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रंग तरंग- चुगलखोरी की दावत (Rang Tarang- Chugalkhori Ki Dawat)

मिसेज़ मखीजा खोद खोद कर पूछने लगीं कि उनके ख़िलाफ़ मिसेज़ वर्मा ने और क्या-क्या कहा यानी बका. मैंने ना-नुकुर करते-करते उन्हें थोड़ी-सी और चुगली चाट चटा दी. मैं अपना पूरा स्टॉक एक ही बार में खर्च करने वाली नहीं थी. बस, ‘झलक दिखाके और बढ़ा दी बेताबी’ वाली पॉलिसी को ही अंज़ाम देना चाहती थी, ताकि कन्ज्यूमर बार-बार मेरे स्टॉक से थोड़ा-थोड़ा लेता रहे और मेरी वैल्यू बनी रहे. 

मैं जब इस बड़े शहर का बड़ी कॉलोना में बड़े-बड़े लोगों के बीच रहने आई थी तो बड़ा अजीब लगता था मुझे. न किसी से राम-राम, न दुआ-सलाम. हर कोई अपने अपने में व्यस्त और मस्त मैं तो ऐसे में बड़ा अस्त-व्यस्त सा अनुभव करने लगी थी. कारण जिस छोटे शहर के छोटे मोहल्ले के छोटे-छोटे लोगों के बीच से मैं यहां आई थी वहां सबकाआपस में बड़ा मेल जोल और प्यार था. विशेषकर महिलाएं तो एक-दूसरे से बोले-बतियाए बिना न छींकती थीं, न डकार ही लेती थीं. यहां तक कि अगर किसी ने छींका या डकारा तो उसकी भी ख़बर एक सहेली से दूसरी और दूसरी से दसवीं बीसवीं तक पहुंच ही जाती थी. वह भी मिर्च-मसालेदार चाट की शक्ल में. जिसे सब चटखारे ले-लेकर सुनती सुनातीं. वे भी क्या दिन थे! वे भी क्या लोग थे! वहां की याद आते ही मेरे मुंह से ‘आह निकल जाती. वहां के चटपटे किस्सों भरी वे गुनगुनी दोपहरें, वे मखमली शामें रह-रह कर ललचातीं. और यहां की ये मनहूसियत! उफ़! कैसे कटे दिन रैन. इसी फ़िक्र में मेरा कद्दू जैसा हृष्ट-पुष्ट शरीर सूखकर लौकी जैसा होता जा रहा था. घरवाले भी परेशान. डॉक्टर को दिखलाया तो उसने कितने ही प्रकार के टेस्ट करके लगभग पचास तरह की दवाइयों की लिस्ट और पांच हज़ार का बिल हमें थमा दिया. ग़रीबी में आटा गीला की तर्ज पर मेरा हाल बद से बदतर होने लगा. एक तो नीरस कॉलोनी की मनहूस फ़िज़ाओं वाले बोरियत भरे दिन, उस पर कड़वी-कड़वी गोली दवाइयां! बिल की मोटी रकम चुकाने का शॉक लगा सो अलग. लाभ की जगह और अधिक हानि हो गई. यानी लौकी से घटकर मेरा फ़िगर अगरबत्ती छाप पहलवान ओह नो सींक जैसा हो गया था.

पंछी हाथ से उड़ता देख मैंने अपने आत्मबल को ललकारा. “कहां गया तू ओ निष्ठुर! उस छोटे शहर में तो सुबह से शाम तक यहां से वहां, इस घर से उस घर, इस कान से उस कान तक नॉन स्टॉप गॉसिप चैनल तूमुझसे चलवाया करता था. उसके लिए नित नए स्पॉन्सर्स ढूंढ़ा करता था. अरे, तू तो मेरा गॉडफादर बनता था. अब इस शहर में आते ही दूरदर्शन पर चलने वाले किसी धारावाहिक के बिना सूचना अचानक बंद होने जैसी तेरी स्थिति क्यों हो गई? क्या अब तुझे नए स्पॉन्सर्स नहीं मिल रहे या कहानियों के प्लॉट्स का टोटा पड़ गया? तुझ जैसे गॉडफादर से फिल्मी हीराइनों के वे सेक्रेटरी अच्छे, जो लगातार फ्लॉप हो रही अपनी ‘मैडम’ के लिए ख़ुद स्टोरी लिखते हैं और तुम फिल्म बनाना तो दूर, उसका मुहूर्त तक नहीं कर सकते. धिक्कार है तुम्हें.”

मेरी चैलेंजिंग बीन सुनकर मेरा आत्मबल केंचुली छोड़कर उठ खड़ा हुआ.

