कहानी- कंफर्ट ज़ोन (Short Story- Comfort Zone)

Suman-Bajpai

             सुमन बाजपेयी

Ka-Comfort-Zone-(Suman-Bajpai)

“रागिनी सिया को ग़लत मत समझो. असल में हम सब अपने-अपने कंफर्ट ज़ोन में जीते हैं. कहा जा सकता है कि एक तरह की आदत, सुविधाओं, जीने के तौर-तरीक़ों के आदी हो जाते हैं. ज़िंदगी फिर उन्हीं तौर-तरीक़ों के हिसाब से चलती है- उसमें किसी तरह के बदलाव या हस्तक्षेप से अस्त-व्यस्तता महसूस होने लगती है.”

“तुमने उससे बात की?” “कर लूंगी. सोच रही हूं कि कोई सही मौक़ा देखकर ही बात करनी चाहिए. वैसे भी उसने अभी तो अपने बॉस की हरकतों से तंग आकर जॉब छोड़ी है और दूसरी जॉब ढूंढ़ने में बिजी है. उसे थोड़ा रिलैक्स होने दो, फिर बात करती हूं. आजकल कुछ ज़्यादा ही चिड़चिड़ी रहने लगी है. हालांकि मुझे नहीं लगता कि उसे कोई प्रॉब्लम होगी. वह तुम्हें पसंद करती है.”

