
– विपक्ष पारदर्शी प्रक्रिया या चुनाव की बजाय विरोध प्रदर्शनों से रेजीम चेंज की कोशिश कर रहा है. लेकिन देश में सत्ता परिवर्तन हिंसा या प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया व जनता के वोट से होता है. किसी भी चुनी हुई सरकार को मोबक्रेसी (भीड़तंत्र) के ज़रिए हटाया नहीं जा सकता.
– कांग्रेस चाहे कितने भी दलों को एकजुट कर ले, भारत को अस्थिर करने में सफल नहीं होगा. राहुल गांधी राजकुमार की तरह सियासी नखरे कर रहे हैं. वे हिंसा व मोबक्रेसी के ज़रिए सत्ता परिवर्तन चाहते हैं. साल 1989 से लगातार हुए हर विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ने कांग्रेस को नकारा है. वे एक ऐसे प्रिंस हैं, जो चुनाव जीतने के काबिल नहीं हैं, परंतु राजा बनने का सपना देखते हैं.
– मेरे लिए ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी 2’ शो एक साइड प्रोजेक्ट रहा. मैं ख़ुद को फुल टाइम राजनेता व पार्ट टाइम अभिनेत्री मानती हूं.

– साल 2000 से 2008 के बीच के मेरे शो ने टीवी को एक नया स्वरूप दिया था. मैंने फ़र्श से अर्श तक का सफ़र ख़ुद तय किया है.
– अखिलेश यादव जी सीरियल से ध्यान हटाकर संसद के काम पर फोकस करें और महिलाओं को सशक्त बनाने वाले महत्वपूर्ण बिल पास करवाने में योगदान दें. जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है, वे उन लोगों पर टिप्पणी कर रहे हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत से पहचान बनाई है.
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– एक मां की नौकरी तभी सफल मानी जाती है जब बच्चा बड़ा होकर यह महसूस करे कि अब उसे आपकी ज़रूरत नहीं है. एक मां अपनी ज़िंदगी का आधा हिस्सा इसलिए ख़र्च करती है, ताकि वो बच्चे के जीवन के बाकी आधे हिस्से में लगभग भुलाई जा सके या बच्चा अपनी स्वतंत्र दुनिया बसा लें.

– मेरे पिता पंजाबी खत्री व मां बंगाली ब्राह्मण थीं. जब उन्होंने परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी की थी तब उस समय उनके पास मात्र 150 रुपए ही थे.
– हमारा परिवार एक मिनी इंडिया की तरह है. यहां अलग-अलग क्षेत्रों व संस्कृतियों के लोग हैं. दादा पंजाबी थे, विभाजन के बाद उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में रहे. दादी महाराष्ट्र से, नानी असम से, नाना बंगाल से थे. मैंने शादी मुंबई के गुजराती पारसी फैमिली से की. अब मेरे घर दक्षिण भारत की बहू आई है.
– इतनी विविधता के साथ परिवार में राजनीतिक विचारधाराओं के अलग-अलग लोग भी हैं. मेरे पिता कांग्रेस से जुड़े रहे, मेरी मौसी सास एनसीपी से थीं और मैं ख़ुद भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी हूं.
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– बचपन संघर्षपूर्ण रहा. पिता धौलाकुआं के बस अड्डे पर सड़क पर किताबें बेचते थे. बचपन में उनके साथ बैठकर सिक्के इकट्ठा किया करती थी.
– रीवा बब्बर, हितेन तेजवानी, गौरी प्रधान से क़रीब बीस साल से मित्रता है. इतनी पुरानी पर हमेशा रहनेवाली हमारी दोस्ती है.
– ऊषा गुप्ता

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