उसने अपना फन हिलाया और ज़ोर-ज़ोर से फुफकारने लगा. मेरे दिमाग़ में भी एक से बढ़कर एक आइडियाज़ आने लगे. मैं अपने गॉडफादर उर्फ़ आत्मबल के साथ सेलेक्शन कमेटी बनाकर बैठ गई. रिजेक्शन-दर-रिजेक्शन के बाद हमने एक धांसू आइडिया सेलेक्ट कर लिया. इस प्रक्रिया के पूरे होने तक ‘इसकी टोपी उसके सिर’, ‘जिसका जूता उसी का सिर.’ ‘जिसकी लाठी उसी की भैंस’ आदि स्टेपवाइज़ योजनाओं के बाद अंत में ‘सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठ’ का बेटिकट तमाशा देखने का बेमिसाल मौक़ा तो मिलने ही वाला था. आप समझ गईं ना? नहीं? तो लीजिए खुलासा कर दूं.

हमारा सिलेक्टेड धांसू आइडिया था- चुगलखोरी करना. वैसे तो ये बड़ी बूढ़ियों का आज़माया हुआ नुस्ख़ा है. इसे देश के कोने कोने में धर्मनिरपेक्ष भाव से स्वीकार किया और अमल में लाया जाता है. यानी आप किसी भी जात, धर्म, भाषा या प्रांत वालों की चुगली, किसी भी दूसरी जात, धर्म, भाषा या प्रांत वालों से कर सकती हैं.

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आप हंड्रेड पर्सेन्ट सफल होंगी. वे लोग भले ही एक-दूसरे के हाथ का खाना पीना पसंद न करें, पर लज़ीज़ चुगली खाने से कभी किसी को कोई परहेज़ नहीं होता. क्या आप ये सोच रही हैं कि इस चुगलखोरी से मुझे क्या मिलेगा? मैंने शुरू में ही बताया था ना. इस बड़े शहर की बड़ी कॉलोनी के बड़े बड़े लोग आपस में बोलते बतियाते नहीं. न उन्हें फ़ुर्सत है, न वे सामने वाले को इस योग्य ही समझते हैं. यहां हर एक सिर पर सुरखाब के पर लगे हुए हैं. मज़े की बात तो ये कि हर एक सामने वाले के सिर पे लगे पर को कौए का पंख समझकर उसे हेय दृष्टि से देखता है. ऐसे क्रिटिकल वातावरण में अपनी पैठ और पूछ-परख बनाने का एकमात्र अचूक उपाय ‘चुगलखोरी’ के अलावा क्या हो सकता है?

और फिर मैं अगले ही दिन अपनी हिट लिस्ट के साथ अभियान पर निकल पड़ी. मैंने शुरुआत कैसे की, नमूना देखिए- मेरी सबसे पहली टारगेट थीं मेरे ठीक सामने के बंगले वाली मिसेज़ मखीजा. मैंने कॉलबेल बजाई खोला तो बंगले का दरवाज़ा मिसेज मखीजा ने ही, मुझे देखते ही उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, जैसे उनके सामने इंसान नहीं खड़ा है बल्कि कोई केंचुआ बिलबिला रहा है. खैर, मैंने मन-ही मन कोसते हुए उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार किया. उन्होंने इसके जवाब में अपनी वक्र दृष्टि को चक्र की तरह घुमाकर मेरे नमस्कार को हवा के हवाले कर दिया. मैं भी अब अपने आत्मसम्मान को फटी जूती की तरह उतारकर ढीठता पर उतर आई. खिसियाई हंसी के साथ मैंने कहा, “हैं, है … मैं आपके ठीक सामने रहती हूं. आपसे मिलने की बड़ी तमन्ना थी. बहुत दिनों से कोशिश भी कर रही थी, लेकिन मेरी पड़ोसन मिसेज़ वर्मा मुझे आपकेपास आने ही नहीं देती थीं. कहती हैं कि मिसेज़ मखीजा बहुत ही घमंडी व झगड़ालू हैं. तुम मिलने जाओगी तो दरवाज़े से ही रफा-दफ़ा कर देंगी. चाय-नाश्ता तो दूर, पानी तक नहीं पूछेंगी.”

मेरे इतना कहते ही मिसेज़ मखीजा के लाली पुते होंठ से ये मधुर वचन फूटे, “ओए ठेर जा वर्मा दी बच्ची, मैं तेनू कच्चा चबा जावंगी.”