“पसंद तो करती है, लेकिन किस रूप में, इस बात पर भी ध्यान दो रागिनी. तुम्हारे फ्रेंड और कहूं तो अपने बडी के रूप में वह मुझे पसंद करती है, पर उससे आगे… शायद वह मुझे अपनाने को तैयार न हो.” अनुराग के शब्दों की सपाटता ने रागिनी को अचरज में डाल दिया था. इस पहलू से उसने अभी तक नहीं सोचा था, इसीलिए बोली, “जब पसंद करती है, तो उस पसंद को किसी सीमा में बांधकर वर्गीकृत कैसे किया जा सकता है. कोई पसंद है, तो हर तरह से, हर रिश्ते से होगा न?”
“तुम समझ नहीं पा रही हो रागिनी. सिया कोई बच्ची नहीं है, जो रिश्तों को सहजता से अपना लेगी या नई स्थितियों के साथ एडजस्ट करने में उसे व़क्त लगेगा. वह मैच्योर है, उसकी अपनी सोच है और रिश्तों को नाम देने की समझ भी है. मुझे नहीं लगता कि उसके लिए मुझे स्वीकारना सहज होगा. तुम्हें सावधानी से उससे बात करनी होगी.”
“पर हमारी इच्छा और ख़ुशी का तो वह सम्मान कर सकती है.”
“नहीं रागिनी, हम उस पर अपनी इच्छा नहीं थोप सकते हैं और न ख़ुशी. यह उसके साथ अन्याय होगा और इस तरह से हम तीनों की ही ज़िंदगी में कड़वाहट भर जाएगी. तुम एक गिल्ट में जीती रहोगी और मैं सिया को ख़ुश रखने की कोशिश में तुम्हारी ज़िंदगी का चैन छीन लूंगा. जल्दबाज़ी मत करना. हमारा क्या है, बची हुई ज़िंदगी भी अकेले काट लेंगे, पर सिया की ज़िंदगी तो अभी शुरू हुई है. उसकी ख़ुशी सबसे ज़्यादा मायने रखती है.”
“सिया, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है.” रागिनी ने एक शाम चाय का कप उसे पकड़ाते हुए कहा.
“पता है कि आप यही कहेंगी कि मैं नौकरी के चक्कर में न पड़कर बुक शॉप में आपकी मदद करूं. ममा बडी हैं न आपकी मदद करने के लिए. वह वहीं तो बैठे रहते हैं अपने लैपटॉप के साथ. उन्हें लिखने के लिए मसाला भी मिल जाता है और आपकी मदद भी हो जाती है. पता नहीं कहां-कहां से ढूंढ़कर आपके लिए बुक्स ले आते हैं. वे जीनियस हैं.”
“मेरी तारीफ़ क्यों हो रही है? सिया, तुम-सा जीनियस तो कोई नहीं हो सकता. तुम्हारी फोटोग्राफी के तो बहुत चर्चेे हैं. अच्छा यही होगा कि तुम अपने इस पैशन को प्रोफेशन बना लो.”
“ओह! नो बडी, इतनी भी एक्सपर्ट नहीं हुई हूं, पर एक दिन अपनी खींची फोटो की एक्ज़ीबिशन अवश्य लगाऊंगी, इसलिए ममा को समझाइए कि बुक शॉप के काम में मुझे न घसीटें.”
“नहीं, मैं तुमसे कुछ और बात करना चाहती थी.”
“फिर कभी ममा, अभी मैं बाहर जा रही हूं. नाइट पार्टी. आप सो जाना.”
“उ़फ्! बहुत डिफिकल्ट है इस लड़की से बात करना अनुराग.”
“परेशान मत हो,” कहते-कहते अनुराग ने रागिनी को सीने से लगा लिया. एक-दूसरे के एहसास की छुअन को महसूस करते हुए उन्हें पता ही नहीं चला कि सिया अपना मोबाइल लेने के लिए लौटी थी.
सिया के कमरे से अचानक चीज़ों को फेेंकने की आवाज़ों ने उनका ध्यान तोड़ा और वे वहां भागे. “ममा, आप ऐसे कैसे कर सकती हैं. मैंने आपको बडी को गले लगाते देखा. आपने पापा के साथ चीट किया है. मैंने भी महसूस किया था कि आप बडी को प्यार करने लगी हो. नहीं! आप ऐसा नहीं कर सकतीं. मैं केवल अपने पापा को प्यार करती हूं… और बडी, तुमने भी मुझे धोखा दिया. मेरी ममा के साथ… छीः” वह चिल्ला रही थी और लगातार चीज़ें फेेंक रही थी.
“सुनो सिया.” अनुराग ने कुछ कहना चाहा.
“आप यहां से जाओ, मुझे कुछ नहीं सुनना है. मैं बस अपनी ममा के साथ रहना चाहती हूं. कोई आउटसाइडर नहीं चाहिए मुझे.”
“सिया, सोचकर बोलो. अनुराग आउटसाइडर नहीं हैं.” रागिनी ने तमतमाते हुए कहा.
“रिलैक्स रागिनी, मैं जा रहा हूं. प्यार से हैंडल करना सिया को.”
“मैंने तुम्हारे पापा को चीट नहीं किया है सिया. मैं आज भी उनसे प्यार करती हूं. लेकिन उन्हें गए पंद्रह साल हो गए हैं. तुम्हें मैंने अकेले पाला, अपने एकांत को भी अकेले जीया. फिर अनुराग से जब दो साल पहले मेरी मुलाक़ात हुई, तो लगा कि हम दोनों एक-दूसरे का अकेलापन बांट सकते हैं. तुम्हें पता ही है, उसकी बीवी और बेटी दोनों की ही एक्सीडेंट में मौत हो चुकी है. तुम्हारे पापा के देहांत के बाद सबने मुझसे कहा कि मैं दूसरी शादी कर लूं, पर मैं तुम्हें बड़ा करने में व्यस्त हो गई. अब अगर हम दोनों साथ ज़िंदगी गुज़ारना चाहते
हैं तो…”
