
“क्यों?”
“पता नहीं. दिनभर काम की बातें, घर की बातें, बच्चों की बातें. तुम्हारे सामने बैठता हूं तो
लगता है कि तुमसे बहुत कुछ कहना है, फिर कोई न कोई काम याद आ जाता है.”
नंदिनी का चेहरा थोड़ा नरम पड़ गया.
“मेरे साथ भी ऐसा ही होता है. कभी लगता है, तुमसे बैठकर ख़ूब बातें करूं. फिर सुबह का नाश्ता, घर के काम, बच्चों के फोन, बाज़ार की सूची… दिन निकल जाता है.”
“तो फिर एक काम करते हैं,” विवेक ने कहा, “हफ़्ते में एक दिन सिर्फ़ अपने लिए रखेंगे. न कोई
ज़रूरी काम, न किसी के घर जाने की मजबूरी. बस हम दोनों.”
“और अगर तुम भूल गए तो?”
“तो तुम याद दिला देना.”
“यानी याद रखने का काम भी मेरा?”
विवेक ने हंसते हुए उसके कंधे पर हाथ रख दिया. “अच्छा, इस बार मैं याद रखूंगा.”
कुछ देर दोनों चुप रहे. नीचे से किसी के हंसने कीआवाज़ आई. हवा में नंदिनी की साड़ी का पल्लू हल्का सा उड़ रहा था. विवेक ने उसे ठीक कर दिया. यहकोई नई बात नहीं थी. वह बरसों
से ऐसा करता आया था. फ़र्क़ बस इतना था कि आज नंदिनी ने उस छोटे से स्पर्श को महसूस किया और मन ही मन मुस्कुरा दी.
थोड़ी देर बाद दोनों कमरे में लौट आए. नंदिनी ने गहने उतारकर रखे और बाल खोल लिए.
विवेक उसे देखता रहा.
“क्या देख रहे हो?” उसने पूछा.
“कुछ नहीं.”
“कुछ तो है.”
“सोच रहा हूं अगले साल करवा चौथ पर तुम्हारे लिए फिर एकप्रेमपत्र लिखू़गा.”
नंदिनी हंस पड़ी.
“अगले साल क्यों? अभी लिखो.”
“अभी तो बहुत देर हो गई है.”
“तो क्या हुआ? प्रेम करने का भी कोई समय होता है?”
विवेक ने मेज पर रखी डायरी उठाई. कुछ देर पन्नेपलटता रहा, फिर कलम लेकर बैठ गया.
नंदिनी बिस्तर पर बैठी उसे देखती रही. उसे यह सब थोड़ा अटपटा भी लग रहा था और अच्छा भी. इतने साल बाद उसका पति उसके सामने बैठकर प्रेमपत्र लिख रहा था.
कुछ देर बाद विवेक ने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ा दिया.
उसमें लिखा था-
नंदिनी,
पच्चीस साल पहले मैंने तुमसे वादा किया था कि हर दिन तुम्हें प्यार करने की एक नई वजह दूंगा. शायद मैं हर दिन ऐसा कर नहीं पाया, लेकिन इन पच्चीस सालों में तुम मेरी आदत ही
नहीं, मेरी ज़रूरत बन गई हो. सुबह तुम्हारे उठने की आहट से घर जागता है. शाम को लौटकर तुम्हें न देखूं तो लगता है कि कुछ छूट गया है. तुम्हारी शिकायतें सुनना, तुम्हारे साथ बाज़ार जाना, तुम्हारा किसी बात पर चुप हो जाना और फिर थोड़ी देर बाद ख़ुद ही बात शुरू कर देना,
ये सब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है.
पहले डरता था कि कहीं तुम मुझे छोड़कर न चलीजाओ. अब डरता हूं कि कहीं ज़िंदगी इतनी जल्दी न निकल जाए कि तुम्हारे साथ बैठकर बातें करने का समय ही कम पड़ जाए.
मैं नहीं जानता कि आने वाले सालों में तुम्हें कितनी नई वजहें दे पाऊंगा. बस इतना जानता हूं कि जब तक तुम मेरे साथ हो, तुम्हें प्यार करने की वजहें ख़त्म नहीं होंगी.
तुम्हारा,
विवेक
नंदिनी ने पत्र पूरा पढ़ा. फिर उसे मोड़कर अपने पास रख लिया.
“बस इतना ही?”
विवेक ने हैरानी से पूछा, “इतना ही? इसमें और क्या लिखूं?”
