लाइमलाइट की दुनिया में भाई-भतीजावाद, शोषण का इतिहास काफ़ी लंबा रहा है. लेकिन हाल ही में मशहूर संगीतकार ए. आर. रहमान के सनसनीखेज बयान ने लोगों को तो चौंका ही दिया.
क्या वाक़ई फिल्म इंडस्ट्री में क़ाबिलियत को धर्म के पैमाने से भी तोला जाने लगा है? देखिए और सुनिए मेरी सहेली के इस पॉडकास्ट में इसी से जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में दो वरिष्ठ पत्रकारों से, जिनकी बातें चौंकाती भी हैं और हैरान भी करती हैं- पूरा पॉडकास्ट देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें-
दरअसल, ए. आर. रहमान ने पिछले कई सालों से फिल्मों में काम न मिलने को अपने धर्म से जोड़ दिया था. अब इस पर काफ़ी दिनों से बवाल मचा हुआ है.

चूंकि वे मुस्लिम हैं (धर्म बदलने से पहले वे हिंदू थे) इस करके उन्हें काम नहीं मिल रहा सुनने में बड़ा अटपटा लगता है. इस तरह से तो इंडस्ट्री के खानों को भी सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिए. फिर चाहे वो सलमान खान हो, आमिर खान या शाहरुख खान.

अब यह रहमान की हताशा थी या उनका कोई और उद्देश्य यह तो वे ही बेहतर जान सकते हैं. लेकिन कहते हैं ना आपके एक विवादस्पद बयान से आज के सोशल मीडिया के युग में आग लगते देर नहीं लगती. सेलेब्स हो या मीडिया से जुड़े लोग कोई उनके इस स्टेटमेंट को सही ठहरा रहा तो कोई प्रोपोगंडा कह रहा तो किसी ने इसे सिरे से ही खारिज कर दिया.
निर्माता-निर्देशक सुभाष घई का कहना है कि ये सभी बातें पहले भी थीं, आज भी हैं और कल ही रहेंगी. हमें इस तरह की बातों में उलझने की बजाय अपने काम पर फोकस करना चाहिए. आप अच्छा और बेहतरीन करेंगे तो कोई भी आपको अनदेखा कर ही नहीं सकता. आपका हुनर, मेहनत और सच्चाई रंग लाती है, न कि पब्लिसिटी स्टंट.

सीनियर अदाकारा वहीदा रहमान ने भी सुभाष घई की तरह अपने नज़रिए को कुछ यूं पेश किया. उनका कहना है कि किस पर विश्वास करें और कितना विश्वास करें... यह सच भी है या नहीं. हमें इन सब बातों में नहीं पड़ना चाहिए. वे इस तरह की बातों को बिल्कुल बढ़ावा नहीं देना चाहतीं. न ही ऐसी चीज़ों में शामिल ही होना चाहती हैं.

उनका कहना है सभी प्रेम-शांति से रहें. हमारा मुल्क है यह, सभी ख़ुशी के साथ रहें. रही बात काम की तो इसमें ऊपर-नीचे तो होता ही रहता है. एक वक़्त के बाद तो लोग भी नए की ख़्वाहिश रखते हैं. कहते हैं कि किसी नए या अलग इंसान को लाओ. इन सब वजहों से कुछ लोग पीछे रह जाते हैं. माना कुछ लोग ऊंचाई पर पहुंचते हैं, लेकिन वह हमेशा वहीं रहेंगे, ऐसा भी तो नहीं होता है ना!..
एकबारगी हम यदि फिल्मों के इतिहास पर नज़र डालें तो कमोबेश ऐसा कम ही होता रहा है. हां, वहीदा रहमान की बातों से सहमत हैं कि हर किसी की चाह रहती है कि समय के साथ कुछ नया सुना और देखा जाए. अब यह कलाकार पर निर्भर करता है कि वो क्या और कैसे प्रस्तुत करता है. यदि इंडस्ट्री का दोहरा मापदंड कलाकारों को लेकर रहा है तो हो सकता है उनकी गिनती मुट्ठी भर हो. लेकिन इसके लिए पूरी जमात को कठघरे में खड़ा कर देना समझदारी नहीं है. यह भी उतना सच है कि कला को सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. कलाकार ही तो हैं, जो धर्म और सरहदों से परे रहते हैं. तभी तो हम हर संगीत फिर चाहे वो क्लासिकल हो, ग़ज़ल, सूफी हो या फिर पॉप हो, सुनते हैं और दीवाने होते हैं. संगीत तो दिल में बसता है और दिलों को जोड़ता है.

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