“ममा, यह प्यार है या आपकी फिज़ीकल नीड्स, जो आपको बडी की ओर धकेल रही हैं? मैं उन्हें अपने पापा की जगह कभी नहीं
लेने दूंगी.”
“बस बहुत हुआ, मुझे लगा कि मेरी बेटी अपनी मां को समझती है… खैर, तुम्हारी मर्ज़ी के बिना हम कभी साथ रहने के बारे में नहीं सोचेंगे.” अगले दिन अनुराग के घर जाकर रागिनी फूट-फूटकर रोई.
“रागिनी सिया को ग़लत मत समझो. असल में हम सब अपने-अपने एक कंफर्ट ज़ोन में जीते हैं. कहा जा सकता है कि एक तरह की आदत, सुविधाओं, जीने के तौर-तरीक़ों के आदी हो जाते हैं. ज़िंदगी फिर उन्हीं तौर-तरीक़ों के हिसाब से चलती है- उसमें किसी तरह के बदलाव या हस्तक्षेप से अस्त-व्यस्तता महसूस होने लगती है. अब ख़ुद ही सोचो, दो दिन के लिए कोई गेस्ट रहने आ जाए, तो हम कहने लगते हैं कि हमारा रूटीन गड़बड़ा गया है. असल में बंधी-बंधाई ज़िंदगी में आया मामूली-सा बदलाव भी पानी में डाली गई कंकरी की तरह होता है, जिसकी वजह से पानी में गोल-गोल घेरे बनने लगते हैं.
सिया का भी अपना एक कंफर्ट ज़ोन है, जिसमें स़िर्फ तुम ही हो… मेरे आने से उसकी ज़िंदगी में जो बदलाव आएगा, उसकी प्रतिक्रिया ही है यह विद्रोह. आज वह सब कुछ तुम्हारे साथ बांटती है, कल को उसे मेरे साथ बांटना होगा. उसे यही महसूस होगा कि तुम घर पर अकेली नहीं हो, तुम्हारी भी प्राइवेसी का उसे ख़्याल रखना होगा. तुम्हारे कमरे में आने के लिए उसे खटखटाना होगा, जबकि अभी तो वह बेहिचक तुम्हारे कमरे में घुस आती है. तुम्हारी चीज़ों पर अपना अधिकार समझती है, तब उसकी सहजता पर अंकुश लग जाएगा. बेशक कुछ समय के लिए ही सही, पर उसी में उसका कंफर्ट ज़ोन गड़बड़ा जाएगा. उसे ग़लत मत समझो. आजकल के बच्चे फिज़ीकल होने को ही प्यार समझते हैं. पर रागिनी, वह स्वार्थी नहीं है. उसे थोड़ा व़क्त दो. अपने पापा की जगह वह कैसे किसी और को दे सकती है. आख़िर मैं ही कहां शिखा और सुहानी को भूल पाया हूं. मुझे लगता है कि हमें अब मिलना भी नहीं चाहिए.”
सिया और रागिनी के बीच उस दिन के बाद से कुछ चटक गया था. रागिनी बेशक एक-दो दिन बाद सामान्य हो गई थी और अपने काम में बिज़ी रहने लगी थी, पर सिया… एकदम ख़ामोश हो गई थी. उसे यही बात कचोटती रहती कि आख़िर इस उम्र में मां किसी और से प्यार कैसे कर सकती है… पापा की फोटो के आगे खड़े घंटों वह आंसू बहाती रहती. कभी उसे लगता कि मां को भी जीने का अधिकार है. पापा के जाने के बाद से स़िर्फ उसे पालने में उन्होंने ज़िंदगी खपा दी… क्या वह स्वार्थी है? बुक शॉप में जाती, तो बडी की खाली कुर्सी देख उसे अपने भीतर खालीपन का एहसास होता. बडी को वह पसंद करती है, लेकिन वह ममा के साथ उनके कमरे में रहेंगे… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. ममा तो स़िर्फ उसकी है और अपने कंफर्ट ज़ोन में वह किसी को भी घुसने नहीं दे सकती… पर बडी… वह शायद आ चुके हैं, उसके और ममा के भी कंफर्ट ज़ोन में ममा की हंसी के पीछे उदासी के साए उसे नज़र आए. ममा उससे शिकायत क्यों नहीं करतीं… उसकी ख़ुशियों के लिए कब तक कुर्बानी देंगी?  कहां तो वह अपने बॉयफ्रेंड सोम से ममा को मिलानेवाली थी और कहां यह सब हो गया.
“इसमें ग़लत क्या है…?” सोम की प्रतिक्रिया जान वह हैरान रह गई थी.
“सोम, तुम्हें अटपटा नहीं लगा. ममा किसी और के साथ… इस उम्र में…”
“सिया, एक तरफ़ तुम ख़ुद को आधुनिक मानती हो और दूसरी ओर रिश्तों की एक्सेप्टेंस तुम्हें परेशान करती है. खुले दिल से सोचो, उन्हें अपना जीवन जीने दो. इससे तुम्हारी ममा का प्यार तुम्हारे पापा के प्रति कम नहीं होगा. कई बार रिश्ते स़िर्फ शेयरिंग और केयरिंग पर टिके होते हैं, जैसा इनका रिश्ता है. उम्र के इस पड़ाव पर अगर वे कुछ ख़ुशियां साथ बांटना चाहते हैं, तो तुम्हें क्यों आपत्ति हो रही है?”
बडी के घर की घंटी बजाने के बाद वह वापस मुड़ना चाहती थी कि दरवाज़ा खुल गया.
“कैसी हो सिया? आओ अंदर आओ.”
“बडी आज शाम आप हमारे साथ डिनर करेंगे. कितने दिनों से कैरमबोर्ड नहीं खेला. हमेशा मुझसे हारते हैं, इसलिए ही इतने दिनों से खेलने नहीं आए न?” सिया अपने बडी से लिपटकर रो पड़ी. अनुराग के हाथ सिया की पीठ को सहला रहे थे.

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