“ये भी लिखते कि मुझसे कितना प्यार करते हो.”
“वह तो लिखा है.”
“सीधे-सीधे कहां लिखा है?”
विवेक उसके पास आकर बैठ गया.
“अच्छा, सुनो. आई लव यू, नंदिनी. बहुत प्यार करता हूं तुमसे. अब ख़ुश?”
नंदिनी मुस्कुराई.
“थोड़ा और कह सकते थे.”
“आई लव यू.”
“फिर से?”
“आई लव यू.”
वह हंस पड़ी.
“अच्छा, बस. अब कल भी कह देना.”
विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया.
“कल ही क्यों? रोज़ कहूंगा.”
“देखते हैं.”
“तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?”
“भरोसा तो है. लेकिन तुम्हारे वादों का रिकॉर्ड भी तो मेरे पास है.”
विवेक ने उसका हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ लिया.
“एक बात कहूं? अगर अगला जन्म हुआ,
तो तुम्हें ही ढूंढूंगा.”
नंदिनी ने उसके कंधे पर सिर रख दिया. “और अगर मैं नहीं मिली तो?”
“तो तुम्हारे बिना रहना सीख लूगा.”
“इतनी आसानी से?”
विवेक मुस्कुराया.
“आसानी से कहां? पच्चीस साल तुम्हारे साथ रहने के बाद अब अकेले रहने की आदत तो रही नहीं.”
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नंदिनी ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया. कुछ देर दोनों चुप रहे. फिर वह बोली, “जानते
हो, पहले मुझे लगता था कि प्यार का मतलब है किसी का बार-बार यह कहना कि वह हमसे कितना प्यार करता है. अब लगता है, प्यार तो वहहै जब इतने साल बाद भी कोई हमारे पास बैठना चाहे, हमारी छोटी-छोटी बातें याद रखे और दिन ख़त्म होने पर हमें अपने पास पाए.”
विवेक ने उसके माथे पर बिखरे बालों को पीछे किया.
“और मुझे लगता है कि प्यार का मतलब है कि इतने साल साथ रहने के बाद भी तुम्हारे पास बैठकर कभी कभी वही पुरानी धड़कन महसूस हो.”
नंदिनी मुस्कुरा दी.
“तो फिर एक वादा करो.”
“अब क्या?”
“अगले करवा चौथ पर भी मेरे लिए एक प्रेमपत्र लिखोगे.”
“हर साल लिखूंगा. बस तुम हर साल इसी तरह मेरे पास बैठकर पढ़ना.”
“और अगर मैं बूढ़ी हो गई तो?”
“तो क्या हुआ? प्रेमपत्र लिखने के लिए उम्र थोड़े ही देखी जाती है.”
नंदिनी ने सिर उठाकर उसे देखा. फिर धीरे से उसके गले लग गई.
बाहर चांद अपनी रोशनी बिखेर रहा था. मेज़ पर पच्चीस साल पुराना प्रेमपत्र और आज लिखा
गया नया पत्र साथ साथ रखे थे. एक में उस लड़के के वादे थे, जो नंदिनी को अपनी ज़िंदगी में
लाना चाहता था. दूसरे में उस आदमी का प्यार था, जिसने उसके साथ ज़िंदगी के पच्चीस साल
बिता दिए थे और अब भी उसके पास बैठने के लिए बहाने ढूंढ़ता था.
नंदिनी ने दोनों पत्र सहेजकर रख दिए. फिर विवेक के पास आकर लेट गई और उसका हाथ
थाम लिया.
“आई लव यू,” उसने धीमे से कहा.
विवेक ने उसकी ओर करवट बदली.
“एक बार और कहो.”
“कल कहूंगी.”
“कल तक इंतज़ार करना पड़ेगा?”
“पच्चीस साल इंतज़ार किया है. एक रात और सही.”
विवेक हंस पड़ा और उसे अपनी बांहों में भर लिया.
नंदिनी ने आखें बंद कर ली. उसे लगा, प्रेम का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा शायद यही है कि इतने
साल साथ रहने के बाद भी रात के अंत में किसी का हाथ थामकर सोने का मन करे और सुबह
आंख खुले तो सबसे पहले उसी का चेहरा देखने की इच्छा हो.
चांदनी खिड़की से कमरे में उतर रही थी. दोनों केबीच अब कहने को कुछ नहीं था, फिर भी
उनका साथ बहुत कुछ कह रहा था.
– आरती मिश्रा
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