अलग-अलग संस्कृतियों में मनाया जाने वाला पर्व मकर संक्रांति (Happy Makar Sankranti)

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मकर संक्रांति एक ऐसा त्योहार है जो पूरे देश में अलग-अलग संस्कृति में मनाया जाता है. देशभर में ऐसे कई प्रदेश हैं, जहां मकर संक्रांति को विभिन्न नामों से जाना जाता है. यह पर्व सूर्य के राशि परिवर्तन करने के साथ ही सेहत और जीवनशैली से इसका गहरा नाता है. इन सबके साथ ही यह लोगों की धार्मिक आस्था का भी पर्व है. वहीं यह पर्व किसानों की मेहनत से भी जुड़ा है, क्योंकि इसी दिन से फसल कटाई का समय हो जाता है.

सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है

विश्वास किया जाता है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है. लिहाजा, खिचड़ी का भोग लगाया जाता है. गुड़-तिल, रेवड़ी आदि बांटी जाती है. इस पर्व का संबंध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है, तीनों चीज़ें जीवन का आधार हैं. प्रकृति के कारक के तौर पर सूर्यदेव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है. सूर्य की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज पैदा करती है, जिससे हर प्राणी का भरण-पोषण होता है.

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क्या करते हैं?

देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं. इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है. तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को ‘तिल संक्राति’ के नाम से भी जाना जाता है.

चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है. इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है. घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है. इस दिन गंगा नदी में स्नान व सूर्योपासना के बाद ब्राह्मणों को गुड़, चावल और तिल का दान भी अति श्रेष्ठ माना गया है. महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति से सूर्य की गति तिल-तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक-दूसरे का वितरित करते हुए शुभकामनाएं देकर यह त्योहार मनाया जाता है.

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यह पर्व सेहत के लिहाज से बड़ा ही फायदेमंद है. सुबह-सुबह पतंग उड़ाने के बहाने लोग जल्द उठ जाते हैं वहीं धूप लगने से विटामिन डी मिल जाता है. इसे त्वचा के लिए भी अच्छा माना गया है. सर्द हवाओं से होने वाली कई समस्याएं भी दूर हो जाती हैं. इसीलिए इस दिन को सुंदर और रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाने का दिन भी माना जाता है. लोग बड़े उत्साह से पतंगें उड़ाकर पतंगबाज़ी के दांव-पेचों का मज़ा लेते हैं.

– हरिगोविंद विश्वकर्मा