“अजी, आप छोड़िए भी, ऐसों के मुंह क्या लगना.मैंने मन-ही मन मुस्कुराते हुए कहा. इस पर मिसेज़ मखीजा की तनी हुई भृकुटियां ढीली हुई. होंठों पर पौने दो इंच की मुस्कान सजाकर वे बोलीं, “आप ठीक कहती हैं, अरे, आप अभी तक दरवाज़े पर ही खड़ी हैं. अंदर आइए ना.” कहते हुए उन्होंने मुझे अपने आलीशान ड्रॉइंगरूम के क़ीमती सोफे पर बड़े प्यार से बिठाया. साथ ही अपने नौकर से चाय-नाश्ता लाने के लिए भी कहा. मेरा तीर ठीक निशाने पर लगा था. मैं अपनी इस पहली ही विजय पर फूली नहीं समा रही थी. मिसेज़ मखीजा के लज़ीज़ चाय-नाश्ते का लुत्फ़ उठाते हुए मैं सोच रही थी, ‘ओ नकचढ़ी औरत, बड़ा घमंड है ना तुझे अपनी दौलत पर? तू अपने घर में मच्छर को भी नहीं घुसने देती न. देख, आज मैंने किस तरह तेरे सामने ही तेरे घर में सेंध लगा दी और तुझे भनक तक नहीं हुई.”

मिसेज़ मखीजा खोद खोद कर पूछने लगीं कि उनके ख़िलाफ़ मिसेज़ वर्मा ने और क्या-क्या कहा यानी बका. मैंने ना-नुकुर करते-करते उन्हें थोड़ी सी और चुगली चाट चटा दी. मैं अपना पूरा स्टॉक एक ही बार में खर्च करने वाली नहीं थी. बस, ‘झलक दिखाके और बढ़ा दी बेताबी’ वाली पॉलिसी को ही अंज़ाम देना चाहती थी, ताकि कन्ज्यूमर बार-बार मेरे स्टॉक से थोड़ा-थोड़ा लेता रहे और मेरी वैल्यू बनी रहे.

इस तरह हर दूसरे दिन मिसेज़ मखीजा का फोन आता और वे मुझसे नई-नई चुगली सुनतीं. मुझे नए नए पकवान खिलातीं. चुगली जितनी तल्ख और कड़वी होती, पकवान उतना ही रसीला और मीठा होता जाता. मैं उन पर चुगली का मीठा नश्तर चलाती, वे दर्द से कराहतीं और इलाज के रूप में एक और नई चुगली की चोट खाने को उतावली हो जातीं. चुगली खाने की लत ठीक वैसी ही होती है, जैसे नशेड़ियों को ड्रग्स लेने की होती है. यानी न ड्रग्स लेने वाले को छोड़ता है, न लेने वाला ड्रग्स को.

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पूरी कॉलोनी में मैं चर्चा का विषय बन चुकी थी. सबकी निगाहें मुझ पर टिक गई थीं. यानी मैं वी.आई.पी. लोगों की वी.आई.पी. हो गई थी. कारण सभी सोचते मिसेज़ मखीजा जो अपनी नाक पे मक्खी तक नहीं बैठने देतीं, मैं उनकी नाक का बाल कैसे बन गई? मिसेज़ मखीजा के बाद मैंने मिसेज़ खान, मिसेज़ वाधवानी, मैडम तिवारी, मिसेज़ पंड्या सहित कॉलोनी की अनेक सुरखाबियों के पर कतर कर अपने जूड़े में खोंस लिए थे. मेरी हिट लिस्ट के टारगेट पूरे हो गए थे. अब हर घर में मेरी पूछ-परख होने लगी, जिसे देखे मुझे कॉलोनी की महिलाएं किसी न किसी बहाने से बुलवातीं और एक-से एक लज़ीज़ डिश खिलातीं. बदले में मुझे उन्हें बस ज़रा-सी चुगली-चाट भर चटाना होता था.

इस तरह हींग लगी, न फिटकरी और रंग भी खूब चोखा आया. चुगलखोरी की दावतें उड़ा-उड़ाकर मेरी सींकनुमा फिगर फिर से कद्दू के शेप तक प्रोग्रेस कर गई. अब तो बोर होने का प्रश्न ही नहीं है, बल्कि चुगलखोरी से व्यस्तता इस क़दर बढ़ गई है कि चुगली सुनने के कई कॉल्स रिजेक्ट करके मुझे उन्हें कोई अगली डेट देनी पड़ती है. अपनी बोरियत मिटाने, अपने आपको वी.आई.पी. बनाने और अपनी हेल्थ सुधारने के लिए आप भीमेरे इस गारेन्टेड नुस्खको आज़माइए और एक साधारण घरेलू महिला से लोकप्रिय पब्लिक पर्सनैलिटी बन जाइए.

– जया ‘नर्गिस’

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