लड़की होने का एक्सक्यूज़ मत दो- साक्षी मलिक (don’t give excuse that you are a girl)

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बेटियों के पैदा होने पर भले ही समाज में ख़ुशियां न मनाई जाती हों, लेकिन अपने हुनर से एक दिन बेटियां इस मौ़के को जीने के लिए समाज को अपनी ओर झुका ही लेती हैं. कुछ ऐसा ही हुआ हरियाणा की कुश्ती क्वीन साक्षी मलिक के साथ. रियो ओलिंपिक में जाने से पहले उनकी उपलब्धियों पर लोगों का ध्यान नहीं था, लेकिन जब ओलिंपिक के 12वें दिन देश को पहला मेडल इस बेटी ने दिलाया, तो देश के कोने-कोने से साक्षी मलिक के नाम के नारे लगाए जाने लगे. हाल ही में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साक्षी मलिक ने हमसे शेयर की कुछ ख़ास बातें.

क्या आपको विश्‍वास था कि आप मेडल ला पाएंगी?
जी हां, मुझे ख़ुद पर विश्‍वास था कि मैं रियो ओलिंपिक में बहुत अच्छा करूंगी. मेडल तो भगवान के हाथ में था, लेकिन मैं जानती थी कि मुझे अपना बेस्ट देना है और वो मैं दूंगी. उससे मुझे कोई रोक नहीं सकता. मुझे मेरे देश के लिए कुछ ख़ास करना है. बस, इसी उम्मीद के साथ मैं खेली और देश के लिए मेडल जीता.

क्या लड़कियों के लिए कुश्ती में करियर बनाना ज़्यादा मुश्किल होता है?
भूल जाओ कि तुम लड़की हो. दुनिया का हर काम लड़कियां कर सकती हैं. लड़की होने का बहाना मत बनाओ. मुझे कभी नहीं लगा कि एक लड़की होने के नाते मुझे किसी तरह की कोई दिक्क़त हुई हो. हां, ये ज़रूर है कि हम लड़कियों की कुछ फिज़िकल प्रॉब्लम होती हैं, लेकिन उसे हम अपने रास्ते की रुकावट नहीं मान सकते. लड़की होना अच्छी बात है.

देश की लड़कियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
लड़की होना बहुत अच्छी बात है. इसे एक समस्या की तरह मत लो. तुम वो सब कर सकती हो, जो तुम चाहती हो, इसलिए आगे बढ़ो.

देश के बाहर कोच का साथ न जाना किस तरह से खेल को प्रभावित करता है?
बिल्कुल सही कहा आपने. हर एक गेम में कोच का साथ होना बहुत ज़रूरी होता है. वो हमारी कमियों को बताने और विरोधी खिलाड़ी को किस तरह से मात देनी है, जैसी बातें बताते हैं. उनके साथ न रहने पर हमें बहुत परेशानी होती है. कोच, फिज़ियो आदि हमारे साथ जाने चाहिए.

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क्या मेडल संघर्ष के दिन भुला देता है?
जी… ऐसा नहीं है. कड़ी मेहनत के बाद हम मेडल जीत पाते हैं. हां, ये ज़रूर है कि कुछ पल के लिए हम उन परेशानियों को दरकिनार कर देते हैं, लेकिन हमारे भीतर हमारा संघर्ष जीवित रहता है.

आपको इंस्पीरेशन किससे मिली?
2008 में जब सुशील कुमारजी ने देश को मेडल दिया, तब मुझे लगा कि मैं भी देश को कुश्ती में मेडल दिला सकती हूं. उसके बाद जापान की दो लड़कियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया.

क्या स़िर्फ जीत के बाद पैसों की बौछार करना सही है या शुरुआती दिनों में खिलाड़ियों को सारी सुविधाएं प्रोवाइड करानी चाहिए?
जी बिल्कुल, जब हम जीतकर आते हैं, तो सभी बहुत ख़ुश होते हैं और गिफ्ट के तौर पर हमें पैसे मिलते हैं, लेकिन मैं ये कहना चाहूंगी कि इसके साथ ही सरकार और तमाम संगठन को आगे आना चाहिए और नए खिलाड़ियों की आर्थिक मदद करनी चाहिए. उन्हें सही ट्रेनिंग, कोच, डायट आदि उपलब्ध कराना चाहिए. इससे आगे वो प्लेयर देश के लिए ज़रूर अच्छा करेंगे. कई बार आर्थिक रुकावटें कई खिलाड़ियों को आगे नहीं बढ़ने देतीं.

क्या मेडल जीतने के बाद प्रेशर बढ़ गया है?
बिल्कुल सही कहा आपने. मेडल जीतने के बाद प्रेशर बहुत बढ़ गया है. और बेहतर करने का दबाव बढ़ जाता है, लेकिन इससे मैं निराश नहीं हूं. इसे हमेशा सकारात्मक रूप से लूंगी, ताकि आगे और अच्छा कर सकूं.

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कम उम्र में सक्सेस को हैंडल करना कितना मुश्किल/आसान है?
देखिए, ये तो है कि मेडल लाने के बाद लोग मेरी बहुत प्रशंसा कर रहे हैं. कई माता-पिता अपने बच्चों को मेरे जैसा बनने की नसीहत दे रहे हैं. देश-विदेश से बधाइयां मिल रही हैं, लेकिन इसे मैं सही तरह से ले रही हूं. मैं जानती हूं कि मैं कहां हूं, इसलिए हमेशा ज़मीन से जुड़ी रहूंगी.

क्या आप जैसे खिलाड़ियों की कहानी नए खिलाड़ियों को मीडिया के माध्यम से बताई जानी चाहिए?
मुझे लगता है कि ज़रूर बताई जानी चाहिए. संघर्ष, परिश्रम, हार-जीत आदि से जुड़ी कहानी बताई जानी चाहिए. इससे नए खिलाड़ियों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. उनका मनोबल ऊपर उठेगा और वो बेहतर परफॉर्म कर सकेंगे.

हमें पता नहीं होता कि कौन-सा सप्लीमेंट कब लें
हमारे और विदेशी खिलाड़ियों में एक जो सबसे बड़ा फर्क़ है, वो है उनका हर चीज़ में परफेक्ट होना. उनके कोच, फिज़ियो आदि उनके साथ होते हैं. वो समय के साथ चलते हैं, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं होता. हमें तो बस सप्लीमेंट दे दिए जाते हैं. अब उसे कब खाना है, कैसे खाना है या कितना खाना है, वो हम पर निर्भर करता है. हमारी डायट का ख़्याल भी हमें ख़ुद ही रखना पड़ता है. इन सब से बहुत फर्क़ पड़ता है.

– श्वेता सिंह